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मंदिरों का संबंध हिंदुओं से है

प्रसंग
  • सबरीमाला मुद्दे ने मंदिर नियंत्रण के प्रश्नों को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है। यह लंबी यात्रा का पहला कदम है।

2014 आम चुनावों के बाद से भारतीय राजनीति में एक बड़े मंथन ने अपनी जगह बनाई है। जिन विचारों और नीतियों को पहले अप्रासंगिक या अव्यवहार्य माना जाता था वे अब सार्वजनिक बहस और चर्चा के विषय बन गए हैं। इनमें से, जो सबसे चुनौतीपूर्ण प्रस्ताव है और जिस पर सार्वजनिक रूप से विचार-विमर्श हुआ है वह है भारतीय मंदिरों के नियंत्रण को राज्य के बजाय भक्तों के हवाले करने का प्रस्ताव। हालाँकि, इस तरह के ‘परदाफ़ाश’ के लिए लेखों की एक श्रृंखला या सोशल मीडिया अभियानों की आवश्यकता है। इसके लिए एक गहरे और व्यापक अध्ययन एवं मंदिर प्रशासन में सुधार के लिए एक रोडमैप की आवश्यकता है। यह अवधारणा कि राज्य धार्मिक संस्थानों को नियंत्रित करता है और इस प्रकार एक स्वतंत्र संवैधानिक लोकतंत्र में धार्मिक कार्यों को नियंत्रित करता है, चारित्रिक रूप से घृणास्पद है।

कोई यह मान लेगा कि एक स्वघोषित ‘धर्मनिरपेक्ष’ राज्य ऐसे प्रशासनिक तंत्र को ख़त्म करने के लिए जल्दी में होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। मंदिरों पर नियंत्रण राज्य के लिए एक लाभप्रद व्यवसाय साबित हुआ है। जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह राजनेताओं को खुश रखने के लिए उनके लिए उँचे पद बनाती है और प्रशासनिक नौकरशाही मंदिर के फाइनेंस के कंट्रोल का फायदा उठाती है। हाल ही में, मंदिरों और मंदिर प्रशासन पर इस तरह के नियंत्रण के परिणाम भारत भर में, विशेष रूप से केरल में, स्पष्ट होते रहे हैं।

केरल विधायिका ने 20 जून 2018 को त्रावणकोर कोचीन हिंदू धार्मिक संस्थान अधिनियम, 1950 में एक संशोधन पारित किया था। इस कानून का उद्देश्य था पहले वाले अध्यादेश को प्रतिस्थापित करना जिसने देवास्वोम बोर्ड के प्रशासन में कुछ अहानिकर परिवर्तन किए थे। हालाँकि यह विधानसभा में पेश किया गया यह विधेयक अध्यादेश की एक अक्षरशः प्रतिलिपि थी, लेकिन जब यह विधेयक पारित हुआ तब इसमें दो खंड जोड़े गए थे जिन्होंने इसके प्रभाव को मौलिक रूप से बदल दिया था। इसने अपरिहार्य रूप से राज्य में एक विवाद को जन्म दिया और भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पी.एस. श्रीधरन पिल्लई ने इसकी वैधता को चुनौती देने के लिए केरल उच्च न्यायालय का रुख किया।

हालाँकि, मंदिरों के प्रशासनिक निकायों के लिए विवाद केवल केरल तक ही सीमित नहीं हैं। इसकी चपेट में कई राज्य हैं। आंध्र प्रदेश में, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) में गैर-हिंदुओं के रोजगार के बारे में जनवरी 2018 के बाद से एक विवाद पैदा हो रहा है। जब टीटीडी ने उनकी सेवाओं को समाप्त करने का प्रयास किया तब कर्मचारी आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पास पहुँचे जिसने तुरंत रोक लगाई। हालांकि, टीटीडी को परेशान करने वाला यह एकमात्र मुद्दा नहीं है। यह निकाय लम्बे समय से भ्रष्टाचार के साये तले रहा है, जो तब और भी गहरा हुआ जब मुख्य पुजारी रमाना दीक्षिथुलू ने इस साल की शुरुआत में टीटीडी के प्रशासन में व्यापक अनियमितताओं का आरोप लगाया था। बाद में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया।

