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हिन्दू अर्थशास्त्र – राज्य से लेकर धन, धर्म और प्रसन्नता तक
हिन्दू अर्थशास्त्र – राज्य से लेकर धन, धर्म और प्रसन्नता तक

हिन्दू दर्शन के अतिगहन विचारों द्वारा निर्देशित और आज की वास्तविकता में निहित हिन्दू अर्थशास्त्र एक दृष्टिकोण है न कि एक गंतव्य।

क्या किसी भी चीज को हिन्दू अर्थशास्त्र कहा जा सकता है? इसका सही जवाब “हाँ” है क्योंकि इसका सीधा साधा कारण यही है कि अर्थशास्त्री इस बात को लेकर एकमत नहीं हो पाए हैं कि वे अपने विषय को कैसे परिभाषित करें।

एडम स्मिथ ने अर्थशास्त्र को “देशों की प्रकृति और समृद्धि के कारण की जांच” के रूप में परिभाषित किया और परिभाषा के लिए एक राजनीतिक अर्थव्यवस्था घटक को शामिल किया, जहाँ राजनेता राजस्व में बढ़ोतरी करने और जनता के अधिक कल्याण करने के तरीकों को चुनते हैं।

अर्थशास्त्री जे.बी. से ने अर्थशास्त्र को “उत्पादन, वितरण और धन के उपभोग का विज्ञान” बताया, जबकि जॉन स्टूवर्ट मिल का दावा है कि “ विज्ञान जो समाज के ऐसे नियमों को दर्शाते हैं जिसमें धन के उपार्जन के लिए मनुष्य द्वारा किए गए संगठित कार्य शुरू होते हैं, और जिसमें ऐसी घटनाएँ दूसरी चीजों के होने से सुधरती नही हैं।“

अर्थशास्त्र के अंतिम उद्देश्य के आधार पर बहुत ही कम आधुनिक अर्थशास्त्री इस विषय को कई तरीकों से परिभाषित करते हैं, चाहे वह नीति निर्माताओं द्वारा प्रतिस्पर्धी आवश्यकताओं के बीच संसाधन आवंटित करने के बारे में हो, घरेलू बजट के बारे में हो या मानव व्यवहार पर शोध, विशेषकर भौतिक प्रोत्साहनों और किसी दिए गए सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों में जुर्माने के जवाब के बारे में हो।

पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक विज्ञान, जैसे कि भौतिकी, मानकर बहुत बड़ी गलती  की, क्योंकि भौतिकी की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है और इसे आसानी से प्रबंधित भी किया जा सकता है। कोई भी वह क्षेत्र जिसमें मानवीय प्रतिक्रिया शामिल होती है वह कभी भी सटीक और विशिष्ट नहीं हो सकती है। चूंकि मानव एक सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ में अर्थशास्त्री घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हैं इसलिए हिन्दू अर्थशास्त्र के एक स्पष्ट विचार को आगे बढ़ाना वैसे ही वैध होगा जैसे कि इस विषय पर एक पश्चिमी विचार को बढ़ावा देना।

मौर्य युग से लेकर, जहां हमारे पास राजनीतिक अर्थव्यवस्था के दायरे और उद्देश्य को परिभाषित करने के लिए चाणक्य (या कौटिल्य) जैसे विद्वान थे, व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता, गांवों की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्थाओं तथा संपूर्ण समाज को लाभ पहुँचाने के लिए शक्तिशाली तथा धनवान लोगों द्वारा धन के स्वैच्छिक वितरत के गाँधी के विचारों तक, अर्थशास्त्र और संबंधित राज कौशल के लिए भारत के पास कई स्वदेशी दृष्टिकोण थे और हैं। भारत में, हमने राजनीति और समाज से अलग हटकर अर्थशास्त्र का अध्ययन करने पर कभी विचार ही नहीं किया।

