पत्रिका
गाँधी और उनकी अर्थव्यवस्था
Gandhi and his Charkha

गाँधी को समझना आसान नहीं, विशेषतः अगर बात उनके अर्थशास्त्र की हो तो। इसका मुख्य कारण यह है कि गाँधी विश्व की अपनी नैतिक समझ के कारण अपने निष्कर्षों तक पहुँचे, न कि विकास, निवेश, माँग या पूर्ति की अपनी समझ के कारण। यही वजह है कि उनके अर्थशास्त्र के विचारों को वामपंथी-दक्षिणपंथी-मध्यमार्गी या कम्यूनिस्ट-समाजवादी-पूँजीवादी विचारधाराओं में रख पाना सम्भव नहीं है।

इसलिए गाँधी के विचारों पर व्यापक विषयवस्तु के संदर्भ में चर्चा करके, वर्तमान वास्तविकताओं की कसौटी पर उनका परीक्षण करके ही यह पता लगाया जा सकता है कि गाँधी के व्यावसायिक समाधानों में दूरदर्शिता है या तर्कहीनता। गाँधी स्वदेशी में, ग्रामीण आत्मनिर्भरता में, बड़े उद्योगों के बजाय कुटीर और छोटे उद्योगों में और उत्पादन में मशीनों की अपेक्षा श्रम के इस्तेमाल में विश्वास रखते थे।

स्वतंत्रता संग्राम के समय कांग्रेस के कई व्यापारियों द्वारा समर्थित होने के बावजूद, उन्होंने कभी पूँजीवाद को भारत की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़रूरी नहीं माना। लेकिन उन्हें परम्परागत समाजवाद मेें भी क़तई भरोसा नहीं था और उनका कहना था,

”समाजवाद का शब्द का शब्दकोश अर्थ देखने के बावजूद मैं उस स्थान से क़तई आगे नहीं बढ़ा जहाँ मैं ये परिभाषा पढ़ने से पहले था।“

गाँधी सम्भवतः एक सहज समाजवादी थे, समाजवाद की कठोर रूढ़िवादिता से कहीं परे। उन्होंने महसूस किया कि उदारमना पूँजीवाद ही सही जवाब होगा। “इसमें कोई संदेह नहीं कि पूँजी निर्जीव है, पर पूँजीवादी सजीव हैं और उन्हें परिवर्तन के लिए तैयार किया जा सकता है।” वह मानते थे कि अमीर लोगों को समाज के भले के लिए अपनी सम्पत्ति को ट्रस्ट में रखना चाहिए। उनका कहा था, “सच्चा समाजवाद हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में मिला है, जिनका मानना थाः ‘सारी धरती गोपाल की है।’ दूसरे शब्दों में, एक अच्छा पूँजीवादी वह है जो अपने लाभ के पहले समाज का भला सोचता है।

यदि आप नैतिकता को गाँधी के विचारों से अलग कर दें तो आप उनके अर्थशास्त्र को नहीं समझ सकते। लेकिन चूँकि नैतिकता पर बहस मक़सद नहीं है, तो हमें उनके विचारों को उनकी आर्थिक मूल्यों के लिए परखना होगा, ताकि पता चल सके कि उनके कौन से विचार आज भी प्रासंगिक हैं, कौन से विचार असफल हैं और कौन से भविष्य में सही साबित हो सकते हैं।

आइए, एक मुख्य गाँधीवादी विचार से आरम्भ करें-‘स्वदेशी’। आज, दिलचस्प बात ये है कि केवल आर.एस.एस. के विचारकों को ही ये विचार प्रिय है। विशुद्ध आर्थिक शब्दकोश में देखें तो स्वदेशी का विचार आज के संरक्षणवादी विचारधारा से बहुत अलग नहीं है। ऐसा लगता है कि गाँधी भी यही सुझाव दे रहे हैं, जब उन्होंने अपने एक निबंध में लिखा, “भारत को अपने प्राथमिक उद्योगांें की वैसे ही रक्षा करनी चाहिए, जैसेकि एक माँ पूरी दुनिया के खिलाफ़ अपने बच्चों की रक्षा करती है …। “एक अन्य अवसर पर उन्होंने लिखा, “बड़ी मात्रा में जनता की ग़रीबी आर्थिक और औद्योगिक परिक्षेत्र से स्वदेशी के बाहर हो जाने की वजह से है। अगर व्यापार में भारत के बाहर से एक भी सामान न लाया जाय, तो वो आज दूध और शहद से भरी हुई भूमि होगी।“

