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तीसरी संस्कृत क्रांति अगर भारत में नहीं आएगी तो फिर कहाँ?
आशुचित्र- तीसरी संस्कृत क्रांति लाने में केवल भारत ही सक्षम है, यदि भारत इसे गंभीरता से नहीं लेता है तो कोई नहीं लेगा।
अपने वेब सर्च इंजन पर टाइप करें- “2009 की शीर्ष दस सबसे अधिक चोरी की गई किताबें” तब आप क्या देखेंगे? एक संस्कृत पुस्तक- कामसूत्र। आप इसे यह कहकर खारिज कर सकते हैं कि “यह संस्कृत के बारे में नहीं बल्कि कामुकता के बारे में है” लेकिन आप इसका सही सारांश नहीं समझे। यहाँ बात यह मायने रखती है कि संस्कृत में कुछ अर्थपूर्ण था यौन विज्ञान के बारे में कहने के लिए। इतना अर्थपूर्ण कि 1,500 से अधिक वर्षों के बाद भी आज भी इसके लिए पूरी दुनिया में आकर्षण बरकरार है।यही हम गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, व्याकरण, ध्वनिविज्ञान, कम्प्यूटेशनल भाषा विज्ञान, फार्मेसी, औद्योगिक रसायन विज्ञान, धातु विज्ञान, सौंदर्यशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान, मनोविज्ञान और निश्चित रूप से योग और चेतना अध्ययन के बारे में कह सकते हैं परंतु अलग-अलग परिमाण है। अगर हम खेलों की बात करें तो सबसे अच्छा रणनीति वाला खेल जिसे हम संस्कृत में चतुरंगा या शतरंज कहते हैं वो है।
संस्कृत का अर्थ यह है कि यह सार्वभौमिक है और समय की कसौटी पर खड़ी है। इसका यह भी अर्थ है कि इसने अन्य संस्कृतियों के विज्ञानों को गहराई से प्रभावित किया है। प्रसिद्ध ब्रिटिश विद्वान आर्थर ए मैकडॉनेल ने लिखा-
पुनर्जागरण के बाद से इतिहास में इस तरह के विश्वव्यापी महत्त्व की कोई घटना नहीं हुई है जो कि अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत साहित्य की खोज से हुई थी।
शायद वे बढ़ा-चढ़ा के कह रहे थे लेकिन हम लगभग उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोपीय विद्वानों के लिए संस्कृत की खोज का मतलब भूल गए हैं। उदाहरण के लिए हम भाषा का अध्ययन लेते हैं। यूरोपीय विद्वान ध्वन्यात्मकता या भाषण ध्वनियों के अध्ययन के बारे में लगभग कुछ नहीं जानते थे। वे आवाज़ वाले और बिना आवाज़ वाले व्यंजन के बीच अंतर नहीं कर सकते थे। आवाज़ वाले व्यंजन को ध्वनि रज्जु को कम्पन करके बनाया जाता है जबकि बिना आवाज़ वाले व्यंजन ऐसे कम्पन को पैदा नहीं करते हैं। व्यंजन के कई जोड़े हैं – जैसे क/ग, च/ज, प/ब या ट/ड जहाँ मुँह की स्थिति समान होती है लेकिन आवाज़ या बिना आवाज़ का भेद उन्हें अलग बनाता है। उदाहरण के लिए प और ब दोनों ही ओष्ठ्य हैं क्योंकि उन्हें उच्चारण करने के लिए आप होंठ का उपयोग करते हैं। ये अलग-अलग हैं क्योंकि प और ब आवाज उठाई है। ट और ड के बारे में भी यही कहा जा सकता है। दोनों दन्त्य हैं क्योंकि उन्हें उच्चारण करने के लिए जीभ की नोक दांतों को छूती है लेकिन ट बिना आवाज़ की है और ड में आवाज है। वैसे कुछ उल्लेखनीय आधुनिक ध्वन्यात्मकता के कई तकनीकी शब्द जैसे कि लेबियाल (ओष्ठ्य), डेंटल (दंत्य), ओक्लूसिव (स्पर्स), एस्पिरेटेड (महाप्राण) या वॉइस्ड (घोष) संस्कृत शब्दों के अनुवाद हैं जिनको 2,500 साल पहले जाना जाता है!
