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पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों के लिए “भारतीय सपना”
पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों के लिए भारतीय सपना

प्रसंग
  • भारतीय नागरिक बनने के लिए पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों को संघर्ष करना है। वे एक बड़े हिंदू परिवार के साथ रहने के लिए स्वीकार किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

जोधपुर का भगत की कोठी रेलवे स्टेशन। कई पाकिस्तानी हिंदू  जो तीर्थ यात्रा पर भारत आए थे, यह उनके लिए सफर का वह समय है जो जहां से शुरु हुआ था वहीं पर खत्म होगा।

स्टेशन के प्रतीक्षा कक्ष में, कांजी राम और उनकी पत्नी नीला, फर्श पर एक साथ बैठे हैं। उनके पीछे इकट्ठा किए गए कई बैग रखे हैं और पास में गर्म चाय रखी हुई है। थार एक्सप्रेस मध्यरात्रि के बाद भगत की कोठी रेलवे स्टेशन से छूटेगी। अभी लगभग छह घंटे बाकी हैं और नीला थोड़ा अधीर हो रही हैं। वह कहती हैं, “पाकिस्तान में मेरे बच्चे मेरा इंतजार कर रहे हैं। यही वह जगह है जहाँ मेरे लिए घर है।”

“जत्था” में शामिल अन्य महिलाओं की तुलना में नीला काफी बुजुर्ग हैं, “जत्था” लोगों का एक समूह है जो भारत के उत्तराखण्ड राज्य में हरिद्वार और ऋषिकेश की तीर्थयात्रा से लौट रहा है। नीला कहती हैं, “मैं अपने जीवनकाल में तीर्थयात्रा के लिए वापस लौटना चाहती हूँ, लेकिन हम जहाँ हैं वहीं खुश हैं।”

जोधपुर के इस रेलवे स्टेशन पर प्रतीक्षा लाउंज के बाहर कुछ दूरी पर, पाकिस्तान में सिंध प्रांत के उमरकोट का एक हिंदू परिवार अपने राजस्थान के रिश्तेदारों के साथ इंतजार की अंतिम घड़ियां व्यतीत कर रहा है। इस समूह में तीन पुरुष मनवर लाल, गुलाब लाल और भंवर लाल लौटी राजस्थान स्टूडियो में ली गयी अपनी तस्वीरों को टकटकी बांधकर देखपने से नहीं रोक पा रहे हैं। वे एक-दूसरे से पूछते हैं, “हम राजवाड़ा पुरुषों की तरह दिखते हैं, है ना?”

इस समूह में से एक महिला एक युवा लड़की की तस्वीर लेकर बैठी है। यह एक स्टूडियो में ली गयी तस्वीर है। जो प्लास्टिक के फूलों और चमकीले वालपेपर के सामने खींची गयी है। वह महिला कहती है, “यह मेरी पुत्री है। मैं पाकिस्तान में रिश्तेदारों को उसकी तस्वीर भेज रही हूँ। उसे वहाँ रहने वाले किसी हिंदू परिवार से एक उपयुक्त दूल्हा मिल सकता है।”

पाकिस्तान की महिलाओं ने हरिद्वार से ढेर सारी बिंदियां खरीदी हैं। वे अपने बैग से आवश्यक सहायक सामगी के कई पैकेट निकालती हैं। समूह में से एक अन्य महिला उत्साहपूर्वक कहती है, “हम यह सब हमारे उन रिश्तेदारों को उपहार स्वरूप देंगे जो हरिद्वार नहीं जा सके। यह एक यादगार तीर्थयात्रा थी। हम राम झूला (ऋषिकेश में) भी गए थे। वहाँ बारिश हो गई और बारिश काफी तेज थी।”

पाकिस्तान के इन हिंदुओं के अलावा, जो प्रसन्नतापूर्वक थार एक्सप्रेस से पाकिस्तान जाने के लिए तैयार हैं, इस वर्ष कई लोगों ने भारी दिल और भारी कदमों एवं आत्माओं के साथ राजस्थान को छोड़ा है।

जोधपुर में भगत की कोठी से कई मील दूर एक शिविर है जहाँ पाकिस्तानी हिंदू रहते हैं। जो लोग वापस नहीं जाना चाहते हैं। उनके स्थानांतरण के कठिन और पीड़ादायक उदाहरण में “इच्छा” उचित शब्द नहीं है। फिर भी, अधिकांश लोगों का जीवन भारत में चल रहा है, जब तक वह चला सकते हैं।

