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द नेशनल हेराल्ड स्टोरी, प्रकरण
द नेशनल हेराल्ड स्टोरी

प्रसंग
  • यह एकमात्र ऐसा ‘घोटाला’ है जिसमें नेहरू-गांधी परिवार को सीधे तौर पर आरोपित किया गया है।
  • यहाँ इसका सारांश दिया जा रहा है कि यह क्यों नेशनल हेराल्ड मामला आज अदालत में हैं।

नेशनल हेराल्ड शुरुआत से बहुत महंगा था। जब 1938 में लॉन्च होने के एक दशक से भी कम समय के बाद समाचार पत्र तीन महीनों तक बंद रहा, तो जवाहरलाल नेहरू ने लखनऊ में अपने कर्मचारियों की एक सभा में घोषित किया, “हमें बनियागिरी नहीं आयी।” भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने के कुछ साल बाद एक अन्य समारोह में उन्होंने कहा, “मैं नेशनल हेराल्ड को बंद नहीं होने दूंगा चाहे मुझे आनंद भवन (इलाहाबाद में उनका पैतृक घर) भी बेचना पड़े।” लेकिन नेहरू को यह नहीं पता था कि, प्रतिष्ठित समाचार पत्र को बचाने और इसे भारत की स्वतंत्रता आंदोलन के हिस्से के रूप में संरक्षित करने के लिए उनका परिवार अपने संसाधनों का उपयोग करने के बजाय, राष्ट्रीय हेराल्ड की संपत्ति का उपयोग करेगा।

पृष्ठभूमि

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी द्वारा इसे पुनर्जीवित करने के प्रयासों के बावजूद, कुछ ही दशकों में राष्ट्रीय हेराल्ड की खपत और आय में गिरावट आ गयी, जिसके परिणामस्वरूप 2008 में इसे 90 करोड़ रुपये के कर्ज के साथ बंद कर दिया गया। नतीजतन, एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) – जिसने समाचार पत्र प्रकाशित किया था – वास्तव में दिल्ली, इंदौर, लखनऊ और मुंबई में हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियों के साथ एक रियल एस्टेट फर्म बन गया।

कांग्रेस पार्टी ने जो ऋण दिया था वह पार्टी द्वारा दिवालिया कंपनी को दिए गए 90.25 करोड़ रुपये ब्याज मुक्त ऋण का नतीजा था। 2010 में, कांग्रेस ने एक नई कंपनी यंग इंडियन को 50 लाख रूपये का ऋण स्थानान्तरित कर दिया। यंग इंडियन के 76 प्रतिशत शेयर के मालिक सोनिया गांधी और राहुल गांधी हैं, जबकि बाकी बचे 24 प्रतिशत शेयर पर कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीस, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे का अधिकार है।

ऋण स्थानांतरित होने के बाद, एसोसिएट जर्नल लिमिटेड का ऋण यंग इंडियन को सौंप दिया गया। इस ऋण के बदले यंग इंडिया को एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के 99 फीसदी शेयर मिल गए, यह शेयरों की काफी बड़ी संख्या थी। इसके साथ ही, एसोसिएट जर्नल लिमिटेड और इसकी अचल संपत्ति का स्वामित्व यंग इंडियन – जिसके शेयरों में गांधी परिवार का एक बड़ा हिस्सा था – को हासिल हो गया। इस सौदे से एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के देश भर में फैले शेयर और संपत्तियाँ गांधी परिवार के नियंत्रण में आ गईं।

गांधी परिवार के खिलाफ स्वामी का केस

2013 में, सुब्रमण्यम स्वामी ने गांधी परिवार पर धोखाधड़ी और धन के गबन का आरोप लगाते हुए एक शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया था कि गांधी परिवार ने “दिल्ली, उत्तर प्रदेश और अन्य स्थानों पर धोखाधड़ी करते हुए एसोसिएट जर्नल लिमिटेड की संपत्तियाँ हड़प ली हैं।” उन्होंने इन संपत्तियों की कीमत 2000 करोड़ रुपये बताई।

स्वामी ने गांधी परिवार के अलावा कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा, महासचिव ऑस्कर फर्नांडीस, पत्रकार सुमन दुबे और तकनीकज्ञ सैम पित्रोदा को भी इस मामले में घसीट लिया। स्वामी ने तर्क दिया था कि एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के जिम्मे 90 करोड़ रूपये के ऋण का उसकी परिसंपत्तियों के माध्यम से आसानी से भुगतान किया जा सकता था लेकिन ऐसा करने की कोशिश ही नहीं की गई। उनकी लाइन: 2000 करोड़ रूपये की संपत्ति के बदले एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के पास सिर्फ 90 करोड़ रुपये की सीमित देनदारी है।

