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भारत का अपना बग़दादी: ममता के बंगाल में इस मौलाना ने एक छोटा इस्लामिक स्टेट कैसे गढ़ा
Bengali Madrasa

चवालीस साल के मौलाना नासेर शेख़, देखने में जितने अनोखे हैं, बातचीत और व्यवहार में भी उतने ही अनोखे हैं। लगभग 5 फ़ीट दो इंच के नाटे क़द का ये व्यक्ति, पश्चिम बंगाल में, कोलकाता से 400 किलोमीटर उत्तर, बांग्लादेश की सीमा से जुड़े मालदा ज़िले के हरिश्चंद्रपुर के एक छोटे से क़स्बे केबाला में एक अज़ीम शख़्सियत हैं। नासेर स्थानीय मस्जिद के इमाम हैं, और एक मदरसा चलाते हैं, जोकि राज्य सरकार से पंजीकृत नहीं है। वह बंाग्ला और बिहारी का एक अनोखा मिश्रण बोलते हैं, (केबाला, बंगाल-बिहार सीमा से बस थोड़ी ही दूर है।), लेकिन अरबी धाराप्रवाह बोलते हैं।

नासेर की पोशाक, जिसे मुस्लिम उदारवादी, व्यंग्य से, छोटे भाई का पजामा और बड़े भाई का कुर्ता कहते हैं, (छोटे भाई का पजामा क्यूँकि ये टखने से काफ़ी ऊपर तक ही होता है, जबकि बड़े भाई का कुर्ता, घुटनों से नीचे तक होता है), मेंहदी रँगे बाल, अनकटी हुई दाढ़ी, सुरमा भरी आँखें-जो साँप की आँखों की तरह तीव्र गति से चलती रहती हैं, हाथों में तसबीह, और सस्ते इत्र से महकते रहते हैं। उन्हें बड़े सम्मान से ”मौलाना साहब“ कहा जाता है, वह धर्म, विवाह, तलाक़ और अन्य व्यक्तिगत मुद्दों के मामलों पर फ़ैसले सुनाते हैं।

नासेर ख़ुद को ”शुद्ध“ मुस्लिम बताते हैं, यही वजह है कि वो तस्वीरें नहीं खिंचाते। मदरसे के अंदर, तीन कमरों के उनके घर में, जहाँ 9 से 18 साल तक के 72 युवा लड़कों को कुरान और अन्य धर्मग्रंथों को दिल से याद करना सिखाया जाता है, काबा के पत्थर (अल-हजर अल-असवाद) की एकमात्र तस्वीर है। उनके सैमसंग मोबाइल पर उनकी तीन बीवियों, (उनकी चार बीवियाँ थीं, उनमें से एक की दो वर्ष पहले मृत्यु हो गई, और वो एक और विवाह की योजना बना रहे हैं।)

”हदीस के अनुसार इस्लाम में किसी भी तरह की कल्पना वर्जित है, लोगों की तस्वीरें लेना हराम है,” वह बड़े जोश में कहते हैं। इंसानों के बग़ैर भी कु़दरती दृश्यों की तस्वीरें लेना या पंेंटिंग करना भी इस्लाम में वर्जित है। टेलीविज़न ”लोगों को भ्रष्ट करने का शैतान का औज़ार है।“ सिनमा तो उससे भी बड़ी बुराई है। संगीत, यहाँ तक कि सीटी बजाना और गुनगुनाना भी एक संकेत है कि शैतान ने किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश किया है, वह गर्व से घोषणा करते हैं कि उन्होंने अपने सबसे बड़े बच्चे (बेटी सबरा ख़ातून) के कुछ दाँत तोड़ दिये थे, जब उसने एक मशहूर बाॅलीवुड गाना गाया था। ”मैंने उसे बुरी तरह पीटा, और उसे उसका सबक़ मिल गया। मैंने उसके घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी, क्योंकि उसने ये गाना बाहर सीखा था जहाँ किसी चाय की दुकान पर ये गाना बज रहा था।“ नासेर ने बताया, बड़े संतोष से वह कहते हैं, कि केबाला (विशेषकर, एक लगभग पूरी तरह मुस्लिम आबादी वाला शहर) में अब शायद ही कोई गाने सुनता या बजाता है।

केबाला, नासेर के अनुसार, दस साल पहले तक, पापियों, तकफ़िरों (लोग जो ख़ुद को मुस्लिम कहते हैं, लेकिन शरीअत का ढंग से पालन नहीं करते) से भरा हुआ था। ”हर कोई फ़िल्म देखता था, गाने गाता और सुनता था, यहाँ तककि लोग नाचते भी थे। शायद ही कोई महिला बुरख़ा पहनती थी, मर्द और औरतें चाय की दुकान में बैठते थे, और बातें करते थे,“ उनका कहना है,“ उन्होंने बताया। वह कहते हैं, ”केबाला ‘मुशरिकीन्स’ (जो शिर्क करते थे, या मूर्तिपूजा करते थे), जो सूफ़ी पीरों की मज़ार (मज़ार या मकबरा) जाया करते थे। ये इस्लाम में पूरी तरह हराम है और इसकी सज़ा मौत है।’

