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बांग्लादेश और इसके सीमावर्ती भारतीय क्षेत्र में मुस्लिम जनसांख्यिकी

प्रसंग
  • पूर्वी भारत और बांग्लादेश में, सीमाओं के दोनों तरफ हिंदू आबादी कम होने के क्या कारण हैं?

यह ज्ञात है कि सन् 1951 से 2011 के बीच बांग्लादेश में हिंदुओ का अनुपात 22 प्रतिशत से घटकर 11 प्रतिशत रह गया है। शायद ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि इस अवधि में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी हिंदू भारत में आकर बस गए हैं। इससे बांग्लादेश की सीमा से सटे भारतीय राज्यों में हिंदुओं के अनुपात में वृद्धि होनी चाहिए थी। लेकिन इसके विपरीत, हम भारत के तरफ भी हिंदुओं के अनुपात में गिरावट पाते हैं।

तो फिर हो क्या रहा है?

बांग्लादेश और भारत के बीच जनसांख्यिकीय मेल मिलाप हिंदुओं के वहाँ से यहाँ प्रवासन की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल है। हिंदुओं के अलावा, बांग्लादेश के मुस्लिम भी बड़ी संख्या में भारत में प्रवेश करते हैं और मुस्लिम प्रवासियों की संख्या हिंदू प्रवासियों की तुलना में बहुत अधिक है। यह भारत की मुस्लिमों के बढ़ते अनुपात और इसी तरह हिंदुओं के अनुपात में गिरावट की आंशिक रूप से जानकारी देता है।

जनसांख्यिकीय वृद्धि (या गिरावट) न केवल प्रवास (और धर्मान्तरण) बल्कि प्रजनन दर और मृत्यु दर में अंतर की वजह से भी होती है। भारत और बांग्लादेश दोनों में ही मुस्लिमों की तुलना में हिंदुओं में प्रजनन दर कम और मृत्यु दर उच्च है। भारत और बांग्लादेश दोनों में ही हिंदुओं के अनुपात में गिरावट का एक बड़ा हिस्सा उनकी अपेक्षाकृत कम प्रजनन दर से संबंधित मालूम होता है।

इस घटना को समझने के लिए, आइए हम मुस्लिमों की तुलना में हिंदुओं की प्रजनन दर में गिरावट, मृत्यु दर तथा प्रवासन आँकड़ों पर नज़र डालते हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं की जनसंख्या में गिरावट

सन् 1901 में, मौजूदा बांग्लादेश में हिंदुओं की एक-तिहाई आबादी थी। विभाजन से पहले सन् 1941 में उनकी जनसंख्या 28 प्रतिशत रह गई। विभाजन के बाद भी सन् 1951 में बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में हिंदुओं की जनसंख्या 22 प्रतिशत थी। यह पश्चिमी पाकिस्तान के विपरीत था, जहाँ से विभाजन के समय लगभग सभी हिंदुओं और सिखों को मारकर, धर्मान्तरण करके या निष्कासित करके निकाल दिया गया था। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में अलग-अलग प्रतिक्रिया आंशिक रूप से पूर्वी क्षेत्र में महात्मा गाँधी की उपस्थिति और प्रयासों की वजह से थी।

हालाँकि गाँधी विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं के पूर्ण निर्वासन को टालने में सक्षम थे, लेकिन उनके प्रयासों ने उस घटना को सिर्फ लम्बा खींचा। बांग्लादेश से हिंदुओं का निष्कासन (हत्याओं और धर्मान्तरणों के अलावा) विभाजन के बाद दशकों तक जारी रहा। दशक-दर-दशक हिंदुओं की आबादी कम होती रही। सन् 1974 में बांग्लादेश में होने वाली जनगणना में गिरावट बहुत तेज थी। ऐसा लगता है कि विभाजन द्वारा शुरू की गई प्रक्रियाएं तीन दशकों तक लगातार जारी रहीं। तब से चार दशकों में इस गिरावट में कमी देखी गई है, फिर भी, सन् 1974 में हिंदुओं की आबादी 13.5 प्रतिशत थी जो 2011 में घटकर 8.5 प्रतिशत रह गई थी।

