पत्रिका
भारत और तकनीकि मंचों का अहितकारी पक्ष

आशुचित्र- सत्ताधारियों और उभरते मंचों के बीच विवाद के समय में ये छः प्रश्न हैं जिनका उत्तर भारतीय राज्य, अर्थव्यवस्था और समाज को देना होगा। 

मैसिडोनिया में वेल्स कोई ऐसी जगह नहीं है जो यूरोप के अधिकतर लोगों की चेतना में हो फिर अमरीकी और भारतीय लोगों की बात छोड़ दीजिए। इसके बावजूद वेल्स ताकतवर असत्य खबरों का प्रमुख केंद्र रहा जिसने 2016 में अमरीका में हुए चुनावों में अहम भूमिका निभाई। बड़ी संख्या में गुमनाम लोगों को संगठित करने के लिए, एल्गोरिदम द्वारा झूठी खबरों को तोड़-मरोड़कर और उनका विश्लेषण कर पोस्ट करने के लिए तथा इन्हें लक्षित दलों तक पहुँचाने हेतु तकनीकी प्लेटफार्म उपयोग किए गए।

कैम्ब्रिज ऐनालिटिका के कांड के बाद यह स्पष्ट है कि फ़ेसबुक जैसे तकनीकी प्लेटफॉर्म गुप्त तरीके से लोगों पर प्रभाव डालने के लिए योजनाओं तथा चुनावों के लिए उपयोग किए जा सकते हैं। इन्हें श्रेष्ठ, जोड़-तोड़ वाले तथा गैर-कानूनी माध्यमों से उपयोग किया जाता है। इसने विश्व की काल्पनिकता को जकड़ लिया है तथा दुनियाभर की ज़िंदगी तथा आजीविका पर वैश्विक स्तर पर प्रमुख प्रभाव तकनीकी प्लेटफॉर्म डाल रहे हैं जैसे- अमेज़न, फ़ेसबुक, अलीबाबा, नेटफ्लिक्स, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एपल तथा अन्य।

यूरोपियन यूनियन ने सामान्य डाटा संरक्षण नियम लागू करने का कदम उठा लिया है। साथ ही स्वीकारा है कि किसी भी व्यक्ति के लिए तकनीक तथा समाज की प्रमुख भूमिका समान है। डेनमार्क ने विदेश मंत्रालय में विश्व के पहले तकनीकी दूत को शामिल किया है जो सिलिकन वेली में आधारित हैं तथा इनका अधिकार कोपेनहेगन, बीजिंग तथा सिलिकन वेली क्षेत्रों के लिए है।

बिग डाटा, एल्गोरिदम, क्लाउड तथा मोबाइल फोन पर आधारित तकनीकी प्लेटफॉर्म हानिकारक हैं। ये इस परिस्थिति के प्रमुख किरदारों के निर्माण में सहायक होता है। ये किरदार- आपूर्तिकर्ता, विक्रेता, उपभोक्ता, दलाल और देनदार होते हैं जिन्हें इस प्लेटफॉर्म के मुनाफे के लिए प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया को अधिक धनराशि के माध्यम से नियंत्रण में रखा जाता है तथा इससे प्रारंभिक दौर में लाभकारी परिणाम प्राप्त होता है।

ये प्लेटफॉर्म इतने बड़े हो जाते हैं कि इनके असफल होने के आसार न्यूनतम होते हैं तथा विशाल प्लेटफॉर्म और अधिक विशाल होते जाते हैं। अधिक धन राशि तथा नवीनतम तकनीक की मदद से किरदारों के व्यवहार पर नियंत्रण, उत्पाद के ऑफर पर नियंत्रण, उसकी कीमत, डिलिवरी, उपभोक्ता की पसंद और ऐसे ही नाटकीय ढंग से इन उद्योगों तथा इन पर आश्रित लोगों के लिए हानिकारक होते हैं।

वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली (जीपीएस) से लेकर एंड्रॉइड, ऑपरेटिंग सिस्टम तथा फांग्मा तक कई तकनीकी प्लेटफॉर्म हैं।