जोधपुर शिविर में, जहाँ पाकिस्तानी हिंदू रहते हैं, सूर्यास्त के बाद दूल्हे के आने की उम्मीद है। भील परिवार के समारोह में मेजबानी करने वाले दो बुजुर्ग पुरुष अर्घा राम और चेरा राम अंतिम तैयारी की देख रेख कर रहे हैं।

 

जोधपुर में रहने वाले हिन्दू प्रवासियों में से एक भागचंद भील का कहना है कि “वह कई रिश्तेदारों को जानते हैं जो डर के कारण वापस आ गए हैं, या पाकिस्तान वापस जाना पसंद किया है। यह सब कुछ सही नहीं लगता है। यह सब नहीं।”

इस साल मार्च में अब तक का सबसे बड़ा झटका सामने आया। राजस्थान के कई हिन्दुओं, भारतीय और पाकिस्तानी, को खबर मिली कि उचित दस्तावेजों की कमी कारण जिन 500 हिन्दुओं को भारत से पाकिस्तान वापस भेज दिया गया था उन्होंने पाकिस्तान के सिंध में कथित तौर पर इस्लाम धर्म अपना लिया है।

भागचंद कहते हैं कि “पाकिस्तान से निर्वासित हिन्दुओं को पाकिस्तान वापस भेजने के बारे में हम क्या कहें।” मीडिया में इस खबर की सूचना दी गई थी। थोड़ी फुसफुसाहट हुई, थोड़ा सा शोरगुल हुआ, बस इतना ही। हमारी परवाह कौन करता है, खासकर हम गरीब पाकिस्तानी हिन्दुओं की? अन्य लोगों से हमारी हालत बहुत ही ज्यादा बदतर है। यह दूसरों के लिए थोड़ा आसान है जिनको या तो दीर्घकालिक वीजा या नागरिकता हासिल हो गई है।” इस समय भागचंद अपने साथी पाकिस्तानी हिन्दुओं को आवेदन और दस्तावेज से संबंधित कार्यों में मदद कर रहे हैं।

इनमें से अधिकतर प्रवासी पूरी तरह से भारत के नागरिक बनने के इच्छुक हैं, वे डरे सहमे हुए अपने घर वापस लौटते हैं। सिंध में युवा लड़कियों के माता-पिता जंगलों में घूमने वाले गिरोहों से भयभीत रहते हैं जो उनकी लड़कियों को जबरन उठा ले जाते हैं और उनसे शादी कर लेते हैं। हिन्दू नेताओं ने कई बार इस मुद्दे को उठाया है कि उनकी लड़कियाँ अक्सर लूट और धर्म परिवर्तन का शिकार रही हैं।

दिल्ली के असोला में स्थित शरणार्थी शिविरों में रहने वाले जेवर का कहना है कि सिंध में हिन्दू लड़कियाँ 10वीं या 12वीं के बाद पढ़ाई नहीं कर पाती हैं क्योंकि उनके परिवारों को डर रहता है कि वे स्कूल से घर वापस नहीं आएंगी। उन्होंने कहा, “हमारी लड़कियाँ घरों तक ही सीमित रहती हैं क्योंकि हम नहीं चाहते कि उनपर किसी की बुरी नजर पड़े।”

नई दिल्ली में रहने वाले इन्हीं शरणार्थियों में से एक, अपने पूर्वजों की पसंद पर पछतावा करते हुए हमें बताता है कि “पाकिस्तान मुस्लिमों के लिए है। हिन्दुओं की भूमि भारत है।”

इसीलिए वे भारत आते रहते हैं। ज्यादातर सिंध से आते हैं जहाँ पाकिस्तानी हिन्दुओं की आबादी सबसे ज्यादा है। पाकिस्तान से संबंधित भारतीय वीजा के जो नियम हैं वह सामूहिक तीर्थयात्रा की अनुमति देते हैं, इसीलिए वे आमतौर पर 25-30 परिवारों के झुंड में आते हैं। वे उत्तर प्रदेश में वृंदावन और मथुरा, तथा उत्तराखंड में हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे पवित्र स्थलों का दर्शन करने के लिए पर्यटक वीजे पर आते हैं। अपना निर्धारित एक या तीन महीने का समय पूरा करने के बाद कुछ तो वापस लौट जाते हैं लेकिन कुछ इस उम्मीद से यहीं ठहर जाते हैं कि उनको कभी भी वापस जाने को नहीं कहा जाएगा। उनकी नई जिंदगी में कोई भी सुख या खुशी नहीं होती है। दीर्घकालिक वीजा या भारतीय नागरिकता पाने की प्रतीक्षा करते-करते ज्यादातर लोगों की जिंदगी झोपड़ियों में ही कट जाती है। लेकिन इस लोगों से की गई बातचीत से पता चलता है कि ये सब वे अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए करते हैं। सिंध के उमेरकोट से आने वाले दर्शन (कई शरणार्थियों की तरह केवल पहले नाम का उपयोग करते हुए) ने स्वराज्य को बताया कि “मेरी इच्छा है कि जब मेरे बच्चे माता-पिता बने तब वे पूरी तरह से भारतीय हों।” दर्शन इस समय दिल्ली के आदर्श नगर शिविर में रहते हैं।