वह चाय बनाने के लिए अपनी पत्नियों में से किसी एक को आवाज़ देते हैं, बदले में कोई जवाब नहीं आता, न ही उनकी बीवियों या बेटियों में से किसी को ही उस कमरे में आना पड़ता है, दो हरी कुर्सियों और बेड के साथ ये कमरा उनका बेडरूम और सिटिंग रूम दोनों है। केवल उनके दो बेटे आते हैं और अपने पिता को सलाम करते हैं। नासेर बताते हैं कि इस्लाम में न केवल औरतों को अजनबी आदमियों के सामने आने की मनाही है, बल्कि उनकी आवाज़ भी अजनबी मर्दों को नहीं सुनाई देनी चाहिए। इस्लाम में हराम और शिर्क और उनके लिए दी जानी वाली सज़ाओं पर उनके पाँच मिनट के व्याख्यान के बीच, तीन बार किसी बर्तन पर कलछी की आवाज़ आती है। ये नासेर के बेटों में से एक के लिए रसोई में जाने और हमारे लिए पानी के गिलास, चाय, बिस्किट और भुने हुए चने लाने का संकेत है। नासेर अपने पानी और चाय के गिलास तीन हिस्सों में उठाते हैं। इस तरह पानी पीना ‘सुन्नाह’ (मुहम्मद साहब की शिक्षाओं और कहावतों को मौखिक रिकॉर्ड) के अनुसार है।

नासेर के खाने के तरीक़ा भी बहुत अनोखा है: वे भुने हुए चने को प्लेट से तीन उँगलियों- अँगूठे, तर्जनी और मध्यमा- से उठाते हैं, और मुँह में डालते हैं, वो बताते हैं, ”पैग़म्बर ऐसे ही खाया करते थे, सभी को ऐसे ही खाना चाहिए।“ वे चाय को ठंडा करने के लिए उसमंे फूँकते नहीं हैं, जैसाकि सामान्यतः लोग करते हैं। वे कहते हैं, ”इस्लाम में कुछ खाते या पीते वक़्त उसमें फूँकना वर्जित है।“ लेकिन वह यह नहीं समझा पाते कि इस तरह की प्रथाओं की सिफ़ारिश क्यूँ की जाती है ? वह आगे बताते हैं, कि बेहतर होगा कि खाने के बाद अपनी तीन उँगलियों को चाटना चाहिए। ”इसकी वजह ये है कि इस्लाम में खाने के छोटे से हिस्से को भी बर्बाद करना हराम है।“ उन्होंने बताया।

एक सलाफी का निर्माण 

नासेर केबाला के मूल निवासी नहीं हैं। और न उनका मूल नाम ही नासेर है। पूर्वी मालदा के एक छोटे से क़स्बे लसकरहट के नज़दीक उनका जन्म एक ग़रीब बँटाईदार परिवार में हुआ, नाम रखा गया-शिमुल ख़ान। वह पाँच बेटियों और तीन बेटियों में सबसे छोटे थे और ग़रीबी में बड़े हुए। लेकिन स्थानीय मदरसा में अच्छे छात्र थे, वहाँ शिक्षकों की नज़र उन पर पड़ी। जब वह आठ साल के थे, तभी उन्हें गाजोल (मालदा में ही) में एक बड़े मदरसे में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति मिली और दो साल बाद, मालदा शहर में एक और मदरसे में स्थानांतरित कर दिया गया। वह एक उत्कृष्ट छात्र थे, जो शास्त्रों को सीखने में आगे रहते थे और 12 साल की उम्र का होने तक उन्हें एक बड़ी छात्रवृत्ति दी गई, और भोपाल में एक इस्लामिक विद्यालय में प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान, मौलाना हाफ़िज़ मुहम्मद का संरक्षण मिला।

