पत्रिका
सरदार बनाम नेताजी
सरदार बनाम नेताजी

प्रसंग
  • सरदार पटेल को 1930 के अंत में कई मामलों को लेकर संघर्ष करना पड़ा। कांग्रेस के अन्दर ही इनका सबसे कड़ा मुकाबला सुभाष चंद्र बोस से हुआ

दि मैन हू सेव्ड इंडिया – सरदार पटेल एंड हिज आइडिया ऑफ इंडिया। हिंडोल सेनगुप्ता। पेंगुइन वाइकिंग। हार्ड कवर. 437 पीपी। 799 रुपये।

हर गुजरते दिन के साथ, विभिन्न रियासतों में कांग्रेस जैसे-जैसे नागरिक समितियों को बढ़ावा देती गई, वैसे-वैसे सरदार, राजाओं और महाराजाओं के बीच टकराव बढ़ता गया। राजकोट में तो हालात इतने बिगड़ गए कि राज्य में कांग्रेस किस तरह का लोकतंत्र लेकर आयेगी के डर से शासकों ने यह कहना शुरू कर दिया कि गांधी और पटेल, मुस्लिमों सहित अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचलना चाहते हैं। यहां पर पटेल को सबसे पहले एक सनकी राजा का सामना करना पड़ा जो राज्य के धन की बर्बादी करता था और उसका चालाक दीवान, वह सब करता था जो वह चाहता था- जिसमें किसानों पर फालतू करों को बढ़ाना और सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा करना शामिल था, ऐसा वह राजकुमार को सिंहासन पर काबिज रखने और दीवान की शक्ति को कायम रखने के लिए करता था। कुछ सालों बाद ऐसा ही लेकिन और ज्यादा कड़ा मामला हैदराबाद में देखने को मिला, जिसमें सरदार  पटेल ने राजकोट के मामले से सबक लेते हुए इसका भी वैसे ही निपटारा किया।

खरे और फिर वर्धा के मामले में, हमने देखा कि द्वेषपूर्ण तरीके से बनायीं गयीं बात फैला दी गई कि पटेल अल्पसंख्यकों के खिलाफ हैं। खरे के मामले को धक्का तब लगा जब केन्द्रीय प्रांतों के प्रमुख के रूप में, कांग्रेस नेता ने अपने मुस्लिम कानून मंत्री को तेरह साल की दलित लड़की के बलात्कार में दोषी पाए गए चार मुस्लिम पुरूषों को रिहा करने को कहा। इससे परेशान होकर पटेल ने पार्टी अध्यक्ष बोस को लिखा कि ‘यह सबसे जघन्य अपराध था’I

राजकोट के हालात बिगड़ गए और सशस्त्र भीड़ ने पटेल को मारने के लिए गांधी के संबोधन वाली एक बैठक पर हमला कर दिया। कांग्रेस मीटिंग के पंडालों को जला दिया गया और बाद की एक घटना में मुस्लिम भीड़ ने एक मीटिंग के हमला किया जिसमें पटेल को बचाने में एक कांग्रेस कार्यकर्ता की मौत हो गई थी। यह केवल एक उदाहरण नहीं है जहाँ पर कांग्रेस को मुस्लिम विरोध का सामना करना पड़ा। सितंबर 1937 में, प्रसाद ने पटेल को स्वतंत्रता आंदोलन के क्रान्तिकारी गीत वंदे मारतम और राष्ट्रीय ध्वज पर कुछ मुस्लिम समुदायों की तीखी प्रतिक्रिया के बारे में लिखा कि पार्टी ने उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में कड़वे संघर्षों का नेतृत्व करने का फैसला लिया है।

“मैंने देखा है कि कुछ जिलों में बार एसोसिएशनों ने मुस्लिम सदस्यों के विरोध में अपनी इमारतों पर झंडा फहराने का प्रस्ताव पारित किया है, यह लोग कम संख्या में थे और विरोध में बाहर चले गए हैं। इसी तरह से, वंदे मातरम गीत पर भी कुछ मुसलमानों ने आपत्ति जताई है कि यह हिन्दू देवी का वंदन है और शाब्दिक रूप से इसका अर्थ मूर्ति पूजा होता है, जिसके लिए मुसलमान कभी राजी नहीं हो सकते।”

हालांकि प्रसाद ने इस बात को भी स्वीकार किया कि सभी मुसलमानों को ऐसा महसूस नहीं हुआ है, उनका मानना यह था कि इस संबंध में गीत और राष्ट्रीय ध्वज दोनों के साथ समस्या थी।

सरदार बनाम नेताजी

“कई ऐसे भी मुसलमान हैं जो गीत को इस नजरिए से नहीं देखते हैं, इस बात पर कोई शक नहीं है कि उनमें से कई लोगों की यह भावना है कि वे इसको एक राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार नहीं करते जिस तरह वे तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार नहीं करते।”

