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सबरीमाला और समानता के नाम पर उत्पीड़न

प्रसंग
  • सबरीमाला फैसला इस बात का उदाहरण है कि जब राजकीय संस्थान नागरिकों की स्वतंत्रता पर समानता के अपने विचारों को लागू करना चाहते हैं तो आपको क्या प्राप्त होता है।

200 से भी ज्यादा साल पहले “स्वतंत्रता, समानता, बंधुता” फ्रांसीसी क्रांति में लगाया जाने वाला नारा था। क्रांतिकारियों ने लोकतंत्र और गणतंत्रवाद के लिए एक अकाट्य तर्क के रूप में “स्वतंत्रता, समानता और बंधुता” को बेचा था। हालाँकि उन्होंने पहले दो आदर्शों को एक दूसरे के साथ सीधे संघर्ष में पाया होगा। संवैधानिक विद्वानों ने सालों से इस संघर्ष पर बहुत चर्चाएँ की हैं। इस संघर्ष ने कुछ कानूनी मामलों को जन्म दिया है, लेकिन वर्तमान संदर्भ में, सबरीमाला फैसला और इसके लागू किये जाने के बाद पैदा होने वाला विवाद इसका परिणाम है।

स्वतंत्रता और समानता में यह संघर्ष कैसे उत्पन्न होता है? या फिर, यह संघर्ष आखिर है क्या?

साधारण बोलचाल के तरीके से कहा जाए तो स्वतंत्रता राज्य द्वारा “अकेला छोड़ देने” का अधिकार है। जिसका मतलब है, किसी व्यक्ति की गतिविधियों में राज्य के हस्तक्षेप को रोकना। स्वतंत्रता के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा अन्य कई प्रकार हैं। वहीं दूसरी तरफ समानता यह तय करती है कि राज्य किसी एक व्यक्ति या समूह के पक्ष को नकारते हुए दूसरे का पक्ष न ले। नागरिकों को अधिकार है कि उनके साथ वर्ग, जाति या लिंग का भेदभाव न किया जाए। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि राज्य से स्वतंत्रता या समानता का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। वे अलग-अलग स्तरों तक ही सीमित हैं। स्वतंत्रता और समानता के बीच होने वाला संघर्ष उनकी मौलिक अवधारणाओं से ही निकलता है। उनके अंतिम लक्ष्य एक दूसरे के विरोधी हैं। सभी को समानता प्रदान करने का मतलब सभी से स्वतंत्रता छीनना होगा, जबकि सभी को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करने का प्रयास करने का मतलब सभी की समानता को नकारना होगा। यह एक शाश्वत संघर्ष है, जो दुनिया भर में हर उदार लोकतंत्र में पाया जाता है। लेकिन वहाँ स्पष्ट आदेश होते हैं जहाँ समानता और स्वतंत्रता को लेकर एक नागरिक के अधिकार समाप्त या प्रारंभ होते हैं, विशेष रूप से तब जब यह दो ऐसे नागरिकों या समूहों के अधिकारों के बारे में, जो आपस में संघर्षरत हों।

संवैधानिक अधिकारों के पीछे की संकल्पना हमेशा से राज्य की व्यापक शक्तियों के खिलाफ व्यक्तियों और समूहों के अधिकारों की रक्षा करना रही है। संवैधानिक दस्तावेज सार में राज्य और उसके नागरिकों के बीच एक समझौता होता है, जो राज्य की विशेष शक्तियों और नागरिकों के विशेष अधिकारों को सुरक्षित करता है। इसको नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करने वाला माना जाता है लेकिन इसे एक दूसरे नजरिये से भी देखा जा सकता है। संविधान द्वारा प्रदत्त सुरक्षाएं और गारंटियाँ राज्य के साथ-साथ नागरिकों की वैधता की रक्षा करती हैं। राज्य को अत्याचारी फैसलों में पड़ने से रोककर, यह इसके खिलाफ जनता में फैलते असंतोष की संभावना को समाप्त कर देती है, इस तरह से यह इसकी वैधता की रक्षा करती है। अन्यथा, नागरिकों की नजर में राज्य संस्थानों की वैधता का खतरा होता है। अगर राज्य हितों की रक्षा करने में असफल रहता है – इस मामले में अयप्पा भक्तों की धार्मिक स्वतंत्रता की – तो यह सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान, व्यापक असंतोष और कानूनों के उल्लंघन के रूप में सामने आएगा, जैसा कि हमने कुछ हफ्तों पहले केरल में देखा है।