आदर्श नगर शिविर में रहने वाले कुछ प्रवासियों का कहना है कि पाकिस्तानी समाज में उन लोगों को नीच माना जाता है। आदर्श नगर शिविर की एक और प्रवासी राधा कहती है कि “अगर हम लोग पानी मांगते हैं तो वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनका बर्तन कहीं हम लोगों को छू न जाए।” भारत के कई हिन्दू पाकिस्तानी हिन्दुओं के साथ होने वाले इस तरह के भेदभाव से अनजान हैं। 2016 में एक हिन्दू पत्रकार के बारे में एक रिपोर्ट प्राप्त हुई थी कि उसे अपने कार्यालय में अपने मुस्लिम सहयोगियों के ग्लास और बर्तन को इस्तेमाल करने से रोक दिया गया था, इस रिपोर्ट से कई लोग चौंक गए थे। राधा कहती है कि “वे हम लोगों को सहन कर रहे हैं लेकिन हम लोगों को पसंद नहीं करते हैं। वे हम लोगों के साथ बहुत गिरा हुआ इंसान समझकर बर्ताव करते हैं। हमारे लड़के स्थानीय लड़कों से हमेशा डरते रहते हैं। हिन्दू, खासकर निचली जातियों के लोग, पुलिस के गुर्गों के हाँथों लगातार अपनी कृषि और मंदिर भूमि खो रहे हैं।

सिंध में पाकिस्तान की सबसे ज्यादा हिन्दू आबादी है। हिन्दू, बलोच और सिंध दोनों ही, भारत लौट रहे हैं। 1965 में होने वाले भारत पाकिस्तान युद्ध के समय सिंध के थारपारकर जिले से करीब 8000 हिन्दू भारत आए थे। वे 1971 में भारत आए और फिर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आए। भारत में होने वाले दंगों के बाद अल्पसंख्यक समुदाय विशेष रूप से अपनी बेटियों को लेकर चिंतित, असुरक्षित और कमजोर महसूस कर रहा था।

उनमें से बहुत से राजस्थान और गुजरात में आकर बस गए, जहाँ पर इनकी करीब 400 बस्तियाँ हैं। वे ट्रेन से आते हैं और नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं – यही एक तरीका है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतने सालों में भारत सरकार ने इन शरणार्थियों के लिए एक पक्षपातपूर्ण रवैया ही अपनाया है। उनके आवेदन सालों तक लंबित पड़े रहते हैं भले ही उनकी स्थिति कितनी भी दयनीय क्यों न हो जाए, जो लगातार उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाती है।

पाकिस्तानी हिन्दू प्रवासियों के जीवन को आसान बनाने की दिशा में कार्य कर रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ज्यादातर मामलों में शरणार्थियों को निर्वासित नहीं किया जाता है बल्कि वे स्वयं ही चले आते हैं। दीर्घकालिक वीजा या नागरिकता हासिल करने में होने वाली देरी के कारण लगातार निराशा का सामना करने के बाद वे पाकिस्तान वापस लौट जाते हैं। हालांकि यह जानकार खुशी होगी कि हर गुजरते साल में ज्यादा से ज्यादा शरणार्थियों को दीर्घकालिक वीजा हासिल हो रहा है, लेकिन उतनी ही दुखी करने वाली बात यह है कि वापस जाने वालों की तादाद में भी बढ़ोतरी हो रही है। पिछले तीन सालों में 2000 से अधिक शरणार्थी वापस गए हैं और इनमें से अधिकांश ने इस्लाम धर्म अपना लिया है। केवल राजस्थान की बात करें तो, सरकारी हलफनामे के अनुसार, 2015 से 2017 के बीच कुल 968 हिन्दू पाकिस्तान वापस गए हैं। सितंबर 2017 में, राजस्थान की एक अदालत ने कहा था कि पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय के प्रवासियों द्वारा दीर्घकालिक वीजा या नागरिकता प्राप्त करने के लिए किया गया ऑफलाइन आवेदन 60 दिनों की अवधि के भीतर यथासंभव सकारात्मक माना जाएगा।