उड़ीसा में, पुरी जगन्नाथ मंदिर खजाने की चाबियाँ गायब हो गईं जो जून 2018 में कुछ ही दिनों के दौरान मिल भी गयीं। इस प्रसिद्ध मंदिर का माहौल केवल इस सबसे ही ख़राब नहीं हुआ बल्कि जब मंदिर में कतार प्रणाली को लागू किया गया तब हिंसा हुई और मंदिर प्रशासन के कार्यालय में तोड़फोड़ हुई। तमिलनाडु में हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडॉमेंट डिपार्टमेंट के साथ समस्याएं इतनी व्यापक हैं कि मद्रास उच्च न्यायालय ने “इसे बंद करने” की धमकी दी थी।

मंदिरों का प्रशासन और प्रबंधन आम तौर पर राजाओं की ज़िम्मेदारी रही है, जो अपने क्षेत्र में मंदिरों की परंपराओं और अनुष्ठानों से गहराई से जुड़े हुए थे। हिंदू शासकों की तरह धार्मिक संस्थानों पर उनका नियंत्रण वैध और आवश्यक माना जाता था। कई राजाओं ने स्वयं को उनके राज्य के प्राथमिक देवता के दास के रूप में स्थापित किया। त्रावणकोर के महाराजा ने अपना नाम ‘श्री पद्मनाभ दास’ रख लिया था जिसका मतलब है-पद्मनाभ स्वामी का सेवक। मेवाड़ के महाराजा आधिकारिक तौर पर मेवाड़ के दीवान थे जबकि उसके वास्तविक शासक श्री एकलिंगजी जी थे।

राजाओं का अधिकार केवल उनके क्षेत्रों के भौतिक पहलुओं तक ही सीमित नहीं था बल्कि सांसारिक मामलों में भी था। उनके ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘धार्मिक’ प्राधिकरण के बीच कोई भेद नहीं था। इन्हें एक-दूसरे के साथ समेकित माना जाता था। जैसे-जैसे अंग्रेज भारत पर कब्जा करते चले गए, राजाओं का लौकिक अधिकार कम होता गया, लेकिन उनका आध्यात्मिक अधिकार बना रहा। अंग्रेजों ने 1817 में मद्रास एंडोमेंट्स और एस्चेट्स विनियमन संख्या VII के माध्यम से 1817 में मंदिरों पर नियंत्रण करने के लिए अपना पहला कानून जारी किया। 1863 में इसके स्थान पर एक नया कानून जारी किया गया और इसके बाद 1926 में एक बार फिर ऐसा हुआ।

भारत स्वतंत्र होने के बाद, पूर्ववर्ती राजाओं के सामने मंदिरों पर नियंत्रण के संबंध में एक बड़ा सवाल उभरा। 1950 के दशक में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कानूनों की एक श्रृंखला के अधिनियमन द्वारा इन प्रश्नों का हल निकाला गया था। मंदिरों पर राज्य के नियंत्रण के साथ वैचारिक समस्याएं बनी रहती हैं। पहला, कैसे एक आत्मनिर्भर “धर्मनिरपेक्ष” राज्य हिंदू मंदिरों के प्रशासन को नियंत्रित कर सकता है? दूसरा, क्या राज्य अपने उद्देश्यों के लिए हिंदू मंदिरों की विशाल संपत्ति का उपयोग कर सकता है? इस तरह के एक अधिनियमन के लिए प्राथमिक समर्थनों में से एक यह था कि देवस्व बोर्ड केवल मंदिर के “धर्मनिरपेक्ष” पहलुओं पर नियंत्रण करेगा, लेकिन “धार्मिक” पहलू निर्विवाद बने रहेंगे। हालांकि, ये कार्य व्यावहारिक रूप से अविभाज्य हैं।