पश्चिमी विद्वानों द्वारा संस्कृत की खोज के बिना आधुनिक भाषाविज्ञान का जन्म का होना नामुमकिन था। पाणिनी के व्याकरण में 4,000 नियमों में संपूर्ण संस्कृत भाषा का वर्णन है। यदि आप इसे प्रिंट करते हैं तो यह मुश्किल से 40 मुद्रित पृष्ठ लेगा। पाणिनि के नियमों को एक धातु भाषा में बीजांक किया गया था जिससे उन्हें अत्यंत संक्षिप्त होने में मदद मिली। यदि आप उन प्राकृतिक भाषा में कूटाणुवाद करते हैं तो यह 500 से अधिक पृष्ठों की पुस्तक में आसानी से बदल जाएगी। अमेरिकी भाषाविद् एल ब्लूमफील्ड ने कहा था कि पाणिनी का व्याकरण मानव बुद्धि के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्मारक है। वास्तव में हम आसानी से कह सकते हैं कि संस्कृत स्वयं मानव बुद्धि के सबसे महान स्मारकों में से एक है।
न केवल भाषा विज्ञान में बल्कि उन्नीसवीं सदी के सामाजिक विज्ञान में भी संस्कृत की खोज का गहरा प्रभाव पड़ा। इसे मैं संस्कृत दूसरी क्रांति कह सकता हूँ। पहला युग मध्य युग में आया जब मुस्लिम विद्वानों ने भारतीय ज्ञान को मुख्य रूप से स्पेनिश अल-अंडालस के माध्यम से पश्चिम में स्थानांतरित किया। अल-ख्वारिज़मी (गणित), एविसेना (चिकित्सा), अल-फ़रगनी (खगोल विज्ञान) जैसे मुस्लिम लेखकों ने जो भारतीय ग्रंथों से गहराई से प्रभावित थे उन्होंने टोलेडो स्कूल ऑफ़ ट्रांसलेटर्स के प्रयासों से पश्चिम में भारतीय विज्ञान को उपलब्ध कराया। ऐसा प्रतीत होता है कि पहले अरबी अंक जो वास्तव में भारतीय थे और जो यूरोप में लिखे गए थे वे एल एस्कोरिअल (मैड्रिड) में कोडेक्स डी 12 में हैं। मुस्लिम लेखक जैसे कि अल्मरिया (स्पेन) के इब्न सईद ने अपनी 11वीं शताब्दी की पांडुलिपि तबक़त उल-उमाम(राष्ट्रों की श्रेणियां) में भारत के प्रति अपने ऋण को स्वीकार करने में संकोच नहीं किया। ज्ञान की भूमि के रूप में भारत की छवि इस्लामी दुनिया के माध्यम से यूरोप में प्रवेश किया और यूरोपीय ज्ञान के लिए सामान्य ज्ञान बन गई। फ्रांसीसी लेखक वोल्टेयर ने भारत को मानव सभ्यता के विकास की भूमि के रूप में देखा और अंकों, शतरंज और उपचारात्मक दंतकथाओं के आविष्कारक के रूप में देखा।
आप कह सकते हैं “ठीक है, यह सब अतीत की बातें है। भविष्य के बारे में क्या विचार है? क्या संस्कृत अभी भी एक तीसरी क्रांति प्रदान कर सकती है?” इसे हम इन शब्दों में कहें कि क्या संस्कृत आज आधुनिक दुनिया के लिए प्रासंगिक है? मेरा मानना ​​है कि संस्कृत एक जीवित अनुशासन है जो अभी भी आधुनिक मानव विज्ञान द्वारा उठाए गए कुछ समस्याओं को हल करने में योगदान कर सकती है।
