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ऊर्जा के लिए उचित घोषणापत्र- परमाणु विकल्प की ओर ध्यान

आशुचित्र- दीर्घावधि के लिए भारत की ऊर्जा मांग के विषय में सोच रही सरकार को परमाणु ऊर्जा पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

भारत दुनिया में तेज़ी से बढ़ने वाली सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ऊर्जा की खपत और आर्थिक विकास के बीच संबंध की घनिष्ठता को हम जनते हैं। इसे उन नई मांगों में शामिल करें जिन्हें सरकार ने अपनी योजनाओं में जोड़ा है। पिछले चार वर्षों में इसने 18,000 से अधिक गाँवों का विद्युतीकरण किया है और लाखों घरों को बिजली कनेक्शन देने के लिए काम कर रहा है जो अभी तक ग्रिड से जुड़े नहीं थे। सरकार 2022 तक भारतीय रेलवे के 100 प्रतिशत विद्युतीकरण को प्राप्त करने का लक्ष्य भी बना रही है।

भारत की अर्थव्यवस्था और जनसंख्या बढ़ने के साथ ही बिजली की मांग बढ़ेगी जिसमें विनिर्माण क्षमता और जीवन की कई सुख-सुविधाओं के लिए नागरिक अधिक समृद्ध होंगे। कई अध्ययनों ने भविष्यवाणी की है कि इस सदी के मध्य तक भारत की बिजली की ज़रूरतें लगभग आठ गुना बढ़ जाएँगी। हालाँकि नई क्षमता को स्थापित करने से अधिक जो बात महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि हम किस प्रकार की ऊर्जा को जोड़ रहे हैं क्योंकि लक्ष्य केवल लागत की परवाह किए बिना बढ़ती ऊर्जा को पूरा करना नहीं है। भारत ने पहले ही 2030 तक अपने उत्सर्जन की तीव्रता को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में 33-35 प्रतिशत कम करने का वादा किया है।

फरवरी 2019 तक भारत ने 349 गीगावाट बिजली उत्पादन किया है। इसमें से कुछ 64 प्रतिशत तापीय ऊर्जा से, 13 प्रतिशत पनबिजली ऊर्जा से, 21 प्रतिशत अक्षय ऊर्जा से और 2 प्रतिशत परमाणु ऊर्जा से आता है। नरेंद्र मोदी ने सबसे बड़ा निवेश विस्तार नवीकरणीय ऊर्जा में किया है जिसके मिश्रण में हिस्सेदारी लगभग 9 प्रतिशत बढ़ी है। थर्मल को सबसे बड़ा नुकसान हुआ है। इसके शेयर में 7 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित करने के लिए भारत को प्रतिबद्ध किया जिसमें से 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा होगी। हालाँकि जीवाश्म ईंधन से दूर जाने के लिए चुना गया कोई भी कदम सराहनीय है लेकिन सौर ऊर्जा की अपनी गंभीर सीमाएँ हैं जिन्हें अभी तक संबोधित नहीं किया जा सका है और भारत का एक ऐसी तकनीक को थोक मात्रा में अुानाना चिंताजनक है।

इससे भी बुरी बात यह है कि मोदी ने सबसे ज़्यादा ध्यान सिर्फ एक किस्म की ऊर्जा को दिया है जिसे वे 2030 तक कुल ऊर्जा मिश्रण के 40 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहते हैं। वर्तमान में यह सौर ऊर्जा का पीछा करने की तुलना में थोड़ा अधिक है।

भारत के लिए सौर ऊर्जा के लिए कोई निर्वाण नहीं है। एकमात्र वास्तविक विकल्प परमाणु का इस्तेमाल करना है। यदि भारत को अपनी आर्थिक वृद्धि के लिए पर्याप्त ऊर्जा चाहिए और उस कहानी में उच्च गति वाली रेल, इलेक्ट्रिक कारें, और विद्युत शक्ति के अन्य प्रतिस्थापन शामिल हैं तो भारत को परमाणु ऊर्जा पर तेज़ी से काम करना शुरू करना चाहिए।

इसलिए यहाँ ऊर्जा तंत्र को मज़बूती प्रदान करने के लिए सरकार के लिए यह एजेंडा प्रस्तुत है।

