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कृषि के लिए उचित घोषणापत्र- किसान और उपभोक्ता केंद्रित समाधान

आशुचित्र- कैसे भारतीय कृषि क्षेत्र किसान और उपभोक्ता केंद्रित उपायों से नवाचार का स्थल बन सकता है।

हमारी नीति संरचना इस तरह किसानों के लिए कृषि को बनाएगी एक लाभकारी उद्यम-

  1. खान पान के बदलते स्वरूप का लाभ उठाते हुए खाद्य उत्पादन और कृषि उपज को मांग आधारित बनाना।
  2. जलवायु के प्रति लचीले कृषि प्रबंधन के माध्यम से बदलते मौसम और तेजी से घटते प्राकृतिक संसाधन के कारण कृषि उत्पादन जोखिम को कम करना, और
  3. इस सोच के साथ कि एक उपाय देशभर में सभी किसानों के लाभदायक नहीं हो सकता है, सभी किसानों के लिए किसान-केंद्रित नीति निर्धारण

मांगप्रेरित उत्पादन

उपभोक्ताओं की बदलती मांग जैसे गुण, सेहत, पोषण, सुरक्षा, विविधता और सुविधा सब्ज़ी, फल, पोषक-अनाज (बाजरा), दाल जैसे कृषि उत्पादों और दूध और मीट जैसे प्राप्त उत्पादों में विविधता के लिए अच्छे अवसर प्रदान करती है। इस अवसर से और भी लाभ उठाने के लिए किसानों को फसल प्रबंधन की अच्छी जानकारी और बाज़ार से लागत और प्राप्ति की कुशल जानकारी होना आवश्यक है। इन सब में तेज़ी के लिए

  • भारत के संसाधनहीन गरीब लेकिन स्वयं संसाधन सम किसानों की मदद के लिए सभी हितधारकों की शक्ति को मिलाकर, सार्वजनिकनिजी उत्पादक भागीदारी के माध्यम से समावेशी थाली से खेत तक मूल्य श्रृंखलाओं के विकास को बढ़ावा देना।
  • ग्रामीण स्तर पर कृषि सेवा प्रदाताओं की मदद से किसानों को समसामायिक और निजी हितकर जानकारी। 12 करोड़ किसानों के लिए ऐसे 30 लाख उद्यमियों की आवश्यकता है और यह सरकार द्वारा सबसे बड़ा कौशल आधारित रोजगार सृजन होगा।
  • डिजिटल मंचों द्वारा इस नए समय के कृषि सेवा उद्यमियों की मदद करना जो स्मार्ट तकनीकों के माध्यम से उच्चउपज, प्रारंभिक चेतावनी, अपशिष्ट सामग्री शमन के उपायों से कृषि विस्तार को “वैज्ञानिक के अंतिम मील” के पारंपरिक प्रितिमान से “किसान के पहले मील” में परिवर्तित करेंगे।
  • देश के सर्वोच्च 100 कस्बों में सब्ज़ियों के उत्पादन के क्षेत्र को जलवायु नियंत्रित खेती की सुविधा से बनाना और उनको गाँव के युवाओं को किराए पर देना।
  • फसल कटाई के बाद के नुकसान से बचने के लिए खाद्य प्रसंस्करण और फसल विशिष्ट भंडारण और हैंडलिंग प्रणालियों को प्रोत्साहित करना।
  • विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से उच्च लागत के बुनियादी ढांचे की भरपाई  के लिए कृषि उपज मूल्यवर्धित निर्यातों पर ज़ोर देना।
  • किसानों को अपनी फसल को बेचने के लिए एपीएमसी अधिनियम में सुधार करना और फसलों के कटने के बाद की सेवा संगठनों में मंडियों को बदलने के लिए सुधार।
  • किसानों को अपनी फसलों को लगाने से पहले उनकी कीमतों की जानकारी के बारे में सक्षम बनाने के लिए कमोडिटी डेरिवेटिव बाज़ारों को गहरा करना।
  • किसानों की फसलों के उत्पादन से पहले राष्ट्रीय कृषि बाज़ार को जाँचना और फसलों पर उनके असर को देख कर डाटा विश्लेषण करना।
  • घरेलू कीमतों में गिरावट के समय किसानों का समर्थन करने के लिए मूल्य स्थिरीकरण कोश के लिए कृषि उत्पादों के आयात पर सीमा शुल्क को अलग रखना।

जलवायुलचीली खेती

सिर्फ कुछ ही हिस्से जहाँ खेती के लिए सामान्य रूप से पानी पहुँच जाता है, उसके अलावा भारत की अधिकतम खेती बारिश पर निर्धारित है। जिस तरह मौसम में बदलाव बहुत तेज़ी से देखने को मिल रहा है उसकी वजह फसल के उत्पादन पर भी गहरा असर हो रहा हैप्राकृतिक संसाधन जैसे भूमिगत पानी और पृथ्वी के ऊपरी हिस्से की मिट्टी बहुत तेज़ी से घट रही है। ऐसे में अपने देश की खेती को और भी टिकाऊ बनाने के लिए-