यदि आप धर्मपरायण हैं तो इसमें धन निर्माण के लिए जो संतुलित दृष्टिकोण बताए गए हैं वह धर्म की चरम सीमा तक के बारे में नहीं है।  धार्मिक अर्थशास्त्र या हिन्दू अर्थशास्त्र द्विआधारी विकल्प नहीं हैं, जिस प्रकार पश्चिम में हैं। यह बाजार अर्थव्यवस्था और राज्य का नेतृत्व करने वाले विकास के बीच एक वैचारिक संघर्ष नहीं हैः कभी-कभी यह दोनों हो सकता है, कभी-कभी कुछ भी नहीं होता है और अक्सर दोनों दृष्टिकोणों का मिश्रण हो सकता है। यहाँ तक कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अहस्तक्षेपित और आदर्श अर्थव्यवस्था को त्यागकर एक मिश्रित अर्थव्यवस्था का चयन करते समय जवाहर लाल नेहरू ने भी सही दृष्टिकोण अपनाया।

ऐसा करके उन्होंने समाजवाद के साथ पूँजीवाद के लाभों को प्राप्त करने की उम्मीद की, लेकिन दुर्भाग्यवश, उनका संतुलन बिगड़ गया और हमें दोनों प्रणालियों के नकारात्मक रूपों का सामना करना पड़ा। हमारे हाथ में लाइसेंस-परमिट राज थमा दिया गया। 1991 में हुए आर्थिक उदारीकरण में इसमें व्याप्त कुछ बकवासों को तो कम कर दिया, लेकिन हम ‘n’ के बल पर ही समाप्त हो गए, कानून के अनुपालन के नाम पर लाइसेंस राज को नियामक राज और इंस्पेक्टर राज में प्रतिस्थापित कर दिया गया।

अब केवल इतना है कि इनमें से कुछ बेवकूफियों को सही किया जा रहा है लेकिन उसके लिए अभी हम मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार नहीं हो पाए हैं। हिन्दू अर्थव्यवस्था को वहाँ से प्रारंभ होना चाहिए जहाँ से वास्तविकता प्रारंभ होती है, इसको काल्पनिक आदर्शों की रेत पर नहीं बनाया जाना चाहिए। इसको अपने दृष्टिकोण को परिभाषित करना होगा और फिर पथ उभर कर सामने आ जाएगा। इसके क्षणिक भौतिकवादी लक्ष्यों की तुलना में जीवनपर्यन्त चलने वाला होना चाहिए। पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों का भौतिकवादी लक्ष्यों की ओर झुकाव रहा है जिसके परिणामस्वरूप दोनों का पतन हुआ।

हिन्दू अर्थव्यवस्था को मार्गदर्शन देने वाला पहला सिद्धान्त एक मजबूत लेकिन सीमित राष्ट्र का विचार होना चाहिए। जो कानून और व्यवस्था को बनाए रखने, अनुबंधों को लागू करने, अच्छी बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने, देश की बाहरी तथा आन्तरिक सुरक्षा और एक उचित आर्थिक प्रबंधन प्रदान करने पर काफी हद तक केन्द्रित होना चाहिए। यह सब कल्याणवाद के बारे में नहीं है, जो इस समय भारत में चल रहा है।

लेखक संजीव सान्याल कहते हैं जैसा कि ऊपर बताया गया है, भारत में “कौटिल्यन राज” के बजाय एक “अशोकन राज” है, जहाँ व्यक्तिगत जिम्मेदारी राज्य की जिम्मेदारी के रूप में महत्वपूर्ण है। पहले सुधारात्मक हिन्दू अर्थशास्त्र को अपने इस असंतुलन को सही करना चाहिए जहाँ पर राज्य गलत कर्तव्यों पर केन्द्रित है और हर व्यक्ति अपने कल्याण के लिए सभी जिम्मेदारियों से अलग है।