अगले तीन वर्षों तक इस्लामिक धार्मिक ग्रंथों और दर्शन में विस्तृत अध्ययन के बाद, जूनिया हाई मदरसा की परीक्षा बेहतरीन ढंग से पास करने के बाद, उन्हें उच्चतर धार्मिक शिक्षा के लिए देवबंद के प्रसिद्ध दारुल उलूम भेजा गया। वहीं एक वरिष्ठ मौलवी ने उनसे अपना नाम बदलने को कहा। ”शिमुल (रेशम कपास के फूल के लिए बांग्ला शब्द) इस्लामी नाम नहीं था और इसलिए मैंने वरिष्ठ विद्वानों की राय पर नाम बदल लिया और बन गया, नासेर। शिमुल एक हिंदू नाम है, और एक मुसलमान को कभी भी हिंदू या किसी अन्य काफ़िर का नाम नहीं दिया जाना चाहिए। हालाँकि मैं अपने माता पिता को दोष नहीं देता वो अशिक्षित और अंजान थे,“ नासेर कहते हैं।

देवबंद में भी वह एक उज्ज्वल छात्र रहे और जल्द ही मौलाना पीर मुद्दी के प्रभाव में आए, जिन्होंने सऊदी अरब की इस्लामिक यूनिवर्सिटी में प्रशिक्षण लिया था और सलाफ़ी बने थे (। बाॅक्स देखें)। इन मौलाना ने नासेर को संरक्षण में ले लिया और सलाफ़ी धर्मशास्त्र के अतिवादी और शुद्धतावादी सिद्धांतों में इन्हें पारंगत किया। नासेर ने अहल-ए-हदीथ, जोकि उत्तरी भारत में 19वीं सदी के मध्य में आरम्भ हुआ और सऊदी अरब के वहाबी समर्थकों से वित्तीय सहायता प्राप्त करता है। नासेर, देवबंद के बाद कहाँ यात्रा पर गये और क्या किया, ये बताने से इंकार कर देते हैं। लेकिन वह तब्लीगी जमात, एक सुन्नी धर्मांतरण और पुनरुद्धारवादी आंदोलन में भी शामिल हुए। सात साल पहले केबाला पहुँचे नासेर ने स्थानीय मस्जिद के मौलाना के रूप में कार्यभार सम्भाला। फिर उन्होंने मदरसा भी शुरू किया और ज़ोर देकर कहा कि सभी मुसलमान अपने बच्चों को मदरसे भेजें।

और तब से, कर्बला में एक धीमा लेकिन निश्चित परिवर्तन आया है, पुरुषों ने दाढ़ी बढ़ानी शुरू कर दी है, अपने मौलाना की तरह पोशाक पहननी शुरू कर दी है। महिलाओं ने बुरख़ा पहनना शुरू कर दिया है और यहाँ तक कि पाँच वर्ष की उम्र की बच्चियाँ भी हिजाब पहनने लगी हैं। उन्होंने सूफ़ी संत बाबा ग़यासुद्दीन (जैसा कि उन्हें सम्मानपूर्वक कहा जाता था) की मज़ार पर जाना बंद कर दिया है और संगीत के नाम पर सिर्फ़ उनके पास मुअजि़्ज़न की अज़ान ही बची है। कई अन्य बदलाव आये हैं, और क़स्बे के मुस्लिमों ने यहाँ की बहुत कम हिंदू आबादी से बातचीत करना भी बंद कर दिया है।

हालाँकि ये सब नासेर के केबाला पहुँचने के काफ़ी पहले से शुरू हो गया था। ”यहाँ के मुसलमान बहुत मित्रवत् और उदारवादी थे। वे हमारे त्योहारों और पूजा के दौरान हमारे घरों में आते थे और प्रसाद लेते थे। हम-हिंदू और मुस्लिम- मज़ार पर जाते और प्रार्थना करते थे। और फिर कुछ बाहरी लोग आये और मुस्लिमों के यहाँ बैठकें शुरू कीं और उनके घरों में उपदेश देने लगे। अचानक पुरानी मस्जिद के पुनर्निर्माण के लिए बहुत पैसा आया और इसे पूरी तरह पुननिर्मित किया गया। एक नये मौलाना भी सात साल पहले आये और उसके बाद से यहाँ के मुसलमान बहुत कट्टरपंथी बन गये। वे हमारे साथ बामुश्किल ही कभी बात करते हैं और हमें काफ़िर कहने लगे हैं, जो शब्द हमने कभी सुना नहीं था। वे अब हमारे घरों में नहीं आते  हैं, और मौलना ने उनसे कहा है कि वे हमारे देवी-देवताओं की ओर देखें भी नहीं, प्रसाद लेना तो दूर की बात है। दोनों समुदायों के बीच एक खाईं आ चुकी है, और अब केबाला में रहना बहुत असहज हो गया है,“ किराने की दुकान के मालिक केशब चंद्र दास ने बताया। केबाला में अब केवल दो दर्जन हिंदू परिवार ही बचे हैं।