  1. किताबों तक ही सीमित रहे फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (एफबीआर) और उन्नत खारे पानी के रिएक्टर (एएचडब्ल्यूआर) पर ज़ोर दें और इसे उपयोग में लाने के लिए एक दशक या उससे अधिक समय की देरी हो रही है।
  2. 9,900 मेगावाट (मेगावाट) जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण में तेज़ी लाएँ।
  3. वर्तमान में अनुबंधित रिएक्टरों के अलावा कम से कम 50 और को उपयोग हेतु उपलब्ध करवाएँ। वर्तमान में कुछ 40 रिएक्टर परियोजनाएँ चल रही हैं या कानूनी जटिलताओं के कारण रुकी हुई हैं। हालाँकि 50 अतिरिक्त रिएक्टर से एक अच्छी शुरुआत हो सकती है लेकिन भारत के लिए अगले 50 वर्षों में 300-400 रिएक्टर रखने के बारे में सोचना आदर्श होगा। इतने बड़े निवेश के साथ भी परमाणु ऊर्जा अभी भी भारत के कुल ऊर्जा मिश्रण का 35 प्रतिशत से भी कम है। वास्तव में, संयुक्त राज्य अमेरिका अपने 315 मिलियन लोगों के लिए सौ रिएक्टरों के साथ आज एक समान ऊर्जा मिश्रण का प्रतिनिधित्व करता है।
  4. संयुक्त रूप से दुनिया भर में परमाणु निर्माण करने के लिए रोसाटॉम के प्रस्ताव को स्वीकार करने का प्रयास करें और अरेवा एवं वेस्टिंगहाउस जैसी अन्य एजेंसियों के साथ समान निर्माण समझौतों में प्रवेश करें।
  5. भारत परमाणु निर्यात बाजार में प्रवेश करे और आदर्श रूप से पूर्ण रिएक्टरों का प्रस्ताव रखे लेकिन इससे भी कम समय में भारत  एक प्रमुख परमाणु घटक विनिर्माण केंद्र बन जाना चाहिए। भारत में 220 मेगावाट, 540 मेगावाट और 700 मेगावाट रिएक्टर हैं जो वर्तमान में उपलब्ध बड़े मुख्यधारा के रिएक्टरों की तुलना में छोटे और सस्ते हैं। अफ्रीका जैसे उभरते ऊर्जा बाज़ारों- नाइजीरिया, केन्या, आदि का उपयोग किया जा सकता है। इस बीच भारत को स्वदेशी 1 गीगावॉट रिएक्टर विकसित करना चाहिए।
  6. परमाणु घटकों के विनिर्माण में पूर्ण निजी क्षेत्र के प्रवेश की अनुमति दें- इससे विदेशी भागों पर घरेलू निर्भरता कम होगी, परमाणु बाज़ार में भारत की भूमिका को मज़बूत किया जा सकेगा और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। निजी ठेकेदारों के हाथों में परमाणु प्रौद्योगिकी और विखंडनीय सामग्री का विचार भले ही निंदनीय हो लेकिन निजी परमाणु उपयोगिताओं ने विश्व स्तर पर काफी अच्छा किया है। निजी स्वामित्व वाले रिएक्टर काफी बेहतर प्रदर्शन करते हैं जिनमें से 94 प्रतिशत विश्व के औसत तक भार उठा सकते हैं जबकि सरकारी रिएक्टरों में बमुश्किल 44 प्रतिशत ही बेंचमार्क प्राप्त करते हैं। यह भी पाया गया कि 82 प्रतिशत रिएक्टर औसत से ऊपर (81 प्रतिशत) भार पर संचालित उदारीकृत परमाणु ऊर्जा बाज़ारों में काम कर रहे हैं, जबकि विनियमित बाजारों में केवल 40 प्रतिशत ने ऐसा किया। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि परमाणु बाज़ार में निजी इक्विटी में वृद्धि हुई है, औद्योगिक सुरक्षा भी बढ़ गई है, दुर्घटना दर 1.04 से 0.33 प्रति 200,000 कार्य-घंटों में हो रही है। निजी क्षेत्र ने दायित्व के प्रश्न को संबोधित करने में अपनी सामान्य संसाधनशीलता दिखाई है।

जयदीप ए प्रभु विदेश व परमाणु नीति के विशेषज्ञ हैं।