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काशी कॉरिडोर- बाबा विश्वनाथ की नगरी के सृजन के लिए विनाश आवश्यक

आशुचित्र- काशी विश्वनाथ गलियारे के निर्माण के लिए, बनारस के जीर्णोद्धार के लिए जो सबसे आवश्यक चीज़ थी, वह थी शिव के समान विध्वंस करने की राजनीतिक इच्छशक्ति।

अपनी दाहिनी हथेली पर शिवलिंग लेकर खड़ीं अहिल्याबाई होलकर, उनके घूँघट के अंदर से उनका बायाँ हाथ उसे बल देता हुआ और उसके ऊपर पुष्पार्पण। यह छवि उन सभी का स्वागत करती है जो वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के वृत्त-खंड में प्रवेश करते हैं। इस मराठा रानी का बड़ा-सा पोस्टर ईंट की एक दीवार पर लटका है और इसमें लिखा है, “महारानी अहिल्या बाई होलकर- 1780 में इस मंदिर की मरम्मत कराके इसे वर्तमान स्वरूप में लेकर आईं।” उनके चित्र का मुख उस मस्जिद की ओर है जहाँ कभी वास्तविक विश्वेश्वर मंदिर था और यह उन सभी को छू जाता है जो यह जानते हैं कि किसी भी साधक के लिए काशी क्या मायने रखता है और यह शहर और मंदिर युगों से साथ-साथ रहे हैं।

काशी मंदिर प्रांगण में अहिल्या बाई होलकर का पोस्टर

उनके समान वे सभी लोग जिन्होंने समय-समय पर भारतीय सभ्यता और धर्म के गौरव को बनाए रखने के लिए योगदान दिया है, के प्रति इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या होगी कि मंदिर जाने वाला हर श्रद्धालु समय से परे एक ऐसे युग में जा सके जहाँ धर्म अपराध भाव से मुक्त होकर विद्यमान है। और यही वह चीज़ है जो काशी कॉरिडोर परियोजना का उद्देश्य है।

काशी कॉरिडोर एक सौंदर्यीकरण परियोजना है जिसका उद्देश्य गंगा के तट और काशी विश्वनाथ मंदिर के बीच के स्थान को भीड़ रहित करना है। और तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के लिए बड़े-बड़े कॉम्प्लेक्स का निर्माण किया जा सके। नदी से मंदिर तक सरल मार्ग के प्रयोजन से यह परियोजना क्षेत्र को वापस लेकर विश्वनाथ मंदिर को नया स्वरूप देने के साथ-साथ कॉम्प्लेक्स का निर्माण भी करेगी।

अपने संवैधानिक क्षेत्र, वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 मार्च को एक भूमिपूजन समारोह में सम्मिलित हुए थे और वाराणसी धाम परियोजना का शिलान्यास किया, उनकी स्वप्न योजना जिसके लिए वे कहते हैं कि इसके लिए ही वे वाराणसी से चुने गए हैं। “इस कॉरिडोर से काशी पूरे विश्व में एक नई पहचान बनाएगा। जब मैं यहाँ 2014 के चुनावों में आया था तब मैंने कहा था कि मैं आया नहीं हूँ बुलाया गया हूँ। आज मुझे लगता है कि यह बुलावा ऐसे कार्य के लिए था और अब यह संकल्प और अडिग हो गया है।”, प्रधानमंत्री ने कहा था।

यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 2014 के चुनावी घोषणापत्र का भाग भी थी जहाँ पार्टी ने इस शहर के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया था। वाराणसी से सांसद रहे प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में सुनिश्चित कर दिया कि यह परियोजना पूर्णरूप से विकासशील रहे।

शिलान्यास के बाद से सोशल मीडिया पर कई वीडियो आए हैं जो उभरते हुए मंदिरों के बारे में कहते हैं। लेकिन यह जानने के लिए कि यह परियोजना है क्या और यह इस प्राचीन नगर के लिए क्या कर सकती है, व्यक्ति को साइट पर जाकर देखना होगा कि क्या कार्य चल रहा है।