अदालत ने राज्य सरकार से पाकिस्तानी हिन्दू प्रवासियों के लंबित नागरिकता मामलों पर एक रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया था। विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) को उचित स्थानों पर शिविर लगाकर आवेदकों की उपस्थिति में अपर्याप्तता को हटाने के लिए कहा गया था। राजस्थान में रहने वाले एक प्रवासी ने बताया कि “शिविर तो लगाए गए थे। लेकिन उन्होंने केवल दीर्घकालिक वीजे और नागरिकता से संबंधित दस्तावेजी कार्य को समझाने और उसको पूरा करने में मदद की।”

इन सबके बीच, विश्वास बनाए रखना एक संघर्ष रहा है। इस साल की शुरूआत में चंदू राम की तरह कुछ लोग इस संघर्ष में हार गए, कई अन्य लोगों की तरह, जो कथित रूप एक अलग नाम, अलग विश्वास और अलग पहचान बना लेते हैं। वे अपने ही मूल देश में अपनी स्वीकृति पाने में नाकाम रहे।

दिल्ली के एक सामाजिक कार्यकर्ता हरिओम साहू कहते हैं कि अक्सर शरणार्थी पाकिस्तान वापस लौटने पर सबसे पहले इस्लाम धर्म अपना लेते हैं। उन्होंने कहा, “वे ऐसा क्रोध और निराशा में करते हैं और अधिकतर भारत सरकार और भारतीय लोगों को संदेश भेजने के  लिए।” नई दिल्ली के आदर्श नगर शिविर (जो हाल ही में बिजली और पानी की आपूर्ति रोक दिए जाने के कारण खबरों में था) में 100 सिंधी शरणार्थी परिवारों के साथ काम करने वाले साहू इस बात पर अपने विचार रखते है कि शरणार्थी इस्लाम में क्यों शामिल हो जाते हैं। “जब वे भारत में रहने के इरादे से पाकिस्तान छोड़ते हैं तो वे अपने घर और संपत्तियों को बेचने के बाद ऐसा करते हैं, अक्सर बहुत ही कम कीमत पर। उन्हें हर कदम पर अपमान का सामना करना पड़ता है। रेलवे स्टेशनों पर कस्टम क्लियरेंस के दौरान बड़े अधिकारियों के द्वारा अक्सर उनके सामान को छीन लिया जाता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि जब उनको भारत द्वारा ठुकरा दिया जाता है और उनके सामने वापस लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं होता है तब उनको कैसा महसूस होता होगा। वे धर्म परिवर्तन कर लेते हैं।” राजस्थान में रहने वाले पाकिस्तानी शरणार्थियों के द्वारा भी इसी प्रकार की घटनाओं की जानकारी दी गई है।

साहू आगे कहते हैं, “वे अपने धर्म से दृढ़तापूर्वक जुड़े रहने के लिए सब कुछ करते हैं। लेकिन कुछ मुद्दों पर वे इसका पालन नहीं करते। इस्लाम में धर्म परिवर्तन करना उनको उनके ही देश में भविष्य के उपहास से बचाता है।

हालांकि इसका अच्छी तरह से लिखित प्रमाण दिया गया है कि इन सभी वर्षों में हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करने में लापरवाही और देरी होती रही है जो कि विचार योग्य है। ऐसे शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से भारतीय वैध नागरिकों की बढ़ोत्तरी हो रही है क्योंकि नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान सरकार के तहत बदलाव शुरू हो रहे हैं।

2014 के लोकसभा चुनावों की शुरुआत में, भाजपा ने अपने घोषणापत्र में भारत को “सताए गए हिंदुओं का प्राकृतिक निवास” घोषित किया। मोदी ने एक राजनीतिक रैली में कहा था, “हमारा हिंदुओं, जो अन्य देशों में पीड़ित हैं तथा मुसीबत उठाते हैं, के प्रति उत्तरदायित्व है। उनके लिए भारत ही एकमात्र स्थान है। हमें उन्हें यहाँ पर संगठित करना होगा।” अपने वादे के अनुरूप, भाजपा सरकार ने हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों, जैनों, पारसियों, और बांग्लादेश, अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के बौद्ध अल्पसंख्यकों का भारत में निवास तथा नागरिकता प्राप्त करना सुगम कर दिया।