सीमावर्ती भारतीय राज्यों पर असर

बांग्लादेश की सीमा से सटे असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा राज्यों में मुस्लिमों तथा हिंदुओं (सिखों, बौद्धों, जैनों और दूसरे धर्मों तथा दूसरे मतों को मानने वाले लोगों सहित) की बदलती आबादी को इस लेख में प्रस्तुत किया गया है। इन तीनों राज्यों में बदलाव एक दूसरे से अलग हैं लेकिन इनमें से किसी में भी बांग्लादेश में लगातार गिरावट के हिसाब से हिंदुओं की आबादी में लगातार बढ़ोतरी नहीं देखी गई है।

ये तीनों राज्य, साथ ही मेघालय और मिजोरम भी, बांग्लादेश के साथ लंबी सीमाएं साझा करते हैं, (मानचित्र 1 देखें), लेकिन मेघालय और मिजोरम से जुड़े मुद्दे कुछ अलग हैं। इसलिए, फिलहाल आइए तीनों राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में मुस्लिमों और हिंदुओं की बदलती आबादी पर विस्तार से बात करते हैं।

मानचित्र 1

असम

असम में मुस्लिमों और हिंदुओं की बदलती जनसँख्या पर बांग्लादेश के विभाजन और परिणामस्वरूप हिंदुओं के निष्कासन का लगभग कोई प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता है। राज्य में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है और तदनुसार सन् 1901 से हिंदुओं की आबादी में लगातार गिरावट आई है। विभाजन का एकमात्र प्रभाव, जिसे असम में मुसलमानों की जनसँख्या में वृद्धि और हिन्दुओं में गिरावट के इस धर्मनिरपेक्ष रुझान में देखा जा सकता है, 1941 और 1971 के बीच 25 प्रतिशत मुस्लिम आबादी की स्थिरता में है, हालाँकि हिन्दुओं की जनसँख्या में इस अवधि में भी 74.3 प्रतिशत से 72.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। सन् 1971 के बाद से यहाँ पर मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है। सन् 1971 में यह 24.6 प्रतिशत थी जो सन् 2011 में बढ़कर 34.2 प्रतिशत दर्ज की गई।

यह बात सभी लोग जानते और मानते हैं कि असम में मुस्लिमों की बढ़ती आबादी मुख्य रूप से बांग्लादेश से होने वाले प्रवासन का ही परिणाम है। यह प्रक्रिया बीसवीं सदी के अंत में शुरू हुई थी जब मौजूदा बांग्लादेश भारत का ही एक हिस्सा था। फिर यह असम और बांग्लादेश के बीच एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा की स्थापना के बाद भी जारी रही। जनसांख्यिकीय डेटा से ऐसा प्रतीत होता है कि देश कभी विभाजित हुआ ही नहीं था। जैसा कि हम नीचे देखते हैं कि असम में मुस्लिम प्रजनन दर हिंदुओं से काफी ज्यादा है।

पश्चिम बंगाल  

पश्चिम बंगाल में, स्वतंत्रता से पहले की पूरी अवधि यानी सन् 1901 से 1940 तक मुस्लिमों की आबादी करीब 30 प्रतिशत पर स्थिर रही। विभाजन के समय बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से हिंदुओं के प्रवासन और पश्चिम बंगाल से कुछ मुस्लिमों के बांग्लादेश चले जाने की वजह से यहाँ पर मुस्लिमों की आबादी में करीब 10 प्रतिशत की गिरावट आई थी। लेकिन सन् 1951 के बाद मुस्लिमों की आबादी बढ़नी शुरू हो गई। सन् 1971 के बाद यह वृद्धि तेज हो गई। इस प्रक्रिया में, राज्य की मुस्लिम आबादी पर विभाजन का असर काफी हद तक बेअसर हो गया और विभाजन के समय मुस्लिमों की आबादी में होने वाली 10 प्रतिशत कमी का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा पुनः प्राप्त कर लिया गया।

