पत्रिका
कैसे दशकों तक कांग्रेस ने न्यायपालिका को ‘प्रबंधित’ किया

प्रसंग
  • कांग्रेस के भ्रष्टाचार के कृत्य और इसका शासन अनुकूल प्रशासनिक तंत्र पर फल-फूल रहा है, जिसके दिल में न्यायपालिका के साथ पार्टी का रिश्ता है।

30 अप्रैल 1976 का दिन था जब भारत में समाचार पत्र या तो अपनी इच्छा से खामोश हो गए थे या लगभग खामोश करा दिये गए थे। इसलिए, देश में जो कुछ प्रसारित हो रहा था उसे समझने के लिए अक्सर पर किसी को अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों पर भरोसा करना पड़ता था। उस घटना वाले दिन, न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाईटी) ने अपने संपादकीय में, एक असंभाव्य नायक के प्रयासों का अभिनंदन किया – एनवाईटी ने बताया कि एक न्यायाधीश जो संविधान और कानून के शासन को कायम रखने के लिए स्वयं स्मरण योग्य थे, भले ही इसका मतलब था कि वह खुद के कैरियर का बलिदान दे रहे थे। संदेह के घेरे में सर्वोच्च न्यायालय के यह न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच आर खन्ना थे और यह संदिग्ध मामला जबलपुर के एडीएम बनाम शिवकांत शुक्ला था।

परिणाम कभी नहीं आया लेकिन न्यायमूर्ति खन्ना की असहमति रही जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने न्यायपालिका की आजादी के साथ छेड़छाड़ की। और आपातकाल के दिनों से आज तक, कांग्रेस अदालतों की आजादी का हनन करने के अपने ट्रैक रिकॉर्ड के साथ चल रही है।

तो पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस ने अपने हितों के लिए न्यायपालिका को अपने वश में करने के लिए किन रणनीतियों का उपयोग किया है? पार्टी के दृष्टिकोण को तीन बिंदुओं में समझा जा सकता है।

1.उन लोगों के लिए रास्ता बनाओ जो आपके प्रति वफादार हैं और जो उच्चतम स्थान तक पहुँचने के लिए वफादार बने रहेंगे।

वर्ष 1973 में, अनुभवी नेता जय प्रकाश नारायण (जेपी) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी भारी चिंता व्यक्त करते हुए एक पत्र लिखा, कि किस तरह से जस्टिस ए एन राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाने के लिए तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को हटा दिया था। ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों ने केशवनंद भारती मामले में सरकार के खिलाफ निर्णय दिया था, जिसमें न्यायपालिका को संविधान की ‘मूल संरचना’ को बदल देने वाले किसी भी संशोधन को रोकने का आदेश दिया गया था। यह सरकार के लिए अत्यधिक शर्मिंदगी का कारण था और कांग्रेस को एहसास हुआ कि उच्चतम पद वाले तीन न्यायाधीशों में से किसी के साथ भी काम करना मुश्किल होगा। लेकिन न्यायमूर्ति राय ने बहुमत के फैसले के खिलाफ असंतोष व्यक्त किया था। इसलिए कांग्रेस ने राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनने का रास्ता तैयार किया।

जेपी ने अपने पत्र में भारी आश्चर्य व्यक्त किया और प्रधानमंत्री से पूछते हुए, कि क्या इसके पीछे विचार मुख्य न्यायाधीश को ‘एक दिन के लिए सरकार का प्राणी’ बनाना था, राष्ट्र की चिंताओं को समझाया। वास्तव में, यही वास्तविक विचार था। सरकार के मंत्रियों ने भी यह तर्क दिया कि न्यायाधीशो की पदोन्नति पर निर्णय लेते समय ‘उनके सिद्धांत और दृष्टिकोण’ को ध्यान में रखा जाना चाहिए था। इंदिरा गांधी ने स्वयं न्यायमूर्ति राय को पदोन्नत करने के कांग्रेस के फैसले की यह कहते हुए सराहना की थी, कि वह एक ऐसे न्यायाधीश थे जिन्होंने ‘परिवर्तन की हवाओं’ को पहचाना था।

2. न्यायाधीश जो अपने करियर में बाधाओं का सामना करने के लिए कांग्रेस पार्टी की स्थिति में मददगार नहीं हैं।

पहली रणनीति केवल तभी कार्यान्वित की जा सकती है जब यह उन न्यायाधीशों, जो कांग्रेस पार्टी और उसकी मरजी के अनुरूप नहीं हैं, को हटाने की दूसरी रणनीति के साथ संयोजित होगी। यह ऊपर उल्लिखित मामले की तरह वरिष्ठ न्यायाधीशों की पदोन्नतिको रोकने के माध्यम से हो सकता है या सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ हालिया आक्षेप की तरह, जवाबतलब की कार्यवाही शुरू करने जैसे प्रमुख कदमों के माध्यम से हो सकता है। यह सभी रणनीतियां आपातकाल की अवधि में ही उत्पन्न हुई प्रतीत होती हैं। उदाहरण के के तौर पर आपातकाल के दौरान, भारत भर के नौ उच्च न्यायालयों ने आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (एमआईएसए) के कठोर संरक्षण के तहत मनमानी हिरासत के खिलाफ निर्णय दिया था।