2016 में, मोदी सरकार ने एलटीवी (ऋण-से-मूल्य) पर नियमों को आसान बनाने की दिशा में एक कदम उठाया। इसके साथ ही कुछ सुविधाओं और सेवाओं का लाभ उठाना आसान बना दिया गया। इस प्रकार शरणार्थियों के लिए आसानी से उपलब्ध सुविधाओं में बैंक खातों का खुलना, स्वयं के व्यवसाय के लिए संपत्ति की खरीद की अनुमति, स्व रोजगार के लिए उपयुक्त आवास, ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड और आधार संख्या जारी करना, राज्यों तथा संघ शासित क्षेत्रों में मुफ्त आवागमन, और एक राज्य से दूसरे राज्य में एलटीवी पत्रों का स्थानांतरण आदि शामिल हैं।

शरणार्थियों को अब एक समय में पांच साल की अवधि के लिए प्रारंभिक एलटीवी मिलता है। भारतीय नागरिकता पाने के लिए पंजीकरण शुल्क 3,000 रुपये से 15,000 रुपये के बीच था जो घटाकर 100 रुपये कर दिया गया था। यह एक बड़ी राहत क्यों है, इस पर साहू ने व्याख्या करते हुए कहा, “इससे पहले शरणार्थियों को कुछ महीनों का एलटीवी मिलता था वह भी कई सरकारी कार्यालयों में भटकने के बाद। उन्हें नवीनीकरण की तिथियां कुछ महीनों के अंतराल पर दी जाती थीं जिससे वे निराशा का अनुभव करते थे। उनके आत्मविश्वास को चोट पहुँचती थी। अपनी जिंदगी बनाने के लिए उनके पास थोड़ा सा ही समय बचता था। अब उन्हें यह सब लंबे समय तक मिलना शुरू हो गया है।”

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन -2 के पांच वर्षों के कार्यकाल की अपेक्षा मोदी सरकार के तहत अधिक शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त हुई। भाजपा सरकार से पहले के पांच वर्षों में 1,023 शरणार्थियों द्वारा नागरिकता पाने की तुलना में भाजपा सरकार आने के एक साल बाद लगभग 4,300 शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता मिली। रिपोर्टों के मुताबिक, उनमें से बड़ी संख्या को एलटीवी भी मिली- जिसमें मध्यप्रदेश में लगभग 19,000, राजस्थान में 11,000 और गुजरात में 4,000 शरणार्थी शामिल हैं। केवल वे शरणार्थी भारतीय नागरिकता के योग्य हैं जो सात साल के एलटीवी पर भारत में रहते हैं।

हालांकि, मौजूदा सरकार के समर्थन के बावजूद भी शरणार्थी निर्धन तथा उपेक्षित अवस्था में हैं। दिल्ली के आदर्श नगर, असोला, और मजनू का टीला, जोधपुर में दो शिविरों, और जयपुर के मानसरोवर आदि तक स्वराज्य की यात्रा निराशाजनक दृश्यों को प्रकट करती है। दिल्ली के कुछ शिविरों में, उन्हें मूल आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। अगर इनकी हालत सुधारने के लिए लगातार काम कर रहे कुछ कार्यकर्ता नहीं होते तो शरणार्थियों ने अब तक संभवतः वापसी कर ली होती।

निममिट्टकम में जयपुर-आधारित जय अहुजा, एक संगठन जो भारत में रहने वाले अन्य देशों के हिंदुओं की मदद करने का काम करता है, के साथ कार्य करने वाले जयपुर के डॉक्टर और समाजसेवी ओमरेन्द्र रत्तु का मानना है कि हिंदू नेतृत्व कारण की ओर मामूली कदम उठा रहा है। वह कहते हैं, “ऐसे आत्मशक्ति, आत्मअवशोषित, पूरी तरह धुंधले हिन्दू नेतृत्व को लिए गुस्सा आता है। पाकिस्तानी हिंदू साहसी हैं, जो अपने धर्म के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूरी तय करके यहाँ आये हैं। हिंदू नेता होने का दावा करने वाले लोगों को हमारे जैसे लोगों का समर्थन करने और हमारी कोशिशों को सुरक्षा देने के लिए सबसे आगे होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी जिन्होंने सभी आवश्यक लाभ प्रदान किए हैं, गृह मंत्री राजनाथ सिंह जी जो अपना काम कर रहे हैं, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के सदस्य प्रशांत हटकर जी आदि सभी को धन्यवाद।”