उदाहरणः आप सबसे अच्छी चिकित्सा सुविधाओं को मुफ्त में उपलब्ध कर सकते हैं लेकिन अगर कोई व्यक्ति व्यायाम नहीं करता, योग नहीं करता और स्वस्थ भोजन नहीं करता फिर जब वह गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है तब वह राज्य से उपचार का भुगतान करने की उम्मीद नहीं कर सकता। नीतियों को राज्य की जिम्मेदारियों के साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के साथ जोड़ना चाहिए। अच्छा होगा अगर, देश के 50 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपये का जीवन बीमा देने की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना ‘आयुष्मान भारत’ केवल पात्रता के बारे में ही न हो बल्कि स्वास्थ्य आदतों में जागरूकता और निवेश हो। दोनों को कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए।

दूसरा उदाहरणः शिक्षा का अधिकार अधिनियम को इस तर्क से साथ शुरू किया गया था कि राज्य पर्याप्त बुनियादी शिक्षा प्रदान नहीं सकते हैं इस प्रकार यह जिम्मेदारी निजी स्कूलों को सौंप दी जाए, विशेषकर बच्चों की अधिक संख्या वाले स्कूलों की जिम्मेदारी, इस प्रकार उनको और अधिक महंगा तथा बोझिल बना दिया गया।

उचित गुणवत्ता वाले सार्वजनिक स्कूलों, जहाँ कोई भी सक्षम शिक्षा प्राप्त कर सके, के साथ निजी स्कूलों के बीच सही संतुलन होना चाहिए। निजी स्कूल केवल उन्हीं लोगों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जो उनका खर्च वहन कर सकते हैं। आज की गिग अर्थव्यवस्था के समय में, यह सीखने की क्षमता है इसमें प्रारंभिक उच्च ज्ञान का अधिग्रहण नहीं होता है, जो विजेताओं को पराजितों से अलग करेगा। इसलिए, अच्छी गुणवत्ता वाली राज्य द्वारा वित्त पोषित या राज्य द्वारा प्रदत्त प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा महत्वपूर्ण है।

धार्मिक संतुलन का दूसरा तत्व आर्थिक नीतियों का पालन करने के बारे में होना चाहिए जो व्यक्तिगत क्षमता को बढ़ाता हो और धन की चरम असमानताओं को कम करता हो। बहुत समय पहले कार्ल मार्क्स ने सही नारा दिया था (“हर किसी से उसकी क्षमता के अनुसार, हर  किसी को उसकी जरूरतों के अनुसार”), मार्कस बकिंघम तथा कर्ट कॉफ़मैन लेखकों ने इसको और आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया, जो संगठनात्मक और मानव विकास के केंद्र में प्राकृतिक प्रतिभा रखना चाहते थे (पहले पढ़ें, सभी नियमों को तोड़ें), हम भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण के स्वधर्म के गुणों की प्रशंसा करते हैं। श्री श्री रवि शंकर के अनुसार, “स्वधर्म वह क्रिया है जो आपकी प्रकृति के अनुसार है। जो आपके कौशल, प्रतिभा, आपके अपने स्वभाव और आपके कर्मों – जिनके लिए आप जिम्मेदार हैं- के अनुसार कार्य कर रही है।”

सीधे शब्दों में कहें तो, हिन्दू अर्थशास्त्रियों को व्यक्तिगत क्षमताओं को बढ़ाने वाली नीतियों पर अधिक ध्यान देना चाहिए (जिसका अर्थ है मेरिट के आधार पर प्रचार और करियर का विकास, स्वाचालित उन्नयन और कार्य पर वर्षों के आधार पर उच्च वेतन नहीं)।

लेकिन “किसी की क्षमता को बढ़ाने” जैसी नीति का पालन करके उत्पन्न किया गया धन इक्विटी के सिद्धान्त को नुकसान पहुँचायेगा, अगर इसका सही उपयोग नहीं किया जाता है तो इस मामले में धर्म स्थिर है। पुनर्वितरण को सक्षम करने के लिए अत्यधिक धन को उपयुक्त संतुलन नीतियों की आवश्यकता होती है। दान और पुनर्वितरण की अवधारणाएं हिन्दू इतिहास जितनी पुरानी हैं जिनका वर्णन सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में किया गया है।