कार्य प्रगति पर

एक ऐसी जगह जहाँ कभी शहरी चाल जैसी इमारत खड़ी थी, वहाँ अब टूटी हुई इमारत, अवशेषों का ढेर, खाली भूमि और बड़े व छिपे हुए मंदिर जो परियोजना के लिए जगह खाली करने के बाद दिखे हैं। ये कोई छोटा मंदिर नहीं हैं, सबका एक इतिहास है जो सदियों पुराना है लेकिन ये सभी तीर्थयात्रियों की पहुँच से दूर हो गए थे क्योंकि बहुमंजिला इमारतों ने इन्हें घेर लिया था। यह बहुत दुखद है कि कई ने तो इन मंदिरों से सामान्य संरचना की तरह व्यवहार कर, इससे जोड़कर या इसके ऊपर ही निर्माण कर दिया था। सरदल, सरिये जो पीछे छूट गए हैं और नक्काशियाँ जो सीमेंट की परत में से झाँकने की कोशिश करती हैं, यह गाथा कहती हैं कि यह परियोजना किसका अनावरण और किसे पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर रही है।

कॉरिडोर परियोजना

40,000 वर्गमीटर के क्षेत्र में फैली यह परियोजना एक ऐसे कॉम्प्लेक्स का निर्माण करना चाहती है जो गंगा से तीर्थयात्रियों को मंदिर तक का सुगम मार्ग प्रदान करे। नदी में पुण्य डुबकी लगाकर आप सीधे मंदिर जा सकते हैं।

काशी परियोजना के मॉडल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

यह एक सर्व-समावेशी कॉम्पलेक्स होगा जिसमें कुछ वर्तमान संरचनाओं को उन्नत और बेहतर किया जाएगा जैसे कि विरासत पुस्तकालय लेकिन उससे भी अधिक यह कि एक सुनियोजित मंदिर प्रांगण का निर्माण होगा जिससे न सिर्फ मंदिर से सीधा गंगा को देखा जा सकेगा बल्कि विश्राम-गृह, जन-प्रसाधन, यात्री सूचना केंद्र, मणिकर्णिका घाट पर चिता जलाने के लिए लकड़ियों को गोदाम, यात्रियों के लिए सामान-गृह, कलाकारों के प्रदर्शन/अभिनय के लिए बड़ी जगह, एक संस्कृति केंद्र, एक कैफ़े, एक बहुप्रयोजन सभागृह, एक वैदिक केंद्र, एक वाराणसी गैलरी, बिक्री केंद्र और कार्यालय, अतिथि गृह, यज्ञशालाएँ और नव-निर्मित संग्रहालय।

प्रधानमंत्री ने शिलान्यास के बाद योजना का एक वीडियो ट्वीट किया। और इस योजना को वास्तविकता के धरातल पर उतारने का कार्य शुरू हो चुका है और पिछले आठ माहों से तेज़ी से प्रगतिरत है।

लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि काशी को भीड़ रहित करने की योजना बनी हो। कई पिछली सरकारों ने ऐसा करने की कामना तो की परंतु प्रतिबद्धता नहीं दिखाई। परियोजना को ज़मीन पर इसलिए नहीं उतारा जा रहा था क्योंकि इसमें स्थानीय लोगों से निपटने और उनकी भावनाओं को आहत करने जैसी जटिलताएँ थीं। लेकिन वर्तमान सरकार ने जो किया वह अद्वितीय है। पहले सरकार को विनाशक भी कहा जा रहा था लेकिन सरकार आगे बढ़ती रही। इसे प्रधानमंत्री की प्रशंसा के नाम पर हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह इस क्षेत्र का कई बार अवलोकन कर, योजना से प्रभावित होने वाले लोगों से मिलकर जिन्होंने शुरुआत में विरोध किया था, तीर्थयात्रियों, मज़दूरों, ठेकेदारों और इसके पीछे की टीम व कोई भी जिसका इस मामले में कुछ कहना है से बात करके की गई समीक्षा है। सभी प्रतीक्षा कर रहे हैं उस क्षण की जब काशी कॉरिडोर पूर्ण स्वरूप में आ जाएगा।

मंदिर जो उभरे हैं

मैं सोचती हूँ कि इस मराठा महारानी को यह जीर्णोद्धार देखकर कैसा लगता। मंदिर की ओर दर्शन के लिए बढ़ते हुए जहाँ लोग कतार में खड़े थे, मेरी आँखें एक चबूतरे पर बने तीर्थस्थल पर जा टिकीं जो तीन तरफ से स्टील रेलिंग से घिरा था। ओर मुझे पता लगा कि अब तक यह एक तीन मंज़िला इमारात से ढँका हुआ था और हाल ही में उभरा है।

