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व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण के जोखिम और उलझनें
शिवकुमार - 2nd January 2019

आशुचित्र- जब तकनीकी कंपनियों के पास उपभोक्ताओं का भरपूर डाटा है तब वे किसी एक वस्तु के लिए ही ग्राहक को उसकी आवश्यकतानुसार विभिन्न मूल्य और विभिन्न सेवाएँ उपलब्ध करा सकते हैं।

तकनीकी कंपनियों के पास निजी उपभोक्ताओं के डाटा की बढ़ती उपलब्धता ने उत्पाद तथा सेवाओं के व्यक्तिगत होने के आसार बढ़ा दिए हैं। इस माहौल में ही “व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण” जैसी चीज़ें जन्मी हैं। व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण एक महत्त्वपूर्ण नवोन्मेष (इनोवेशन) है जिसने उत्पाद तथा सेवा के लिए 150 वर्ष पुरानी उत्पाद तथा सेवाओं के लिए मानक मूल्य के टैग की रीत पर प्रभाव डाला है।

मूल्य के टैग के उपयोग का श्रेय उसके अन्वेषक जॉन वानामैकर को जाता है जिन्होंने वर्ष 1870 में फिलाडेल्फिया रेल रोड़ डिपो खरीद कर कपड़ा खुदरा केंद्र आरंभ किया था। उसके पहले तक कीमतें खरीददार तथा उपभोक्ता के बीच व्यक्तिगत रूप से तय की जाती थीं तथा उसके बाद मूल्य के टैग की क्रांति ने उपभोक्ता की खरीदी का व्यवहार तय किया।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी वस्तु के लिए उपभोक्ताओं की अधिकतम भुगतान करने की इच्छा 100 रुपए से 1,000 रुपए के बीच है तो विक्रेताओं ने एक वाजिब मूल्य तय किया जैसे कि 250 रुपए। जिससे बाज़ार में अधिकतम खरीदी इसी कीमत पर हो सके। इस स्थिर कीमत व्यवस्था ने कई प्रकार के अन्वेषण के तूफानों में भी अपना अस्तित्व कायम रखा लेकिन अब इसका भविष्य बेरंग दिखने लगा है।

1970 के दशक में अस्थिर कीमतों का दौर आया जहाँ भिन्न समूह के लोगों ने एक समान उत्पाद तथा सेवा के लिए भिन्न कीमतें अदा की। यहाँ उपभोक्ताओं को खरीदी के समय के आधार पर विभाजित किया गया। कुछ उदाहरण- हवाई जहाज़ के टिकट, होटल के कमरे, बार में “हैप्पी आर्स” तथा बुधवार को कम कीमत में सेल इत्यादि हैं। यहाँ पर उपभोक्ताओं के पास अपना खंड चयन करने का अधिकार था। उदाहरण के तौर पर बिज़नेस क्लास वाले उपभोक्ता भी यदि समय के पहले टिकट आरक्षित करवा लें तो उन्हें कम कीमत अदा करनी पड़ती है। इसी क्षेत्र में नवागुंतक है “व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण” जो ग्राहक का व्यक्तिगत डाटा जैसे कि पूर्व में की गई खरीददारी तथा उनका व्यवहार, उनके जीवन के निजी कार्यक्रम अथवा अन्य मनोवैज्ञानिक लक्षण  का विश्लेषण कर एक मूल्य निर्धारित करता है जो कि उस ग्राहक के लिए तथा उस समय पर अद्वितीय होता है। अस्थिर मूल्य निर्धारण तथा व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण में अंतर है कि अस्थिर मूल्य निर्धारण एक समय पर हर ग्राहक के लिए एक जैसी कीमत निर्धारित करता है वहीं व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण इस वक्त की सीमा को भी तोड़ देता है। व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण डाटा तकनीक में क्रांति की वजह से सुलभ हो पाया है जहाँ ई-विक्रेताओं तथा उत्पाद कंपनियों के पास निजी ग्राहकों का टेराबाइट जितना बड़ा डाटा भी आसानी से उपलब्ध है जो कि अब तक नहीं था।

जब बात व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण के साथ प्रयोग की आती है तो अमेज़ॉन तथा गूगल जैसी कंपनियाँ अग्रिम पंक्ति में रहती हैं। भले ही व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण सुनने में सौम्य प्रतीत होता है लेकिन किसी वस्तु को खरीदने के पहले उपभोक्ता द्वारा उसके चयन करने का अधिकार उनसे छिन लेना क्या उचित है? क्या इस प्रारूप में व्यापार के अर्थशास्त्र के बिंदुओं से भिन्न कोई नैतिक बिंदु है?

