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2014-19 में राजनीति का हिंदूकरण हुआ, 2019-24 में राज्यव्यवस्था का हिंदूकरण आवश्यक

‘सेक्युलरिज़्म’ पर आम सहमति का समय अब सही मायनों में जा चुका है- वह आम सहमति जिसमें राजनीतिक वर्गों की परंपराओं में इफ्तार पार्टी मनाने की होड़ और हिंदू प्रतीकों को दबाना सामान्य था। हालाँकि इस दोहरे मापदंड का भद्दा प्रदर्शन काफी समय से चल रहा था लेकिन सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के परितंत्र ने इसे एक नई ऊँचाई प्रदान की और हिंदू आतंक का छद्म प्रपंच रचकर सारी सीमाएँ पार कर दीं।

आधुनिक भारत को उसकी सभ्यता की जड़ों से अलग करा नेहरूवादी अधिष्ठानों का पुराना स्वप्न था (इसे जवाहर लाल नेहरू के व्यक्तिगत विचारो से नहीं जोड़ा जाना चाहिए)।

दशकों से देश की रक्त शिराओं से हिंदू धर्म को निकाल फेंकने की एक सांस्कृतिक क्रांति चलाई जा रही थी जिसमें अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा देने के लिए मिशनरी उत्साह दिखाया जा रहा था और इसमें वे लगभग सफल हो गए थे।

लेकिन पिछले पाँच वर्षों में परिस्थिति बदल गई है और कैसे। राजनीति के हिंदूकरण ने शांत बहुसंख्यकों के हृदय को बल दिया है। दक्षिणपंथ में कई लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस महान बदलाव का श्रेय देते हैं लेकिन मेरा मानना है कि वे इसके सेक्युलरिज़्म-विरोधी भाव के लाभार्थी हैं, न कि परिवर्तन के अग्रदूत। फिर भी उन्होंने अपनी भूमिका अच्छे से निभाई जिसके बिना यह कार्य सफल नहीं हो पाता।

फिर भी यह कार्य अभी अधूरा है। यहाँ आराम करने के लिए समय नहीं है। अगले पाँच वर्षों में हिंदू राष्ट्रवादियों का कार्य भारतीय राज्यव्यवस्था का हिंदूकरण होना चाहिए। स्पष्ट रूप से कहूँ तो मैं इस वृहद कार्य का भार अकेले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कंधों पर नहीं छोड़ना चाहता। और यह न ही यह व्यहारिक है। भारतीय संविधान में आधारभूत परिवर्तन के लिए राज्य सभा में भी भाजपा की प्रचंड बहुमत होनी चाहिए जिसमें कई वर्ष लग सकते हैं। नवंबर 2020 तक राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को उच्च सदन में बहुमत मिल जाएगी लेकिन भाजपा को नहीं और यह भूलना नहीं चाहिए कि दोनों में बहुत अंतर है।

अतः यह सरकार के बाहर विद्यमान राष्ट्रवादी हिंदुओं का कार्य है कि वे इसका दायित्व स्वयं पर लें और संविधान के दायरे में रहते हुए नवाचार युक्त समाधानों को ढूँढें, कम से कम तब तक जब तक पार्टी बहुमत में नहीं आ जाती। उन्हें लोगों के बीच काम कर हिंदुत्व की सीमा का विस्तार करना होगा जो अब तक केवल तीन मुद्दों से जुड़ा है- राम मंदिर निर्माण, धारा 370 को हटाना और समान नागरिक संहिता को लागू करवाना, जो पिछले पाँच वर्षों में इस सूची में जुड़ा है और यह स्वागत योग्य है लेकिन इसका क्षेत्र भी विस्तृत करना होगा। जैसा कि उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता जे साई दीपक ने सुझाया कि भारत को “इस तथ्य को वैधानिकता देनी चाहिए कि भारत भारतीय समुदायों का एक प्राकृतिक घर है, अतः यदि वे कभी भी, विश्व में कहीं भी शोषित हों तो उन्हें यहाँ शरण और नागरिकता प्राप्ति का अधिकार है।”

इस्लाम और ईसाइयत जो विश्व के दो सबसे बड़े मत हैं, वे भारतीय समाज में परिवर्तन के सबसे बड़े बाधक हैं। इस्लाम की बढ़ती हुई जनसांख्यिकी और ईसाइयत का संस्थागत व धन बल चिंता का विषय है।

