पत्रिका
एक ‘अत्याधुनिक मंदिर’ के अनुभव की कल्पना कीजिए
एक 'अत्याधुनिक मंदिर' के अनुभव की कल्पना कीजिए

प्रसंग
  • चूंकि तकनीकी नवीनता से हिंदू धर्म की सामंजस्य स्थापित करने की सहज क्षमता प्राप्त होती है, अतः यह समय स्मार्ट मंदिरों के बारे में विचार करने का है

महान वास्तुकार डैनियल बर्नहम ने कहा है, “कोई छोटी योजनाएं न बनाएं; उनमें पुरुषों के खून को खौला देने वाला कोई जादू नहीं होता है और शायद वे स्वयं इसका एहसास नहीं करेंगे। बड़ी योजनाएं बनाएं; उम्मीद के साथ ऊँचा लक्ष्य रखिए और कार्य करिए, यह याद रखते हुए कि एक बार जब एक शानदार, तार्किक रेखाचित्र दर्ज हो जाता है तो वह कभी मरता नहीं, बल्कि हमारी मृत्यु के लंबे समय के बाद दृढ़ता से हमेशा बढ़ते आग्रह के साथ खुद को जोर देते हुए हम एक जीवित वस्तु बन जाते हैं।”

सोमनाथ या उलुवातु अथवा पुरी जगन्नाथ की यात्रा आत्मा को प्रफुल्लित कर सकती है। हालांकि हाल ही में भव्य नए मंदिरों का निर्माण किया गया है, जैसे कि नई दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर, हमने अभी तक उन्नत तकनीकों द्वारा पेश किए गये उपकरणों का प्रयोग करके नये तरीके से मंदिरों का निर्माण नहीं किया है। बर्नहम के प्रेरणादायक शब्द मंदिरों के पुनर्निर्माण और नए निर्माण में हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं।

जब यह लेखक वर्ष 2000 के आरंभ में अमेरिका में स्नातक छात्र थे, तो इंटरनेट पर माउस के एक क्लिक के माध्यम से तिरुपति बालाजी की आरती दिखाने का विचार बहुत प्रसिद्ध हुआ था। शोधपत्र (थीसिस) के बचाव या अनुदान प्रस्ताव जमा करने या गृह परीक्षा देने से पहले कई स्नातक छात्र एक बटन पर क्लिक करते और कंप्यूटर को साष्टांग नमस्कार करते और अपनी रोजमर्रा की जीवन यात्रा पर निकल पड़ते। किसी के भी माथे पर बल नहीं पड़ा। हाल ही में, आरती करते हुए एक रोबोट के हाथ का एक वीडियो वायरल हुआ था। हालांकि यह लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाया, लेकिन यह अप्राकृतिक रूप में नहीं देखा गया। यहां तक कि छोटे मंदिरों में आज भी एक काम चलाऊ उपाय होता है, जो एक बटन दबाने पर घंटी बजाने, शंखनाद का घोष करने, ढोल बजाने और झांझ, मंजीरा आदि सब एक साथ बजाने के लिए एक ट्रांसमिशन तंत्र को सक्रिय कर देता है।

आधुनिकता के लिए सनातन धर्म को एक असाधारण अनुकूलनशीलता के साथ व्यवस्थित किया गया है जो तकनीकि में प्रगति के साथ अच्छी तरह से संयुक्त हो जाती है। यह कोई प्रतिरोध प्रदान नहीं करता है और इसे अपने समूह में शामिल कर लेता है। आखिरकार, जब वास्तविक “मांग” व्यक्तिगत स्तर पर होती है, तो प्रक्रिया में सहायता करने वाले परिशिष्टों से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हम एक पल के लिए रुककर सोचते हैं, तो यह आश्चर्यजनक लगता है कि युगों-पुराना धर्म रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धि और  आदान-प्रदान वाली मानवता के नए युग की ओर बढ़ने के लिए तैयार है।

परंपरा को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए वर्तमान पीढ़ी के पास तकनीकि के अनुकूलन को आगे बढ़ाने का अवसर है। विचार, तकनीकि का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए न करके इसे परम सत्य या ब्राह्मण की तलाश में यात्रा का हिस्सा बनाने का है।