कांग्रेस पार्टी ने इसे तिरस्कार के रूप में नहीं लिया। कुल मिलाकर, 18 न्यायाधीशों, जिन्होंने सरकार के खिलाफ फैसले दिए थे, को स्थानांतरित कर दिया गया था। दिल्ली उच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशीय खंडपीठ ने फैसला सुनाया था कि अनुभवी पत्रकार कुलदीप नायर को मनमाने ढंग से हिरासत में नहीं लिया जा सकता था। न्यायाधीशों में से एक, अतिरिक्त न्यायाधीश अग्रवाल को जल्द ही स्थायी न्यायाधीश बनाया जाना था। लेकिन उन्हें सत्र न्यायाधीश के पद पर स्थानांतरित कर दिया गया। और इसके पीछे कारण भी जाना-पहचाना था। कांग्रेस ने तर्क दिया कि खुफिया विभाग की रिपोर्टों से पता चला है कि न्यायमूर्ति अग्रवाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के व्यक्ति थे और इसीलिए उनकी उम्मीदवारी को उचित नहीं समझा गया था। दूसरे न्यायाधीश को दिल्ली से असम में स्थानांतरित कर दिया गया था।

इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग इसी तरह के जबलपुर के एडीएम मामले में न्यायमूर्ति एच आर खन्ना के साथ उनके असहमति के नोट के लिए देखा गया था। न्यायमूर्ति खन्ना वरिष्ठता के मामले में सीजेआई पद के लिए दूसरे स्थान पर थे लेकिन न्यायमूर्ति एम एच बेग के लिए उन्हें नजर अंदाज कर दिया गया था। उन्होंने खंडपीठ से इस्तीफा दे दिया और उनके इस साहसिक कार्य का अर्थ उनके कानूनी करियर का अंत था।

3. न्यायपालिका में नियुक्त अपने लगभग राजनीतिकलोगों की रक्षा करो और जब उपयुक्त समय हो तो उनके प्रदर्शन के आधार पर उनका जश्न मनाओ।

पत्रकारों से लेकर न्यायाधीशों तक, कलाकारों से लेकर कार्यकर्ताओं तक, कांग्रेस पार्टी को पता है कि इनसे वफादारी की मांग कैसे करें और इन्हें कैसे पुरस्कृत किया जाए। आने वाले दिनों में दूसरों के लिए यह सिर्फ एक संकेत नहीं है बल्कि राजनीतिक नियुक्तियों के साथ अधिक संस्थानों को पैक (अपने कब्जे में) करने का आजमाया हुआ और परीक्षण किया हुआ साधन भी है। ज्यादातर न्यायाधीशों की पदोन्नति तुरंत किये गये फैसलों के मामले में कांग्रेस के उदार विचारों के कारण हुई हैं। जबलपुर के एडीएम मामले पर ए एन राय और एम एच बेग की तरह। और अन्य मामलों की तरह जैसे न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा, जिनके 1984 के सिख कार्यक्रम पर अनुकूल फैसले ने पार्टी को बहुत शर्मिंदगी से बचाया था।

वफादार न्यायाधीशों को हमेशा इस तरह के संकटपूर्ण समय में पार्टी की सेवा के लिए पद्म पुरस्कारों के लिए पार्टी संस्थानों में उच्च पदों से लेकर अधिक संवैधानिक पदों तक पुरस्कृत किया जाता है। न्यायमूर्ति खन्ना को किनारे करते हुए न्यायमूर्ति बेग को पहले सीजेआई बनाया गया था और सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय हेराल्ड समूह का निदेशक बनाया गया था। लेकिन, कांग्रेस की कृपा यहीं नहीं समाप्त हुई। 1988 में, कांग्रेस द्वारा आपातकाल लगाए जाने के दौरान राजीव गांधी सरकार ने न्यायमूर्ति बेग के योगदान को पहचाना और उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

एक और न्यायाधीश थे न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी का पक्ष लिया। 1984 के सिख पोग्राम की देखरेख के लिए एक व्यक्ति की टास्क फोर्स के रूप में, उन्हें केवल पुलिस द्वारा की गई चूक मिली थी और किसी भी मौत और दंगे की स्थितियों से पार्टी का कोई सीधा जुड़ाव नहीं मिला था। राजीव गांधी सरकार के लिए यह एक बड़ी राहत थी और जल्द ही पुरस्कारों का सिलसिला शुरू हो गया और यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। यह  सिलसिला सीजेआई के पद के साथ शुरू हुआ और फिर प्रथम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की अध्यक्षता, इसके बाद धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों के राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता और फिर अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता तक चला। वर्ष 2004 में एक राज्यसभा सीट को नहीं भूलना।

घटनाओं की एक अजीब श्रृंखला में, कुछ महीने पहले कांग्रेस ने न्यायपालिका में सह-विकल्प और नियंत्रण के अपने पिछले रास्ते पर चलते हुए सीजेआई दीपक मिश्रा, जो संयोग से रंगनाथ मिश्रा के भतीजे हैं, को दोषी ठहराने की कोशिश की। संदेश स्पष्ट था, जैसे यह ऊपर हाइलाइट किए गए उदाहरणों में रहा है। यदि कांग्रेस पार्टी की इच्छानुसार कार्य नहीं करते हैं तो इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। और पहले की तरह एक संकेत भी था। यदि कांग्रेस पार्टी की इच्छानुसार कार्य करते हैं, तो पुरस्कार दिए जाएंगे। आपातकाल से लेकर आज तक, कांग्रेस ने न्यायपालिका को निशाना बनाने की कोशिश की है और बेशर्मी से उसकी आजादी का हनन किया है। अचानक, यह न्यायिक आजादी की चिंताओं के लिए जाग गई है और महसूस कर रही है कि ‘अब बहुत हो गया’। सच्चाई का यह एहसास 45 साल बाद बहुत देर से हुआ है।