श्री गंगेश्वर महादेव मंदिर

इसका नाम है गंगेश्वर महादेव मंदिर। इस मंदिर की खोज और जीर्णोद्धार एक दिव्य क्षेत्र को वापस पाने और इतिहास को पुनः लिखने की शुरुआत है।

ये उन कुछ मंदिरों में से है जिसका अच्छे से रखरखाव किया जाता है लेकिन कई घरों से जुड़े हुए हैं और इन्हें वापस प्राप्त करनी ही अपने आप में चुनौतीपूर्ण है।

भवनों में से उभरे हुए मंदिर

सीमा पर देखे जाने वाले कई गणेश मंदिर 56 विनायक परिक्रमा के भाग हैं जिनकी परिक्रमा पंचकोसी कहे जाने वाले श्रद्धालु लगाते हैं। यह यात्रा जोविनायक मंदिर से शुरू होती है। इस तीर्थस्थल को भी कई संरचनाओं ने घेर रखा था।

दाईं तरफ जोविनायक मंदिर है और इसके ऊपर एक बहुमंजिला इमारत थी।

महाराज चंद्रगुप्त द्वारा निर्माण कराए गए चंद्रगुप्त महादेव मंदिर के मुख्य स्थल की एक प्रतिकृति भी देखी जा सकती है। इसे मनकामेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है और ऐसी मान्यता है कि देव सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं।

मनोकामेश्वर मंदिर

जो मंदिर सर्वाधिक लोगों का ध्यान आकर्षित करता है, वह है हाथों से तराशा हुआ पत्थर का श्री कुंभ महादेव और समुद्र मंथन की गाथा को इसकी पिछली दीवार पर तराशे हुए देखा जा सकता है। इस स्थान की अनदेखी का प्रमाण यह है कि मंदिर के शिखर के आधार छज्जे से छड़ें निकलती हुई देखी जा सकती हैं।

मंदिर शिखर के आधारसे निकलती हुई छड़ें

स्थानीय किंवदंतियाँ हैं कि लोगों ने इन मंदिरों के आसपास घर इसलिए बनाए थे ताकि इन्हें इस्लामी आक्रमण से बचाया जा सके। लेकिन इन अमूल्य वास्तुशास्त्र की प्रतियों की रक्षा करने के लिए उन्हें तोड़ने या विकृत करने की आवश्यकता नहीं थी।

बदलती हुई काशी

इस लेख में उन सभी मंदिरों का विवरण देना कठिन होगा जो उभरे हैं और इस मलबे के बीच डिगकर खड़े होते दिखते हैं लेकिन आप चित्रों से समझ जाएँगे कि कैसी अमूल्य धरोहर इन इमारतों के पीछे छुपी हुई थी।

विनाश और मुआवज़ा

कॉरिडोर पर चले कार्य के बीच जेसीबी से इमारतों को गिराते हुए मलबे के बीच में देखा जा सकता है। जो संरचनाएँ मंदिर से सटी हुई हैं, उन्हें व्यक्तिगत रूप से तोड़ा जा रहा है और मजदूरों को निर्देश हैं कि मंदिर को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचनी चाहिए।

उभरते हुए ढेरों मंदिर

लगभग 40 ऐसे मंदिरों को प्राप्त किया गया है और उन्हें सुधारने का कार्य चल रहा है। ईंट-ईंट निकालकर इन अतिक्रमणों को हटाया जा रहा है। हालाँकि अभी भी कई लोग हैं जो अभी तक अपना घर छोड़कर नहीं गए हैं लेकिन अधिकांश रहवासी और व्यावसायिक स्थानों को खाली कर दिया गया है।

श्री रामजनेश्वर महादेव मंदिर

लगभग 200 दुकानदारों और 300 निवासियों को विस्थापित किया गया है और उन्हें मुआवज़ा भी दिया गया है। अधिकांश मामलों में बाज़ार के दाम से दोगुना, मुआवज़ा पाने वाले स्थानीयों ने बताया। अभी तक सरकार ने विध्वंय और खरीद के लिए  360 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।