मंदिर व्यक्तिगत पूजा के स्थान रहे हैं, लेकिन अधिक महत्वपूर्ण रूप से साझा धार्मिकता के साथ। वे (मंदिर) समुदाय की भावना पैदा करते हैं और उन स्थानों के रूप में कार्य करते हैं जहाँ सामूहिक रूप से “धर्म की उत्पत्ति होती है”। पवित्रता और ज्ञान की सामूहिक भावना को आगे बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीकि से सुसज्जित अगली पीढ़ी के मंदिर के बारे में सोचना संभव है। इस पृष्ठभूमि के साथ मुझे धार्मिक विद्वानों, तकनीशियनों और परोपकारी लोगों के बीच चर्चा शुरू करने की उम्मीद के साथ एक स्मार्ट मंदिर के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने दें। मैं इसे “नया सरस्वती मंदिर” कहूंगा। इस मंदिर का नाम और निर्माण आध्यात्मिक खोज में जेन जेड की सहायता के लिए होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सभी के लिए होगा। सन्निधियों का क्रम प्राय पहले सरस्वती, फिर लक्ष्मी और फिर दुर्गा हो सकता है, जैसा कि किसी नए उधमी की ज्ञान से लेकर धन, और फिर सत्ता तक की यात्रा हो सकती है।

एक अत्याधुनिक विमान की कल्पना करें जो हमारी प्राचीन वास्तुकला शैली और काल्पनिक विज्ञान वाली फिल्मों में देखे गए “गुंबददार शहरों” का एक मिश्रण होगा। मंदिर में सभी उन्नत आईओटी (चीजों का इंटरनेट) डिवाइस होंगी। यह पूरी तरह से स्वचालित हो सकती हैं और यदि देवता के साथ आत्मसात होना है तो पुजारी को भी दूर कर सकते हैं।

दर्शन करने के लिए एक ऐप के माध्यम से बुकिंग की जा सकती है और मंदिर में प्रवेश करने के लिए एक क्यूआर कोड स्कैन किया जा सकता है। एक सेंसर पानी के नल को चालू कर सकता है क्योंकि भक्त घूमने वाले दरवाजे से होकर जाते हैं। संन्निधि में प्रवेश करने के बाद एक बटन दबाने पर, भक्त के ज्योतिषीय चार्ट के अनुसार व्यवस्थित एक स्वचालित माध्यम से भक्त (अभिषेक, अलंकार, पुषप भेट करना, आरती करना, प्रसाद भेंट करना आदि) पूरी पूजा कर सकते हैं।

भक्त अपने चढ़ावे का योगदान डिजिटल रूप से दे सकते हैं। शुभ अवसरों के लिए प्रार्थनाओं और विशेष पूजाओं का कार्यक्रम पहले से निर्धारित किया जा सकता है। मंदिर की संपूर्ण यात्रा से संबंधित डेटा प्राप्त किया जा सकता है और मंदिर में एवं मंदिर के बाहर की सेवाओं को प्स्तुत करने के लिए उसका विश्लेषण (बड़ा डेटा) किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक विशेष भक्त के लिए, ललित सहस्रनामा को बजाया जा सकता है जब वह देवी के चारों ओर प्रदक्षना कर रहा हो। व्यक्तिगत स्मृति चिन्ह (3 डी प्रिंटिंग के माध्यम से) या प्रसाद को भक्तों को महत्वपूर्ण तिथियों पर भेजा जा सकता है।

सरल स्वचालन अपनाने के लिए हमें मौजूदा प्रक्रियाओं को रोकने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन और अधिक प्रभावशाली दर्शन के लिए “स्टार्ट-अप सरस्वती मंदिर” होलोग्राम, आभासी वास्तविकता और बढ़ी हुई वास्तविकता (वीआर / एआर) का इस्तेमाल कर सकता है। दुर्गा सन्निधि को देवी के रूप में नहीं बल्कि ‘ऐयगिरि नंदिनी’ के उपर नृत्य करती हुई एक होलोग्राम की तरह कल्पना कीजिये या लक्ष्मी सन्निधि की जो वास्तविकता में सोने की वर्षा करती हुई देखी जाती हैं।