विभाजन की जडें फ़ैल रहीं थीं, और जून 1938 के आसपास पटेल ने नेहरू को संबोधित करते हुए कहा, “जिन्ना का भाषण बहुत खराब था। दरअसल इससे आम जनता के बीच यह धारणा बन गई कि वे (जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग) किसी भी प्रकार का समझौता नहीं चाहते हैं।”

इस तरह की हिंसा का सामना करते हुए, गांधी राजकोट में आक्रामक लोकतंत्र से अलग हो गए और अन्य राज्यों में स्थानीय शासकों द्वारा विरोध प्रदर्शन को बढ़ावा दिया गया।

इन सब बिंदुओं से, पटेल और कांग्रेस को भारत को एकीकृत करके आजाद करने के एक व्यापक कार्य सफल होने का संकेत मिला। लेकिन इससे पहले उन्हें बोस से बातचीत करनी थी जो कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में दूसरा कार्यकाल चाहते थे। मार्च 1938 में उनके आरक्षण के बावजूद, पटेल कांग्रेस के लोगों से बोस की अध्यक्षता का समर्थन करने के लिए कह रहे थे लेकिन इस बार उनका पुराना संदेह फिर से प्रकट हुआ।

यदि पटेल कांग्रेस के एक कार्यकाल के लिए बोस के अध्यक्ष चुने जाने के विरोधी रहे होते तो उन्हें नेताजी की दूसरी अवधि के बारे में बहुत ही अधिक मतभेद रहा होता। ऐसे कई मुद्दे हैं जो बोस को गांधी और पटेल से अलग करते हैं। मूलतः बोस गांधी के नेतृत्व पर संदेह कर रहे थे, उन्होंने उन्हें कभी भी अपने नेता के रूप में स्वीकार नहीं किया था, और न ही वह कांग्रेस द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीवादी पद्धति को स्वीकार किया जाना जरूरी मानते थे। 1928 के शुरुआती दिनों में कलकत्ता के कांग्रेस सत्र में, बोस ने युवा पुरुषों और महिलाओं का अपना कैडर प्रस्तुत किया, जिसे उन्होंने कांग्रेस स्वयंसेवी बल कहा था जिसमें साइकिल सवार, घुड़सवार और गुप्तचर शामिल थे। जनरल ऑफिसर कमांडिंग बोस, पूरी तरह से सेना की वर्दी में रहते थे (जो जांघिया और चमड़े के लंबे जूते पहनते थे), के नेतृत्व में हर सुबह कलकत्ता मैदान में सैनिकों की परेड आयोजित की जाती थी। गांधी ने सेना की अर्धसैनिक वर्दी को नापसंद किया और सलामी, चलने के तरीके और एड़ी से आने वाली खटखट की आवाज़ पर असंतोष प्रकट किया।

जैसा कि नीरद चंद्र चौधरी ने स्पष्ट कियाः

“गांधी के नेतृत्व के उद्भव के साथ ही साथ तीन पहलुओं वाला एक स्पष्ट विरोध भी भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन में दिखाई दिया। सबसे पहला पहलू यह है कि गांधी के आदर्श और पद्धतियां पाश्चात्य संस्कृति की विरोधी थीं, दूसरा यह था कि नए तानाशाहों ने  पूर्व-गांधीवादी नेतृत्व का विरोध किया था, और तीसरा यह कि उत्तरी भारत बंगाल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे साधारण क्षेत्रों से काफी विषम था। गांधी जी एक चरमपंथी और दबंग व्यक्ति थे जो विरोधी चरमपंथियों तथा दबंगों को सहन करने में असमर्थ थे। असहयोग दूसरों को मजबूर करने का उनका तरीका था, और इसी गुण ने उनके व्यक्तित्व और आदर्शों को बढ़ावा दिया जिसने मतभेद की सभी संभावित आशंकाओं को नष्ट कर दिया।”

जैसे-जैसे बोस लोकप्रिय होते गए वैसे ही विचारों में मतभेद भी बढ़ते गए।

फिर भी, एक मतभेद जारी रहा और जैसे-जैसे समय बीतता गया बोस ने आत्मविश्वास और लोकप्रियता हासिल की, वह गांधीवाद के विरोध का प्रतीक बन गए। 1921 में गांधी जी के साथ अपनी पहली मुलाकात में बोस प्रभावित नहीं हुए, लेकिन उस समय उस बुजुर्ग आदमी के विरोध में खड़े होने का तो कोई सवाल ही नहीं था जिसका नेतृत्व उनको स्वीकार करना पड़ा था। हालांकि अपने राजनीतिक जीवन के दौरान बोस न केवल गांधीवाद के प्रति उदासीन रहे बल्कि यह इसके प्रति सहिष्णु श्रेष्ठता को प्रभावित करने वाले रहे।”

हिंडोल सेनगुप्ता फॉर्च्यून इंडिया के एडिटर-एट-लार्ज हैं।