जोधपुर उच्च न्यायालय परिसर में, एक अधिकारी, जिन्हें जोधपुर में प्रवासियों के मुद्दे पर मीडिया से बात करने का अधिकार नहीं प्राप्त है, ने कहा कि एलटीवी और नागरिकता की प्रक्रिया जोधपुर के लिए विशिष्ट सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, सभी स्तरों पर, व्यवस्थित रूप से होती है। जोधपुर में हिंदू प्रवासियों में से एक ने बताया, “2005 में, जोधपुर में रहने वाले कुछ भीलों को नागरिकता मिली, (लेकिन) जो लोग दो दिन भी चूक गए उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं मिली। उनके मामले अभी तक विचाराधीन हैं और स्पष्ट नहीं हो सके हैं। पीड़ित गरीब परिवार कष्ट उठा रहे हैं। वे लोग, जो इसे हमारे लिए सुगम कर सकते हैं, अधिकारियों को तंग करने के माध्यम से इसे और भी मुश्किल बना रहे हैं। यह सब हमारे सामने सर्पिलाकार रूप में उभरता है। हम न खाने के, न बैठने के। हम एक दूसरे के पीछे भागते रहते हैं। हम अपने परिवारों को कैसे सहारा देंगे?”

रत्नु उन लोगों के बीच सामंजस्य की कमी की ओर इशारा करते हैं जो पाकिस्तान से आए हुए हिंदुओं में मतभेद उत्पन्न कर सकते हैं। वह कहते हैं, “हिन्दू शरणार्थियों की देखभाल करना एनजीओ की ज़िम्मेदारी क्यों है? हम लिखित कार्यवाही के साथ उनकी मदद करने का संभव प्रयास कर रहे हैं। हम उन्हें मुफ्त चिकित्सा सहायता दे रहे हैं। कोई समेकित प्रयास नहीं है। सब इधर उधर पैर मार रहे हैं। प्रशांतजी के अतिरिक्त, कोई भी हिंदू नेता इस कारण को ध्यान में रखकर काम नहीं कर रहा है। वह एक वरिष्ठ व्यक्ति हैं। उसके पास समय और ऊर्जा सीमित है।”

पाकिस्तान के हिंदू सहज रूप से धर्म को स्वीकार नहीं करते, लेकिन भारत में होने पर धर्म को सहजता से स्वीकार करते हैं। लक्ष्मण राजपूत, एक पाकिस्तानी हिंदू प्रवासी जो दिल्ली में रहते हैं, ने विस्थापित हिंदू सम्मेलन में फरवरी में एक बातचीत के दौरान स्वराज को बताया, “हम देश के कानूनों को महत्व देते हैं। हम कानून का पालन करने वाले लोग हैं।” एक जोशीले भाषण में लक्ष्मण ने बताया था कि नाम को उनकी हिंदू पहचान से कैसे जोड़ा जाता है, “कभी कभी संघर्ष से भी बढ़कर हो जाता है, निष्ठा बरकरार रखने का संघर्ष।”

जमना भील नामक जोधपुर में एक अन्य कैम्प में रहने वाले शरणार्थियों में से एक ने कहा कि साफ सफाई यहॉं सबसे बड़ी समस्या है जिससे हमें दो-चार होना पड़ता है। साफ-सफाई की कमी की वजह से महिलाओं और लड़कियों को रोज सुबह अपने काम और स्कूल जाने से पहले समस्याओं का सामना करना पड़ता है । एक बुजुर्ग महिला, मारवी देवी एक दूरवर्ती तथा सुनसान टीले की ओर इशारा करते हुए कहती हैं. “वो दिख रहा है। वहाँ पर लड़कियाँ जाती हैं। (क्या आप उस टीले को देख सकते हैं? शौचालयों न होने के कारण महिलाएं वहां जाती हैं।) हम शौचालय के अलावा कुछ भी नहीं मांगते हैं। सरकार हमारे लिए कम से कम शौचालय तो बनवा ही सकती है।” मारवी ने जो भी बताया उस पर कैम्प में रहने वाली एक लड़की इसे छोटा सा एक मुद्दा बताकर इसकी हंसी उड़ाती है। वह बोतलों के बारे में शरारतपूर्ण लहजे में बताती है कि महिलाएं इन्हें लेकर सुबह टीले पर जाती हैं।

इस शिविर में रह रहे एक बुजुर्ग पाकिस्तानी हिंदू लाखा राम, झोपड़ी को अंतिम रूप देने का काम करते हैं। उनका काम पड़ोसी देश से अपने साथ लाए गए शिल्प कौशल के हुनर को दर्शाता है। वह कहते हैं, “हमारे पास कुछ नहीं है। यह झोपड़ी भी हमारी नहीं है। यह जमीन भी हमारी नहीं है। हम वहां बैठते हैं जहां हमें बैठने के लिए कहा जाता है। हम अपनी दाल-रोटी कमाते हैं और अपने परिवारों को खिलाते हैं। 2014 में यहां आने के बाद से में यही कर रहा हूँ। मुझे यहां आए चार साल हो गए हैं।”