अंत में, एक वीआर रंगमंच हो सकता है जो हमें 108 शक्ति पीठों के दर्शन कराता है, भौगोलिक बाधाओं के कारण वास्तविक जीवन में जिनका दर्शन करना मुश्किल है।

पूरा प्रचालन तंत्र, प्रशासन और सुरक्षा स्वचालित हो सकती है। यह एक ऐसा परिसर होगा जो ग्रीन और स्वच्छ ऊर्जा पर चलेगा। मंदिर के योजना विवरण, तकनीकी विवरण, वित्तीय तथा आध्यात्मिक तत्वों में वास्तु तथा आधारिक संरचना के तत्व शामिल हो सकते हैं।

परंपरावादी लोग इसका तिरस्कार कर सकते हैं, यह विचार एक मंदिर को थीम पार्क में बदलने जैसा है, या यह केवल एक दिखावटीपन है जो आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार नहीं करता है। कुछ के लिए, आध्यात्मिकता दर्शाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग ही एक अभिशाप हो सकता है और देवता का दर्शन प्राप्त करने के लिए की गई तपस्या में बाधाएं तपस्या का ही एक अंग हैं।

लेकिन, हमें याद रखना चाहिए कि हमारे दर्शन, पुराण, गुरुओं की शिक्षाएं और पूरा हेर्मेनेयुटिक्स (दर्शनशास्त्र की शब्दावली) आदि सब चीजें प्राप्ति का मार्ग और विस्तारित विकल्पों की प्रस्तावना हैं। यह जानना उचित होगा कि हमारे प्राचीन मंदिर वास्तुशिल्प और वैज्ञानिक चमत्कार हैं। अवद्वयर कोविल या लेपाक्षी की यात्रा करने वाला कोई भी व्यक्ति उनके द्वारा बनाई गई तकनीकी प्रतिभा को आसानी से देख सकता है। हमारे पूर्वज डिजाइन और निर्माण में निडर थे क्योंकि वे मंदिरों के वास्तविक “उद्देश्य” को जानते थे।

सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण हिंदुओं की राजनीतिक और आर्थिक सफलताओं से सीमित है। हमारे प्राचीन ग्रंथों पर आधुनिक विद्वान, गुरू और मनीषी पहले से ही शोध कर रहे हैं और ज्ञान को एक नए रूप में परिभाषित कर रहे हैं। इस समय हमारे वास्तुकार भी आंख मूंदकर ज्ञान के इस रूप में शामिल हो रहे हैं। जैसा कि स्टीव जॉब्स हमें स्मरण कराते हैं, मांग की आशा करना तथा कुछ सुंदर और स्थाई निर्माण करना हमारी रचनात्मकता पर निर्भर करता है। अगर हम ऊँचे मीनाक्षी अम्मन मंदिर का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें तो यह हमें स्मरण कराता है कि भारतीय वास्तुकला प्रतिभा शायद निष्क्रिय हो गई है जो फिर से जीवंत किए जाने का इंतजार कर रही है।

स्वचालन और रोबोट के आने वाले वर्ष हम लोगों से चेतना, स्वतंत्र इच्छा और मानव के रूप में प्रथम स्थान पर होने के अर्थ पर आधारभूत सवाल पूछेंगे। हिन्दू धर्म शायद नैतिक और व्यवहारिक बाधाओं के बिना अन्वेषकों की विविधिता को पूरा करने के लिए शायद सबसे अच्छा स्थान है। श्री अरबिन्दो ने अपने दूरदर्शी उत्तरपारा भाषण में कहा था कि “वह दुनिया भर में स्वयं को सौंपे गए दिव्य प्रकाश को बिखेरने जा रहे हैं।” हमें संसार के लिए सनातन धर्म को सुलभ बनाने के लिए नवप्रवर्तन तथा सुधार के लिए प्रेरणा पर आकर्षित होना चाहिए। इसके अनुभव की पेशकश करने वाले मंदिर हमेशा से इसका एक भाग रहे हैं। प्रौद्योगिकी को इस अनुभव को तल्लीनता पूर्ण बनाने, सुधारने तथा प्रचलन में लाने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए। उन्हें संगठित होने दें।