स्वदेशी का परित्याग करने के बाद ही भारत दूध के आधिक्य और डाबर या पतंजलि के शहद से भरपूर हो पाया है। लेकिन गाँधी का स्वदेशी अंतर्मुखी नहीं था, इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी आयात को बाहर रखने से कहीं अधिक आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता को बढ़ावा देना था। “जहाँ कपास उगाने से लेकर सूत कातने तक के सभी कार्य एक ही गाँव या क़स्बे में किये जाते हों, वही सच्चा स्वदेशी है।” ये विचार उनके उस विचार से जुड़ा था जहाँ उनका मानना था कि गावों को गणतंत्र बनाने और उनके लोकतांत्रिक शासन के लिए उनका आत्मनिर्भर होना आवश्यक है, ताकि गाँव के लोग अपने ज़रूरत की समस्त चीज़ें गाँव में पैदा कर सकें। “ग्राम्य स्वराज्य से मेरा तात्पर्य एक ऐसे गाँव से है जो पूर्ण गणतंत्र हो और अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं के लिए अपने पड़ोसी से स्वतंत्र है। इसलिए सभी गाँवों की पहली चिंता अपने खाने के लिए फ़सलों और कपड़े के लिए कपास का उत्पादन होना चाहिए। पशुओं के लिए चारागाह और वयस्कों और बच्चों के लिए खेल का मैदान छोड़ने के बाद यदि अतिरिक्त ज़मीन बचती है तो गाँजा, तम्बाकू, अफ़ीम को छोड़कर अन्य व्यापारिक फ़सलों के लिए उसका उपयोग किया जा सकता है।”

गाँधी का ग्राम गणतंत्र उनके उत्तराधिकारी नेहरू की कल्पना के बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के विचार की विरोधी स्थिति में था। अम्बेडकर के विपरीत, जो कि गाँवों को कट्टरता और भ्रष्टाचार का केंद्र मानते थे, गाँधी भारत का भविष्य, यहाँ के गाँवों में देखते थे, और बड़े उद्योगों को ग्राम्य गणतंत्र और छोटे उद्योगों के लिए ख़तरनाक मानते थे। उन्होंने लिखा, “मैं कहूँगा कि अगर गाँव बर्बाद होते हैं, तो भारत भी नष्ट हो जायेगा। भारत किसी भी मायने में भारत नहीं रहेगा। दुनिया में उसका अपना मकसद खो जायेगा। गाँवों का पुनरुत्थान तभी सम्भव है जबकि गाँवों का शोषण बंद हो। बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण, बाज़ार और प्रतिस्पर्धा लाएँगे और यह अनिवार्य रूप से ग्रामीणों के निष्क्रिय या सक्रिय शोषण का कारण बनेगा। इसलिए हमें गाँवों के आत्मनिर्भर होने पर केंद्रित होना होगा, जिनके लिए उत्पादन का मुख्य उद्देश्य अपने लिये प्रयोग करना हो।”

कुटीर उद्योगों को लेकर गाँधी के त्रुटिपूर्ण विचारों और बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन को बुरा मानने के चलते भारत ने तीव्र औद्योगिक विकास की लगभग सारी राहें ख़ुद ही बंद कर दी थीं। नेहरू ने राज्य को औद्योगीकरण का एंजिन बनाकर इस मूर्खता को और बढ़ावा दिया। हमने छोटे उद्योगों की रक्षा करने के कारण उन्हें बड़े पैमाने पर बढ़ने या लाभकारी होने से रोका। सन् 1991 के दिवालियेपन के हमें सही राह तक पहुँचाने से पहले तक हमने उद्योगों को छोटा रखने और आयात प्रतिस्थापन पर ही ध्यान दिया।

गाँधीवादी नैतिकता और नेहरूवादी राज्यवाद ने हमें दुनिया की सबसे बुरी अवस्था में पहुँचा दिया। गाँधीवादी प्रतिमानों से बाहर निकलने के लिए हमें नेहरू-गाँधी सहमति के दायरे से बाहर के किसी शख़्स और एक बाहरी संकट की ज़रूरत थी।