वर्ष 2000 के दौरान जब अमेज़ॉन इकलौता बड़ा ई-विक्रेता था तब एक ग्राहक ने पाया कि यदि वह ब्राउसर की कुकीज़ डीलिट कर दे तो एक डीवीडी 4 डॉलर कम कीमत में खरीद सकता है। यह राष्ट्रीय स्तर पर विवाद बन गया था तथा जेफ बेज़ोस ने व्यक्तिगत रूप से क्षमा माँगी थी तथा हज़ारों के प्रतिदाय दिए थे। यह सोशल मीडिया से पहले के दिन थे। यदि यही विवाद सोशल मीडिया के दिनों में होता तो अमेज़ॉन के स्टॉक ध्वस्त होने की कगार पर पहुँच जाते।

लेकिन दुनिया आगे बढ़ गई और अब प्रमुख ग्राहक समूह 1990 के दशक के लोग तथा 20वीं सदी के अंत के बच्चे हैं। तकनीकी कंपनियों के अनुसार इस दौर के ग्राहक निजता को लेकर इतने चिंतित नहीं रहते तथा कम कीमतें और अधिक बचत की चाहत में अपना निजी डाटा खुश होकर साझा करते हैं।

व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण को लेकर एक सजीव तथा सटीक अध्ययन ऑनलाइन मानव संसाधन संस्थान ज़िपरिकृटर ने शिकागो बूथ स्कूल के प्राध्यापकों के साथ मिलकर किया था। पहले यह संस्था किसी भी सोर्सिंग रिक्वेस्ट के लिए 99 डॉलर की कीमत लेने लगी फिर कई प्रयोगों से उसने पाया कि वह कीमत को दोगुना कर 199 डॉलर तक कर सकती है(व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण 19 डॉलर से 399 डॉलर के बीच था) और पहले से अधिक मुनाफ़ा कमा सकती है। उसने कई ग्राहक खोए भी, कुछ ने शिकायत भी की लेकिन अधिकतर ग्राहक संतुष्ट थे तथा उसका मुनाफा बढ़ गया। उन्होंने व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण के लिए ग्राहकों का निजी डाटा उपयोग किया। इस प्रयोग की सफलता तथा उबर की बाज़ार के अनुरूप अस्थिर कीमत के तरीके को कम शिकायतों और लागू करने में कम बाधाओं के कारण तकनीकी कंपनियों तथा ई-विक्रेताओं ने व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण को उत्साहित होकर अपनाया। निजी ग्राहकों का डाटा तकनीकी कंपनियों तथा ई-विक्रेताओं के पास होना एक बड़ा सहायक रहा।

व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी मूल्य विभेद जैसा ही प्रारूप है। इसमें प्रत्येक ग्राहक व्यक्तिगत कीमत अदा करता है जो कि उसकी अधिकतम डब्ल्यूटीपी के बराबर होती है। यह प्रारूप अर्थशास्त्र में कुशल माना जाता है क्योंकि इसमें कोई भी नहीं छूटता तथा उपभोक्ता-उत्पादक अधिशेष का मुद्रीकरण हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर यदि आइस्क्रीम के लिए ग्राहकों की डब्लयूटीपी 2 रुपए से लेकर 50 रुपए तक है और विक्रेता 15 का मूल्य निर्धारित कर देता है तो बेशक कुछ ग्राहक उसे खरीद पाने में असमर्थ होंगे लेकिन बहुत सारे ग्राहक उसे खरीद सकेंगे क्योंकि उनकी डब्ल्यूटीपी  निर्धारित मूल्य से अधिक है।