जिन मौलाना कि केशबदास बता कर रहे हैं, वो निश्चित तौर पर नासेर ही हैं। केबाला में उनके आने के दो साल पहले, तब्लीग़ी जमात के प्रचारकों ने यहाँ के स्थानीय निवासियों को इस्लाम की शिक्षा के लिए कई महीनों तक शिविर लगाया था। स्थानीय मुसलमान, जिनमें से ज़्यादातर ग़रीब थे, उन्हें सलाफ़ी इस्लाम की शुरुआत के लिए पैसे का लालच दिया गया। स्थानीय मस्जिद के पुनर्निर्माण के लिए सात लाख रुपये (जोकि इन इलाक़ों के लिए एक बड़ी राशि है) ख़र्च किये गये। क़स्बे के प्रमुख व्यक्ति और मुस्लिम बुज़ुर्ग़, जो कि मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्य थे, उन पर तत्कालीन इमाम की सेवाओं को समाप्त करने और मौलाना नासेर की नियुक्ति करने के लिए प्रबल दबाव बनाया गया।

तब से केबाला और इसकी बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी में कई गहरे क़िस्म के बदलाव आये हैं। रंग, सचमुच, उनकी ज़िंदगी से बाहर ही हो गये हैं, पुरुष, सफ़ेद रंग पहनते हैं तो महिलायें हमेशा काला बुरख़ा पहनती हैं। लिपस्टिक या नेल पाॅलिश किसी भी दुकान पर नहीं मिलते। ज्यादातर घरों की दीवारों पर कोई तस्वीरें या पोस्टर्स नहीं हैं। बहुत कम घरों में टी.वी. हैं, जिनमें हैं वो केवल धार्मिक चैनल, जिनमें पाकिस्तान का क्यू टी.वी. शामिल है, देखते हैं। यहाँ तक कि युवा अपने मोबाइल सेट्स पर भी कम से कम खुले तौर पर तो गाने नहीं सुनते हैं। और अपने बच्चों को नियमित स्कूल भेजने के बजाय ज़्यादातर परिवार अपने बच्चों को नासेर के मदरसे में भेजते हैं। अपने बच्चों को पहले की तरह डाॅक्टर, एंजीनियर या सरकारी अफ़सर बनाने के सपने देखने के बजाय, अब वे चाहते हैं कि उनके लड़के सलाफ़ी मदरसों में पढ़ें और बेटियाँ कर्तव्यवान गृहिणियाँ बनें।

स्थानीय व्यापारी इस कठोर परिवर्तन का एक जीता-जागता उदाहरण हैं। उन्हें मूवीज़ देखने का ज़बर्दस्त शौक़ था और वह शाह रुख़ ख़ान के बहुत बड़े प्रशंसक थे। कभी-कभी शराब भी पीते थे और ग़ैर-हलाल माँस खाने को लेकर भी उन्हें कोई ख़ास समस्या नहीं थी। उनकी बेटियाँ जीन्स पहनती थीं, यहाँ तक कि बड़ी बेटी (अब 26 वर्ष की हैं) को तो कई वर्ष अपनी पसंद के (मुस्लिम) लड़के से विवाह करने की इजाज़त भी मिल गयी थी। वह अपने बेटों (24 और 22 वर्षीय) को पुलिस अफ़सर या डाॅक्टर बनाना चाहते थे। दोनों अब सलाफ़ी स्कूल में पढ़ते हैं, और वह चाहते हैं कि बड़ा वाला बेटा इस्लामिक यूनिवर्सिटी आॅफ़ मदीना में पढ़ाई करे, जहाँ वहाबिज़्म सिखाया जाता है। उनकी पत्नी रुक्साना पहले केवल सारी पहना करती थीं, उनके यहाँ विभिन्न मौक़ों पर समुंदर के किनारे छुट्टियाँ मनाते हुए या बंगाल की पहाड़ियांे पर, अपने परिवार की कई फ्ऱेम की हुई तस्वीरें थीं। उनकी पत्नी अब घर के भीतर ही रहती हैं, और जब कभी घर से बाहर निकलने का मौक़ा मिलता भी है, तो बुरखे़ में लिपटे हुए ही निकल पाती हैं, और अब एक छुट्टी पर जाने का भी सपना नहीं देख सकतीं। उनकी सबसे छोटी बच्ची सुमी (अब 19 वर्षीया) उनकी आँखों का तारा थी और वे उसे अध्यापिका बनाना चाहते थे। उन्होंने पिछले वर्ष उसकी शादी नज़दीक के मुर्शिदाबाद ज़िले के बिरहामपुर क़स्बे के 35 वर्षीय मौलवी से कर दी।

