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तैयारी कल की: मानव पूँजी में निवेश क्यों है भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण
तैयारी कल की- मानव पूँजी में निवेश क्यों है भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण

प्रसंग
  • यदि भारतीय सेना को भविष्य में युद्ध लड़ने और जीतने में सफलता हासिल करनी है तो सैन्य सुधार और राजकोषीय रूढ़िवाद को एक साथ आना होगा

सेना के लिए वित्तपोषण की तथाकथित कमी के हालिया महीनों में बहुत चर्चाएँ हुई हैं। इसमें कुछ नया नहीं है। वस्तुतः, स्वतंत्र भारत में प्रत्येक सरकार पर उसके कार्यकाल के दौरान इसका आरोप लगा है। दुनिया भर में, एक भी सेना ऐसी नहीं है, यहाँ तक कि अमेरिकी सेना भी नहीं ( जिसके रक्षा बजट के सामने अपनी रक्षा पर बहुत ज्यादा खर्च करने वाले भी 10 देश बौने हैं), जो वित्त की कमी की शिकायत नहीं करती है। फिर भी, हालिया इतिहास में यह देखा गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे नवीन दृष्टिकोण अतिवित्तपोषित सेनाओं ने नहीं बल्कि उन सेनाओं ने अपनाया है जो धन की कमी का सामना कर रही होती हैं. उदहारण के तौर पर, स्वीडन और ताइवान ऐसे देश हैं जिन्होंने अपनी सीमाओं (रूस और चीन क्रमशः) पर गंभीर खतरों का सामना किया है और अपेक्षाकृत कम लागत पर ठोस सुरक्षा उपायों में कामयाब रहे हैं। विशेष रूप से स्वीडन बहुत पहले से तकनीक का इस्तेमाल करता था, जिसके पास 1950 के दशक में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी वायुसेना थी और 1980 के दशक में एक बहुत छोटी लेकिन अधिक घातक वायुसेना थी। ठीक इसी तरह फ्रांस ने अपनी क्षमताओं को अभिनव समाधानों के माध्यम से उन्नत किया।

आज फ़्रांस मात्र 3000 सैनिकों के साथ दुष्कर सहारा क्षेत्र में, आकार में भारत से दोगुने, इस्लामी राज्य से पीड़ित क्षेत्र के एक बड़े खतरे से निपट रहा है। हालाँकि ऐसे उदाहरण राजकोषीय रूढ़िवाद के सपने को सच करने जैसे हैंI

हालाँकि, सवाल यह है कि क्या इनमें से कोई उदहारण भारत पर लागू होता है? भारत का जोखिम का परिवेश क्या है? संस्थागत अनिवार्यताएं क्या हैं जो सुधारों में सहायता करती हैं या उन्हें रोकती हैं? ऐसे कौन से सामाजिक-आर्थिक कारक हैं जो परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं या रोकते हैं? यदि ये जमीनी कारक अन्य देशों के साथ पंक्तिबद्ध नहीं होते हैं तो आगे का क्या रास्ता है?

पारिभाषिक और संज्ञानात्मक मुद्दे

भारत जो पहली समस्या का सामना करता वह यह है कि हम स्पष्ट रूप से अपने खतरों को परिभाषित करने में कभी भी सक्षम नहीं रहे हैं। नेहरु के समय से यह एक सतत समस्या रही है लेकिन इस पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया, यहाँ तक कि जवाहर लाल नेहरु के सबसे प्रखर आलोचकों द्वारा भी नहीं। समस्या यह है कि लम्बे समय से हमारे दुश्मन स्पष्ट रहे हैं– चीन और पाकिस्तान । फिर भी, डर या मौन के कारण हम ऐसे विचारों को व्यक्त करने में असमर्थ हैं और परिणामी भ्रम को “सामरिक अस्पष्टता बताने” का प्रयास करते हैं।

इसी प्रकार, एक ऐसे देश के लिए जिसे इस्लामी चरमपंथ द्वारा अति क्षति पहुंचाई गयी है, भारत का इस्लाम की रूप-रेखा के बारे में ज्ञान अस्तित्वहीन है। अब तक, हमारे पास सूफीवाद के कारण भारतीय मुसलमानों के शांतिप्रिय होने के बारे में आश्चर्यजनक-अविश्वसनीय तर्क हैं जहाँ हम सूफीवाद की चरमपंथी प्रवृत्तियों और हिंसक इतिहास को नज़रअंदाज करते हैं। इस अफवाह को किसी और के द्वारा नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पिछले साल अप्रैल में फैलाया गया जब उन्होंने दावा किया कि सूफी सभ्यता के बिना “भारत अंधकार की ओर चला जायेगा”। सूफी सभ्यता इस्लाम के अन्य सम्प्रदायों जैसे शिया और खारजियों, जिन्होंने आधुनिक समय में हमें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है, के लिए यह एक अपमान है। दूसरी तरफ पाकिस्तान के लिए हमारा स्पर्श ज्ञान शानदार है लेकिन हमारे पास डेटा और प्राथमिक स्रोत शोध की कमी हमारी नासमझी को व्यक्त करती है। दरअसल, हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि पाकिस्तान को लेकर हमारे आकलन में अकादमिक यथार्थता जोड़ने के लिए  अनुभवजन्य डेटा और स्वतंत्र रूप से उपलब्ध उर्दू स्रोत सामग्री जोड़ने के लिए एक पश्चिमी शोधकर्ता क्रिस्टीन फेयर का सहारा क्यों लेना पड़ता है।