जिन दुकानदारों को इस क्षेत्र से निकाला गया है, उनसे यह भी वादा किया गया है कि कॉम्पलेक्स बनने के बाद उनकी दुकानों की स्थापना को प्राथमिकता दी जाएगी। “ये समय की बात है”, एक अधिकारी ने बताया, “लेकिन इन लोगों को वापस आने का अवसर मिलेगा क्योंकि वे ही मंदिर के पारिस्थितिकी तंत्र (ईकोसिस्टम) हैं। प्रसाद वितरक, फूल बेचने वालों, आदि को यहाँ आना होगा और ये वे ही लोग होंगे। हम मानते हैं कि लोगों को असुविधा हुई है लेकिन यह सिर्फ समय की बात है।”, यह कहते हुए उन्होंने बताया कि परियोजना 50-60 प्रभावित लोगों को सुगम दर्शन सुविधा पर रोजगार मिल चुका है जो काशी आने वाले लोगों की सहायता करता है।

विश्वनाथ धाम में स्वागत करता हुआ पोस्टर

विध्वंस कार्य में लगे हुए कई ठेकेदारों में से एक अमित श्रीवास्तव, जो काशी विश्वनाथ मंदिर से मात्र 200 मीटर की दूरी पर रहते हैं, इस बात की पुष्टि मोटे तौर पर एक डाटा से करते हैं। “मैं एक ठेकेदार हूँ और मेरे पास रोज़गार नहीं था, फिर मैंने यहाँ कार्य अवसरों के बारे में सुना। मैंने अपने कागज़ात तैयार किए और कार्यालय पहुँचा। मैं सीधे सीईओ से मिला और उन्होंने मुझे यह अवसर दिया। लेकिन पहली बार मैंने कोई सरकारी कार्य शुन्य भ्रष्टाचार के साथ होते देखा। यहाँ जो पारदर्शिता है, ऐसी कहीं नहीं देखी गई।”, श्रीवास्तव ने बताया।

“किसी को भी कोई परेशानी होती है तो वह सीधे जाकर अपनी बात कह सकता है। ओर देशभर के लोग जो अपने घर में बैठे-बैठे विचार गढ़ रहे हैं, उन्हें यहाँ आना चाहिए और जो कार्य हो रहा है उसे देखना चाहिए।”, उन्होंने जोड़ा।

विरोध

पिछले वर्ष की शुरुआत में जब उत्तर प्रदेश सरकार ने घोषणा की थी कि यह इस परियोजना को आगे बढ़ाएगी तो कुछ स्थानीय लोग जिनकी दुकानें और घर इस क्षेत्र में आते थे, उन्होंने धरोहर बचाओ समिति गठित की। पूर्व खेल पत्रकार पदमपति शर्मा ने इस विरोध का नेतृत्व किया और अगर परियोजना को आगे बढ़ाया जाएगा तो अपने प्राण त्यागने की धमकी दी। लेकिन जब मैं उनसे मेहमूरगंज स्थित उनके निवास पर मिली तो उन्होंने कहा, “मेरा विरोध पहले की प्रस्तावित योजना से था जिसमें उन्होंने कहा था कि सभी इमारतों को तोड़ दिया जाएगा और गंगा को एक कैनाल के माध्यम से मंदिर के निकट लाया जाएगा। यह केवल इतिहास नहीं बल्कि भूगोल को भी विकृत करने का प्रयास था।” लेकिन फिर विधान परिषद में चर्चा कर सरकार ने इस योजना को विस्तार से समझाया और बताया कि कॉरिडोर पर एक कॉम्पलेक्स भी बनाया जाएगा जिससे इस क्षेत्र का सौंदर्य बढ़ जाएगा, तब उनके विचार बदल गए।

इस व्यक्ति, जिसने विरोध में आवाज़ उठाई थी, ने न सिर्फ अपने घरों को काशी ट्र्स्ट में पंजीकृत कराया बल्कि एक घर को मंदिर न्यास को दान में भी दिया। सरस्वती फाटक (विश्वनाथ मंदिर द्वार 2) जहाँ सरस्वती विराजमान हैं, उस भूमि को भी शर्मा परिवार ने ही मंदिर को दान में दिया था। “इस सरस्वती को नौंवी शताब्दी में आचार्य शंकर ने पवित्र स्थान घोषित किया था।”, उन्होंने बताया। उनका मानना है कि जो उन्होंने दान दिया है, वह एक ज्योतिष केंद्र था और उनके पूर्वज प्रख्यात विद्वान व ज्योतिष थे। इस जगह के साथ व्यापार न करने की इच्छा बताते हुए वे कहते हैं, “हमें लगा कि इसका सौदा नहीं करना है इसलिए हमने दान कर दिया”।