”पहले हम मुशरिकीन की ज़िंदगी जी रहे थे, कभी महसूस ही नहीं किया कि हम जो कुछ कर रहे थे वह इस्लाम में हराम था। हम केवल नाम के मुसलमान थे। मौलाना नासेर के आने के बाद ही हमें यह पता चला कि इस्लाम वास्तव में क्या है, उनका भला हो, उन्होंने हमें बचा लिया। वरना हम सब नरक में जलाये जाते,“ नवाब कहते हैं, अच्छे डीलडौल वाले नवाब ने भी तब्लीग़ी जमात के कुछ कोर्स किये और अब वो ख़ुद भी धर्म उपदेशक बन गये हैं।

“अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुनाह करते रहने के बाद, अब मेरी ज़िंदगी का मक़सद है कि मैं अपने साथी मुस्लिम भाइयों को मालदा और मालदा के बाहर भी, सलाफ़ी इस्लाम का उपदेश दूँ। मेरी ज़िंदगी का मक़सद है कि मैं ज़्यादा से ज़्यादा काफ़िरों को इस्लाम के दायरे में ला सकूँ ताकि उन्हें जहन्नम में जाने से बचाया जा सके। अंततः, इंशाअल्लाह, हिंदुस्तान भी एक मुस्लिम मुल्क बनकर पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ शामिल हो जायेगा और मध्य पूर्व से दक्षिणपूर्व एशिया तक हमारे पास एक इस्लामी बेल्ट होगी। वह दिन दूर नहीं जब काफ़िर इस्लामिक खि़लाफ़त में रहेंगे, लेकिन हदीस के हिसाब से दोयम दर्जे के शहरी बनकर, जिनके हक़ बहुत सीमित होंगे। इसलिए उनके लिए मुसलमान बनना ही बेहतर होगा, क्योंकि यही अल्लाह की मर्ज़ी है,“ बग़ैर पलक झपकाये नवाब ये सब कहते हैं।)

उन्हें यह सब मौलाना नासेर शेख़ ने सिखाया है। नासेर ख़ुद अपने चरमपंथी सलाफ़ी मतो ंमें बहुत खुले हुए हैं। वह गुनहगारों, व्याभिचारियों और काफ़िरों के लिए मौत, पत्थर से मारकर, हाथ पैर काटने और सर काटने जैसी सज़ाओं का खुलकर समर्थन करते हैं। यह सभी मुसलमानों को पवित्र कर्तव्य है, वह कहते हैं, उम्मह (दुनिया भर में फैली मुस्लिम इकाइयाँं) के लिए प्रयास करना, इस्लाम के विस्तार (ज़रूरी हो तो ताक़त के ज़ोर से) और इस्लामी खि़लाफ़त की स्थापना जो दुनिया के सभी कोनों तक फैलेगी। नासेर आईएसआईएस का समर्थन करते हैं और अमेरिका को एक ”शैतानी शक्ति“ कहते हैं, और उन्हें लगता है कि हिंदुस्तानी मुस्लिमों को पाकिस्तानियों के खि़लाफ़ भारतीय सेना में नहीं शामिल होना चाहिए। बांग्लादेशी पाखंडी और मुर्तद हैं जो पाकिस्तान से अलग हो गये, और यही वजह कि वहाँ पर विपत्तियाँ बार-बार आती ही रहती हैं। वे ग़ुस्से से कहते हैं, ”उन्होंने अल्लाह को नाराज़ किया है, और वह हमेशा उन्हें जलायेगा।”

”इस्लाम का स्वर्ण युग, जब मुस्लिमों ने लगभग सारी सभ्य दुनिया पर राज्य किया, निश्चित रूप से वापस आयेगा। हिंदुस्तान इकलौता देश है जो मुस्लिम मुल्कों के बीच खड़ा है, और हिंदुस्तान के मुस्लिम मुल्क बनने में अब ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है,” वह कहते हैं, और एक संतुष्ट मुस्कान के साथ आगे जोड़ते हैं कि पूर्वी भारत एक बड़े पैमाने पर मुस्लिम आबादी वाला हिस्सा पहले ही बन चुका है, जिसके लिए हमें पिछले कुछ दशकों में बढ़ी हुई मुस्लिम आबादी का शुक्रिया कहना होगा। ”भारत का उद्धार एक मुस्लिम राष्ट्र बन जाने में ही है, ऐसा होने पर पाकिस्तान के साथ दुश्मनी समाप्त हो जायेगी ओर उन शानदार फ़ायदों के बारे में सोचें जो इससे होंगे, भारत को अपने सैन्य बजट पर अरबों रुपयें नहीं ख़र्च करने पड़ेंगे, बल्कि सेना भी नहीं चाहिए होगी, क्योंकि इसके इर्द-गिर्द सभी दोस्त मुल्क ही होंगे। और फिर इस्लामिक मुल्क भारत की हिफ़ाज़त अल्लाह करेगा,“ वह पूरी गम्भीरता से कहते हैं।