अंत में, हमें हमारे सैन्य नेतृत्व के साथ भी समस्या है। कई मौकों पर, जब पूछा गया है कि समस्या और खतरा क्या है, तो सशस्त्र बालों की विभिन्न शाखाओं के एक के बाद एक प्रमुखों ने “कुछ भी विशिष्ट नहीं” कहा है। इसी प्रकार जब हम दोस्तों की गिनती करते हैं, यहाँ तक निजी तौर पर भी, तो दशकों तक विश्वास निर्माण के बावजूद अमेरिका पर संदेह व्यापक हैI इससे हमारे दोस्तों के साथ संयुक्त रूप से संचालन करने और दुर्लभ संसाधनों की नकल से बचने की हमारी क्षमता कमजोर हो जाती है।

इसके बाद यह रक्षा सुधारों में पहली बाधा प्रस्तुत करता है – यदि हम राजनयिक रूप से या अकादमिक रूप से पहचान नहीं सकते हैं, भय की बात छोड़ दें तो हम कैसे युद्ध लड़ सकते हैं ? इस मुद्दे पर राजनीयिक अनिर्णय को नौकरशाही ने बढावा दिया जो आखिरकार सेना तक पहुंचाI संक्षेप में कहें तो जब सैन्य सुधारों की बात आती है तब हमें तीन स्तरों की समस्या का सामना करना पड़ता है – राजनीतिक, नौकरशाही और सैन्य।

खतरा

स्पष्ट रूप से तब, एक नए नज़रिए की जरूरत है, जो पिछले पागलपन की तरह दबाव में न हो जिसमें असलियत पर मुखौटा लगा दिया गया थाI

एक तरफ आपको चाइना और पाकिस्तान के साथ दो-मोर्चों की लड़ाई लड़ने की जरूरत है। दूसरी तरफ आपको पाकिस्तान के खिलाफ एक दंडात्मक प्रहार करने में सक्षम होना चाहिए और साथ ही ऐसे प्रहारों के जवाबी हमलों को रोकने के लिए पर्याप्त परंपरागत श्रेष्ठता होनी चाहिए, क्योंकि इससे हमलों में वृद्धि होगी। यहाँ “कुछ भी विशिष्ट नहीं” के लिए कोई जगह नहीं है। ये विशिष्ट समस्याएं हैं, जहाँ यदि आप चीन-पाकिस्तान के मोर्चे को हल कर लेते हैं तो अकेले पाकिस्तान से निपटना बहुत कठिन नहीं होगा।

यहाँ यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि ऐसे बल को आप उप-पारंपरिक युद्ध – आतंरिक सुरक्षा और विद्रोह के खिलाफ – प्रयोग नहीं कर सकते। आधुनिक युद्ध का मतलब है तेजी से आगे बढ़ना, हालाँकि आवर्ती राजनीतिक भ्रमों का मतलब है कि सेनाएं भीड़ नियंत्रण के काम में लग जाती हैं, जैसे – इराक, लीबिया, सीरिया या अफ़ग़ानिस्तान में। ये एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत आवश्यकताएं हैं। एक सैन्य अभियान में बेख़ौफ़ युवा सैनिकों की जरूरत होती है जो लक्ष्य पहचानें और हमला करें। विरोध और भीड़ नियंत्रण, जहाँ गोली चलाने से अच्छे परिणाम नहीं आते हैं, में अधिक परिपक्व और अनुभवी सैनिकों की आवश्यकता होती है। जब आप एक ही सैनिक से ये दोनों काम करवाते हैं आप उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते। उदाहरण के लिए, कश्मीर में सैनिकों की थकान अधिक है। संयम का प्रयोग कब करें और कब नहीं, इस पर भ्रमित संकेत, और बलि का बकरा बनाने के साथ-साथ कानूनी सुरक्षा की अनुपस्थिति का मतलब है प्रशिक्षण का निरंतर क्षरण और राज्य में विश्वास की कमी।

