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श्रम कानून, जिनमें तत्काल प्रयासों की है आवश्यकता

आशुचित्र- वर्तमान सरकार को श्रम कानून में संशोधन को प्रथमिकता देनी चाहिए।

भारत ने हाल में जो आर्थिक प्रगति की है, वह कई मायनों में प्रभावित करती है और इसके साथ ही गरीबी दर में भी पर्याप्त गिरवाट देखी गई और देश के मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ है। इसके फलस्वरूप हम जानते हैं कि निचले स्तर पर आने वाले लोगों पर भारत के विकास का सकारात्मक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है और इसलिए उच्च विकास दर को बरकरार रखना नई सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए नीति निरंतरता और कुछ बड़े सुधारों की आवश्यकता होगी जैसे व्यापार सुलभता बढ़ाने और बड़े निवेशों को आकर्षित करने के लिए कुछ प्रयास।

हालाँकि पिछले तीन दशकों से लंबित सुधारों की सूची काफी दीर्घ है, फिर भी तत्कालिक सुधारों में मज़दूर नियमों की ओर ध्यान देना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत की वृद्धि से प्राप्त लाभों के बावजूद यह वृद्धि मूल रूप से सर्विस सेक्टर (सेवा क्षेत्र) से आई है, न कि विनिर्माण क्षेत्र से। इसका परिणाम यह हुआ कि गैर-कृषि अल्प-कौशल वाले रोजगार में कमी देखी गई जिससे कृषि क्षेत्र में उपलब्ध अतिरिक्त श्रम विनिर्माण क्षेत्र में स्थानांतरित नहीं हो पाया। इसका एक कारण भारत के सख्त श्रम कानून हो सकते हैं, विशेषकर औद्योगिक विवाद अधिनियम। इस अधिनियम के तहत कोई भी कंपनी जिसमें 100 से अधिक श्रमिक कार्यरत हैं, उन्हें किसी मज़दूर को हटाने से पूर्व सरकारी अनुमति लेनी होगी। यह भारत के कमांड और नियंत्रण आर्थिक मॉडल का गुण है जो नेहरू काल से चला आ रहा है। इसी प्रकार भारत में 200 भिन्न श्रम कानून हैं जिनका उद्देश्य श्रमिकों के हित में कार्य करना है (इनमें से कम से कम 40 केंद्र सरकार के अधीन हैं)।

अब यह ज्ञात हो चुका है कि इन नियमों का औपचारिक रोजगार क्षेत्र पर बुरा प्रभाव पड़ा है और इसके कारण अर्थव्यवस्था के विनिर्माण क्षेत्र में अधिक अनौपचारिकता देखी गई है। इसके अतिरिक्त ये नियम हमें यह भी समझा सकते हैं कि क्यों भारत की वृद्ध मूल रूप से सेवा क्षेत्र से हुई जो कि औद्योगिक और कृषि क्षेत्र की तुलना में कम श्रम की मांग करते हैं। (औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी उतनी ही रही जबकि कृषि क्षेत्र के मूल्य पर सेवा क्षेत्र ने विकास किया)। इसलिए जो नियम मजदूरों के हितार्थ बने थे, वे भेदभावपूर्ण हो गए क्योंकि वे सिर्फ औपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों का संरक्षण करते हैं और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक सामाजिक सुरक्षा विहीन रह जाते हैं। बढ़ती जनसंख्या और लोगों की बढ़ती आकांक्षाओं के बावजूद किसी सरकार ने श्रम कानूनों में सुधार का प्रयास नहीं किया। यदि ऐसा हो पाता तो इससे औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ते। परिणामस्वरूप, अधिकांश उद्योगपतियों ने पूंजी प्रधान क्षेत्रों में निवेश करना चाहा, बजाय श्रम प्रधान क्षेत्रों के। इस कारण विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार केवल सीमित मात्रा में बढ़ा। विभिन्न क्षेत्रो ंमें रोजगार की हिस्सेदारी दर्शाती हा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि रोजगार प्रधान है, वहीं नगरों में अधिकांश लोग टर्शियरी क्षेत्र (तृतीयक) में कार्यरत हैं।

पिछली सरकार ने द्वितीय राष्ट्रीय आयोग के सुझाव पर इस दिशा में कार्य शुरू किया है जिसके अनुसार श्रम कानूनों को चार खंडो में विभाजित किया जाना चाहिए- वेतन भत्ता, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण एवं व्यावसायिक सुरक्षा। हालाँकि इनके क्रियान्वयन की प्रगति अत्यंत धीमी है क्योंकि ये संसदीय प्रक्रिया और परामर्श चरणों में अटकी हुई है। साथ ही, भूमि सुधार पर विपक्ष के विरोध के बाद यह स्पष्ट है कि श्रम कानूनों में सुधार को भी कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ेगा।