हालाँकि उनका मानना है कि परियोजना को अलग तरह से नियोजित किया जाना चाहिए था लेकिन अब उनके विचार उनके पहले के विचारों से पूर्णतः विपरीत हैं। और िसके श्रेय वे मंदिर न्यास के सीईओ विशाल सिंह को देते हैं, “इसके पीछे विशाल की बड़ी भूमिका है क्योंकि हमने विशाल को अपना पुत्र माना है।”, उन्होंने कहा।

लेकिन कई मीडिया हाउस, जिन्होंने उनका नाम तब लिया था जब वे “प्राण त्यागने की धमकी दे रहे थे”, ने उनके परिवर्तन के बारे में बताना ज़रूरी नहीं समझा। “ये किसी को नहीं पता क्योंकि ये प्रचारित नहीं है ना।”, शर्मा ने बताया।

सुनील मेहरोत्रा काशी के निवासी हैं और प्रसिद्ध बनारसी साड़ियों के निर्माण में व्यापार करते हैं। वे भी शर्मा की तरह ही विरोध करने वाले समूह का भाग थे लेकिन अब वे न सिर्फ इस परियोजना का समर्थन करते हैं बल्कि यह भी कहते हैं कि वर्तमान में जो इसका विरोध कर रहे हैं वे, वो लोग हैं जो काशी का भला नहीं चाहते। “गलती निकालने वाले हर जगह होते हैं। आप उसका कुछ नहीं कर सकते। लेकिन ऐसा कोई नहीं है जिसे भरपूर मुआवज़ न मिला हो। हमने भी अपना घर दिया है लेकिन हम असंतुष्ट नहीं हैं।”, मेहरोत्रा ने बताया जो अब मेहमूरगंज में रहने लगे हैं और अपना व्यापार भी वहीं से चला रहे हैं। “अब यह हमारी काशी को और लोकप्रिया बनाएगा, है ना? जिसका अर्थ यह कि इसका लाभ भी हमें ही मिलेगा।”, उन्होंने विरोध को नकारते हुए कहा।

ललिता घाट और मणिकर्णिका घाट के बीच आते-जाते समय उन संकरी घुमावदार गलियों में तीर्थयात्रियों को यही बातचीत करते सुना जा सकता है कि अंततः कोई है जिसे इसकी चिंता है। राजू मल्होत्रा और उनके दोस्त जो गंगा से मंदिर की ओर जा रहे थे, ने मुझे तस्वीरें लेते हुए देखा और कहा, “हमारी काशी बदल रही है और बेहतर हो रही है। पहले लोगों को लंबी और टेढ़ी गलियों से निकलकर जाना होता था लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जी ने सारे व्यवधान हटा दिए हैं और मंदिर के लिए सुगम मार्ग बना दिया है। कमाल का काम हो रहा है।”, मल्होत्रा ने कहा।

शैलेंद्र कुमार सिन्हा गुज़रते हुए श्रद्धालुओं को पुकारकर प्रसाद और फ्रिज चुंबक लेने के लिए कहते हैं। “अभी क्यों बहस करना? प्रतीक्षा करें और देखें कि कॉरिडोर क्या लेकर आता है। अगर यह योजनानुसार हुआ तो निस्संदेह बेहतर दृष्टि और खुली जगहों से व्यापार बेहतर होगा।”, 51 वर्षीय दुकानदार ने बताया।

लंबे समय से अटका हुआ

यह ऐसी परियोजना है जो दशक भर से अधिक से लटकी हुई है। “यदि मुझे पहले तीन सालों में राज्य सरकार का सहयो मिलता तो संभवतः हम इसका उद्घाटन कर रहे होते। लेकिन पहले तीन सालों में असहयोग का वातावरण बना हुआ था। योगी आदित्यनाथ ने जब से राज्य की बागडोर संभाली है, तब से काशी का विकास तेज़ी से हो रहे है।”, शिलान्यास के समय मोदी ने कहा था।