इन दोनों को अलग करना, सेना को केवल परंपरागत युद्ध जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए और अर्धसैनिक बलों को विशेष रूप से विरोध और भीड़ नियंत्रण के जैसे उप-परंपरागत खतरों से निपटने के लिए, कर्मिक, आर्थिक, रसद और रणनीतिक दृष्टिकोण से समझ में आता है। यहां एक और तथ्य भी शामिल है जो समझ से परे है। परंपरागत बलों को थकाना और दबाव डालना असाधारण रूप से खतरनाक हो सकता है, लंबे समय तक तैयार किए गए घरेलू अभियान की नीरसता में उनका कौशल नष्ट हो जाता हैI

तैयारी कल की- मानव पूँजी में निवेश क्यों है भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्णहालांकि, यहां आर्थिक पहलू समान रूप से दिलचस्प है। पारंपरिक सेना के सैनिकों से, “भूमि नियंत्रण” घटक (इसका मतलब है सौदा करना, शहरी ऑपरेशन, भीड़ नियंत्रण इत्यादि के रूप में शत्रु भूमि पर अपनी पकड़ बनाना) को अलग करने से प्रभावशाली परिणाम मिल सकते हैं। इसका मतलब है कि आप एक सेना को छोटा कर उसे दुर्बल स्थिति खड़ा कर, औसत लड़ाई की मशीन बनाकर निवेश संचालन पर बड़ा प्रभाव डालने और अधिक लाभ लेने के लिए अनुकूल बनाते हैं I इसका मतलब यह है कि राजनीतिक वर्ग एक विकल्प खो देता है: भूमि नियंत्रण, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि आप अंधों की तरह नाच करते हुए जाल में नहीं फंस सकते जैसे हम श्रीलंका में फसे थे, या जैसे अमेरीकी, इराक और अफगानिस्तान में फंसे थे। श्रम के इस तरह के एक नैदानिक विभाजन का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू, श्रम के सभी विभाजन की तरह, यह है कि इस तरह की विशेषज्ञता के साथ, आप वांछित प्रभावों के लिए अपने वित्तीय संसाधनों को लक्षित कर सकते हैं। मानसिक रूप से भी, इन भूमिकाओं को अलग करने से सेना को अपने उद्देश्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाया जा सकता है, जिससे राजकोषीय सावधानी और अधिक जवाबदेही हो जाती है।

फिर पारंपरिक पक्ष पर, हम किस खतरे का सामना कर रहे हैं? कुछ कारणों से, भारत और चीन का साथ-साथ आंकलन हमेशा से ही दोनों देशों की सैन्य शक्ति की समग्रता से किया जाता हैI वास्तव में, हालांकि, भारतीय सेना को एक साधारण वजह से चीन की पूर्ण शक्ति का कभी सामना नहीं करना पड़ेगा, और वह वजह यह है कि चीन के सीमावर्ती क्षेत्र, वहां तक संसाधनों को पहुँचाना ही उसकी समस्या है। चीन की सीमा पर कोई भी देश पूरे चीन की सैन्य शक्ति से लड़ने की योजना नहीं बना रहा है, लेकिन अधिकतम नुकसान पहुंचाने के लिए अधिकतम संभव स्थानीयकृत समस्याओं से लड़ सकता है।

इसके लिए यहां दो मॉडल हैं – विकसित देश रणनीति और विकासशील देश रणनीति। विकसित देशों ने एक थ्री फोल्ड सट्रेजी अपनाई है। पहला, या तो सभी (जापान, कोरिया) अमेरिका के साथ अपने सम्बन्ध खुलकर या छिपाकर बनाये हुए हैं (सिंगापुर, ताइवान), जो भले ही उनकी सहायता के लिए नहीं आता है लेकिन यह चीनी सेनाओं को हटाने के लिए पर्याप्त रूप से एक परिवर्तन  उत्पन्न करेगा (जैसे 1996 के ताइवान स्ट्रेट संकट के दौरान किया था)। दूसरा यह है कि वे सभी थल सेना पर कम निर्भरता बनाए रखते हैं, और अपनी नौसेना और वायु सेनाओं का उपयोग करना अधिक पसंद करते हैं (क्योंकि उन सभी को चीन से समुद्र ही अलग करता है, जिन्हें वे अपने प्राथमिक खतरे के रूप में देखते हैं)। तीसरा, वे हवा और समुद्री प्लेटफार्म मानकों के अनुसार सभी प्रकार के हथियारों के साथ केवल एक या दो प्रकार के बेड़े को सामने लेकर चलते हैं, सभी हथियार हवा और समुद्री प्लेटफॉर्म पर मानकीकृत होते हैं और खुले बाजार में

 

 