धार्मिक स्वतंत्रता की उत्पत्ति

सबरीमाला मुद्दे को लिंग समानता पर तैयार किया गया है। हालाँकि, मसला यह है ही नहीं। सवाल स्पष्ट रूप से सबरीमाला में भगवान अयप्पा के रूप की पूजा करने वाले मेरे जैसे भक्तों की धार्मिक स्वतंत्रता का है। राज्य द्वारा किए गए इस हस्तक्षेप का कोई महान उद्देश्य नहीं है और अगर कोई मलयाली महिलाओं की प्रतिक्रिया को देखता, तो यह फैसला उनको मानसिक रूप से बहुत पीड़ा देता। उनके और अयप्पा भक्तों द्वारा उठाए गए सवाल वाजिब हैं – सबरीमाला में देवता की नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की प्रकृति वहाँ पर धर्म और विश्वास के लिए आवश्यक है। न्यायालय द्वारा इसे नकारना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

इसका मूल्य समझने के लिए हमें सबसे पहले धार्मिक स्वतंत्रता की उत्पत्ति का पता लगाना होगा। धार्मिक स्वतंत्रता आवश्यक मौलिक अधिकारों और सुरक्षाओं में से एक है जो दुनिया का कोई भी उदार लोकतंत्र अपने नागरिकों को प्रदान करता है। दरअसल, संवैधानिक लोकतंत्र की स्थिति का निर्धारण करने के लिए प्राथमिक मानदंडों में से एक है धार्मिक स्वतंत्रता को दी गई सुरक्षा की देखभाल करना। धार्मिक स्वतंत्रता की धारणा, जैसे आज हम इसे जानते हैं, की जड़ें सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप में होने वाले धर्मयुद्धों में है। बाद के दशकों में कई बुद्धिजीवियों ने ‘विवेक की स्वतंत्रता’ की आवश्यकता व्यक्त की थी।

कई शासकों ने यह भी स्वीकार किया है कि केवल सुलह के द्वारा ही धार्मिक संघर्ष का अंत होता है। यह इस भावना में था कि फ्रांस के हेनरी चतुर्थ ने नेंटस का फरमान जारी किया था जिसने सन् 1598 में कैल्विनवादी विरोध प्रदर्शनकारियों को विशेष अधिकार दिए। हेनरी चतुर्थ के पास इस फरमान को जारी करने के निजी कारण थे (उनका जन्म एक विरोधी के रूप में हुआ था और वह कुछ साल पहले ही कैथोलिक धर्म में परिवर्तित हुए थे), लेकिन इसने राज्य और धर्म के बीच संबंधों की मौलिक प्रकृति को बदल दिया। लगभग 200 साल बाद, नव स्थापित संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के लिए पहला संशोधन किया जिसने एक राष्ट्रीय धर्म की स्थापना के साथ-साथ “धर्म के मुक्त अभ्यास को प्रतिबंधित करने” से कांग्रेस को रोक दिया। मनुष्यों और नागरिकों के अधिकारों की फ्रांसीसी घोषणा ने अनुच्छेद X के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की भी रक्षा की, जिसमें कहा गया है –

“किसी को भी उसके विचारों, यहाँ तक कि धार्मिक विचारों, के लिए परेशान नहीं किया जा सकता है, बशर्ते कि उनकी अभिव्यक्ति कानून द्वारा स्थापित सार्वजनिक नियम में व्यवधान न उत्पन्न करे।”

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सूचीबद्ध किया गया है। अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 में धार्मिक स्वतंत्रता का मूल दिया गया है। अनुच्छेद 25 किसी व्यक्ति को धर्म का अभ्यास करने का अधिकार देता है जबकि अनुच्छेद 26 प्रत्येक धर्म, संप्रदाय और वर्ग को धार्मिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें कायम रखने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 26 का उद्देश्य किसी एक समूह या समुदाय के अधिकारों की रक्षा करना नहीं बल्कि सभी समुदायों और हर वर्ग या समूह की रक्षा करना है, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो। इन समूहों पर सिर्फ यह प्रतिबंध है कि वे सार्वजनिक स्वास्थ्य, कानून या नैतिकता का उल्लंघन न करें।

उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 26 के तहत अयप्पा भक्तों को न केवल अलग संप्रदाय के रूप में मानने से इंकार कर दिया बल्कि यह भी कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म का अभ्यास करने के लिए दूसरों की तरह महिलाएं भी “समान रूप से हकदार” हैं। समस्या है कि धार्मिक आदेश (स्थानीय शास्त्रों और सबरीमाला मंदिर की विशिष्ट परंपराओं के माध्यम से) खुद यह कहते हैं कि एक विशेष आयु की महिलाओं को मंदिर से बाहर रखा जाना चाहिए।

इस तरह से अगर उस आयु की कोई महिला धर्म का अभ्यास करने की कामना करती है तो वह धर्म के नियमों का उल्लंघन करेगी। हालाँकि, ऐसा लगता है कि न्यायालय ने इस विरोधाभास को नजरअंदाज कर दिया है। अपने इतिहास में न्यायालय ने कई बार यह निर्णय लिया है कि कौन से अभ्यास ‘जरूरी‘ हैं और कौन से नहीं। यह सभी बातें एक सवाल पूछती हैं कि उच्चतम न्यायालय इस स्थिति पर कैसे पहुँच गया जहाँ पर यह देश का सर्वोच्च धार्मिक संस्थान बन गया। सबरीमाला पर अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति न देना हिंदू धर्म के लिए “आवश्यक” नहीं है और इसलिए अनुच्छेद 25 इसको सुरक्षित नहीं करता है। सुप्रीम कोर्ट और राज्य का अधिकार मंदिरों में नहीं है। मंदिर से जुड़े अधिकार सबरीमाला के तंत्री (वंशानुगत प्रधान पुजारी) के पास हैं न कि उच्चतम न्यायालय, केरल सरकार और भारत की केंद्र सरकार के पास। इस तरह के अधिकारों का उल्लंघन करना अत्यन्त भीषण उल्लंघन है।

अब भी मन में संदेह है कि उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 26 के तहत गारंटीकृत सांप्रदायिक अधिकारों पर विचार कैसे नहीं किया। धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप, जिसका कोई विधायी समर्थन नहीं है, बल्कि यह सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत द्वारा मौलिक अधिकारों के दावों पर आधारित है, किसी अन्य लोकतंत्र में नहीं देखा गया है। यह निर्णय देश में हर समुदाय के रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप के लिए द्वार खोलता है। यह बड़े “सामाजिक सुधार” के लिए एक मार्ग के रूप में कुछ सकारात्मक रूप में दिखाई दे सकता है। हालाँकि, यह फिर भी धार्मिक स्वतंत्रता का एक अशांत उल्लंघन होगा। उच्चतम न्यायालय द्वारा संवैधानिक रूप से नैतिकता के लिए प्रतिकूल मानी जाने वाली सभी प्रथाओं और रीति-रिवाजों को खत्म करते हुए किसी की स्वतंत्रता के बराबर उल्लंघन करना ‘सामाजिक सुधार’ नहीं है बल्कि यह न्यायालय द्वारा उन संवैधानिक अधिकारों का हनन है और जिनकी इसे रक्षा करनी चाहिए।

धार्मिक स्वतंत्रता का एक और पहलू भी है, ‘धर्मनिरपेक्षता’ की अवधारणा, राज्य से धार्मिक संस्थानों को अलग करना। राज्य धार्मिक संस्थानों के आचरण में हस्तक्षेप नहीं करते हैं और ऐसे ही धार्मिक संस्थान राज्यों के संचालन में। यह निश्चित रूप से धर्मनिरपेक्षता का सबसे प्रबल उल्लंघन नहीं है क्योंकि राज्य लाखों मंदिरों को नियंत्रित करता है। मंदिर की प्रथाओं में दखल देकर न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन किया है।

फैसले और इसके अवलोकनों की विस्तार से आलोचना एक लेख में नहीं की जा सकती। यह एक ऐसा विषय बना रहेगा जिसकी आलोचना और विश्लेषण किया जाएगा। स्वतंत्रता में विश्वास करने वालों के लिए सबरीमाला के फैसले वाला दिन यानी 28 सितंबर एक मनहूस दिन होगा। अयप्पा के लाखों भक्तों के लिए भी यह दिन अत्यधिक क्रोध और पीड़ा वाला दिन होगा।

अनंत कुमार कोच्चि, केरल के एनयूएएलएस (नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज) में लॉ, एलएलबी (ऑनर्स) के छात्र हैं।