भारत जैसे देश में जहाँ समाज का बड़ा हिस्सा अशिक्षित है लेकिन बेहतरीन तरीके से जुड़ा हुआ है, यहाँ पर तकनीकी प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रभाव तथा अवांछनीय परिणाम हानिकारक हो सकते हैं। अमित्र विदेशी ताकतें, ताकतवर लॉबी तथा विशेष रुचिकर भारत की राज्यव्यवस्था पर घातक प्रभाव डाल सकते हैं। हमने देखा है कि वॉट्सऐप पर भेजे गए झूठे संदेश तथा उकसाती हुई कहानियाँ जिनसे खतरनाक तथा हिंसक घटनाएँ हुई। वहीं इस वर्ष जुलाई में सरकार को भीड़ द्वारा हत्याओं की घटनाओं के बीच वॉट्सऐप को आदेश देना पड़ा था कि वह जल्द ही गैर-ज़िम्मेदाराना तथा उग्र संदेशों के लिए सख्त कदम उठाए।

कुछ समय पहले फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्त्रां एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफएचआरएआई) और ओयो होटल्स, मेकमाइट्रीप तथा गो आईबीबो (जिनमें बाद के दो का विलय हो गया) में हुआ फसाद महत्त्वपूर्ण है। एफएचआरएआई ने कंपनियों पर अनुबंध के उल्लंघन, गैर-कानूनी तथा लाइसेंस के बगैर आवास उपलब्ध कराने तथा अनुचित कीमतों का आरोप लगाया। यह स्पष्ट है कि पाँच साल पुरानी ओयो तकनीक ने भारत के होटल उद्योग को बहुत अधिक बदल दिया है- कीमत संबंधी, विशाल तथा निरंतर बढ़ती कमरों की सूची, इस सूची की कुशल खोज, वर्तमान में जुड़े लोगों के बीच संबंध का नियंत्रण करने वाली प्रक्रियाएँ, अच्छे स्तर के अनुभवों का वादा तथा होटलों के मालिकों को ओयो नेटवर्क से जुड़ने के एक महीने में ही 50 प्रतिशत अधिक मुनाफा दिलवाने जैसी इसकी विशेषताएँ हैं।

होटल मालिकों तथा प्रतिनिधियों से अब ताकत ओयो के हाथ में चली गई है। 1.5 बिलियन डॉलर की उद्यम पूंजी तथा पाँच बिलियन डॉलर के मूल्य (ताज होटल की मालिक इंडिया होटल्स से दोगुना) की है तथा शत प्रतिशत दर से प्रतिवर्ष बढ़ रही है। ओयो के पास कुल 2,70,000 से अधिक कक्ष अपनी सूची में हैं तथा 8,500 कर्मचारियों में से 700 सॉफ्टवेयर इंजीनियर इसमें कार्यरत हैं। तकनीक पर निर्भर निर्णय की प्रक्रिया ने ओयो को अत्यधिक गतिशीलता, विश्वसनीयता  तथा पूर्वानुमान की ताकत प्रदान की है।

अथवा आठ वर्ष पुराने ओला का किस्सा देखना होगा। इसके नेटवर्क के अंतर्गत 169 शहरों में कुल 1 मिलियन से अधिक वाहन हैं तथा हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में भी इसने सेवाएँ आरंभ कर दी हैं। इनमें से ओला द्वारा एक भी वाहन खरीदा नहीं गया है। 6,000 कर्मचारियों के साथ ओला की तीन बिलियन डॉलर की उद्यम संपत्ति है तथा इसका मूल्य चार बिलियन डॉलर है। ओला ने परिवहन के साथ फूड डिलिवरी भी आरंभ कर दी है। इसके परिवहन व्यवसाय में कैब, ऑटो, ई-वाहन और साइकिल शामिल हैं। आवश्यकता के अनुसार परिवहन उपलब्ध कराने में ओला भारतीय बाज़ार में स्वामित्व बना चुका है। जिन लोगों पर ओला की वृद्धि से असर हुआ उन्होंने आंदोलन, कोर्ट केस, तथा मीडिया तक अपनी आवाज़ पहुँचाई। इनमें टैक्सी चालक, उद्योग नियंत्रणकर्ता तथा समाज के कुछ लोग शामिल हैं।

आईसीआईसीआई, एचडीएफसी, सिटी, स्टैंडर्ड चार्टर्ड तथा अन्य निजी बैंकों ने साथ आकर वित्तीय तकनीकी (फिनटेक) कंपनियों को क्रेडिट मूल्यांकन तथा प्रलोभन देने से रोका था। फिनटेक कंपनियाँ ऐसे तकनीकी प्लेटफॉर्म हैं जो कि अन्य बैंकों से विपरीत भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के नियमन में नहीं आते। फिनटेक कंपनियों की वृद्धि से प्रभावित संस्थानों ने डाटा सुरक्षा तथा निजता को लेकर चिंता जताई थी। पेटीएम तथा फोनपे फिनटेक प्लेटफॉर्म कंपनियाँ हैं जो कि भुगतान उद्योग पर प्रभाव डाल रही हैं।