मुझे क्षमा करें यदि थोड़ी देर के लिए मैं कुछ तकनीकीयों में जाता हूँ लेकिन अपनी बात को साबित करने के लिए मैं सिर्फ कई विश्लेषणात्मक उपकरणों का उल्लेख करना चाहूँगा जिन्हें केवल बीसवीं शताब्दी में पश्चिम में खोजा गया था। दूसरी ओर भारतीय विद्ववानों ने सचेत रूप से इन अवधारणाओं को कई शताब्दियों पहले नियोजित कर रहे थे। केवल कुछ संख्याओं की बात करें तो शून्य प्रत्यय, भाषा और निरूपक भाषा के बीच का अंतर, संदर्भ संवेदनशील नियमों का उपयोग, इस तथ्य को कि व्याकरण की कल्पना लगभग एक प्रोग्रामिंग भाषा के रूप में की गई थी जो अनंत संख्या में अच्छी तरह से निर्मित अभिव्यक्तियों का निर्माण करने में सक्षम थी। हमने अभी भी भारतीय सत्ता मीमांसा और तर्क की सभी क्षमताओं को नहीं समझा है और न ही हमने उन सभी तकनीकी संसाधनों का दोहन किया है जो मीमांसा के उपदेशक हमें प्रदान कर सकते हैं। संस्कृत के अन्य क्षेत्रों में हम आधुनिक दुनिया की बढ़ती रुचि को ऐसी चीजों में देख रहे हैं जैसे संस्कृत सौंदर्यशास्त्र में रस और ध्वनि के सिद्धांतों का उदाहरण दिया गया है जो हमें सौंदर्य आनंद की प्रकृति को समझने में मदद कर रहे हैं।दर्शनशास्त्र के कई क्षेत्रों में रुचि है। उदाहरण के लिए चार अलग-अलग तत्वों की एक भौतिक इकाई के रूप में मानव मन का वर्णन है जो कि है बुद्धी, सिट्टा,अहंकार और मानस। मन और चेतना के बीच का अंतर इसलिए पश्चिम में धुंधला है और चेतना अध्ययन करने की आवश्यकता है। चिकित्सा और एकाग्रता की तकनीक के रूप में अवचेतना इतनी लोकप्रिय हो गई है कि हम इसके भारतीय मूल को भूल गए हैं।
आज कई लोग योग,आयुर्वेद और ध्यान के कारण संस्कृत में रुचि ले रहे हैं। पाली और प्राकृत की तरह संस्कृत और इसकी व्युत्पन्न भाषाएँ मन में मुक्ति के साधन के रूप में साहित्य का खजाना है जिसका ना ही नशा और अवसाद है। संक्षिप्त में कहें तो संस्कृत ग्रंथों में अभी भी कई चीजें खोजी जानी हैं जो आज उपयोगी हो सकती हैं। समस्या यह है कि उन्हें पुनः प्राप्त करना एक आसान काम नहीं है। एक तरफ संस्कृत के भाष्य का ज्ञान रखने वाले लोग बहुत बार संबंधित पश्चिमी विषयों में बहुत कम रुचि दिखाते हैं। दूसरी ओर आज के सबसे अधिक प्रासंगिक मुद्दों की अच्छी समझ रखने वाले लोगों को आमतौर पर संस्कृत स्रोतों का बहुत ही खंडित ज्ञान है। दो दुनियाओं के बीच एक बुनियादी पल बनाने की ज़रूरत है ताकि संस्कृत अध्ययन पूर्वी और पश्चिमी मानव विज्ञान के बीच की खाई को पाट सकने के प्रयास में सक्षम हो।
एक बात साफ है कि तीसरी संस्कृत क्रांति भारत में ही शुरू हो सकती है। अगर भारत संस्कृत को गंभीरता से नहीं लेता है तो कोई भी नहीं लेगा। कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-
  1. पारंपरिक भारतीय विद्वानों की रक्षा करें। वे एक लुप्तप्राय प्रजाति और उपेक्षित ज्ञान का भंडार हैं। यदि वे नष्ट हो जाते हैं तो संस्कृत ग्रंथों की समझ और कठिन हो जाएगी। इंडिक अकादमी ने पहले ही इसे करना शुरू कर दिया है।
  2. संस्कृत को जीवन के पिछड़ेपन का प्रतिनिधित्व करने वाला मत समझिए। संस्कृत ग्रंथ खुले विचारों वाले और मुक्त विचारों से भरे हैं। हमें इसके तर्कसंगत और उदार गुणों पर जोर देना चाहिए। आधुनिक बनो और अपने  बुद्धि को स्वतंत्र करने के लिए संस्कृत का उपयोग करो।