ऋग्वेद के अध्याय 10 में स्पष्ट रूप से लोगों को अपनी संपत्ति साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, प्रासंगिक छंद (पुस्तक 10, भजन 117) में कहा गया हैः “भगवान ने हमारी मृत्यु के लिए भूख नहीं दी है, यहाँ तक कि पेट भरे हुए व्यक्ति की भी मृत्यु होती है, परोपकारी की संपत्ति कभी नष्ट नही होती है, जबकि जो कोई दान नहीं देगा उसे शांति प्राप्त नहीं होगी।”

इसके बाद के छंद में लिखा है, “दानी/धनी वह है जो भोजन की इच्छा से अपने पास आए हुए दीन-हीन को कुछ दे ; उसे युद्ध में सफलता मिलती है; वह भविष्य की परेशानियों को अपना मित्र बना लेता है। उसका कोई मित्र नहीं है जो अपने मित्र को तथा अपने सहयोगी, जो उससे भोजन की मांग करता है, को कुछ भी नहीं देता। (उपर्युक्त दोनों उद्धरण राल्फ ग्रिफिथ द्वारा अनुवादित हैं।)

बृहदारण्यक उपनिषद (छंद 5.2.3) के अनुसार, उत्पन्न मनुष्य  वह है जिसमें आत्म-संयम, परोपकार और सभी जीवों के प्रति सहानुभूति, ये तीन गुण विद्यमान हैं। व्यक्तिगत क्षमता का विस्तार करने और पुनर्वितरण के महत्व पर जोर देने वाला यह नजरिया संकेत करता है कि धार्मिक अवस्था में ऐसी नीतियां होनी चाहिए जो दोनों को बढ़ावा दें। यह धन और समृद्धि के सृजन की बाधाओं को दूर करने का संकेत हो सकता है, जिसका मतलब अल्प आयकरों, और उन नीतियों के माध्यम से जरूरतमंदों को वे संसाधन प्रदान करना जो सामाजिक पूंजी, जो संभवतः धर्मार्थ उपयोगों के लिए व्यक्तिगत संपत्ति का उपयोग करने का समर्थन देने वाला एक पैतृक कर है (या कई कर हैं), में दान और निवेश को बढ़ावा देते हैं।

पाश्चात्य अर्थशास्त्री सिद्धांतवादियों द्वारा व्यापार चक्र की खोज किए जाने से पहले ही कर्म सिद्धांत ने जीवन के चक्रीय स्वभाव को स्वयंसिद्ध मान लिया जिसमें 40-60 वर्षों तक चलने वाले कोंड्राटीफ चक्र भी मौजूद हैं। चक्रीयता का पूर्वानुमान लगाने के अलावा कर्म सिद्धांत इस बात पर भी बल देता है कि क्रियाओं का महत्व होता है। अर्थशास्त्र के एक हिंदू सिद्धांत के तीसरे तत्व को व्यक्तिगत या राष्ट्र स्तर की आर्थिक नीतियों पर ध्यान देना चाहिए।

बूम-बस्ट (अर्थव्यवस्था में तेजी से उतार चढ़ाव) में हमारी स्थिति क्या है, इसका तात्पर्य इस बात से लगाया जा सकता है कि हम व्यक्तिगत मितव्ययता (और व्यय) में वृद्धि को बढ़ावा देते हैं, इसके साथ ही राज्य वित्त इसी तर्क का समर्थन करते हैं -या आर्थिक चक्र कमजोर पड़ने पर अधिक व्यय करते हैं, और आर्थिक चक्र मजबूत होता है तो पूरी श्रंखला मजबूत हो जाती है।