हालाँकि, राजनीतिक विरोध का बहाना बनाकर इन सुधारों को टालना सही नहीं है और पिछली सरकार द्वारा चालित किए गए सुधारों को क्रियान्वित किया जाना चाहिए जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में और औपचारिकता लाई जा सके।

औद्योगिक संबंधों पर जो श्रम कानून की रूपरेखा तैयार हुई है उसमें मज़दूरों को हचाने के लिए सरकार की अनुमति वाला नियम बरकरार है (पाठ 10), हालाँकि इसमें संशोधन कर इसे 300 से अधिक मजदूरों वाली कंपनियों के लिए आवश्यक कर दिया है। हालाँकि वर्तमान कानून से यह एक सुधार है लेकिन यह नियम कंपनियों की तीव्र वृद्धि में बाधक बनेगा जिससे उत्पादन वृद्धि दर भी तेज़ी से नहीं बढ़ पाएगी। इससे श्रम बाज़ार में विकृतियाँ देखने को मिलेंगी, या तो कंपनियाँ अलग-अलग नामों से अपने श्रमों को विभाजित करेगी या अनुबंध आधारित श्रम को नियुक्त करेगी (जो एक तरह से अनौपचारिक भी हो सकता है)। औद्योगिक संस्थाओं में मजदूरों को निकालने के लिए सरकारी अनुमति निजी क्षेत्र के भाव का खंडन करती है और यह कमांड और नियंत्रण अर्थव्यवस्था का लक्षण है।

सरकार को करना चाहिए कि यह अतिरिक्त नियमों को निरस्त कर दे जो कंपनियों में रोजगार प्रबंधन में बाधा बनते हैं। एक विकल्प है कि सरकार इस नियम को संशोधित कर प्रोफेसर जगदीश भगवती और प्रोफेसर अरविंद पनगरिया का सुझाव माने जो कहता है कि मांग और तकनीक के आधार पर मजदूरों को कम करना औद्योगिक विवाद अधिनियम के अनुसार छँटनी की परिभाषा से अलग किए जाने चाहिए। हम जानते हैं कि नियुक्त करना, निकालना और प्रशिक्षित करना, सभी का एक मूल्य होता है। इसलिए सामान्य रूप से कंपनियाँ सकारात्मक या नकारात्मक व्यापार के समय मजदूरों की संख्या परिवर्तित करने की बजाय उनकी कार्यावधि परिवर्तित करती है। वास्तिविक संसार में रोजगार स्तरों में परिवर्तन एक मूल्य के साथ आता है और इस कारण जब तक अत्यंत आवश्यकता न हो तो कंपनियाँ कर्मचारियों को निकालने या लेने से बचती हैं। इसलिए अस्थाई आर्थिक परिवर्तनों में कर्मचारियों की छँटनी की समस्या को अनावश्यक रूप से बड़ा मान लिया गया है और छँटनी तब ही की जाएगी जब व्यापार पूर्ण घाटे में जा रहा हो।

साथ ही राज्य श्रम कानून भी आवश्यक हैं जिनका प्रभाव राज्य के अंतर्गत हो रही विनिर्माण गतिविधियों और ताज़े निवेश पर पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर ऐसे सुधार करें जो एक मुक्त श्रम बाज़ार स्थापित कर सके। आदर्श रूप से होना चाहिए कि केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों से चर्चा कर पूरे देश के लिए एक श्रम कानून बनाए। इस कार्य के इरादे भले ही नेक हैं लेकिन भारत में राजनीतिक कारणों से इसके पूरा होने की आशंका कम है। इसकी जगह केंद्र यह कर सकता है कि यह राज्यों के साथ संवाद स्थापित कर उनके श्रम कानून बनाने में सहायता करे जिससे आसान मजदूर नियम बन सकें। इन कानूनों के आसान होने से विभिन्न क्षेत्रों में चल रही विनिर्माण गतिविधियों के बीच पुल बन पाएगा, भारत का मध्य और उत्तर भाग श्रम प्रमुख उत्पादन गतिविधियों को प्रोत्साहित कर पाएगा, वहीं दक्षिण भाग पूंजी प्रधान विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।

इस प्रयास का महत्त्वपूर्ण पहलू होना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया को इसी कार्यकाल में पूरा किया जाए क्योंकि यह दीर्घ समय से लंबित है और यह देरी भारत में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि में बाधक है।

पिछले दो माहों के प्रचंड चुनाव अभियान के बाद समय है अब सुधार लाने का और एक कठिन राजनीतिक कदम से शुरू करना एक अच्छी शुरुआत होगी। यदि कोई दुष्प्रभाव हुआ तो वह अस्थाई और राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित होगा लेकिन इसके सुखद फल अगले दो वर्षों में मिलने लगेंगे।