पिछली तीन शताब्दियों में इतने बड़े स्तर पर पहली बार इस महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल पर कार्य हो रहा है। इसका इतिहास ही जीर्णोद्धार का है क्योंकि इसपर कई बार हमले हुए।

ज्ञानव्यापी मस्जिद वहाँ खड़ी है जहाँ रभी काशी विश्वनाथ मंदिर हुआ करता था

ज्ञानव्यापी मस्जिद जो मंदिर प्रांगण के लौह बाड़े के पीछे है, औरंगज़ेब द्वारा प्राचीन मंदिर का विध्वंस कर बनवाई गई थी और इसके कुछ भाग कथित रूप से आज भी मस्जिद की संरचना में दिखते हैं। यह 1669 में हुआ था। इससे कई वर्ष पहले 1194 में क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने कन्नौज के राजा को हराकर इस मंदिर पर हमला किया था। यह मोहम्मद ग़ौरी के समय की बात है। 13वीं शताब्दी में एक गुजराती व्यापारी द्वारा बनवाए गए इस मंदिर पर पुनः 15वीं शताब्दी के अंत या 16वीं शताब्दी की शुरुआत में तोड़ गया। अकबर के शासनकाल में राजा मानसिंह ने इसे बनवाया था लेकिन मुग़लों से संबंध के कारण उनका बहिष्कार कर दिया गया था। औरंगज़ेब ने जिस मंदिर का विध्वंस किया था वह 1585 में राजा टोडर मल द्वारा बनवाई गया था।

हालाँकि मराठा राजा मल्हार राव होल्कर चाहते थे कि मस्जिद को गिराकर वास्तविक मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाए लेकिन वे सफल नहीं हो सके क्योंकि लखनऊ के नवाबों का उस क्षेत्र पर शासन था। आज हम जो संरचना देखते हैं वह उनकी बहू ने कई राजसी परिवारों के अनुदानों से बनवाई थी जिसमें से 1 टन सोना महाराजा रणजीत सिंह ने दान में दिया था जिससे गुंबद पर सोने का पानी चढ़ाया गया है।

एक व्यक्ति और उनकी सेना

जहाँ सभी लोग इस काम के लिए प्रधानमंत्री के नज़रिये और मुख्यमंत्री के क्रियान्वयन की सराहना कर रहे हैं, वहीं इस काम को ज़मीनी स्तर पर उतारने का श्रेय उस व्यक्ति को दिया जा रहा है जो इस परियोजना के विरुद्ध खड़े लोगों को भी समझाकर मना पाया। यह देखना बहुत अद्भुत है कि किस तरह जिन लोगों ने अपने घरों को इस कॉरिडोर के लिए छोड़ दिया, वे भी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विशाल सिंह के कार्य की सराहना कर रहे हैं, और यह नाटकीय लग सकता है जब तक आप सीधे इसे न सुनें। कई लोग इस काम के लिए उनकी भक्ति की प्रशंसा कर रहे हैं, कई उनकी कर्तव्यपरायणता और निष्ठा से मंत्रमुग्ध हो गए हैं और कई लोग तो सरकार को इस बात के लिए चेतावनी दे रहे हैं कि अगर वे इस काम को चलता देखना चाहती है तो विशाल सिंह को हटाने की सोचें भी ना। 