आज के एक-दूसरे पर आश्रित विश्व में गाँधी का अपनी ज़रूरतों के लिए ख़ुद ही उत्पादन करने वाले गाँवों का विचार बहुत ही विचित्र होगा। लेकिन क्या एक ऐसे समय में जब कि दुनिया में इंटरनेट और भूमंडलीकरण के बाद विकास का रास्ता उत्पादन और कृषि के बजाय सेवाओं पर निर्भर है, ये कुछ ज़्यादा ही अजीब नहीं है? आज, जबकि सुदूर क्षेत्रों में काम करके लोग आजीविका कमाते हैं और घर या दफ़्तर से सेवायें दे सकते हैं, क्या यह सबकुछ अवास्तविक है ? अगर हम मान लें कि निर्माण और कृषि दोनों ही बहुत हद तक मशीनों से किये जायेंगे, तो नौकरियाँ कम से कम होती जायेंगी, और हम सब एक दूसरे से ई-मेल, सोशल मीडिया, फ़ेसबुक, ट्विटर और आदि ज़रियों से जुड़े हुए, अपने एक आभासी ग्राम्य गणतंत्र में रहेंगे।

डिजिटलाइज़ेशन से दुनिया के एक आत्मनिर्भण गाँव बन जाने की पूरी सम्भावना है। गाँधी एक बहुत अलग दुनिया में थे। ये अकल्पनीय है कि वह इस बदलाव को देख भी पाते। ग्राम्य गणतंत्र का उनका विचार उस रूप में तो ग़लत था जैसा उन्होंने सोचा था, लेकिन एक ऐसे रूप में सच हुआ है जो वो कभी सोच भी नहीं सकते थे। भारत का भविष्य शहरीकरण में है, लेकिन हमारा शहरीकरण एक वैश्विक गाँव के रूप में होगा।

स्वचालन, वैश्वीकरण और स्थानीयकरण की नई दुनिया में, जहाँ औपचारिक क्षेत्र की नौकरियाँ कम होती जायेंगी, हमारा भविष्य, अपने स्वयं के कौशल निर्माण, स्वरोज़गार, और आत्म-उन्नति पर ही तो निर्भर है- और गाँधी यही तो चाहते थे। स्व-रोज़गार, जहाँ भविष्य में सरकार और उद्योग सहायक भूमिका में होंगे। इस नई साहसी दुनिया में ग़ैरलाभकारी संगठन बड़ी भूमिका में होंगे। कहा जा सकता है, पर्याप्त गाँधीवादी।

दूसरा गाँधीवाीदी झुकाव स्वचालन और मशीनरी के प्रति उनकी घृणा से सम्बन्धित है। उन्होंने शारीरिक श्रम को उच्चकोटि का माना और अप्रचलित चरखे को गले लगाकर इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा भी की। चूँकि आज का डिजिटल संसार की बिना स्वचालन के कल्पना भी नहीं की जा सकती, तो गाँधी को एक ऐसे पुरातनपंथी व्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है जो श्रमिकों के लिए मशीनों को तोड़ दे। उनका मानना था मशीनें इंसान के लिए होनी चाहिए न कि इंसान मशीनों के लिए – जैसे कि असेम्बली लाइन में खड़े लोग करते हैं। अगर गाँधी की चलती तो फ़ोर्ड कभी अपनी मॉडल-टी असेम्बली लाइन की स्थापना नहीं कर सकते थे। गाँधी उच्च तकनीक़ की अपेक्षा कम-से-कम तकनीक़ में विश्वास करते थे। मशीन और स्वचालन पर उनके विचार थे, “मेरी मशीन सबसे आरम्भिक प्रकार की होनी चाहिए, जिसे मैं लाखों लोगों के घर में रख सकूँ।” और आगे, “मैं मशीनों के ग़ायब होने पर रोऊँगा नहीं, या इसे कोई विपत्ति नहीं मानूँगा।”

गाँधी की यह शर्त कि मशीनें इतनी छोटी हों कि लाखों लोगों के घरों में रखी जा सकें पूरी हो रही है। नई खोजों और मशीनों के छोटे से भी छोटा होते जाने से यही तो हो रहा है।

लैपटॉप से स्मार्टफ़ोन तक, मशीनरी और गैजेट्स न केवल घरों में, बल्कि आपकी जेब तक पहुँच चुके हैं। मशीनें एक ऐसे ढंग से सशक्तीकरण का हिस्सा बनी हैं, जिस पर गाँधी को भी कोई आपत्ति नहीं होती। लेकिन इन मशीनों पर हमारी अत्यधिक निर्भरता और मानवीय मूल्यों को त्यागकर मशीनों को नवदेवता बनाकर उनकी ग़ुलामी पर गाँधी को ज़रूर ऐतराज़ होता।

गहराई में जायें तो पता चलता है कि गाँधी का मुख्य विरोध मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण किये जाने से था और यहीं से उनकी मशीनों और स्वचालन पर आपत्ति की शुरुआत होती है। इसलिए, जहाँ उनका मानना था, “पूँजी कुछ लोगों के श्रम का शोषण कर ख़ुद को कई गुना बढ़ाती है,” तो उन्होंने समान रूप से यह भी देखा कि अगर स्वनियंत्रित न हो, तो संगठित श्रम भी एक बड़ा ख़तरा बन जायेगा।