हज़ारों केबाला

चिंताजनक है कि यह ख़तरनाक बदलाव सिर्फ़ मालदा के केबाला में नहीं हुआ। पश्चिम बंगाल और असम में छोटे-छोटे हज़ारों केबाला हैं, जहाँ सऊदी वहाबियों ने अपने ज़हरीले विचारों का प्रचार-प्रसार किया है। सलाफ़ी मक़तब और मदरसे सऊदी आर्थिक मदद से जगह-जगह उग आये हैं और शहरों, क़स्बों और गाँवों में सलाफ़ी उपदेशक बहुतायत में मौजूद हैं।

इस्लाम के इस ज़हरीले स्वरूप का प्रसार हर किसी के लिए स्पष्ट है: बुरख़ा पहनने वाली महिलाओं की बढ़ती संख्या, छोटे पजामे, बड़े कुर्ते में बिना कटी दाढ़ी वाले पुरुषों की बढ़ती संख्या, बड़ी संख्या में सलाफ़ी मस्जिदों का बनना, जहाँ मौलवी और इमाम नफ़रत उगलते हैं, साथ ही इन जगहों के मुसलमानों में आने वाले बदलाव।

एक बड़ी संख्या में मुसलमानों ने, संगीत सुनना, बजाना, ख़ुद की फ़ोटो खिंचाना, पेंटिंग, नाचना और सामान्य लोगांे की तरह, जीवन का आनंद लेना छोड़ दिया है। अधिक से अधिक मुस्लिम माता-पिता अपने बच्चों को औपचारिक स्कूलों से बाहर खींच रहे हैं, और उन्हें सलाफ़ी मदरसों में दाखि़ला दिला रहे हैं। इन क्षेत्रों में ज़्यादा छोटी बच्चियाँ हिजाब पहनती हैं, और मुसलमानांे और अन्य समुदाय के लोगों के बीच होने वाली बातचीत भी बहुत कम से कम होती गयी है।

और तो और, सलाफ़ी उपदेशक और तब्लीग़ी जमात के प्रचारक बड़ी ख़ामोशी से, वंचित वर्गों तथाकथित निचली जातियों और दलित वर्ग के हिंदुओं को अपने ब्रांड के इस्लाम में धर्मांतरित कर रहे हैं। इस तरह के धर्मांतरण मीडिया में कवर नहीं किये जाते धर्मांतरित लोग भी तुरंत अपने धर्म परिवर्तन को रिकाॅर्ड नहीं करवाते, ताकि जाँच से बचे रहें और बात ज़्यादा न फैले। बड़ी चिंता ये है कि इन क्षेत्रों मंे कट्टरपंथी युवकों की संख्या बढ़ रही है और वे उग्रवादी और आतंकवादी संगठनों में शामिल हो रहे हैं।

भारतीय खु़फ़िया एजेंसियाँ इस ख़तरनाक प्रवृृत्ति पर नज़र रख रही हैं, और इसकी रिपोर्ट भी कर रही हैं। नतीजतन, सलाफ़ी विचाराधारा को फैलाने के सऊदी अरब और अन्य मध्य-पूर्व के देशों से आने वाले फंड की निगरानी की जा रही है और कई सलाफ़ी, अहल-ए-हदीस, और तब्लीग़ी जमात के प्रचारकों पर नज़र रखी जा रही है। धीरे-धीरे, ख़ामोशी से, सलाफ़ी मक़तब और मदरसों की फंडिंग को काटा जा रहा है। लेकिन ख़ुफ़िया एजेंसी के बहुत से लोग मानते हैं कि ये क़दम पर्याप्त नहीं हैं।

नफ़रत फैलाने के लिये सलाफ़ी उपदेशकों की जाँच की जानी चाहिए, उन्हें गिरफ़्तार कर उनके खि़लाफ़ कठोरतम आरोप पत्र तैयार करने चाहिए। साथ ही साथ, उदारवादी मुस्लिमों और उदारवादी मुस्लिम संगठनों को सलाफ़ियों का विरोध करने और उनकी विषाक्त विचारधारा का मुक़ाबला करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। लेकिन क्या ऐसा होगा ?

सलाफ़ीवाद क्या है ?