मेहरोत्रा का कहना है  कि ना सिर्फ कॉरिडोर का काम बल्कि पूरे शहर का विकास कार्य सिंह को सौंप देना चाहिए। “इतना ईमानदार अधिकारी हमने अपनी ज़िंदगी में अभी तक नहीं देखा है। शुरुआत में मैं भी इस परियोजना के विरुद्ध था पर जब विशाल जी से मिला तब चीज़ें बदल गई। इस आदमी ने एक पैसे का धोखा नहीं किया और यह इनकी भक्ति की शक्ति और कार्य की पारदर्शिता ही है जिससे इस स्तर का कार्य चल रहा है”।, मेहरोत्रा ने कहा। “कहीं कोई बिचौलिया नहीं, कुछ नहीं। उन्होंने सभी से यह कहा कि सीधा मेरे पास आओ। जो भी उनके बारे में बुरा बोल रहे हैं उनका कुछ नहीं किया जा सकता। वे अकेले ही 100 के बराबर हैं। जब कोई परियोजना इस स्तर की होती है, तो हर किसी की दिक्क्त को सुनना और उसे हल करना यह संभव नहीं है।”, भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ ने पूर्व नगर अध्यक्ष ने कहा। मेहरोत्रा ने इस मुद्दे पर आगे कहा, “बाबा में उनकी इतनी भक्ति है कि उनकी बातें सुनकर हमें लगा कि हमें बाबा के लिए यह काम करना चाहिए।” मेहरोत्रा अपने पुराने घर गए और अपने माथे पर श्रद्धा में धूल भी लगाई और कहा, “हम भविष्य में अपने बच्चों को बता पाएँगे कि देखो यहाँ हमारा घर हुआ करता था, और इस अद्भुत काशी कॉरिडोर में हमने इस तरह योगदान दिया है। यह बाबा विश्वनाथ की इच्छा थी और इसलिए यह कार्य हो रहा है।”

सीईओ विशाल सिंह

‘आज का औरंगज़ेब’ कहलाने से लेकर आज जब सिंह इन गलियों में चलते हैं तो उनकी भक्ति की शक्ति की सराहना के साथ उनके नज़रिये की भी प्रशंसा करते हैं। निस्संदेह ही पिछले एक वर्ष से सिंह ने बहुत मीलों का सफर तय कर चुके हैं। अगर आप एक आम भक्त हैं तो बिना जाने आप ऐसे ही गुज़र जाएँगे यदि आपने उन्हें उनकी टेबल पर माथे पर चंदन के तिलक के साथ नहीं देखा है तो।

मुआवज़े का चेक देते हुए सिंह

वे इंटेरनेट को ठीक करने के लिए एक आईटी प्रबंधक को भी अपनी जुराबें निकालने के लिए बोलते हैं और साथ ही वह बहुत ही कोमलता से अपनी मेज़ के पीछे नंदी बैल के सामने त्रिशूल पर फूलों की माला को ठीक भी करते हैं। वह मुस्कुराते हुए एक बूढ़ी महिला को 10 लाख रुपये का चेक देते हैं जिसने अपना घर इस कॉरिडोर के लिए पंजीकृत करवाया था। लेकिन यह विवरण तब खो जाता है जब वह बूढ़ी महिला कहती है कि उस चेक में एक शून्य कम है। क्रूर सुपरवाइज़र 30 सैकंड तक कर्मचारी को उसकी गलती के लिए घूरता है और उनकी पूरी टीम उस गलती को ठीक करने में लग जाती है। वे खुद अपने सदाचारी स्वरूप में लौट जाते हैं और कहते हैं कि इसे ठीक करना उनकी ज़िम्मेद्दारी है और महिला को आश्वस्त करते हैं। इके बाद वे फिर अपनी टेबल पर लौट जाते हैं और हमें परियोजना के तहत अपनी यात्रा के बारे में बताते हैं।

सिंह ने कहा, “इस परियोजना को किसी आम परियोजना की तरह निपटाया नहीं जा सकता है। इसमें सहानुभूति, संवेदनशीलता और भावनात्मक जुड़ाव है जिसने लोगों को समझाकर मनाने में हमारी सहायता की”। 

सृजन के लिए विनाश है आवश्यक

एक महिला जो अपने स्वास्थ्य के कारण अधिकारियों का सहयोग नहीं कर पाती थी, आज उसका ध्यान परियोजना के अधिकारियों द्वारा रखा जा रहा है। वैसे तो वे इस क्षेत्र में तीन घरों की स्वामिनी हैं लेकिन उनकी और उनकी बेटी के स्वास्थ्य के कारण वे चिंतित थीं। सिंह ने बताया, “हमें एक मानवीय पहुँच के अनुसार चलना था इसलिए पहले उनका उपचार करवाना हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण काम था जिससे उन्हें इस बात पर भरोसा हो जाए कि हम अच्छे लोग हैं और हम किसी को भी नुकसान पहुँचना नहीं चाहते हैं। उनकी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने का हमारा उद्देश्य उन तक पहुँचाया गया। वे पहले उस महिला को स्थानीय डॉक्टरों के पास लेकर गए लेकिन फिर उसे लखनऊ लेकर जाया गया। वहाँ काशी कॉरिडोर के फंड से उनका इलाज करवाया गया। अब वे ट्रस्ट के साथ अपने घरों को पंजीकृत करवाने के लिए तैयार हैं।”