प्रवासियों से ‘स्वराज्य’ जोधपुर, मानसरोवर (जयपुर) और दिल्ली में फिर से मिला, वे कानून का पालन करने वाले नागरिक हैं और वे अपने प्रवास स्थानीय कारकों से जुड़ी हुई प्रक्रिया, नियम, जटिलताओं को समझते हैं और वह अपनी पाकिस्तानी पहचान से भली भांति परिचित हैं। “हमने नागरिकता पाने के लिए इतने सालों तक इंतजार किया है। इतने सारे लोगों के लिए आधार कार्ड और एलटीवी पाना एक कठिन काम है। बहुत लोग आधार कार्ड पर ज्यादा निर्भर हैं खासकर जोधपुर जैसे शहर के जहां रक्षा संस्थान स्थित हैं। हम और इंतजार करने के लिए तैयार हैं, हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस देरी से हमें कितनी चुनौतियों को सामना करना पड़ेगा।” स्पष्ट रूप से, सरकार पर उनका विश्वास और धैर्य बरकरार है, लेकिन हिंदू संगठनों की ओर उनकी अपेक्षाएं और अधीरता बढ़ रही है। “जोधपुर अपनी भौगोलिक स्थिति   के कारण खुद ही बाधाओं का घर है। बाद में, जोधपुर को हिंदू प्रवासियों की मदद करने के लिए वास्तविक गैर सरकारी संगठनों सहायता की आवश्यकता है। जो भी किया जा रहा है निश्चित रूप से वह पर्याप्त नहीं है। एक प्रवासी ने कहा, हिन्दू प्रवासियों में जो कुछ गरीब लोग हैं वह कुछ व्यक्तियों की उदासीनता के कारण परेशान हैं।

जयपुर में इस साल की शुरुआत में प्रसांत हटालकर ने ‘स्वराज्य’ के साथ अपनी बातचीत में बताया कि इस पीड़ा और भावना को अब पीछे हट  जाना चाहिए। उन्होंने बताया, “वे भारत में रहने वाले हम जैसे अधिकांश लोगों की तुलना में बहुत बेहतर और साहसी हिंदु हैं। वे पीड़ित हैं, जिससे भावनाएं जागृत होती हैं। जबकि मैं उनकी पीड़ा के प्रति भावुक हूं, मैं समझता हूं कि उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए ध्यान देने की और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। हम उनकी अधिक से अधिक मदद करने के लिए दृढ़ संकल्प ले रहे हैं। आप हैरान हो जाएंगे कि मेरे लिए पहला चिंता का विषय, उन शिविरों में एक स्वस्थ वातावरण और परिवेश तैयार करना है जहां वे रह रहे हैं। उन्हें शिविर में सफाई के महत्व को समझना चाहिए। जो शिविर साफ सुथरे हैं, वहां के बच्चे स्वास्थ और अध्ययन में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। हमें उन्हें काम, कौशल, व्यवसाय और मूल्यों के लिए विश्वास दिलाना है। क्यों हर चीज के लिए सरकार पर निर्भर रहें?”

हटालकर ने शिक्षा पर कहा था, “हमने पाकिस्तान से आए 60 प्रतिशत हिंदू प्रवासियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने का लक्ष्य प्राप्त किया है। अधिक से अधिक लड़कियां अब स्कूल जा रही हैं।” एक सवाल उनके सामने आता है। 12वीं कक्षा के बाद क्या होगा? “हम उनके बच्चों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने के तरीके पर विचार कर रहे हैं। हम इस समस्या पर सुझावों और समाधानों के साथ हमारी सहायता करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास जाने की सोच रहे हैं।”

जयपुर के मानसरोवर में स्वराज्य ने पाकिस्तान से आए हिंदु परिवारों से मुलाकात की जहां महिलाएं पुरुषों की तरह जिम्मेदारी के साथ जीवन का पुनर्निर्माण कर रही हैं। कुछ महिलाएं कढ़ाई कर रही हैं जो पहले पाकिस्तान में उनके लिए केवल एक शौक का काम था, वह अब यहां पैसा कमाने और अपनी जरूरतों को पुरा करने का जरिया बन गया है। “हम हस्तशिल्प व्यवसाय में शामिल छोटी इकाइयों में काम करते हैं। यह हमें हमारे परिवारों के प्रति जिम्मेदारी की भावना सिखाता है, लेकिन इस काम से मिलने वाला पैसा हमारे द्वारा किए गए श्रम और उस कार्य को करने के लिए की गई मेहनत और उसपर लगाए गए समय के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। हम बहुत अधिक किराए का भुगतान करते हैं। हम इस तरह से और कितने समय तक आगे बढ़ेंगे?”