विभाजन के बाद के दशकों में बांग्लादेश छोड़ने वाले कुछ हिंदू पश्चिम बंगाल आए होंगे लेकिन ऐसा लगता है कि बांग्लादेश के साथ लंबी सीमा साझा करने वाले जिलों में मुस्लिम भी आए होंगे। जैसा कि हम बाद में देखेंगे, उच्च प्रजनन के कारण राज्य में मुस्लिम आबादी भी बढ़ती रही है।

त्रिपुरा

बांग्लादेश से सटे इन तीनों राज्यों में से केवल त्रिपुरा में ही हम हिंदू प्रवासन का प्रत्यक्ष प्रभाव देख सकते हैं। 1961-71 के दौरान सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ, जब हिंदू जनसँख्या 79 प्रतिशत से बढ़कर 92 प्रतिशत हो गई और मुसलमानों की संख्या 20.1 प्रतिशत से घटकर 6.7 प्रतिशत रह गई। यह स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के चटगांव क्षेत्र से हिंदुओं (और बौद्धों) के बड़े प्रवासन का प्रभाव था।

आबादी बहुत कम होने के कारण त्रिपुरा में पश्चिम बंगाल और असम के मुकाबले हिंदुओं के अनुपात का प्रभाव व्यापक है। 1961 और 1971 के बीच त्रिपुरा में हिंदुओं (और बौद्धों, आदि) की संख्या में केवल 5.3 लाख की बढ़ोत्तरी हुई। इसमें दशक के दौरान प्राकृतिक वृद्धि और प्रवासन दोनों शामिल हैं। इस संख्या से राज्य में हिंदुओं के अनुपात में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

1961-1971 के दौरान तेज गिरावट के बाद से, त्रिपुरा में और साथ ही साथ पड़ोसी राज्यों में मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है।

यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश से हिंदुओं के निर्वासन से, एक विशेष दशक में त्रिपुरा में देखी गई एक प्रासंगिक वृद्धि के अतिरिक्त, भारत में उनकी आबादी में कोई वृद्धि नहीं हुई है।

इससे हम मूल प्रश्न पर वापस आ जाते हैं। क्यों? हिंदुओं के साथ क्या हो रहा है?

बांग्लादेश में हिंदू आबादी में गिरावट के कारक

जैसा कि हमने शुरुआत में उल्लेख किया है कि कम से कम ऐसे तीन कारक हैं जिनका जनसंख्या में एक समुदाय की आबादी पर प्रभाव पड़ता है। ये हैं – प्रजनन दर, मृत्यु दर और प्रवासन। बांग्लादेश ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मुसलमानों की तुलना में हिंदुओं की प्रजनन दर काफी कम और मृत्यु दर उच्च है। 2015 के आंकड़े उपरोक्त ग्राफ में प्रदर्शित किये गए हैं। इसके अनुसार, बांग्लादेश में हिंदुओं की अपेक्षा मुसलमानों की जन्म दर 3 व्यक्ति / हजार अधिक है जबकि मृत्यु दर 0.9 व्यक्ति / हजार कम है।

हिंदुओं की निम्न प्रजनन दर की व्याख्या प्रायः उनके बीच संतति-नियमन उपायों की उच्च स्वीकृति और अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के आधार पर की जाती है। हिंदुओं की उच्च मृत्यु दर शायद उनकी गरीबी और उपेक्षित स्थिति से संबंधित है।

ऐसा कोई डेटा उपलब्ध नहीं है जिससे देश के बाहर समुदाय-आधारित प्रवासन की जानकारी मिल सके। लेकिन विभिन्न अध्ययनों से संकेत मिलता है कि बांग्लादेश से भारत (और कुछ हद तक अन्य देशों) में हिंदुओं और मुसलमानों के प्रवासन की तुलना की जा सकती है और यह औसत रूप से प्रति हजार जनसँख्या पर पाँच व्यक्ति है। कुछ अध्ययनों का दावा है कि हिंदू बहिर्प्रवासन लगभग एक व्यक्ति प्रति हजार की दर से ज्यादा है और कुछ अध्ययनों का मानना है कि मुस्लिम बहिर्प्रवासन भी इतना ही है। हिंदुओं और मुस्लिम दोनों के समान स्तर पर चल रहे प्रवासन के अलावा, दंगों, अकाल आदि से संबंधित विशेष हिंदू बहिर्प्रवासन भी हैं।