नौकरी एक तकनीकी प्लेटफॉर्म है जो नियोक्ताओं, काम की तलाश वाले लोगों तथा मानव संसाधन विभागों पर प्रभाव डाल रही है। स्विगी तथा ज़ोमेटो रेस्त्रां उद्योग का पुनर्गठन कर रहे हैं- रेस्त्रां का चयन करना तथा खोजना, खाने के विकल्प, ग्राहकों के तरीके, कीमत तथा डिलिवरी। उसी प्रकार कई अन्य उभरते हुए तकनीकी प्लेटफॉर्म हैं जो एंड्रॉइड, गूगल तथा एडब्ल्यूएस जैसे शीर्ष प्लेटफॉर्म पर बनाए गए हैं।

क्या उद्योग पर निर्भर लोगों के डर निराधार हैं? किसी भी उद्योग में ऐसे बदलाव जो निर्भर लोगों के प्रारूप को बिगाड़ते हैं तो इनका परिणाम विपरीत ही होता है। लेकिन भारत जैसे देश में जहाँ सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियाँ विकसित देशों से बहुत दूर हैं, संस्थागत व्यवस्थाएँ ढीली हैं, नियमन रूपरेखा विकसित हो रही हैं, हमें पदग्राही लोगों से निम्न प्रश्न पूछने होंगे-