अतः बलात अथवा प्रेरित धर्म परिवर्तन, सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकी परिवर्तन द्वारा प्रहार, अवैध अप्रवासी, कश्मीर की बदलती जनसांख्यिकी आदि के प्रति जागरूकता फैलानी होगी और निवारण हेतु प्रभावकारी समाधान ढूंढने होंगे। 370 और 35(अ) हटा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, यह मात्र पहला कदम है। हम जनसंख्या नियंत्रक बिल की माँग को सुनते रहते हैं लेकिन हमें पूछना चाहिए कि जो भारतीय राज्य बिजली चोरी करने वाले कुछ गाँव वालों को नहीं पकड़ सकता, क्या वह इस क्रांतिकारी अधिनियम को लागू कर पाएगा? हमें विश्लेषण करना चाहिए कि क्या हम मुस्लिम लड़कियों को बड़े पैमाने पर शिक्षित कर परिणाम पा सकते हैं। अतः प्रभावशाली समाधानों का लक्ष्य वास्तविकता से जुड़ा होना चाहिए, जो कि संविधान की चार दीवारी में स्थित हो।

“अल्‍पसंख्यक अधिकारों” के तमगे के अंतर्गत विसंगत कानून, इन वैश्विक बहुसंख्यक धर्मों को जो विशेष अधिकार प्रदान करते हैं उनका तटस्थीकरण किया जाना चाहिए, जब तक कि संवैधानिक संशोधन द्वारा समान अधिकारों की प्रस्थापना नहीं हो जाती। इसकी शुरुआत सबसे मुश्किल कानून “शिक्षा के अधिकार अधिनियम” में सुधार से की जा सकती है जिसमें आयुष्मान भारत की तरह यदि संस्थान सरकार के नियम और शर्तों से सहमत हों तो उन्हें योजना में शामिल होने के चुनाव का अधिकार होगा।

शिक्षा के मोर्चे पर यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि पूरे भारत में बच्चों को भारतीय भाषाओं में शिक्षा दी जाए। भाषाओं की पंथ निरपेक्षता जैसा कुछ नहीं होता है, जैसा कि सामान्यतया माना जाता है। भाषा स्वाभाविक रूप से उनके, विश्वास, परंपरा और संस्कृति के साथ जुड़ी होती है जिन्होंने उसे विकसित किया है। अगर हम इसका संरक्षण और भविष्य की पीढ़ी को संप्रेषण चाहते हैं तो भारतीय भाषाओं में शिक्षण अति आवश्यक है। इसके लिए अत्यधिक निवेश और प्रयास की अवश्याकता है।

1950 के दशक में बौद्ध, जैन और सिख वैधानिक रूप से हिंदू थे। वर्तमान में वे “अल्‍पसंख्यक” (गैर-हिंदू) हैं। इसे पुनः परिवर्तित करने के लिए किसी संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है। अल्‍पसंख्यकों के लिए विशेष छात्रवृत्ति के स्थान पर राष्ट्रीय पंथ निरपेक्ष छात्रवृत्ति को लाना और अल्‍पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का विलय सामाजिक न्याय मंत्रालय में करना, एक अच्छी शुरुआत प्रदान करेंगे।

इसी तरह से अगर मज़बूत इच्छा शक्ति है तो सरकार मत परिवर्तन के लिए कार्य करने वाले और भारत में तनाव बढ़ाने वाले गैर-सरकारी संगठनों के संजाल यानी कि एनजीओ-सेवा क्षेत्र में आने वाले विदेशी धन को एक साधारण कानून द्वारा पूर्ण रूप से रोक सकती है। सबरीमाला, जलिकट्टू, दही हांडी जैसी विशेष भारतीय परंपराओं को संवैधानिक संरक्षण देना इस हिंदूमय राजनीति के वातावरण में सहज और सरल होगा।

जैसा कि हम देख सकता हैं कि मैंने इस वृहद समस्या के निदान का भार समान्य हिंदू राष्ट्रवादी के जिम्मे रखा है। मोदी सरकार से अल्‍पकालिक मांग है कि यह थोड़ी-बहुत राजनीतिक पूंजी खर्चे। यह अपना 90 प्रतिशत समय विकास पर केंद्रित कर सकती है जिससे इसे काफी चुनावी लाभ प्राप्त हुए हैं, हालांकि विकास पर ध्यान देने का यह एकलौता कारण नहीं है। दी आरएसएस- अ व्यू टू दी इनसाइड  के लेखक वाल्टर एंडर्सन लिखते हैं कि उनके साथ एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने “आगे बढ़कर यह कहा कि आर्थिक संवृद्धि अब हिंदुत्व का केंद्रीय तत्व बन गई है।” एंडर्सन ने इसका व्याख्यान नहीं किया लेकिन इसे समझना यह कठिन नहीं है कि मोदी ऐसा क्यों सोंचते हैं।

जैसा कि मैंने पहले लिखा भूखे पेट से पुनर्जागरण नहीं होता है। मैं विकास के मुद्दे में ऐसी दो बातें जोड़ना चाहूँगा जो गरीबों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकती हैं- जनता की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ध्यान दीजिए और समय से न्याय प्राप्ति के लिए न्यायिक सुधार कीजिए।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।