यह अकुशलता व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण में नहीं होती जहाँ सारे ग्राहक अपनी इच्छानुसार भुगतान कर आइस्क्रीम खरीद सकते हैं। यह सामाजिक कल्याण को बढ़ाता है क्योंकि अमीर अधिक राशि का भुगतान करते हैं तथा गरीब को कम राशि का ही भुगतान करना होता है और इस तरह सभी को इसका फायदा मिलता है।

प्रथम श्रेणी मूल्य विभेद सदैव कल्पना रहती है क्योंकि अधिकतम डब्ल्यूटीपी तय करना असंभव ही होता है तथा कोई भी ग्राहक उसे प्रकट नहीं करता है। निजी ग्राहकों के डाटा तथा ताकतवर मशीन लर्निंग एल्गोरिदम की मदद से कंपनियाँ इस महत्त्वपूर्ण जानकारी को निर्धारित कर पाने में सटीक के करीब रहती हैं।

व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण के पक्षधरों के अनुसार यह प्रारूप समाज द्वारा अपनाया जाएगा क्योंकि यह कुशल है तथा कल्याण के अधिकतम आसार देता है। वे ऐसे लोगों पर प्रहार करते हैं जिनकी डब्ल्यूटीपी अधिक होने के बाद भी समाज के भले के लिए अधिक राशि देने से मना करते हैं।

लेकिन व्यक्तिगत मूल्य निर्धारण के विपक्षियों के कई नज़रिए हैं। पहला तो ग्राहकों में भेद करने के लिए उपयोग किए जाने वाले जनसांख्यिकी पहलू जिनमें कानूनी हस्तक्षेप रहता है।

हाल ही में कैलिफोर्निया की एक अदालत ने एक डेटिंग ऐप की प्रक्रिया को कानून के विपरीत बताया था। यह ऐप उम्र के आधार पर कीमतें तय करती थी तथा अधिक उम्र वालों को अधिक कीमतें अदा करनी होती थी।

उसी प्रकार से धर्म तथा जाति के आधार पर भेद करना भारत सहित कई अन्य देशों में गैर-कानूनी है। इस पर तकनीकी कंपनियों का कहना है कि वे जनसांख्यिकी आंकड़ों का उपयोग प्रॉक्सी के रूप में केवल डब्ल्यूटीपी निर्धारित करने के लिए करती हैं और किसी भी प्रकार के भेदभाव में शामिल नहीं करतीं। उदाहरण के तौर पर दिवाली के अवकाश में किसी हिंदू ग्राहक की यात्रा की कीमत किसी अन्य धर्म के व्यक्ति की तुलना में अधिक होगी लेकिन यहाँ यात्री का धर्म केवल उसकी डब्ल्यूटीपी निर्धारित करने में उपयोग किया जाता है। यह स्पष्ट नहीं है कि अदालत इस पर क्या निर्णय लेगी लेकिन तकनीकी कंपनियों को यह पता है कि यह एक कानूनी दलदल है।

दूसरा मुद्दा जो कि उपभोक्ता अधिकार रक्षा समूह उठाते हैं कि क्या अवसरवादी व्यवहार उचित है। उदाहरण के तौर पर कटरीना तूफान के दौरान अमेरिका के प्रभावित इलाकों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाने से हालात बदतर हो गए थे। इस प्राकृतिक आपदा में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ाना और इन हालातों में कंपनियों द्वारा शोषण करना क्या उचित है? तकनीकी कंपनियों के अनुसार इन हालातों से निपटने में डब्ल्यूटीपी के आधार पर कीमतें निर्धारित करना सर्वश्रेष्ठ प्रयास होता है लेकिन उपभोक्ता समूह इससे सहमत नहीं हैं।