यह बजट में कमी के निरंतर और निश्चित दृष्टिकोण में अंतर्निहित न होकर आर्थिक चक्र के चरण के आधार पर राज्य का एक लचीला पुनर्मूल्यांकन है कि राज्य को कैसे कार्य करना चाहिए।

कार्मिक चक्र को स्वीकार करने में भी लोगों द्वारा उचित कार्यों को बढ़ावा देना शामिल है। यदि आप गरीब हैं तो आपका कर्तव्य स्वयं को कुशल बनाकर धनी बनना है; यदि आप अमीर हैं तो ऐसी योजनाओं पर समय खर्च करना आपका कर्तव्य है जो आपके कल्याण को ही नहीं बल्कि सामाजिक संपत्ति को भी बढ़ावा दें। इस प्रकार राज्य नीतियों द्वारा स्वैच्छिक धन पुनर्वितरण और कुशलता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, और जब यह स्वाभाविक रूप से नहीं हो पाता है केवल तभी कराधान का उपयोग किया जाना चाहिए।

दूसरी तरफ, हिंदू अर्थशास्त्र को केवल भौतिक संपदा को परिभाषित करने का संकीर्ण मार्ग नहीं लेना चाहिए, जिसमें इसे बनाने और वितरित करने के तरीके भी शामिल हैं। किसी भी उद्देश्यपूर्ण जीवन के लिए जीवन का न्यूनतम आर्थिक मानक महत्वपूर्ण है, लेकिन धन ही सब कुछ नहीं है, आज के आर्थिक भविष्यद्वक्ता भी यही खोज रहे हैं। इस प्रकार, हमारे पास प्रति व्यक्ति जीडीपी की गणना को जोड़ने के लिए मानव विकास सूचकांक हैं साथ में भूटान भी सकल राष्ट्रीय सौभाग्य की गणना करने का प्रयास कर रहा है।

चाणक्य के सूत्र, हमें न केवल शुद्ध भौतिक अर्थशास्त्र बताते हैं बल्कि वह हमारे अलग-अलग हिस्सों के अंतिम परिणाम होने के नाते अंतिम लक्ष्यों को एक परिपूर्ण शुरुआत देते हैं। अपने पहले तीन खंडों में, सूत्र हमें बताता है:

सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य  मूलं  अर्थः अर्थस्य  मूलं  राज्यं ….

अनुवाद, इन वाक्यों का मतलब है: “सुख का मूल धर्म है, धर्म का मूल धन (अर्थ) है और धन का मूल राज्य है।”

चाणक्य के सूत्र किसी के लिए भी कोई भी संदेह नहीं छोड़ते है कि पश्चिमी उदारवादी अनावश्यक और अवास्तविक कल्पनाएं हैं, जो राज्य को अलग करने की इच्छा रखना पसंद करेंगे, और सौम्यवाद के अंतिम चरण में राज्य की मार्क्सवादी भविष्यवाणियों को नष्ट होते हुए देखेंगे।  यह हिंदू अर्थशास्त्र को, इस मिट्टी की वास्तविकता सहित, जिस पर धर्म स्वतः आधारित है, आज की वास्तविकता में जगह बनानी है। हिंदू अर्थशास्त्र “सनातन” है, जिसका अर्थ है कि यह शाश्वत और निरंतर बना रहने वाला है, यह स्थिर नहीं है। यह परिस्थितियों और चुनौतियों के आधार पर अपनी प्रवृत्ति और अवधारणा बदलता है। यह एक गंतव्य के बजाय एक यह एक दृष्टिकोण और एक यात्रा है।

हिंदू अर्थशास्त्र पर एक निश्चित स्मृति अभी तक लिखी जानी बाकी है; यह वह समय है जब  हमने ऋग्वेद, गीता, उपनिषद, कर्म सिद्धांत, और चाणक्य सूत्रों तथा अन्य चीजों में दिए गए बुनियादी सिद्धांतों का उपयोग करके इसे लिखना शुरू कर दिया।

जगन्नाथ स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।