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भारतीय तिरंगा निर्माण की एकमात्र आधिकारिक इकाई और इससे जुड़ी महिलाएँ
हर्षा भट - 15th August 2019

हुब्बळी में कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ (केकेजीएसएस) की महिलाएँ तिरंगा बनाने की परंपरा को सँवारते आ रही हैं।

अन्नपूर्णा कोटे की आँखों में चमक आ जाती है जब वे कहती हैं, “संभवतः हम कभी इस नगर से बाहर नहीं निकलेंगे लेकिन हमारा तिरंगा विश्व भर में लहरा रहा है।”

हुब्बळी में केकेजीएसएस की सर्व-महिला इकाई, जो भारत की एक मात्र आधिकारिक तिरंगा बनावट इकाई है, की निरीक्षक हैं कोटे। ये वही ग्रामीण महिलाएँ हैं जो मेहनत से इस कोरे वस्त्र को राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप देती हैं।

केकेजीएसएस एक मात्र इकाई है जो भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा स्वीकृत व सुझाए गए तरीकों से तिरंगा बनाती है। यह पूर्ण रूप से हाथ द्वारा बुना जाता है और हर धागा हाथ से काता गया होता है।

किसी गाँव के सरकारी विद्यालय में या विश्व भर में स्थापित भारतीय दूतावासों में लगाया गया तिरंगा, सरकारी गाड़ियों पर लहराता हुआ तिरंगा या किसी बलिदानी के पावन तन पर ओढ़ाया गया तिरंगा- हर तिरंगा यहाँ बनता है।

कारखाने पर काम करती महिलाएँ

उनका कार्य है कि तिरंगे को सावधानी से और बिना ध्यान भटकाए हुए बनाना। तिरंगे में छोटी-सी त्रुटि से रंग की स्थिरता, धागे की मज़बूती या धागा संख्या, सब गंभीर दंडनीय अपराधों की सूची में आते हैं। भारतीय तिरंगा संहिता 2002 के तहत इन त्रुटियों पर जुर्माना या कैद या दोनों का प्रावधान है।

“इसीलिए यह सर्व-महिला दल है क्योंकि बारीकी के लिए जो नज़र और इस कार्य के लिए जो धैर्य और समर्पण आवश्यक है, वह बहुत कम पुरुषों में ही होता है।”, कोटे कहती हैं जो यहाँ 2005 से काम कर रही हैं, जबसे यह इकाई शुरू हुई है।

“कुछ पुरुष भी इससे जुड़े लेकिन तब कई बार हमें पूरी सिलाई फिर से करनी पड़ जाती थी। सामान्य धागे से इस कार्य के लिए प्रयुक्त धागा मोटा होता है इसलिए एक-एक करके धागा को निकालना पड़ता है, इसे खींचकर निकाला नहीं जा सकता।”, हुब्बळी में केकेजीएसएस पर हमारे दौरे के दौरान कोटे ने बताया।

इस इकाई पर महिलाएँ प्रतिदिन कटाई, स्क्रीन प्रिंटिंग, परिपक्वीकरण (क्योरिंग), सिलाई और ध्वज को छड़ी, डोरी, आदि से जोड़ने के कार्य में सात घंटे व्यतीत करती हैं।

त्रुटि का कोई स्थान नहीं

एक तिरंगे का जन्म- निर्माण के विभिन्न चरण

बागलकोट स्थित इकाई में बीआईएस मानकों के आधार पर तिरंगे के लिए वस्त्र बनाया जाता है। यह सूती कपड़ा हाथ से काता जाता है और इससे दो प्रकार के वस्त्र बनते हैं- एक ध्वजा पट्टिकाओं के लिए और दूसरा कपड़ा धव्ज के बगल में लगाने के लिए। ये दोनों कपड़े हुब्बळी पहुँचते हैं और एक ध्वज बनने के लिए निम्न चरणों से गुज़रते हैं।

विरंजन (ब्लीचिंग) और रंगना- ध्वज की दो पट्टियों के लिए इसे रंगा जाता है और सफेद पट्टी के लिए ब्लीच किया जाता है। ये एकमात्र प्रक्रिया है जिसमें भारी मशीनों की आवश्यकता होती है।

चक्र की छपाई- हर चक्र को व्यक्तिगत रूप से स्क्रीन प्रिंट किया जाता है। विशेष आकारों के चक्रों को उनके अनुकूल आकार की श्वेत पट्टिका पर छापा जाता है। सबसे लोकप्रिय 2X3 आकार वाले ध्वज के लिए दो महिलाओं की आवश्यकता होती है, वहीं सबसे बड़े आकार के ध्वज पर चक्र छापने के लिए आठ महिलाओं की आवश्यकता होती है।

ये महिलाएँ मिलकर एहतियात से सफेद पट्टिका को स्क्रीन के बीच में रखती हैं और ध्यान देती हैं कि पट्टिका के अन्य भागों में स्याही न लगे। फिर वे स्याही प्रसारक को इसके ऊपर घुमाते हैं और पट्टिका को पलटकर पुनः घुमाते हैं। फिर वे फ्रेम खोलकर पट्टिका को बाहर निकाल लेते हैं और एक डोरी पर लटकाकर सूखने के लिए छोड़ देते हैं।

चक्र को रंगने का कार्य

14X21 जितने बड़े आकार के ध्वज की चक्र छपाई में लगने वाली मेहनत के लिए वे बताती हैं, “ये कार्य आसान नहीं है क्योंकि इसे उठाने और पलटने में सिर्फ ताकत की ज़रूरत नहीं है बल्कि चक्र को अच्छे से प्रिंट करने के लिए बहुत ध्यान भी रखना पड़ता है और साथ ही वस्त्र के अन्य भागों पर स्याही न लगे उसका भी।”