इस्लाम के अति-रूढ़िवादी और पुरातनपंथी रूप को ही ”सलाफ़“ या “भक्त पूर्वजों“ का नाम दिया गया है। सलाफ़ी जिंदगी जीने के पैग़म्बर मुहम्मद और उनके शुरुआती अनुयायियों के अल-सलफ़ अल-सलीह, या पवित्र पूर्वजों के विश्वासांे के सख़्त रास्तों का अनुकरण करते हैं। उनकी प्रेरणा हदीस (पैग़म्बर के शब्दों, कामों और आदतों का वर्णन) से मिलती है, जिसके अनुसार पैग़म्बर कहते हैं, ”मेरी पीढ़ी के लोग सर्वश्रेष्ठ हैं, फिर वो जो उनके बाद आये, और फिर उनके बाद की अगली पीढ़ी“। इन तीन पीढ़ियों को सामूहिक रूप से सलाफ़ कहा जाता है।

सलाफ़ी इस्लाम के शुरुआती समर्थकों में से एक था, तक़ी अद्-दीन अहमद इब्न तय्यमियाह (1262-1328), वो ग़ैर अरब-मुस्लिमों को अरब मुस्लिमों की अपेक्षा कमतर मानता था। उसने 1303 में एक फ़तवा जारी किया जिससे सभी धार्मिक मुसलमानों के लिए मंगोलों को मारना अनिवार्य कर दिया गया, क्योंकि मंगोल शरीया क़ानून का पालन नहीं कर रहे थे। उसका कहना था कि जिहाद मुसलमानों के लिए काफ़िरों को ख़त्म करने का अनिवार्य कार्य था। अहमद ने 1293 में एक ईसाई धर्मगुरु असफ अल-नसरानी के खि़लाफ़ पैग़म्बर का अपमान करने के लिए अपना पहला आदेश दिया था। इन दो फ़तवों को आज कट्टरपंथी इस्लामवादियों द्वारा ग़ैर-विश्वासियों और अपने दुश्मनों की हत्या के लिए उद्धृत किया जाता है।

अहमद और उनके अनुयायियों ने दमिश्क में नैतिक पुलिसिंग का काम किया। शराब की भट्टी और दुकानों पर छापे मारे, नास्तिकों को यातना देते हुए मार डाला, और सूफ़ी शेख़ों की हत्या की। उन्होंने अलवाइयों (इस्लाम के उदारवादी स्कूल जिसमें समन्वय के तत्व थे), शियाओं, सूफ़ियों और ग़ैर-सूफ़ियों को ख़त्म करने के लिए चलाये जाने वाले सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया। माना जाता है कि उसका कहना था कि जो लोग मुहम्मद साहब के मकबरे की यात्रा करत हैं और उनसे मध्यस्थता की आशा रखते हैं वे बिद: (नवाचार, जिसे इस्लाम में बुरा माना गया है।) करते हैं, और शिर्क (मूर्तिपूजा) जो किसी सूफ़ी या वली से मध्यस्थता चाहते हैं उन्हें काफ़िर कहा गया।

सलाफी मुस्लिम उपस्थिति वाले सभी देशो में शरीयत को लागू करने के सबसे बड़े समर्थक हैं। सलाफ़ी बहुदेववाद और धार्मिक शख़्सियतों को तवस्सुल (प्रार्थना) के सख़्त खि़लाफ़ हैं। वे यह भी मानते हैं कि इस्लाम के बारे में तर्कसंगत बहस (जिसे कलाम या इल्म अल-कलाम कहा जाता है) मना है और हराम है, और धर्मशास्त्र में डायलेक्ट्क्सि या काल्पनिक दर्शनशास्त्र धर्मविरोधी नव आचरण हैं और इनके लिए मृत्युदण्ड भी दिया जा सकता है।

18वीं शताब्दी में इस्लामिक विद्वान मुहम्मद बिन अब्द अल वहाब (1703-1792) ने हाल के दिनांे के सलाफ़ीवाद को बढ़ावा दिया था। वहाब ने मध्य सऊदी अरब के नाजद के दूरदराज़ क्षेत्र में इस्लामिक पुनरुद्धारवादी आंदोलन शुरू किया और सम्प्रदायों की लोकप्रिय पंथ, धार्मिक स्थलों और मकबरे (मज़ार) के लिए यात्रा जैसी प्रथाओं को शुद्ध करने की वकालत की, इन प्रथाओं को उन्होंने मूर्ति पूजा ही माना। वहाब अहमद इब्न तय्यमियाह को अपनी प्रेरणा माना। वहाब ने 1744 में दिरिया (आधुनिक रियाद के निकट एक कृषक बस्ती) के अमीर मुहम्मद-बिन-सऊद को समर्थन देते हुए सलाफ़ी इस्लाम के प्रचार-प्रसार का एक समझौता किया। वहाब की बेटी की सऊद के बेटे अब्दुल अज़ीज़ से विवाह के साथ ही इस समझौते पर मुहर लग गई थी। दोनों परिवारों के वंशज उस दिन से नज़दीकी से जुड़े हुए हैं, वहाब के वंशज, जिन्हें अल-राख़-शेख़ कहा जाता है, हमेशा सऊदी अरब के धार्मिक मामलों के प्रमुख होते हैं। सऊद ने वहाब के समर्थन के साथ अपने पड़ोसी सरदारों के खि़लाफ़ ख़ूनी युद्ध किया और अपनी रियासत का विस्तार किया।