में तेजी से और सस्ते में अतिरिक्त पुर्जों की आपूर्ति करने की अनुमति देने के लिए अत्यधिक अनुकूलन से बचते हैंI विकासशील देश, उदाहरण के लिए वियतनाम, अत्यधिक विकसित कार्यबल और प्रौद्योगिकी की कमी के लिए, जनशक्ति पर भरोसा करते हैं, लेकिन वे भी तकनीकी रूप से और संख्यात्मक रूप से बेहतर चीनी बलों को विफल करने के लिए विषम जंगल युद्ध में बड़े विश्वास के साथ अपने सैन्य तंत्र को कम कर रहे हैं। हालांकि समानता, असमानता में ही है। तकनीकी रूप से विकसित देश तकनीकी रूप से असममित दृष्टिकोण का उपयोग कर रहे हैं, जबकि अविकसित देश रणनीतिक असममितता का उपयोग कर रहे हैं।

यह हमें भारत की याद दिलाता है। मित्र देशों के साथ भारत का द्वेष प्रसिद्ध है, इसलिए किसी दूसरे की ताकत का फायदा उठाने का सवाल खत्म हो जाता है। भौगोलिक दृष्टि से, हमारे पास हिमालय है, जो भारत-चीन सीमा पर अपनी सर्वोच्च ऊंचाई को प्राप्त करता है। भारत की तरफ, समुद्र स्तर का उतार काफी तेज है। चीन की तरफ, लगभग 2.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर का विशाल तिब्बत का पठार और 4,500 मीटर की औसत ऊंचाई सैन्य तंत्र के लिए जटिल बन जाती है। यदि कोई सैन्य दृष्टिकोण से विचार करता है, तो इसका लाभ चीन को मिलता है, जो ऊंचाइयों पर नियंत्रण रखता है और इसकी एक उत्कृष्ट रेल प्रणाली है जो इसके मुख्य सैन्य संसाधनों की आपूर्ति करती है, और साथ ही सीमा तक पहुंचने वाली उत्कृष्ट सड़कें भी हैं। वहीं, भारत की तरफ, अधिक ऊंचाई तक बाड़ों की कमी है जो बदहाल सीमावर्ती सड़कों से मिलती है।

भौगोलिक स्थिति भी जटिल है। तकनीकी रूप से यहाँ पर हिमालय की तीन समांतर श्रेणियाँ हैं, उच्च हिमाद्रि, मध्य हिमाचल तथा निचली शिवालिक लेकिन व्यवहारिक रूप से अक्साई चिन में इसका अर्थ शिवालिक से शुरू होने वाली सात अलग समांतर श्रेणियों तक हो सकता है जो धौलादार, पीर पंजल, हिमाद्रि, जंस्कार, लद्दाख और काराकोरम पर्वतमालाएं हैं। इसका मतलब यह है कि इसके बीच में आपको सात अलग-अलग पहाड़ियों और छह गहरी घाटियों का सामना करना पड़ता है। पूर्व में, जबकि तीन समानांतर सीमाएं हैं, आपके पास संकीर्ण सिलीगुड़ी गलियारा और अराकन रेंज के उत्तर-दक्षिण के छोरों के परस्पर छेदन की आड़ी-तिरछी क्रॉसिंग है जो उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दोनों आवागमनों को जटिल बनाती हैं। संक्षेप में कहा जाए तो, चूँकि दोनों देशों को इस सीमा पर भारी भौगोलिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, चीन ने इसपर काफी हद तक काबू पा लिया है, अधिकारिक संरचना के उपर ही नहीं, बल्कि तिब्बत में भी पर्याप्त आर्थिक क्षमता अधिकारिक संरचना को सिद्ध करती हैI दूसरी ओर भारत को इस तरह के बुनियादी ढांचे को व्यवहारिक बनाने के लिए केवल बड़ी समस्याओं का ही नहीं बल्कि आधारभूत संरचना और व्यावसायिक मामलों में कमी का भी सामना करना पड़ता है।

फिर भी, जब हम वायु सेना को ऐसी ही स्थिति में देखते हैं तो यहाँ पर मामला पूरी तरह से बदल जाता है। मैदान में यह सात समानांतर पर्वत श्रेणियाँ भारत में समुद्र तल से लेकर 200 किलोमीटर की ऊंचाई बनाती हैं जहां तक सुपरसोनिक फाइटर को पहुंचने में कुछ मिनट का समय लग जाता है। इसके अलावा, चीन के लिए तिब्बत पठार की तरफ विशाल गहराई का मतलब है कि इसकी तरफ वायु शक्ति के लिए उच्च ऊंचाई बाधा है। एक उदाहरण दिया जाए तो 2017 में जब मैंने तिब्बत की यात्रा की तो देखा कि एयरबस ए330 में पीछे की करीब एक चौथाई जगह छोड़ दी जाती है जबकि इसके अंदर काफी सारी जगह होती है और यह विमान भी काफी असाधारण क्षमता वाला होता है। ऐसा सवारियों की कमी के कारण नहीं किया जाता बल्कि ऊंचाई से लैंडिंग में होने वाली परेशानी के कारण किया जाता है। उच्च प्रदर्शन वाले विमानों जैसे कि फाइटर, पर वजन के प्रतिबंध बहुत ज्यादा हो जाते हैं जिससे उनकी रेंज और पेलोड दोनों को काफी हद तक सीमित करना पड़ता है। अहम बात तो यह है कि भारत साल भर किसी भी समय वायु शक्ति का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकता है, जबकि चीन केवल गर्मियों में ही प्रभावी रूप से ऐसा कर सकता है।

