पत्रिका
आइये 100 नए मंदिरों को दें वजूद

प्रसंग
  • भारत की सांस्कृतिक कायाकल्प परियोजना में मंदिरों को न केवल आध्यात्मिक केन्द्रों के रूप में बल्कि धन निर्माण के साधनों के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

5.4 लाख वर्ग फुट क्षेत्र में 700 फुट ऊंचाई वाले और 70 मंज़िला दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक भवन वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर के निर्माण के एक प्रस्ताव ने राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल का हमेशा की तरह मजा किरकिरा कर देने वाला ध्यान अपनी ओर खींचा है। ट्रिब्यूनल ने इस्कॉन, द इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस, जिसने मंदिर परिसर का प्रस्ताव दिया है तथा केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से एक ग्रीन ऐक्टिविस्ट द्वारा दायर याचिका का जवाब देने की मांग की है। कार्यकर्ता का दावा है कि विशाल मंदिर यमुना का पानी खत्म कर देगा क्योंकि माना जा रहा है कि मंदिर के आस-पास 28 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में 12 वनों को फिर से तैयार किया जाना है।

भविष्य में पानी की कमी की समस्या को रोकने के लिए हरियाली और जंगलों के निर्माण का किसी व्यक्ति द्वारा विरोध चकित करने वाला है, लेकिन यह मामला अलग है। जब मंदिर का निर्माण होगा तब यह न केवल वास्तुशिल्प नवोन्मेष होगा बल्कि यह मथुरा में वाणिज्यिक और आध्यात्मिक गतिविधि के लिए एक नया केंद्र भी बनाएगा।जबकि कोई भी इस मंदिर के निर्माण के लिए पर्यावरण को बर्बाद करना नहीं चाहेगा, वहीं चुनौतियों से निपटने का सही तरीका होगा कि किसी भी परिणामी प्रभाव की क्षतिपूर्ति हेतु उचित ऊपाय किए जाएँ, जैसे – अन्य साधनों के माध्यम से यमुना का जल आवर्धन और अपशिष्ट जल का शोधन इत्यादि।यदि विरोध होना चाहिए तो वह होना चाहिए एक ऐसे मंदिर के निर्माण को रोकने के मूर्खतापूर्ण प्रयास का, जिस मंदिर से अधिकांश भारतीय गौरवान्वित होंगे।

स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर के पुनर्जन्म के अपवाद के साथ हमारे मंदिर की विरासतों का कायाकल्प करने के कुछ प्रयास किए गए हैं।बिड़लाओं ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया और स्वामीनारायण संप्रदाय हमारी विरासतों को आगे ले जाने के लिए उत्कृष्ट अक्षरधामों का निर्माण करता रहा है। अत्यंत समृद्ध तिरुपति मंदिरों को चलाने वाला तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) कुछ नयी जगहों तक अपना दायरा बढ़ाता रहा है लेकिनी टीटीडी एक राज्य-संचालित संस्थान है और इसके प्रयास औसत दर्जे के हैं। सभी संसाधनों के होने बावजूद इसके द्वारा लीक से हटकर कोई प्रयास नहीं किया गया है।

सच्चाई यह है कि भारत के वर्तमान सामाजिक पतन को हमारे पूर्वजों द्वारा हमारे लिए छोड़ी गयी वास्तुशिल्प विरासत पर निर्माण करने में हमारी अक्षमता से आंशिक रूप से जोड़ा जा सकता है।उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में दिलचस्प विविधताओं के साथ भारतीय मंदिरों की वास्तुकला अद्वितीय है। लेकिन यदि हम सांस्कृतिक कायाकल्प चाहते हैं तो हमें नए मंदिरों का निर्माण नवीन डिज़ाइनों के साथ करने की आवश्यकता है जिससे दो उद्देश्यों का संयोजन होगा: हमारी समृद्ध विरासत का चित्रण और साथ ही साथ नए विचारों पर प्रयोग। इस्कॉन मंदिर कुछ ऐसे ही निष्कर्ष तक पहुँच सकता है,यदि सही तरह से निर्मित हुआ तो।

दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक ढांचे (तर्कसाध्य रूप से) के रूप में यह मंदिर वास्तुकला और इंजीनियरिंग की नयी मिसाल होगा (मॉडल चित्र देखें) लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि यह भारत में अब्राहमिक चुनौती के विर्रुध एक प्रकार का जवाबी हमला है। चर्चों और मंदिरों का निर्माण न केवल श्रद्धालुओं की धार्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है बल्कि इसलिए भी किया जाता है कि आस-पास में ताकत और रोब का संदेश भी भेजा जा सके।दूसरी तरफ हमारे मंदिरों को निम्न आँका जाता है। भारत में नए चर्च और मस्जिदें कुछ इस प्रकार से निर्माण करने कि कोशिश करते हैं ताकि वे नए और भविष्य में होने वाले धर्मांतरणों को ताकत दिखा सकें।यह एक चुनौती है कि हिन्दू मंदिरों को अब मुक़ाबला करना है और हमारी सुनहरी विरासत के कालातीत मंदिरों के आध्यात्मिक तत्व को भी बनाए रखना है।

यह इस मिथक को भी खारिज करने का समय है कि भक्तों के लिए मंदिर मुख्य रूप से आध्यात्मिक केंद्र होते हैं। जहां बड़े मंदिर आते हैं वहाँ पूरी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है और एक नए पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण होता है जो इंजीनियरिंग, वास्तुकला, स्कूलों, स्वास्थ्य संस्थानों और संबन्धित सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है।हिंदू कायाकल्प के लिए मंदिर भविष्य के केंद्र हैं।