  3. इस समय यह मत भूलिए कि संस्कृत केवल एक विश्लेषणात्मक भाषा नहीं है बल्कि एक आध्यात्मिक भी है जिसमें गायन और ध्यान के लिए भी अच्छा है। एक ऐसी भाषा जो की मानवता और विश्व शांति के लिए एक है। एक ऐसी भाषा जो कि संवाद के लिए है।
  4. संस्कृत को किसी विशेष विचारधारा से न जोड़ें। यहां तक ​​कि अगर आप एक कट्टर हिंदू हैं तो संस्कृत को हमेशा की तरह प्रकल्प करें। कई लोगों के लिए एक खुली खिड़की तो कईओं के लिए अक्सर परस्पर विरोधी विचार।
  5. संस्कृत को सुलभ बनाएं। जैसा कि संस्कार भारती ने साबित किया है। संस्कृत आसानी से और खुशी से उन लोगों द्वारा सीखी जा सकती है जो पहले से ही एक भारतीय भाषा जानते हैं।
  6. विदेशी विद्वानों के साथ एक मज़बूत जाल का निर्माण करें। जापान से लेकर अर्जेंटीना, अमेरिका से लेकर रूस, दक्षिण अफ्रीका से लेकर स्वीडन और थाईलैंड से लेकर कोस्टा रिका तक पूरे विश्व में छोटे-छोटे समूहों द्वारा संस्कृत को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  7. असली रहें। झूठे दावे न करें। संस्कृत न तो सभी भाषाओं की जननी है और न ही सबसे प्राचीन है। कंप्यूटर के लिए संस्कृत सबसे उपयुक्त भाषा भी नहीं है। संस्कृत को खाली दावों की आवश्यकता नहीं है। इसके पहले से ही कई मजबूत बिंदु हैं। उन्हें खोजने का प्रयास करें।
  8. योग की तरह संस्कृत को भी सार्वभौमिक बनाएँ। हालाँकि इसके भारतीय मूल को मत भूलिए।
  9. संस्कृत के उपयोग से नर्म दिल के साथ एक मज़बूत भारतीय संस्कृति का निर्माण करें जो कि एक संस्कृति जो सार्वभौमिक और गैर-बहिष्कृत हो और विविधता के लिए खुली हो और जो मानव बुद्धि का उत्पादन करने वाली सबसे परिष्कृत और महानगरीय भाषाओं में से एक का उपयोग करती हो जो कि है संस्कृत।
निष्कर्ष निकालें तो सदियों से भारतीय बुद्धिजीवियों ने संस्कृत ज्ञान प्रणालियों की उपज की है। ये बुद्धिजीवि अब भारतीय वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, भौतिकविदों, गणितज्ञों, इंजीनियरों और कंप्यूटर जादूगरों के एक समूह में बदल गए है जो पूरी दुनिया में काम कर रहे हैं। भारत केवल आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में अपनी धर्मनिरपेक्ष प्रतिभा को लागू कर रहा है और उसी उत्कृष्टता को प्राप्त कर रहा है जो प्राचीन काल में हासिल की गई थी। इसलिए भारत के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह अतीत के साथ अपने संबंधों को न खत्म करें। इसे एक सभ्यता की दीर्घकालिक स्थिरता कहा जा सकता है जो इसके अस्तित्व की जड़ में निहित है। संस्कृत इस दीर्घकालिक स्थिरता का हिस्सा है। हमें इसे खारिज नहीं करना चाहिए।
ऑस्कर पुजोल एक कैटलन इंडोलॉजिस्ट हैं। उन्होंने बीएचयू वाराणसी में 17 साल बिताए और वहाँ स्पेनिश पढ़ाई और संस्कृत में पीएचडी हासिल की। उन्होंने संस्कृत भाषा और दर्शन के कई पहलुओं पर कई पत्र लिखे हैं। भारत और संस्कृत में उनके कई योगदानों में से एक संस्कृत-कैटलन शब्दकोश है।