40 की उम्र के ऊर्जावान सिंह के पास उनके समान ही ऊर्जावान टीम है लेकिन उन्हें जो कशी मिली थी वह प्रभावशाली नहीं थी। सिंह ने अफ़सोस जताते हुए कहा, “भारतेंदु हरीशचंद्र जी ने एक कविता लिखी थी ‘देखी तुमरी काशी’ जिसमे उन्होंने काशी की सभी बुरू बातों को रेखांकित किया था। दुर्भाग्यवश जब परिस्थिति हमारे हाथ में आई तो हालात कुछ ज़्यादा अलग नहीं थे।”

चाहे वह अवैध कब्ज़ा हो या निराशाजनक किराए, जीर्ण-शीर्ण संरचनाएँ और अतिक्रमण हो या दखलंदाज़ी और हिप्पियों के लिए रिक्त स्थान के उपभाड़ा, यहाँ तक कि ड्रग बेचने जैसी गतिविधियां, गंदी गलियाँ और हर जगह आवारा जानवर- यह सूची अंतहीन है। वह दृश्य काफी दुखदाई था।” जो इसे सबसे ज़्यादा भुगत रहे हैं, वे तीर्थयात्री हैं। कल्पना कीजिए कैसा हो अगर कोई व्यक्ति पवित्र गंगा में स्नान करने के लिए जाए और उसके बाद साफ़ मन से मंदिर की तरफ दर्शन करने के लिए बढ़े लेकिन उससे पहले उसे पतली और गंदी गलियों से गुज़रना हो फिर कहीं गलती से उसका पैर गाय के गोबर पर पड़ जाए और उसी अवस्था में उसको मंदिर तक जाना हो।”, अत्यंत दुःख के साथ सिंह ने कहा। “इसे बदलना होगा और इसके लिए ही यह परियोजना शुरू की गई है” उन्होंने कहा। “ज़ाहिर सी बात है कि शहर एक दिन में नहीं बदल सकता है लेकिन लोग बदल सकते हैं, और हमने यही करना शुरू किया है। शुक्र है कि यह बदलाव शुरू हो गया है और एक बार परियोजना का कार्य पूरा हो जाए उसके बाद लोगों को एक नई काशी देखने को मिलेगी।” उन्होंने विश्वास से कहा।

मंदिर से निकट स्थित संरचनाओं को तोड़ने के लिए ध्यनपूर्वक हाथ से कार्य किया जा रहा है

सामने दिख रहे मलबे के ढेर, कीचड़ के ढेर, भव्य सपनों को सच में बदलने की यह पहल तो बस एक शुरुआत है। लेकिन कुछ नया शुरू करने के लिए इस ऊर्जापूर्ण शुरुआत की आवश्यकता थी। विध्वंस सबसे बड़ी चुनौती थी लेकिन अब यह मामला हाथ में आ चुका है। काशी कॉरिडोर परियोजना में यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य भी था। वहाँ पर अविमुक्त क्षेत्र (मोक्ष की भूमि) के लिए बिलकुल भी जगह नहीं थी लेकिन अपने प्राचीन गौरव को वापस लाने के लिए ज़रूरी है कि वह अपने हाल के अतीत को भुला दे।

“बनारस इतिहास से भी पुराना है, परंपरा से, किंवदंती से भी पुराना है और अगर इन सभी को एक साथ जोड़ भी दिया जाए तो भी काशी इससे दोगुना पुरानी है”, मार्क ट्वेन ने कहा था। इसलिए जिस भूमि पर लोग अपनी अंतिम सांस लेने आते हैं, विध्वंस के देवता की भूमि, समय से भी प्राचीन भूमि को फिरसे जीवित करना अति आवश्यक था। वर्तमान शासन इस बदलाव को लाने में सफल रहा है और इस बिंदु को सिद्ध करता है कि सृष्टि की रचना होने के लिए स्थिति को बदलना होगा, जिसके लिए विनाश आवश्यक है। शम्भो!