तीसरा मुद्दा सौदेबाजी के नैतिक अधिकारों से जुड़ा है। जितना ग्राहक तथा उपभोक्ता स्वतंत्र रूप से प्रतियोगी उत्पादों के बारे में जान पाते हैं उससे अधिक तकनीकी कंपनियाँ ग्राहकों के बारे में जानती हैं। यह अंतर ताकतवर कंप्यूटिंग तथा एल्गोरिदम के कारण है। इसी कारण से ग्राहकों के शोषण के आसार होते हैं। इस क्रय के एकाधिकार से निपटने का एकमात्र तरीका है बाज़ार को अधिक प्रतियोगी बनाना। जैसे कि नियामकों द्वारा निजी ग्राहकों का डाटा सभी प्रतियोगियों को साझा करने का प्रावधान रखना या इस डाटा का नियंत्रक बनना जिससे बाज़ार में एक ही स्तर पर प्रतियोगिता हो सके।

इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है ग्राहकों की मानसिकता। तय कीमत के पिछले 150 वर्षों के दौर में कोई भी उपभोक्ता कभी यह महसूस नहीं कर सकता था कि उसने समान वस्तु के लिए अन्य उपभोक्ता से 100 रुपए अधिक कीमत अदा की। अब ग्राहकों के मन में निराशा हो सकती है जो कि विक्रेता के लिए नकारात्मकता पैदा कर सकती है। इस मानसिकता को बदलना सबसे जटिल भाग है तथा यहाँ फर्क नहीं पड़ता कि अर्थशास्त्र की बातें क्या कहती हैं। तकनीकी तथा उत्पाद कंपनियाँ यह जानती हैं कि यदि यह नकारात्मकता रही तो ग्राहकों का विश्वास, उनके द्वारा किया जाने वाला प्रचार तथा उनका कंपनी से जुड़े रहने के समय का मूल्य भी प्रभावित होगा।

इस समस्या के लिए कंपनी के लिए मूल्यवान ग्राहक वे अमीर ग्राहक होते हैं जिनकी डब्ल्यूटीपी अधिक होती है। इस पर कंपनियाँ कहती हैं कि बाज़ार में समान कीमतें रहती ही नहीं हैं। लोग समान स्तर की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति तथा आर्थिक सहयोग के कारण भिन्न कीमतें अदा करते हैं। लोग अभी भी टैक्सी तथा ऑटो-रिक्शा सेवाओं के लिए भिन्न कीमतें अदा कर रहे हैं।

लेकिन इस बात के साथ दो अन्य बातें जुड़ी हुई हैं।
पहली, भिन्न कीमतें केवल अनुकूलित सेवाओं के क्षेत्र में व्याप्त हैं जहाँ ग्राहकों को विकल्पों के तुलनात्मक अध्ययन का प्रावधान देना कठिन है। इस प्रारूप को उत्पाद तथा मानक सेवाओं में भी शामिल करना आसान नहीं है।
दूसरी, जब कीमतों की जानकारी निजी रखी जाती है तब तुलना करना कठिन होता है लेकिन सोशल मीडिया के दौर में व्यक्तिगत निर्धारण मूल्य की जानकारी निजी रख पाना अत्यंत कठिन है।

कंपनियों के लिए एक अन्य चुनौती है कि ग्राहकों द्वारा कंपनियों द्वारा दी जाने वाली जानकारियों को बदल कर पेश किया जा सकता है अथवा इस खेल के लिए कई ऑनलाइन हथकंडे अपनाए जा सकते हैं। यह एक अन्य कारण है जिसकी वजह से व्यक्तिगत निर्धारण मूल्य को अभी मूल रूप से थोड़ा दूर रखा जाता है।

इन सभी तकनीकी, नैतिक तथा कानूनी बिंदुओं का सार जो भी रहे लेकिन यह निश्चित है कि व्यक्तिगत निर्धारण मूल्य प्रारूप बाज़ार में व्याप्त रहेगा तथा नियामकों के लिए ग्राहकों के अधिकार की सुरक्षा अधिक जटिल कार्य होगा। भले ही कड़वी बात हो लेकिन हम सभी ग्राहकों को खरीदी के इस ने प्रारूप से संबंध जोड़ना होगा जहाँ मूल्य का टैग नहीं होगा तथा ग्राहक का अतिरिक्त कोष खाली होता रहेगा।