कोई भी सामान्य देश इस मामले में जमीनी प्रतिक्रिया के लिए हवाई प्रतिक्रिया को प्राथमिकता देगा। हैरानी की बात तो यह है कि थल सेना में जो निरंतर वृद्धि हो रही है और यह रोज नए कीर्तिमान रच रही है इसका मतलब केवल यह नहीं है कि हम जमीनी स्तर पर दोगुने हो रहे हैं बल्कि इसका अर्थ यह भी है कि भारतीय वायुसेना में जो कमी है उसकी जल्द भरपाई नहीं की जा रही है। अगर वायु सेना को विभिन्न प्रकार के विमान रखने के लिए मजबूर किया जाता रहा तो इसका नतीजा यही होगा कि हमारे पास गंभीर तार्किक जटिलताओं के साथ एक टूटी-फूटी और बेतुकी वायु सेना होगी। भारतीय वायु सेना में 2030 या उसके बाद पाँच से सात के बीच विभिन्न प्रकार के विमानों को शामिल करने की योजना बनाई गई है जबकि सबसे अमीर देश भी दो से अधिक प्रकार के विमानों खर्च वहन नहीं कर सकते हैं।

नौसेना के मामले में भी यह तस्वीर बेहतर नहीं है। शायद, चीनी प्रकार के 055 डिस्ट्रॉयर को लॉन्च करना इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। संपूर्ण भारतीय पूर्वी बेड़े की तुलना में इसके हर जहाज में अधिक लंबवत लॉन्च ट्यूब (मिसाइल) हैं। इसके अलावा, इनमें से हर नाव में पर्याप्त मिसाइलें हैं जिनको एंटी-एयरक्रॉफ्ट मिसाइलों के सामान्य पूरक के साथ फिट किया गया है, जिनमें से कुछ पूरी जल यात्रा के दौरान हवाई हमलों से निपटने के लिए तैनात रहती हैं जिनको मौका पड़ने पर चलाया जा सकता है। अब तक नौसेना के अधिकांश बजट को वायुयान ले जाने वाले तीन प्रकार के जलपोत खरीदने में व्यय किया जा चुका है, इन तीनों जलपोतों पर ले जाए जाने वाले वायुयान भी अलग-अलग प्रकार के हैं, ये तीनों अपने चीनी समकक्षों की तुलना में काफी छोटे हैं।

हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियों को देखने के हो-हल्ले के बावजूद, जहाज आधारित, पनडुब्बी विरोधी हेलीकॉप्टर विंग को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया, भारतीय विशष्ट संशोधन की ज़रूरतों को देखते हुए, जिसमें बड़े पैमाने पर नवीनीकरण और कई गुना लागत है, नयी पनडुब्बियों के आर्डर में देरी की जा रही हैI संक्षेप में कहा जाए तो चीनी नौसेना के प्रति हमारी प्रतिक्रिया अससिमित है I यह एक तरह से प्रतिष्ठा की दौड़ है, न कि स्पष्ट रूप से काम में अससिमित सोच, यह तो तब है जब चीनी हम से आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम हैI

चीन के साथ हालात ऐसे हैं कि भूमि को देखते हुए हम बहुत नुक्सान में हैं, एक वायु लाभ है और मात्रात्मक रूप से बेहतर चीनी नौसेना है। यह भारत और चीन के बीच बड़े पैमाने पर आधारभूत और आर्थिक असंतुलन से जुड़ा हुआ है (जिसकी अर्थव्यवस्था संपूर्ण भारतीय अर्थव्यवस्था की पाँच गुनी है और नकदी भंडारण भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना में 1.5 गुना है)। फिर भी, एक भी मामले में इनसे समझौता या गठबंधन न करने के बावजूद, हम अत्यधिक बुरे संभावित विकल्पों का चयन कर रहे हैं –  वायु सेना की खराब स्थिति पर एक समझौते वाली जमीनी स्थिति को प्राथमिकता देना, उस पर, हथियारों की कमी से जूझते सैनिक और कमजोर आपूर्ति के साथ जमीनी लड़ाई, एक बुरी तरह से विखंडित और एक बेतुकी वायु प्रतिक्रिया और सममित नौसेना प्रतिक्रिया का चयन, जिसमें पृथ्वी पर प्रमुख औद्योगीकरण के कोई संकेत दिखाई नहीं देते।