यह एक दुःखद बात है कि दक्षिण भारत में अधिकांश मंदिर और पश्चिम में कुछ मंदिर राज्य के हस्तक्षेप के अंतर्गत चल रहे हैं।राज्य, यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित राज्य भी, मंदिरों को आध्यात्मिक और लौकिक उन्नति के केन्द्रों के रूप में देखने के बजाय नगदी के स्रोतों के रूप में देखते हैं।इस प्रकार वे हिंदू धर्म की भावनाओं को प्रभावी ढंग से मार रहे हैं।

जहां एक तरफ मंदिरों को राज्य नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए थोड़ी-बहुत लड़ाई शुरू हो चुकी है वहीं दूसरी तरफ यह भी समान रूप से महत्वपूर्ण है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में नए मंदिर कस्बों का निर्माण किया जाये जो कि सरकार की भागीदारी के बिना एक बिल्कुल नए सिरे से शुरू हों और अपने स्वयं के मार्गों पर चलने के लिए स्वतंत्र हों।इस परिदृश्य में यह महत्वपूर्ण है कि नए मंदिरों के निर्माण के लिए न सिर्फ चंदाऔर दान इकट्ठा किया जाये बल्कि वित्त पोषण के वैकल्पिक और अभिनव माध्यमों को विकसित करने की भी अनुमति दी जाये।उदाहरण के लिए, क्यों ना शहरों के बाहरी हिस्से वाले गांवों को मंदिर बनाने की इजाजत दी जाये, जो न सिर्फ वहाँ के निवासियों की आजीविका को बढ़ाने का एक माध्यम हो बल्कि हमारी विरासत में प्रत्येक समूह के एक सह-मालिक होने के साथ जाति सहयोग का एक नया संवाहक भी हो। दूसरी तरफ, धार्मिक फंड क्यों न बनाए जाएँ, जिनका मुख्य उद्देश्य हो मंदिर निर्माण? ऐसे फंडों को धार्मिक उत्पाद कंपनियों (अगरबत्ती, धार्मिक पुस्तकें, गौशालाएँ, इत्यादि) में निवेश कर सकते हैं और निवेशकों को कुछ प्रतिफल देने का अवसर भी दे सकते हैं, हालांकि यह मुख्य उद्देश्य नहीं हो सकता है।असल प्रतिफल मानसिक होना चाहिए यानी वह खुशी जो वह सब लौटाने से आती है जो हमने इससे प्राप्त किया है।

भारत को, विशेष रूप से हिन्दू समाज को, अपने जन्मजात भेदभाव, जिसका हिन्दू विरोधी समाज द्वारा आसानी से फायदा उठाया जा सकता है, से उबरने के लिए एक बड़े विचार की आवश्यकता है।कुछ “आधुनिक” आवाज़ें हमें अयोध्या में राम मंदिर छोड़ने और वहां कुछ अस्पताल या स्कूल का निर्माण करने की सलाह देती हैं। जब यह निश्चित रूप से एक समृद्धशाली राम मंदिर है तो यह स्वयं स्कूलों, अस्पतालों और वेद पाठशालाओं के निर्माण के लिए संसाधन पैदा करेगा।जहां मंदिर है वहाँ आर्थिक लाभ और विकास भी होगा।

हमें अपने पुराने भ्रमों और उपनिवेशवादी नहरूवादी मस्तिष्कों, जो हमें बताते रहे हैं कि मंदिरों का मतलब है संसाधनों की बर्बादी, से पैदा हुई नाज़ुक मिजाजी को दूर करने की ज़रूरत है। मंदिरों का मतलब संसाधनों की बर्बादी बिल्कुल नहीं है। मंदिर सांस्कृतिक और आर्थिक कायाकल्प के स्रोत हैं और हमें हिन्दू समाज को इसके दलदल से ऊपर उठाने के लिए संसाधनों और अध्यात्मिकता के उचित संयोजन की आवश्यकता है।

यह तर्क दिया जा सकता है कि बहुत सारे परित्यक्त और जीर्ण-शीर्ण मंदिर हैं जो हमारी पहली प्राथमिकता होने चाहिए।श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर धर्मस्थाना ट्रस्ट इस संबंध में पहले से ही महान कार्य कर रहा है लेकिन जब उद्देश्य उचित हो तो हमें कभी भी तर्क-वितर्क नहीं करने चाहिए। हमें जितना नए मंदिरों के निर्माण की आवश्यकता है उतनी ही आवश्यकता है पुराने मंदिरों को प्राप्त करने की और उनकी मरम्मत करने की।कभी-कभी नए मंदिर पुराने मंदिर के साथ-साथ बनाए जा सकते हैं, यहाँ तक कि एक ही परिसर में भी। धर्म को दोनों चाहिए।

इस बिंदु परचाणक्य सूत्र में पहली पंक्ति स्मरण करने योग्य है: “सुखस्य मूलम् धर्म:, धर्मस्य मूलम् अर्थ:, जिसका अनुवाद इस प्रकार है- धर्म या अच्छे आचरणों के पालन से खुशियाँ आती हैं और धर्म का आधार है धन।इन पंक्तियों के अनुसरण के लिए नए और रोचक मंदिरों के निर्माण के अलावा और कोई बेहतर मार्ग नहीं है। धर्म और आर्थिक कल्याण निकट से संबन्धित हैं।

जगन्नाथ स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।