जयपुर के मानसरोवर में रहने वाली महिलाओं में से एक, जो अपना नाम नहीं जाहिर करना चाहती थी, ने कहा कि कम वेतन के कारण ज्यादातर महिलाओं की हस्तशिल्प के काम में रुचि कम होती जा रही है। एक महिला ने अपने घर पर उसके द्वारा कढ़ाई की चादरें दिखाते हुए कहा, “हम अपने बच्चों की शादी के लिए कढ़ाई वाली वस्तुएं और उनकी आने वाली पीढ़ीयों के लिए तोहफे तैयार कर रहे है।” दिल्ली शिविर में हमारी बातचीत के दौरान गंगा देवी ठीक यही भावना व्यक्त की, जो दान में मिली सिलाई मशीन से कपड़ा सिल रही थीं। उन्होंने कहा “हम कड़ी मेहनत करने से नहीं डरते हैं। हम लोग एक बार फिर से जीवन की शुरूआत कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में काफी काम करना पड़ेगा जिसका मतलब है कड़ी मेहनत करनी होगी।”

एक आश्चर्य ही है कि पाकिस्तानी हिंदू महिलाओं में सहने की कितनी क्षमता है, कि वह डर, निराशा, और मायूसी भरी अंधेरी गलियों से, भावनात्मक और अत्यंत कष्टदायी सफरों के बीच होते हुए अपने परिवारों के लिए एक नए वातावरण और शहरी संघर्ष में अपने अस्तित्व के लिए डटी हुई हैं। वे अपने और बच्चों के लिए बेहतर जीवन की खोज के दौरान रसोई और कढ़ाई तथा शिल्प संबंधी कार्यों पर भी ध्यान देती रहती हैं। पाकिस्तान से आए हिन्दुओं के दिल्ली में स्थित दो शिविरों में काफी हद तक महिलाएं आत्म निर्भरता की शुरूआत करने से बहुत दूर दिखाई पड़ रही हैं। जोधपुर और जयपुर में कुछ शुरुआत करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं और कुछ शुरुआत कर चुके हैं जैसी मिलाजुली स्थिति दिखाई देती है। स्पष्ट रूप से इस परिदृश्य में भिन्नता का एक कारण, उनकी सामाजिक पहचान, रूपरेखा और जीवन शैली में भिन्नता होना है – जो पाकिस्तान में उनके रहन सहन और जीवन यापन के तरीकों से प्रतीत होता है।

मानसरोवर में, जो महिलाएं अब भारतीय नागरिक हो गई हैं, वे बहुत खुश दिखाई देती हैं। राजस्थानी छापे वाली शिफॉन साड़ियों को ओढ़े हुए उन्होंने बताया कि एक उपसर्ग हटाने और दूसरा उपसर्ग “हिंदू” जोड़ने पर वह कितना अलग महसूस करती हैं। इनमें से बहुत सी महिलाओं को बिना डर के घर के बाहर निकलना एक “विशेषाधिकार” लगता है। सामुदायिक निमार्ण इसके बाद आता है।

भारत क्या है? “हमारा देश है” जोधपुर शिविर में सुबह के भोजन के लिए एक खटिए पर बैठे चेतन भील ने इसका जबाव तीन शब्दों में दिया। मोटे अनाज से बनी हुई एक रोटी (चपाती) और थाली के कोने में रखा हुआ थोड़ा सा घी, उनके शिविर में एक और पूरे दिन काम करने के लिए भोजन है। उन्होंने कहा, “आ जाओ दीदी आप भी खाओ।”  हर शरणार्थी, यदि इन शिविरों में खाना बना रहा है, परोस रहा है या भोजन करने जा रहा है, तो वह आपको भोजन करने के लिए जरूर पूछेगा। यह उनका लचीलापन और भावना है। इनमें से बहुत से लोग आराम से पहले धर्म को आगे रखते हैं। बहुत से भारत में बिना “शरणार्थी” कहलाए होली और दीपावली का जश्न मनाने का सपना देख रहे हैं। पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी कई जातियों से संबंधित हैं – मेघवाल, कोहली, भिल, जाटव, सुनार, भड़भुजा, कुमावत, कुम्हार, राजपूत, बनिया, ब्राह्मण और अन्य – एक बड़े हिंदू परिवार के साथ भारत में रह रहे हैं और उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब वे अपने नाम के आगे लगने वाली उपजाति से पहचाने जाएंगे। और वह दूसरे “भारतीयों ”में शामिल हो जाएंगे।

सुमति महर्षि और स्वाती गोयल शर्मा स्वराज्य की वरिष्ठ संपादक हैं।