इन प्रश्नों के साथ अन्य प्रश्नों को सबरीमाला अयप्पन मंदिर और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के सवालों के संदर्भ में नवीनीकृत प्रासंगिकता मिली है। त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड (टीडीबी) सबरीमाला को अपने नियंत्रण में सर्वश्रेष्ठ मंदिर के रूप में उजागर करता है, और अच्छे तर्क के लिए – टीडीबी के राजस्व का लगभग छठा हिस्सा मंदिर के ‘मकर विलक्कु’ त्योहार के दौरान अर्जित धन से बना है। मंदिर का प्रसिद्ध प्रसाद ‘अरवन पायसम’ बनाने के मामले में एक से अधिक बार भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। फिर से मंदिरों के राज्य नियंत्रण की सच्चाई को सामने लाने वाला जो तथ्य था उसे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर एक समीक्षा याचिका दायर करने के लिए टीडीबी द्वारा नकार दिया गया था जो मंदिर में एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं की प्रविष्टि की अनुमति के बारे में था। यह भक्तों की तुलना में राज्य सरकार की राजनीतिक मामलों से स्पष्ट रूप से प्रेरित एक निर्णय था, माना जाता है कि इनके मामलों का प्रतिनिधित्व देवस्वम बोर्ड द्वारा तर्कसंगत रूप से किया जाता है। जाहिर है, इस निर्णय में धार्मिक स्वतंत्रता की बड़ी चिंताएं शामिल हैं लेकिन इस पर अलग से बेहतर तरीके की चर्चा की आवश्यकता है। देवस्वम के ऊपर राज्य नियंत्रण की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे उस पर राजनीतिक नियंत्रण एवं राज्य नियंत्रण भी आ जाता है। देवस्वम बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां राजनीतिक निर्णय हैं जिसका उद्देश्य है सहयोगियों को पुरस्कृत करना, न कि उनके द्वारा बोर्डों पर प्रभावी शासन लागू करना। एचआरसीई निकायों के नियमों को नियंत्रित करने वाले कानून इनकी ही सुरक्षा करने के लिए कई बार संशोधित किए गए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भक्त मंदिरों के नियंत्रण में थे। त्रावणकोर कोचीन हिंदू धार्मिक संस्थान अधिनियम में हाल ही में किया गया संशोधन केवल ‘धर्मनिरपेक्षता’ मंदिर प्रबंधन के प्रयासों की एक श्रृंखला में सबसे नया है।

मामलों का सबसे विवादास्पद मर्म ‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा है। 1990 के दशक में केरल में वामपंथी और कांग्रेस के मोर्चों के बीच यह आने वाले और बीते हुए उल्लास का एक कारण था। ई के नयनार कम्युनिस्ट मंत्रालय ने 1990 में टीडीबी अधिनियम में एक अनुच्छेद जोड़ा जो विशेष रूप से ‘हिंदू’ को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता था जो ‘हिंदू धर्म स्वीकार करे’ लेकिन उसे ‘भगवान या मंदिर की पूजा में विश्वास करने की आवश्यकता नहीं’ है। जब कांग्रेस की अगुआई वाली करुणाकरन सरकार सत्ता में आई, तो उसने 1994 में इस अधिनियम में संशोधन किया और विशेष रूप से घोषित किया कि ‘हिंदू’ धर्म में केवल वे लोग शामिल हैं जो मंदिर और भगवान की पूजा में विश्वास करते हैं। अंततः 1999 में इस मुद्दे को सुलझाया गया था जब तत्कालीन वामपंथी सरकार ने ‘हिंदू’ को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जो केवल हिंदू धर्म का पालन करे।

इस प्रश्न, कि हिंदू कौन है, के उद्देश्य को एम पी गोपालकृष्णन नायर बनाम केरल राज्य मसले में भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2005 में स्पष्ट किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुरुवायूर देवस्वम बोर्ड अधिनियम में ‘हिंदू’ शब्द में उन लोगों को शामिल किया गया था जिनकी आस्था मंदिर की पूजा में नहीं थी, भले ही अधिनियम में विशेष रूप से उल्लेख किया गया था कि व्यक्ति को मंदिर की पूजा में आस्था रखनी चाहिए। इसलिए अधिनियम से यह आशय निकलता था कि एक नास्तिक भी हिंदू है।

इसके परिणामस्वरूप केरल में सबसे विचित्र घटनाएं होती हैं: स्व-अनुशासित नास्तिक अन्य नास्तिकों का चयन करते हैं जो मंदिरों पर नियंत्रण करने वाले प्रशासनिक निकाय का संचालन करते हैं। क्या ऐसी स्थिति राज्य में लाखों भक्तों के लिए वांछनीय है? क्या वे स्वयं मंदिरों के लिए वांछनीय हैं?

