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नया संघ और नया हिन्दू
नया संघ और नया हिन्दू

प्रसंग
  • संघ ऐसे समय पर लचीला रवैया अपना रहा है जब नए हिन्दू और ज्यादा कट्टर हो रहे हैं।

यह एक बहुत ही दुर्लभ घटना मानी जानी चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत इस सितंबर दिल्ली में आयोजित हुए तीन दिवसीय कार्यक्रम में हर दिन सुर्खियों में छाए रहने वाले बयान देकर मीडिया के आकर्षण का केंद्र बने रहे।

भागवत ने जिन मुद्दों को लेकर भाषण दिया उन पर ज्यादा गहराई से न जाते हुए आइये देखते हैं उन्होंने क्या कहाः उन्होंने दावा किया कि संघ और भाजपा अलग-अलग थे और कई मुद्दों पर उनके नजरिये भी अलग-अलग थे; जरूरी नहीं है कि कांग्रेस संघ की भी दुश्मन हो और कांग्रेस-मुक्त भारत का बीजेपी का लक्ष्य संघ का लक्ष्य नहीं है, आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के सपने में मुस्लिम भी एक अहम हिस्सा हैं; और सबसे अहम बात यह है कि गोलवलकर की कुछ बातों को आरएसएस अब उपयोगी नहीं मानता। भागवत ने बिलकुल ऐसा नहीं कहा था लेकिन उन्होंने जो कहा यह उसका एक संक्षिप्त सारांश है।

अब आप कुटिल हो सकते हैं और कह सकते हैं कि किसी इंसान की मूल प्रवृत्ति में बदलाव इतना आसान नहीं होता। मुस्लिमों को हिन्दुओं का प्राकृतिक दुश्मन बताने वाला संघ अगर आज मुस्लिमों के बारे में बात कर रहा है और गोलवलकर की परिकल्पनाओं को पीछे छोड़ रहा है तो यह एक गहरी राजनीतिक योग्यता ही हो सकती है जो इस संभावना से प्रेरित हो सकती है कि शायद 2019 में सत्ता में एक दोस्ताना सरकार न हो। लेकिन संघ के मामले में यह बात कुछ हजम नहीं होती क्योंकि संघ ने ऐसा कुछ पहले तो कभी नहीं किया था। दरअसल जो आलोचक यह सोचते हैं कि आरएसएस हमेशा मुस्लिम विरोधी रहेगा तो यह उनकी छोटी सोच है। संघ के पास जनता तक पहुँचने का अपना रास्ता है लेकिन अगर अल्पसंख्यक इससे जुड़ने में संकोच करते हैं तो इससे दोनों पक्षों को बराबर समस्या हो सकती है।

संघ की नई समायोज्यता में विडम्बना यह है कि यह ऐसे समय पर आई है जब बहुत सारे हिन्दू अपनी पहचान के दावे को लेकर निडर बन रहे हैं। आज के पढ़े-लिखे नवनिर्मित हिन्दुओं के लिए संघ, जैसा कि वह चाहते हैं, उससे कुछ ज्यादा ही नखरेबाज हो गया हैI उदाहरण के लिए, संघ संस्था से संबंधित व्यवहार में निष्पक्षता के लिए मूल हिन्दू मांगों में सबसे आगे नहीं है, चाहे वह अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा या शिक्षा का अधिकार प्रदान करने वाले अनुच्छेद 25-30 में संशोधन की मांग करना हो, जो बहुसंख्यकों के द्वारा संचालित संस्थानों के लिए एक परेशानी का कारण बन गया है, या सरकारी नियंत्रण से मंदिरों को पुनः प्राप्त करने का दावा हो। दरअसल, संघ के ज्यादातर सदस्य सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक विचित्र रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हिन्दू पहचान के प्रबल होते दावों के विपरीत है। आरएसएस के कई शीर्ष नेता या तो अज्ञेयवादी हैं या इस शब्द की पारंपरिक समझ में धार्मिक नहीं हैं। संघ अपने हिन्दू राष्ट्रवाद के विश्वास को एक गैर-धार्मिक सावरकर के दृष्टिकोण से हासिल करता है, भले ही यह उतना कट्टर नहीं था जितना वे स्वयं थे। महात्मा गांधी की हत्या के लिए संघ को दोषी ठहराना गलत है क्योंकि संघ का हिन्दुत्व कभी गोडसे जितना कट्टरपंथी था ही नहीं।