  • हर किसान के खेत तक पानी पहुँचाने के लिए राष्ट्रीय सिंचाई प्राधिकरण की स्थापना करना। जल आपूर्ति (विभिन्न क्षेत्रों में जल संचय) और खपत (कुशल पंपों और सुक्ष्म सिंचाई) के लिए खाका (ब्लूप्रिंट) और प्राकृतिक जल निकायों के पुनरोद्धार के लिए रोडमाप तैयार करना।
  • प्राकृतिक संसाधनों की मानचित्र तैयार करना, समय-समय पर देश की ऊपरी मिट्टी और जल संसाधन की वर्तमान स्थिति और भविष्य स्थिति की जानकारी को नोट करना जिससे समय-निर्धारित जीर्णोद्धार कार्य किया जा सके और किसानों को उनके निर्णयों के कारण संसाधन-खपत के विषय में समझाया जा सके।
  • रिमोट सेन्सिंग और ड्रोन निगरानी के द्वारा समीक्षा से किसानों के दावों के शीघ्र भुगतान के लिए फसल बीमा योजना को सुदृढ़ करना।
  • पाली संस्कृति, परमाकल्चर, मधुमक्खी पालन, पशुपालन, कृषि वानिकी और नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से कृषि प्रणाली को प्रकृति के अनुसार लचीला बनाना।
  • देसी किस्म के बीज और ऐसी नस्लों के बीज पर अनुसंधान और विकास कार्य करना जो प्राकृतिक रूप से बदलते मौसम और आर्द्रता की कमी को झेलने की क्षमता रखते हों।
  • प्रतिस्थापन दरों में सुधार से खेतों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए फसलों के उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के लिए सामुदायिक स्वामित्व और संचालन वाले बीज बैंकों की स्थापना करना।

किसान केंद्रित हस्तक्षेप

भारतीय किसान उतने ही विविध हैं जितना कि भारत देश है- बड़े और छोटे, ज़मीन के मालिक और किरायेदार, औरत और आदमी, बूढ़े और जवान, अन्य। जबकि हमें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए बड़े और मध्यम किसानों को बढ़ावा देना है लेकिन साथ ही हमें छोटे और सीमांत किसानों की रक्षा भी करनी है। सभी किसानों को बढ़ावा देने के लिए हमें यह करना होगा-

  • किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को छोटे स्तर के किसानों के शक्ति एकत्रीकरण तंत्र के रूप में प्रोत्साहित करना है
  • उत्पादक संगठन प्रचार संस्थाओं (पोपी) को सशक्त कर स्वशासन क्षमता और व्यवसाय प्रबंधक योग्यता को विकसित कर मज़बूत एफपीओ बनाना।
  • सफाई, वर्गीकरण, छँटाई और परीक्षण के लिए खेत स्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास और खेतीहर उपकरण को किराये पर लेने की प्रणाली की स्थापना कर एफपीओ को वित्तीय सहायता प्रदान करना।
  • ज़मीन के मालिकों के एकत्रीकरण के लिए संगठन के नए तरीकों का प्रोत्साहन करना, जहाँ हर किसान अपने खेत का मालिक रहे जिससे खेती और पूंजी निवेश में देश को आर्थिक पैमाने पर सफल बनाया जा सके।
  • अतिरिक्त स्रोतों की सहायता से खेती की आय को बढ़ाना जैसे डेरी, मुर्गीपालन, शहद बनाना, सौर्य ऊर्जा बनाना, खेतीहर पर्यटन आदि।
  • राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना जो महिलाओं के लिए खेती करने योग्य ऐसे उपकरण बनाए जिससे वे आसानी से खेत में काम कर सकें।
  • शोध के माध्यम से कृषि विज्ञान केंद्रों को उनके क्षेत्रानुकूल ऐसे तरीके ढूंढने का दायित्व दिया जाए जिससे खेती की लागत कम हो।
  • मान्यता प्राप्त दलालों के पास उपलब्ध प्री पेड कार्ड के ज़रिए ज़मीन के मालिकों और किराए पर खेती कर रहे किसानों को खेती के मौसम से पूर्व लागत (इनपुट) खरीदने के लिए वित्तीय सहायता दी जाए।

ये त्रय आयामी रणनीतियाँ- 1. किसानों की आय को विशेष रूप से बढ़ाएँगी और स्थिरता प्रदान करेंगी, 2. कृषि सेवाओं के नए क्षेत्र को बढ़ावा देंगी, और 3. देश को खान-पान और पोषण युक्त बनाएँगी।

शिवकुमार सुरमपुडी आईटीसी के एग्री बिज़नेस के प्रभागीय मुख्य कार्यकारी हैं।