पाकिस्तान के मामले में यह स्थिति कुछ अलग है। एक शांतिपूर्ण चीनी सीमा के विपरीत पाकिस्तानी सीमा से अक्सर घुसपैठ और परिणामी हमले होते रहे हैं, विशेष रूप से कश्मीर से सटी सीमा में। अक्सर, 2001 के दौरान, इस तरह के हमले युद्ध की संभावनाओं को बढ़ा सकते हैं। यहाँ पर यह समस्या तीन गुनी है। सबसे पहले तो यह कि घुसपैठ को कैसे रोका जाए (अर्धसैनिक बल घुसपैठियों से तो निपट सकते हैं लेकिन वे घुसपैठ को दूर नहीं कर सकते क्योंकि इसमें सीमा पार की गतिविधियाँ शामिल होती है), दूसरा, घुसपैठ का सामना करने की नाकामी के जवाब में सार्थक दंडकारी कार्यावाई कैसे करें और तीसरी समस्या, पूर्ण रूप से यहाँ तक कि सीमित युद्ध की संभावना।

हवा और समुद्र में, जो चीज चीन के लिए फायदेमंद है वह पाकिस्तान के लिए जरूरत से भी ज्यादा फायदेमंद है। हालांकि, जमीनी प्रतिक्रिया के मामले में यह समस्या एक अलग रंग ले लेती है। 1980 से भारत की प्रतिक्रिया, बड़े पैमाने पर बख्तरबंद हमलों के साथ पाकिस्तान को धमकी भरी रही, और सुंदरजी सिद्धान्त के बदलाव की तरह, बार बार खुलने और बंद होने के “ठंडी शुरुआत” की तरह रही है I इसने 1980 और संभवता 1990 में एक उल्लेखनीय अर्थ बना दिया है। हालांकि, 1994 और 1996 में ग्रोज़नी की लड़ाई (जिसमें चेचन जीता था) और 1999 की लड़ाई (जिसमें रूस जीता था ), पश्चिमी देशों ईराक और अफगानिस्तान और साथ ही साथ सीरिया तथा यमन के साफ तौर पर जाहिर होता है कि आज कल हथियारों से लैस गाड़ियों आदि को पैदल सैनिकों द्वारा मात दी जा सकती है। बख्तरबंद सेना और पैदल सेना के बीच ऐसा बहुत ही पहले से होता चला आ रहा है – पेंडुलम की तरह, करीब 3300 सालों से, जो 1274 ईसा पूर्व कादेश की लड़ाई से शुरू होता है – दशकों के बाद अब यह प्रवृत्तियाँ वापस आ रही है।

चूँकि पाकिस्तान के सामरिक परमाणु हथियारों को देखकर ही भारत प्रेरित हुआ है, जो स्पष्ट रूप से भारतीय सेना को कुचलने का इरादा रखता है, ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने हर स्तर पर लाखों एंटी-टैंक मिसाइलों का निर्माण कर रखा है। युद्ध के यह असममित उपकरण, परमाणु हथियार से अधिक सही रणनीति के साथ मिलकर, भारतीय सैन्य योजनाओं के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं।

फिर भी चीन के विपरीत, जहाँ लगभग जमीन आधारित विकल्प व्यर्थ लगते हैं, वहीं पाकिस्तानी सीमा पर, कुछ हद तक बड़े पैमाने पर कवच को हटाया जाना बेकार हैI सहारा में फ्रांस से सबक लेते हुए, हल्के और तेजी से चलने वाले वाहनों और एक निराशाजनक पैदल सेना के दृष्टिकोण के साथ इसमें नेटवर्क केन्द्रित युद्ध का पूरा उपयोग शामिल है। इसको 1994-96 और 1999 में ग्रोजनी के युद्ध से महसूस कर लिया गया था। चेचन विद्रोहियों ने 1994-96 में रूसी टैंकों को तबाह कर दिया था, जबकि 1999 में, रूसियों ने पैदल सेना पर केन्द्रित दृष्टिकोण का चयन करके ज्वार को मोड़ दिया था और अपने ही लोगों को हताहत होने से बचा लिया था।

अगर ग्रोजनी ने शहरी सिनेमाघरों में इस तरह के दृष्टिकोण की उपयोगिता को दिखाया तो माली, सीरिया और यमन निर्जन क्षेत्रों में इस मॉडल की प्रासंगिकता दिखाते हैं। इस दृष्टिकोण में से अधिकांश प्राचीन सेनाओं द्वारा पसंदीदा अप्रचलित “कवर आग” की बजाय अग्निशक्ति पर निर्भर करता है। प्राचीन समय में ऐसा कहने के लिए तोपखाने के गोले में विपक्षी बल का अधिकतर हिस्सा कमजोर हो जाएगा जबकि कवच या पैदल सेना धीरे-धीरे एक-एक करके लक्ष्य को समाप्त कर देगी I