साधारण शब्दों में कहें तो संघ एक अनोखा हिंदू संगठन है जो पहचान के मुद्दों पर केंद्रित है, लेकिन इसका निकट संबंध उन महत्वपूर्ण मुद्दों से नहीं है जो मुद्दे परंपरागत हिंदूओं और आज के शिक्षित हिंदुओं, जो अपनी पहचान पर इठलाने में शर्मिंदा नहीं होते हैं, के उभरते हुए समूह के लिए चिंता का विषय हैं। इसके “धर्मनिरपेक्ष” आलोचक इसे मुसलमानों के खिलाफ साजिश रचने वाले किसी प्रकार के भयानक संगठन की तरह प्रदर्शित करना चाहते हैं लेकिन हकीकत यह है कि उन प्रमुख मुद्दों पर संघ काफी नर्म रहा है जो मुद्दे वास्तव में राजनीतिक हिंदुओं को उत्तेजित करते हैं, जैसे- कश्मीर घाटी और बांग्लादेश के पंडितों का सफाया और मंदिरों को वापस प्राप्त करना आदि। “धर्मनिरपेक्ष” आलोचकों ने भी भाजपा को संघ की कठपुतली कहा है लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह बात सिद्ध हो सके। नरेंद्र मोदी के अंतर्गत समान नागरिक संहिता जैसे पुराने मुद्दों के प्रति आधिकारिक दृष्टिकोण में एक सूक्ष्म बदलाव रहा है, कानून आयोग को इस मुद्दे पर ध्यान देने के लिए कहा गया है। सरकार ने हज सब्सिडी, तीन तलाक, निकाह हलाला और संभवतः बहुविवाह जैसे मुद्दों पर अपना रुख बदल दिया है लेकिन ये सभी परिवर्तन भाजपा की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं की समझ से उभरे हैं न कि आरएसएस के एजेंडे से। निश्चित रूप से भागवत यह दावा करने में सही थे कि आरएसएस कभी-कभी विचार-विनिमय और चिंताओं पर जोर देने के अलावा सरकार पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं डालता है।

ऐसा लगता है कि दुनिया को समझने की एक आंतरिक प्रक्रिया के माध्यम से संघ उभरते हुए हिंदू और नरमदलवादी मतैक्य, जहां अल्पसंख्यकवाद के अति विरोध की आवश्यकता नहीं है, के साथ अपने उद्देश्यों को संरेखित करने के निष्कर्षों पर आ गया है। यह भी मुमकिन है कि संगठन 1947 के बाद देश में “धर्मनिरपेक्ष” मुख्यधारा द्वारा लगातार दुर्व्यवहार किए जाने और बदनाम किये जाने के बाद मुख्यधारा से अपनी दूरियाँ कम करना चाहता है। संघ की वर्तमान विचारधारा की भागवत द्वारा अभिव्यक्ति को शाखाओं में भाग लेने वाले या न लेने वाले पांच लाख स्वयंसेवकों द्वारा स्वीकार किया जाता है या नहीं, यह एक अलग मामला है; बात यह महत्वपूर्ण है कि यह अभिव्यक्ति संघ को भारतीय सांस्कृतिक चेतना की मुख्यधारा में लाने के लिए महत्वपूर्ण है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में स्वप्न दासगुप्त ने लिखा, “भागवत ने वास्तव में हिंदू राष्ट्रवाद की पुरानी विचारधारा को भारत के नए सामान्य बोध के रूप में बदलने की कोशिश की है। आरएसएस, भाजपा और समाज द्वारा संदेश पर ध्यान दिए जाने के तरीके के आधार पर भारत एक प्रबुद्ध हिंदू सर्वसम्मति को परिभाषित करने के शीर्ष पर हो सकता है।”

इसे देखने का यह एक पहलू है; लेकिन यह भी संभव है कि संघ ने हिंदुओं के बीच एक नए बौद्धिक वर्ग के उदय को देखा है, जो हिंदुत्व को संघ से अलग रूप में देखते हैं, और हिंदू मांगों की मजबूत अभिव्यक्ति को आधार दे रहे हैं। यह अब हिंदूओं के पक्ष में अकेला नहीं है। भागवत द्वारा संघ के पुनर्निर्मित विचारों पर बात करने के कुछ ही दिनों बाद शिक्षाविदों, धार्मिक नेताओं, लेखकों, पत्रकारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों आदि हिंदुओं के एक और समूह ने दिल्ली में मुलाकात की। ये लोग कानून के तहत समान व्यवहार के लिए हिंदू मांगों पर एक नई सहमति देने के लिए वहाँ गए, चाहे यह धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों के लिए स्वायत्तता हो या धर्मांतरणों का विदेशी वित्त पोषण हो।

आरएसएस बुद्धिजीवियों के साथ संपर्क स्थापित करना नहीं चाहता है क्योंकि इसका मानना है कि वे अहम् रखने वाले लोगों को भ्रमित करते हैं। एक मायने में यह सही हो सकता है; लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी का नया हिंदू अपनी विरासत और पहचान से संबंधित अपनी पुरानी दुविधाग्रस्त महत्वाकांक्षा को समाप्त कर रहा है। हिंदू बुद्धिजीवियों ने अपनी खुद की भावना विकसित की है कि क्या अभिव्यक्त किया जाए और कैसे, एवं आरएसएस इस नई चेतना का हिस्सा बनने के लिए अच्छा काम करेगा।

हालांकि एक बात साफ है कि एक समय था जब कोई हिंदू हितों पर ध्यान देने को तैयार नहीं था तब संघ ने इस पर ध्यान दिया था और अपने प्रयासों के लिए आलोचनाओं के अलावा कुछ और न हासिल करने के बावजूद संघ ने भगवा फहराए रखा। इसके लिए, सभी हिंदू ऋणी रहेंगे।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।