चक्र की छपाई

परिपक्वीकरण- चक्र प्रिंट करके पैनलों को ढेर लगाया जाता है और क्योरिंग मशीन से गुज़ारा जाता है।

चक्र की छपाई के बाद सूखती श्वेत पट्टिकाएँ

सिलाई- बीआईएस मानकों के अनुसार एक विशेष और पैनल से मिलने वाले रंग के धागे से विभिन्न पैनलों को आपस में जोड़कर सिला जाता है और उसके बाद इसके बगल के आवरण को सिला जाता है जो उन्हें जोड़कर रखता है।

तिरंगे की तीनों पट्टिकाएँ आपस में जोड़ी जा रही हैं

टॉगलिंग- जो डोरी तिरंगे की आस्तीन से गुज़रती है उसे साटा लगाकर जोड़ा जाता है और केसरिया पट्टिका के ऊपरी छोर पर रखकर छड़ी को इसमें लगाया जाता है। छड़ी लगाने के बाद आस्तीन को पुनः सिला जाता है ताकि लगाई गई डोरी हिले-डुले नहीं। अतिरिक्त धागों को काट दिया जाता है।

तिरंगे की आस्तीन पर डोरी लगाती हुई महिलाएँ

इस्त्री और घड़ी करना- दो महिलाएँ हर झंडे को चुनकर भाप से इस्त्री करती हैं और घड़ी करती जाती हैं। तह करने की भी विशेष पद्धति है जिसमें सुनिश्चित किया जाता है कि हरी पट्टिका सबसे ऊपर रहे ताकि श्वेत रंग पर दाग न लगे और ऊपर रहने के कारण केसरिया रंग उड़े ना।

तिरंगे की इस्त्री

पैकिंग- तह किए हुए झंडों का ढेर लगाया जाता है और इन्हें रस्सी से बांधकर गोदाम ले जाया जाता है जहाँ से वे क्रमानुसार दूसरे स्थानों पर भेजे जाते हैं।

उत्पादन के एक चक्र में लगभग 15 जिनों का समय लगता है। ये आसान कार्य नहीं हैं, हालाँकि कुछ महिलाएँ यहाँ तबसे हैं जबसे ध्वज निर्माण का कार्य शुरू हुआ है। निरीक्षक कोटे सुनिश्चित करती हैं कि बनाया हुआ तिरंगा त्रुटिहीन हो।

केकेजीएसएस के सचिव शिवानंद मठपति इस महिला दल का नेतृत्व करते हैं। उन्होंने अपने जीवन के तीन दशक ध्वज निर्माण के कार्यों में व्यतीत किए हैं। बागलकोट में एक कताई प्रशिक्षक के रूप में कार्य शुरू करके उन्होंने 30 वर्षों तक इस प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में काम किया है।

इन सबके पीछे रहे व्यक्ति को याद करते हुए वेंकटेश मागड़ी कहते हैं, “वही हैं जिन्होंने यहाँ इसकी कल्पना की थी। उन्होंने अपनी भूमि देकर खादी केंद्र स्थापित किया और मृत्यु तक वे खादी के लिए ही काम करते रहेंगे।”

इकाई कार्यालय के प्रवेश पर मागड़ी और उनकी पत्नी का बस्ट दर्शकों का स्वागत करता है। गोदाम में झंडों, खादी वस्त्र और कपड़ों को रखा जाता है जो देश भर के खादी भवनों में वितरित किए जाते हैं। “ये खादी का सबसे बड़ा गोदाम है।”, वे बताते हैं।

विभिन्न आकार के तिरंगे

आकार और मूल्य

3 फीट बटा 2 फीट के तिरंगे की सर्लाधिक बिक्री होती है और 21 फीट बटा 14 फीट का सबसे बड़ा तिरंगा सबसे कम बिकता है। सबसे बड़े आकार के बहुत कम झंडे बनाए जाते हैं और वे देश में सिर्फ तीन स्थानों पर लहराते हैं- गडग में नरगुंडा किला, ग्वालियर दुर्ग और रायगढ़ दुर्ग।

इस इकाई से वार्षिक रूप से 2 करोड़ रुपये के झंडों की बिक्री होती है। 2017-18 में 2,17,07,235 रुपये की बिक्री हुई थी। पिछले वित्तीय वर्ष में विभिन्न आकारों के 26,334 झंडे बिके। वहीं सबसे बड़े आकार के 30-50 ध्वज औसत रूप से प्रतिवर्ष बिकते हैं।

3X2 आकार के तिरंगे का मूल्य 715 रुपये है और कुल बिक्री का 60 प्रतिशत इसी से आता है। सबसे बड़े ध्वज का मूल्य 17,800 रुपये है। गाड़ियों के आगे लगाए जाने वाले झंडे कम से कम 170 रुपये में मिलते हैं।

तिरंगा सिलने के लिए प्रयुक्त विशेष धागे

प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक कार्य करने वाली महिलाओं की गोद में यह तिरंगा शांति से पड़ा रहता है। महिलाओं को प्रति तिरंगे के हिसाब से मजदूरी मिलती है। तिरंगे की आस्तीन में डोरी या छड़ी लगाने के लिए 12 रुपये, सिलाई का मूल्य तिरंगे के आकार पर निर्भर करता है, सबसे छोटे तिरंगे के लिए 9 रुपये और सबसे बड़े के लिए 300 रुपये मिलते हैं।

इस इकाई पर तिरंगे की बनावट में लगा हर व्यक्ति अपने चेहरे पर मुस्कान लिए होता है। और इस मुस्कान का राज़ निस्संदेह ही आत्म-गौरव है।

हर्षा स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @bhatinmaai द्वारा ट्वीट करती हैं।