  1. क्या उद्योग पर आश्रित लोगों के समान कानून ही तकनीकी प्लेटफॉर्म के लिए हैं? आश्रित लोगों को ग्राहकों, कर्मचारियों, समाज तथा बाज़ार की सुरक्षा के अनुरूप नियम बनाने होते हैं तो फिर तकनीकी प्लेटफॉर्म को क्यों नहीं? डाटा अथवा सेवाओं का दुरुपयोग, तीसरे पक्ष द्वारा दी गई जानकारी का गलत प्रस्तुतिकरण जैसे मुद्दों में उनकी क्या जवाबदारी है?
  2. तकनीकी प्लेटफॉर्म के स्वभाव में होता है कि विशाल को विशाल मिलता है। सीमांत लागत शून्य के करीब होती है। वहीं आर्थिक ताकत तथा तकनीक की बदौलत एकाधिकार, द्वि-अधिकार तथा अल्पाधिकार व्यवस्थाएँ उभरती हैं। फ़ेसबुक, एपल, अमेज़न, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट वैश्विक उदाहरण हैं। इस पर कोई कैसे सुनिश्चित करता है कि इस ताकत का दुरुपयोग नहीं होगा? उदाहरण के तौर पर अधिक प्रलोभन, कमीशन तथा कम कीमतें देकर ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित किया जाता है और एकाधिकार जमने के बाद उन कीमतों को धीरे-धीरे बढ़ा दिया जाता है। इससे कैसे निपटना चाहिए?
  3. अत्यधिक आर्थिक संपत्ति तथा अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग कर प्रलोभन तथा किसी क्षेत्र में व्याप्त किसी संस्थान के साथ भागीदारी कर प्रतियोगिता को खत्म करने के प्रयास किए जा सकते हैं। इसमें नियामक पारदर्शिता और निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित करते हैं? एक मशहूर किस्सा है कि 1990 के दशक में इंटरनेट एक्सप्लोरर को विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम में शामिल कर माइक्रोसॉफ्ट ने मशहूर नेटस्केप ब्राउसर को बाज़ार से बाहर करने के प्रयास किए थे। ऐसा ही किस्सा ट्विटर का भी है जिसने अपनी स्ट्रीमिंग सेवा पेरिस्कोप के प्रचार के लिए मीरकाट को बाज़ार से बाहर किया था तथा 2017 में गूगल द्वारा प्रोडक्ट सर्चेज़ को अपशब्द कने पर उसे 2.7 बिलियन डॉलर का ख़ामियाजा भुगतना पड़ा था। एकाधिकार वाली कंपनियों के ऐसे कारनामों की सूची बहुत लंबी है।
  4. इसमें सम्मिलित लोगों तथा तकनीकी प्लेटफॉर्म के संबंध अफ़सोसजनक हैं। उदाहरण के तौर पर एक टैक्सी चालक ने कॉन्ट्रैक्ट किया और वह अपनी समय सारणी के अनुसार कार्य करेगा तथा उसके ऊपर निर्भर करता है कि वह कुल कितने घंटे कार्य करेगा। वहीं एकाधिकार वाली व्यवस्था में उसके कार्य करने के दिन, कार्य करने के घंटे, ट्रीप की संख्या तथा सहवर्ती हतोत्साहन तथा लाभ सभी चीजें तकनीकी प्लेटफॉर्म द्वारा निर्धारित की जाती हैं। ऐसे में कानून द्वारा पूर्ण कालिक व्यवस्थित कार्य के आदेशों का क्या? भारत जैसे देश में क्या निहितार्थ हैं?
  5. तकनीकी प्लेटफॉर्म के लिए अधिक धन की आवश्यकता का अर्थ है कि भारतीय लोग अपना व्यवसाय बनाने के लिए विदेशी पैसे मुख्यत: अमेरिकी, चीनी, जापानी पर आश्रित हैं। भारत में नियमन के लागू होने में ढीलेपन तथा इसमें खामियों की वजह से कई भारतीय व्यवसायी सिंगापुर में जा रहे हैं। भारत को इस पर किस प्रकार सोचना चाहिए? आने वाले वर्षों में अत्यधिक जनता ऑनलाइन आएगी और अत्यधिक डाटा उपयोग करेगी ऐसे में डाटा के उपनिवेशवाद के खतरे होंगे। यह कैसे कहा जा सकता है कि डाटा की सुरक्षा तथा निजता भारतीय कानून द्वारा सुनिश्चित की जा रही है? यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि भारतीय कंपनियाँ भारत में ही रहकर भारत की संपत्ति को बढ़ाएँ और उनके पास भारत में आधारित आईपी हो? ऐसी विशाल तथा वैश्विक स्तर की कंपनियों के सामने तुच्छ भारतीय कंपनियों को इस नए दौर में संचालित रहने के लिए कैसे उत्साहित किया जाए?
  6. भारत ने तकनीकी प्लेटफॉर्म को सार्वजनिक संपत्ति की तरह उपयोग किया है। भारत द्वारा सामाजिक बदलाव हेतु विकसित किए गए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, आसान भुगतान, क्रेडिट का लोकतंत्रीकरण, बैंक खाते, स्वास्थ्य, ई-केवायसी/ ई-हस्ताक्षर, अभिलेखों को इलेक्ट्रानिक माध्यम से सहेजना, यात्रा तथा न्यायशास्त्र हैं। आधार, वस्तु एवं सेवा कर पहचान क्रमांक, जन धन योजना, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस, बीबीपी, डिजिलॉकर इत्यादि सार्वजनिक संपत्ति हैं। चीन (राज्य द्वारा संचालित तथा खरीदा हुआ) और अमेरिका (निजी कंपनी के पीछे सरकार का सहयोग) से भारत का प्रारूप भिन्न है। 2018 में रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, “मास्टरकार्ड ने अमेरिकी सरकार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रवाद का प्रयोग कर घरेलू भुगतान नेटवर्क रुपे का प्रचार कर रहे हैं और सरकार की संरक्षण योजनाएँ विदेशी भुगतान कंपनियों को हानि पहुँचा रही हैं।”

विदेशी सरकारों और कंपनियों के दबाव में भारत अपने संप्रभु हितों को रक्षा कैसे करेगा? भारत इस विचार को अपने अंदर अधिक गहराइयों तक तथा विश्व के समक्ष कैसे प्रस्तुत करेगा?

तकनीकी प्लेटफॉर्म का उभरना निश्चित है तथा इसका विरोध करने की बजाय हमें ऐसी योजनाएँ बनानी होंगी जिससे ये आंतरिक और विदेशी पहलों के लिए लाभ तथा सुरक्षा के लिए उपयोग किए जा सकें। अत: यह हमारे योजना निर्माताओं, नियामकों, शिक्षित लोगों, विचारक समूहों, कंपनियों, मीडिया तथा जागरूक नागरिकों को इस उद्देश्य के लिए आगे आना होगा।

संजय आनंदराम उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कई उद्योगों व सरकारी एवं निजी संस्थाओं से जुड़े हुए हैं।