अब यह मामला ही नहीं है। आज, सटीक युद्धों का अर्थ है कि आयुध निर्माण कारखाने भरोसेमंद मार और उच्च सटीकता के साथ अपने लक्ष्यों को भली तरह से भेदने में सक्षम हों। अगर यह सब कुछ होता है तब पैदल सेना अवशिष्ट प्रतिरोध से निपटती है।

एक महत्वपूर्ण और सार्थक आक्रमणकारी हेलीकॉप्टर बल द्वारा सहायता प्राप्त इस तरह की भू-युद्ध प्रणाली में बदलाव का मतलब है कि सामना करने की घुसपैठ की भूमिका में अपेक्षित और स्पष्ट तोपखाना भी प्रभावी होगा। इस तरह के तोपखाने पाकिस्तान द्वारा की जाने वाली गोलाबारी का विरोध करेंगे, और वर्तमान में होने वाली अर्थहीन और बेमतलब गोलाबारी के बजाय इसमें विरोधी तोपखानों को नष्ट करना भी शामिल होगा। इसके बाद सवाल उठता है कि कोई सार्थक दंडनीय प्रतिशोध- लंबी दूरी की मिसाइलों और विमानों के  सबसे अच्छे कार्य के प्रभाव को बढ़ाकर खतरे को कम करता है-को कैसे अंजाम देता है।

सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण

इससे पहले इस लेख में यह बताया जा चुका है कि एक व्यापक और समृद्ध, उन्नत तकनीक वाले या मानव गहन विषमता वाले पड़ोसी देश के खिलाफ रक्षा के दो मॉडल (तरीके) हैं। भारत ने अपने सुरक्षा बोझ को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर और महंगी तकनीकों को अपनाते हुए न तो संधि स्वीकार की और न ही असमानता/विरोध स्वीकार किया। वास्तव में, इस सब से साफ होता है कि भारत जैसा दावा करता है, वह मानवीय रूप से अत्यंत उन्नत और आर्थिक साधनों के साथ एक समृद्ध देश है। अफसोस की बात है, यह मामला ही नहीं है। अध्ययन पर हुए एक शोध के अनुसार, भारत की शिक्षा प्रणाली की हालत खस्ता है, 1991 के आर्थिक सुधारों के चलते बड़े पैमाने पर गांवों से शहरों में प्रवासन के कारण भारत के शहरों में उपलब्ध शिक्षा की गुणवत्ता में तेजी से कमी आई और भारत के 95 प्रतिशत इंजीनियर इस संज्ञानात्मक मुद्दे में उलझे हुए हैं और समस्या हल करने में असमर्थ हैं।

यह एक गंभीर मुद्दा है, न सिर्फ इस तथ्य के कारण कि स्वदेशी अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) प्रणाली एक अन्य प्रणाली के उत्पादों के साथ संतृप्त हो जाती है जो निस्संदेह समस्या निवारण पर जोर देती है, बल्कि इस तथ्य के कारण भी कि भारतीय श्रम कानून और सक्रिय “नकेल” की कमी का मतलब है गुणवत्ता नियंत्रण जिसका साधारण तौर पर उपयोग नहीं किया जा सकता है। शिक्षा समस्या सशस्त्र बलों द्वारा प्रौद्योगिकी के समावेश को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है। उन्नत देश इसमें कमी कर सकते हैं लेकिन यह बढ़ता जाता है, इसके कारणों में से एक यह है कि, ऐसा इसलिए है क्योंकि तकनीक को एक सहायक के रूप में देखा जाता है जो हर सैनिक को समस्या हल करने की शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। इसके अलावा, ये सैनिक प्रौद्योगिकी के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं। एक विकसित देश के रूप में बदलते हुए, औसतन नीली वर्दी वाले कार्यबलों, जिनसे युद्ध बल के बड़े हिस्से का निर्माण होता है, को प्लेस्टेशन या एक्सबॉक्स जैसे गेम की अनुमति होगी जिसमें उन्हें बड़ी मात्रा में प्रारंभिक स्थिति में ही सूचनाओं को संसाधित करने, और स्वतंत्र सामरिक निर्णय कैसे लिया जाता है इसे सीखने की अनुमति दी जाती है, जो एक शिक्षा प्रणाली के साथ मिलती है जो समस्या निवारण और आत्मबल को महत्व देता है।