1744 की संधि को राजनीतिक वैधता हासिल करने के लिए धर्म के उपयोग का पहला उदाहरण कहा जा सकता है। कुछ ऐसा ही तरीक़ा पाकिस्तानी सैनिक तानाशाहों ने अपनाया। वहाब की शिक्षायें, सऊदी अरब में सुन्नी इस्लाम के आधिकारिक, राज्य प्रायोजित रूप हैं। जो पूरे विश्व में इस्लाम के इस चरम और सख़्त रूप को प्रचारित करने के लिए अरबो डाॅलर ख़र्च करता है।

वहाब की असहिष्णुता का पहला उदाहरण था- ज़ायद अल खत्ताब (एक सहाब-पैग़म्बर के साथियों में से एक) की मस्जिद को गिराना, और एक महिला को पत्थर मारकर मौत के घाट उतार देना, जिस पर उसने इल्ज़ाम लगाया था कि उसने अपने शहर उयायना में व्याभिचार किया था। सऊद की मृत्यु के बाद, उनका बेटा और वहाब के दामाद, अब्दुल अज़ीज़ बिन मुहम्मब, वहाब के कठोर अनुयायी बन गये और अपने क्षेत्र का विस्तार करने के लिए ‘धर्मपरिवर्तन या मृत्यु’ का तरीक़ा अपनाया और अहमद बिन तय्यमियाह द्वारा प्रस्तावित तकफ़ीर (गै़र सलाफ़ी मुस्लिम को काफ़िर घोषित कर मृत्युदण्ड दिया जाना) लागू कर दी। सन् 1802 में, अब्दुल अज़ीज़ ने पवित्र शहर कर्बला पर हमले में अपनी सेना का नेतृत्व किया और इसे बर्बाद कर दिया, 5000 शियाओं की हत्या की, पैग़म्बर मुहम्मद साहब के पोते हुसैन इब्न अली की कब्र को लूट लिया और शहर की सभी महिलाओं और बच्चों को ग़ुलाम बना लिया गया।

1901 में, सऊद की पाँचवी पीढ़ी के वंशज, अब्दुल अज़ीज़ ने एक क्रूर अभियान शुरू किया और सऊदी अरब के वर्तमान साम्राज्य को आकार देने के लिए पड़ोसी शासकों को पराजित किया। वहाब की सलाफ़ी इस्लामिक शिक्षाओं केे प्रचार-प्रसार के लिए जो अभियान चलाया गया उसमें दो वर्ष के भीतर ही 40,000 लोगों को सार्वजनिक मृत्युदण्ड दिये गये तो वहीं 3,50,000 लोगों के हाथ पैर काट दिये गये।

सऊदी अरब ने 1961 में, सलाफ़ी इस्लाम का प्रचार करने के लिए इस्लामिक यूनिवर्सिटी आॅफ़ मदीना की स्थापना की। यहाँ पूरी दुनिया से विद्यार्थी पढ़ने के लिए आते हैं, वर्तमान बैच में यहाँ भारत के 16 छात्र, पाकिस्तान से 41 और बांग्लादेश से 22 छात्र हैं। 1962 में, मुस्लिम धर्म निरपेक्ष देशों से निपटने के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड, अहल-ए-हदीस और जमात-ए-इस्लामी जैसे उग्रवादी संगठनों को प्रोत्साहित करने के लिए विश्व मुस्लिम लीग की स्थापना की।

2011 और 2013 के बीच, लगभग 2,500 सलाफ़ी विद्वान भारत में उपदेश करने के लिए और सेमिनार आयोजित करने के लिए आये, वे सलाफ़ी वाद के प्रचार के लिए लगभग 1700 करोड़ रुपये लाये । इन सभी प्रचारकों ने सभी मुस्लिमों के लिए क्या करें और क्या न करें वाहली छोटी-छोटी हैण्डबुक बाँटीं। इस सूची में महिलाओं के लिये बुरख़ा पहनने की अनिवार्यता, पुरुषों के लिए दाढ़ी बढ़ाना, महिलाओं और पुरुषों में कोई मेल-मिलाप नहीं, अंतिम संस्कार में कोई विलाप नहीं, ज़ोर से हँसना नहीं, संगीत सुनना, बजाना या टी.वी. देखने पर निषेध।

अल क़ायदा, तालिबान, जैश-ए-मुहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, जमात-उल मुजाहिदीन बांग्लादेश, जैसे आतंकवादी संगठन सलाफ़ी इस्लाम के पीछे हैं।