अब, नवीनतम संशोधन के पारित करने के माध्यम से, केरल राज्य सरकार कानूनी तौर पर टीडीबी के नियंत्रण में मंदिरों का प्रबंधन करने के लिए एक गैर हिंदू नामांकित कर सकती है। यह प्राथमिक कानूनी आवश्यकताओं का निरंतर विघटन है जो हिंदू मंदिरों के प्रशासकों के लिए अस्तित्व में था। ये प्रावधान भविष्य में अपनाए जा सकते हैं, जिनमें देवस्वम बोर्ड प्रशासन पर किन्हीं भी अन्य कानूनी सीमाओं को हटाने के लिए फिर से संशोधन किया गया। मंदिरों का प्रशासन राजनीतिक शासन की मांगों के अधीन है, जिसकी इच्छाएं इसके विपरीत हो सकती हैं।

मंदिरों पर राज्य नियंत्रण की समस्या ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के साथ सार्वजनिक बहस में प्रवेश किया है। टीडीबी के पूर्व अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन ने संस्था के नियमों की मांग की जो मंदिरों का प्रबंधन करने के लिए भक्तों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक आम विषय जो सभी राज्यों में चल रहा है जहां सरकार मंदिरों का प्रबंधन कर रही है, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ-साथ लगातार भ्रष्टाचार की कमी भी प्रतीत हो रही है।

कई मंदिरों को निराशा और उपेक्षा की स्थिति का सामना करना पड़ा है और पिछले कुछ वर्षों में जारी संघर्ष ने केवल दबाव डाला है। धन की विपुलता के बावजूद देवस्व बोर्ड हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इन राज्यों में एक नौकरशाही विकसित हुई है जिसका एकमात्र उद्देश्य मंदिरों का खजाना खाली करना है; मंदिर और उसके भक्तों की भलाई की बजाय निजी लाभ के लिए। उन्होंने मंदिरों को तीर्थयात्रा, भक्ति, सांस्कृतिक दृढ़ता और विरासत के केंद्रों के बजाय धन-खनन मशीनों में परिवर्तित कर दिया है। राज्य द्वारा मंदिरों के नियंत्रण से समस्याएं बहुत अधिक हैं, इस समय समाधान कम ही हैं।

‘राइट विंग’ बुद्धिजीवीवर्ग से जुड़े लोगों में से कई ने मंदिरों के राज्य नियंत्रण के साथ समस्या को काफी पहले से समझ लिया है, खासकर जब प्रशासन मंदिरों से जुड़े विश्वास और विरासत को महत्वहीन करना या कमजोर करना चाहता है। हालांकि, हिंदू धार्मिक संस्थानों द्वारा सामना किये वाले मुद्दों और भक्तों के नियंत्रण में उन्हें वास्तव में कैसे वापस किया जा सकता है, इस बारे में विस्तृत अध्ययन और शोध होना बाकी है। इस तरह के प्रस्ताव में राजनीतिक लाभ नहीं हो सकता है जैसा कि कई लोगों को लगता है कि यह होगा।

अब एक विचारधारात्मक रूप से प्रतिबद्ध संघ सरकार की अवश्यकता है, जो मंदिरों को नियंत्रणमुक्त करने का प्रयास करे और प्रस्ताव को हिंदू समाज के सभी वर्गों एवं श्रेणियों में आत्मविश्वास का आह्वान करना चाहिए। एक व्यापक अध्ययन जो न केवल राज्य नियंत्रण की समस्याओं को दिखाता है, बल्कि समाधान के लिए सुझाव भी देता है, मंदिरों के लिए “स्वराज्य” का पहला कदम है।

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अनंत कृष्ण एनयूएएलएस, कोच्चि, केरल में कानून, एलएलबी (ऑनर्स) के छात्र हैं।