ऐसा माना जाता है कि बांग्लादेश में हिंदुओं की न्यूनतम वृद्धि और उनकी आबादी में परिणामी गिरावट उनकी प्रजनन दर और उच्च मृत्यु दर में बड़े अंतर के कारण है। प्रवासन अपेक्षाकृत छोटी भूमिका निभाता है, क्योंकि यह कारण बांग्लादेश के हिंदुओं और मुस्लिम दोनों को लगभग समान रूप से प्रभावित करता है।

शायद यही कारण है कि बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी में गिरावट भारत में हिंदुओं की बढ़ती आबादी के रूप में परिलक्षित नहीं होती।

भारत की तरफ प्रजनन दर के विभेदक

ऊपर दिया गया ग्राफ असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा राज्यों में 2011 की जनगणना के आंकड़ों से प्राप्त हिंदुओं और मुस्लिमों के कई प्रजनन सूचकांक प्रदर्शित करता है। इन सभी मानकों के आधार पर प्रदर्शित होता है कि हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों की प्रजनन दर स्पष्ट रूप से अधिक है। हमने ऊपर देखा कि बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी में तेजी से गिरावट का जिम्मेदार दोनों समुदायों की प्रजनन दर में अंतर को ठहराया जा सकता है। क्या सीमावर्ती भारतीय राज्यों में मौजूद प्रजनन अंतर यहाँ मुसलमानों की आबादी में तेज वृद्धि का कारण है?

हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि विभाजन के बाद से बांग्लादेश की जनसंख्या में हिंदुओं की संख्या में तेजी से कमी आती रही है। आमतौर पर यह माना जाता है कि यह कमी हिंदुओं के कारण आ रही है जो भारत जाने के लिए बाध्य किए जाते हैं। हालाँकि भारत की तरफ और बांग्लादेश से सटे भारतीय राज्यों में हिंदुओं की संख्या में वृद्धि नहीं हुई है। आंकड़ों के अनुसार बांग्लादेश से हिंदुओं का प्रवासन मुसलमानों के प्रवासन से मिलता जुलता है; प्रति हजार हिंदुओं में से बांग्लादेश से बाहर जाने वाले हिंदुओं की संख्या और प्रति हजार मुसलमानों में से बांग्लादेश से बाहर जाने वाले मुसलमानों की संख्या लगभग बराबर है। इसका मतलब यह है कि बंग्लादेश से प्रवासन करने वाले मुसलमानों की वास्तविक संख्या हिंदुओं की तुलना में काफी अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश से प्रवासन के बावजूद भारत में हिंदुओं की आबादी क्यों नहीं बढ़ी है।

चूंकि बांग्लादेश से प्रवासन करने वाले हिंदुओं और मुसलमानों का अनुपात काफी हद तक समान है, इसलिए हिंदुओं की संख्या में गिरावट पर अन्य कारकों के माध्यम से व्याख्या की गई है, वे कारक हैं – मुसलमानों की तुलना में कम प्रजनन दर और उच्च मृत्यु दर। भारत की तरफ भी हिंदू-मुस्लिम प्रजनन दर में अंतर मौजूद है। इससे एक और अधिक दिलचस्प संभावना बढ़ जाती है। अगर हिंदू-मुस्लिम प्रजनन दर और मृत्यु दर में अंतर से बांग्लादेश की हिंदू आबादी में इतनी तेजी से गिरावट आई है, तो क्या इसी अंतर के चलते भारत की तरफ भी हिंदुओं की संख्या में कमी आएगी?