उन्होंने कहा है कि कांग्रेस द्वारा एजेएल को ब्याज-मुक्त ऋण प्रदान किया गया था, जो चुकाया नहीं गया था, जो कि आयकर अधिनियम 1961 की धारा 269 टी का उल्लंघन है। वह कहते हैं कि इसके अतिरिक्त एक राजनीतिक दल व्यापारिक वित्तीय लेनदेन, जिसमें ऋण देना या लेना शामिल है, में भाग नहीं ले सकता है क्योंकि यह एक गैर-लाभकारी संस्था है।

वह इस पर तर्क करते हैं कि एजेएल को दिया गया ऋण “अवैध” था क्योंकि यह पार्टी फंड से लिया गया था। स्वामी ने गांधी को भी इस अधिग्रहण में विश्वास के आपराधिक हनन का दोषी ठहराया। उनका कहना है कि यह कदम उठाए जाने से पहले एजेएल के 1,050 शेयरधारकों का परामर्श नहीं लिया गया था। उन्होंने दिल्ली के हेराल्ड हाउस, जो नेशनल हेराल्ड के कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, का हवाला देते हुए व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए एजेएल से संबंधित संपत्तियों के उपयोग पर भी विरोध जताया है।

अदालत ने क्या कहा ?

जून 2014 में, दिल्ली में एक मजिस्ट्रेट की अदालत ने शिकायत में नामांकित गांधी और अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को अदालत के समक्ष हाजिर होकर आरोपों, जो उन्होंने अवैध रूप से समाचार पत्र के लिए पार्टी फंड का उपयोग किया था, का जवाब देने का आदेश दिया था। हालांकि, कांग्रेस नेताओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील के माध्यम से निचली अदालत के सम्मन पर रोक लगा दी जब तक कि इस मामले में सभी पार्टियों की सुनवाई नहीं हो गई।

सुनवाई की एक श्रृंखला के बाद, दिसंबर 2015 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरोपों को रद्द करने की मांग पर गांधी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कांग्रेस नेताओं को उन पर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए सम्मन भेजा। उपस्थित होने पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, वोरा, फर्नांडीस और दुबे को अदालत द्वारा जमानत दे दी गई थी।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने गांधी परिवार के लिए समन जारी करते हुए कहा था कि शिकायत और साक्ष्य से अब तक, “ऐसा मालूम पड़ रहा है कि जनता के पैसे को व्यक्तिगत उपयोग में लाने के लिए इसे वाईआई का चोगा पहनाया गया था।

यदि कांग्रेस के लिए यह अधिक हानि नहीं पहुंचा रहा था, दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले में सुनवाई के दौरान देखा कि इसे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि “याचिकाकर्ताओं (गांधी परिवार और अन्य कांग्रेस नेताओं) द्वारा अपनाई जाने वाली कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने में एजेएल विशेष प्रयोजन के माध्यम से, विशेष रूप से जब कांग्रेस के मुख्य व्यक्ति, एजेएल और वाईआई समान हैं, एक आपराधिक इरादा प्रमाणित करते हैं।”

कांग्रेस खुद का बचाव कैसे कर रही है?

अपने बचाव में गांधी परिवार ने कहा, यंग इंडियन लाभ के लिए नहीं बनाई गई है बल्कि इसे दान के लिए बनाया गया है। इसलिए, इसपर कभी अवैध लाभ उठाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। कांग्रेस ने यह भी दावा किया है कि किसी शेयरधारक को धोखा नहीं दिया गया है। इसके अलावा, यह कहा गया है कि उन्होंने शेयरधारकों को यंग इंडियन की इक्विटी के हस्तांतरण के बारे में सूचित या सलाह मांगी गई थी जिसमें सभी ने “सर्वसम्मति से” इस कदम को “स्वीकार” किया था।

हालांकि, उनका यह दावा तब बिल्कुल झूठा साबित हुआ जब पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, जो एजेएल में शेयरधारक हैं, ने दावा किया कि यंग इंडियन का अधिग्रहण “पूरी तरह से अवैध” था। तथ्य यह है कि एजेएल को एक सार्वजनिक कंपनी के रूप में समाविष्ट किया गया था जो नेहरू की निजी संपत्ति नहीं थी, और उन्होंने इसे लगभग 5,000 स्वतंत्रता सेनानियों के समर्थन से शुरू किया था, यह तथ्य कांग्रेस के लिए एक कठिन परिस्थिति को उत्पन्न करता है। गांधी परिवार को अभी तक एक ठोस स्पष्टीकरण के साथ आना बाकी है।