ऐसे में कुछ लोगों का अनुमान है कि प्रशिक्षण और ट्रैनिंग के 80 प्रतिशत भाग को राज्य शिक्षा प्रणाली और समाज द्वारा हजम कर लिया जाता है। भारत में, केवल वे ही परिवार जो काफी समृद्ध हैं और जो अधिकारी-वर्ग में सबसे अधिक योगदान करते हैं, वे इस तरह की विलासितापूर्ण चीजों को खरीदने में सक्षम हो सकते हैं। इसका मतलब एक सामान्य सैनिक के लिए प्रौद्योगिकी का देर से जीवन में अवशोषण है जो एक दर्दनाक और बोझिल प्रक्रिया है जो उसकी प्रकृति के प्रतिकूल है क्योंकि उसे स्वयं को काफी प्रयत्नपूर्वक नवीनीकृत, सामरिक और परिस्थिति के अनुकूल स्थितियों में बदलना होता है और फिर उसे राज्य द्वारा कार्य की स्वतंत्रता का अनुमोदन प्राप्त होता है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि भारत में नियंत्रण मजबूत है, प्रौद्योगिकी को एक सहायक के रूप में नहीं बल्कि नियंत्रक तंत्र के रूप में देखा जाता है, गुणवत्ता प्रशिक्षण वास्तव में अस्तित्वहीन है, मानक और कार्यप्रणाली और सैनिकों के लिए कानूनी सुरक्षा शिथिल है और मानव संसाधनों की स्थिति खराब है।

निष्कर्ष

भारत के रक्षा संकट का स्रोत, कमजोर मानव पूंजी और प्रौद्योगिकी से कमजोर संबंधों के कारण है। एक अपंग शिक्षा प्रणाली और मनुष्यों में प्राथमिकता की कमी ने ऐसी प्रणाली तैयार की है जहाँ महत्वपूर्ण छात्रवृत्ति, या वास्तव में जीवन में प्रशिक्षण की कमी है। नौकरशाही और राजनीतिक वर्ग, जिसमें रद्दी व्यवहारिक ज्ञान तथा अपर्याप्त सैन्य नेतृत्व मिश्रित हो चुके हैं, के मामले में हमारे पास सैन्य ज्ञान की कमी है। यह सब कुछ भारत के स्थिर विचारों की उपज है जिसमें मानव पर निवेश करने के बजाय तकनीक पर निवेश किया जाता है। प्रत्येक परिस्थिति में हमने इस निबंध में अब तक स्पष्ट किया है कि विदेश नीति (नौकरशाही), रक्षा आर्थिक व्यवस्था (राजनीतिक और नौकरशाही) और सैन्य प्रतिक्रियाएं (सैन्य नेतृत्व) के सुरक्षा तत्वों में स्पष्टता या सुसंगतता की कमी है। इस तथ्य से अधिक खतरनाक कुछ भी नहीं है कि स्वदेशीकरण योजना भारत के उचित लेखा परीक्षा औद्योगिक और भारतीय मानव संसाधन सर्वेक्षण के बिना बन जाती है (जो आज तक बनी नहीं है और दिखावे भरी लेखांकन अभ्यास के तौर पर सुरक्षित की जाती है)

शुक्र है, इन समस्याओं के समाधान में न तो विशाल विघटन और न ही प्रमुख लागत शामिल है। इसमें जो शामिल है वह है बजट के केंद्रबिंदु को प्रौद्योगिकी और उद्योग से हटाकर मानव जाति पर स्थानांतरित करना। सैकड़ों इंजीनियरों, अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों को गुप्त रूप से काम करने और नियमित रूप से और ईमानदारी से अभ्यास करने के लिए (मंच पर नाटकीय घटनाओं के बजाय मालाबार युद्ध अभ्यास) मित्रवत रूप से सेनाबलों के साथ भेजना और “प्रशिक्षण कार्यक्रमों को प्रशिक्षित करने” की लागत के लिए वापस बुलाने की अपेक्षा सफेद हाथी की खरीद, पुनर्गठित सिफारिशों के साथ अंतःक्रियात्मक समितियां, एक ही रूढ़िवादी व्यक्ति द्वारा कार्यरत नए रक्षा विश्वविद्यालयों और एक ही एजेंडा और व्याख्यान, और अकादमिक कठोरता की अनुचित नीति, औद्योगिक पारिस्थितिक तंत्र और आपूर्ति श्रृंखलाओं और विदेशों में प्रासंगिक सर्वोत्तम साधनों का परिचय सस्ता है। आज भारत में प्रति व्यक्ति आय उतनी है जितनी कि 1960 के दशक में इजराइल की थी।

फिर भी, इजरायल का ध्यान पूरी तरह से मनुष्यों पर था और जिसने एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जिसने वहाँ तकनीकी क्रांति पैदा की। आखिरकार, भारत के नेतृत्व को समझने की जरूरत है कि बोर्ड विफलता का मतलब है मानव विफलता,  और कोई भी रक्षा खरीद प्रक्रिया, औद्योगिक विस्तार योजना, स्वदेशीकरण नारा, या भ्रष्टाचार विरोधी अभियान इसे सुलझा नहीं सकता। मानव शिक्षा पर किया गया निवेश ही ऐसा कर सकता है।