जब कांग्रेस पार्टी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हमलों और हड़तालों के लिए सबसे आगे रहती थी, तो गाँधी ने स्वयं कहा था, “हमले, काम रोकना और हड़तालें अद्भुत बातें हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन इनका दुरुपयोग करना मुश्किल नहीं है।” वास्तव में, वह हड़ताल से मजबूर करके नियोक्ताओं से रियायतें पाने से घृणा करते थे। उनकी नैतिकता दोधारी तलवार थी, और वो पूँजी और श्रम के बीच संघर्ष को शाश्वत नहीं मानते थे, जबतक कि दोनों अपने-अपने धर्म पर क़ायम रहें।

सम्भवतः, जो सबसे महत्त्वपूर्ण विचार महात्मा गाँधी ने हमें दिया, जिसने हमारे समय में पूँजीवाद (2008) और समाजवाद (1989) की विफलताओं के समय में भी उन्हें पूर्णतयः निष्कलंक रखा, वो था – ट्रस्टीशिप का उनका विचार। ट्रस्टीशिप से, गाँधी का मतलब था था कि व्यापारियों को अपने उद्यमों को लाभ के लिए चलाना चाहिए, लेकिन इससे कमाया गया धन व्यक्तिगत उग्रवाद के लिए नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों के लाभ के लिए किया जाना चाहिए। यह विचार टाटा ने स्वीकार किया था, जिन्होंने अपने सभी शेयरधारकों को ट्रस्ट में रखा था ताकि विकास के लिए ज़रूरी मुनाफ़े के अलावा बाक़ी धन समाज को वापिस किया जा सके।

गाँधीजी ने एक विस्तृत सिद्धांत से परे ट्रस्टीशिप पर अपने विचारों को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं किया था, इस संदर्भ में उन्होंने लिखा, “यदि मेरे पास एक उचित मात्रा में धन विरासत या व्यापार के ज़रिये आया है तो मुझे ये पता होना चाहिए कि जो मेरे पास है वह सारा धन मेरे अपने इस्तेमाल के लिए नहीं है, जो मेरे पास है वह मेरी सम्माननीय आजीविका का अधिकार है, जोकि अन्य लाखों लोगों को मिले अधिकार से किसी भी प्रकार बेहतर नहीं है। उस धन के शेष भाग पर समुदाय का अधिकार है, और समाज के कल्याण के लिए ही इस्तेमाल होना चाहिए।”

गाँधी जी स्पष्टतया सम्पत्ति निर्माण के खिलाफ़ नहीं थे, लेकिन वो सिर्फ़ निजी लाभ के लिए सम्पत्ति के असीमित इस्तेमाल के खिलाफ़ थे।

कई मायनों में, ट्रस्टीशिप का विचार, पश्चिम में प्रचलन में आ रहा है, हालाँकि उस तरह नहीं जैसी कि गाँधी जी ने कल्पना की होगी। अमेरिका के धनी उद्योगपतियों में इधर एक शपथ लेने का चलन बढ़ा है जिसे ‘द गिविंग प्लेज’ कहते हैं। इसके तहत वो अपनी आधी से भी ज़्यादा सम्पत्ति दानार्थ दे देते हैं। प्रतिष्ठित निवेशक, वारेन बफिट ने, बिल गेट्स व कुछ अन्य अरबपतियों के साथ, कुछ वर्ष पहले ये कार्यक्रम आरम्भ किया।

आज 150 से भी अधिक अरबपतियों ने अपनी आधी से अधिक सम्पत्ति दान करने की प्रतिज्ञा कर चुके हैं, जिनमें मार्क ज़करबर्ग, विनोद खोसला, ऐलॉन मस्क, लैरी एलिसन और डेविड रॉकफेलर शामिल हैं। यहाँ भारत में, हमारे आई.टी. अरबपतियों, नारायणमूर्ति, अज़ीम प्रेमजी, और शिव नाडर परोपकार के लिए करोड़ों ख़र्च कर रहे हैं। हालाँकि दान की ये प्रवृत्ति अभी भी मुख्यधारा में नहीं आई है। शायद, ये कुछ ही समय की बात है कि वे ख़ुद को, विरासत में मिले धन के या उनके द्वारा बनायी गयी सम्पदा के ट्रस्टी के रूप में देखना शुरू करें।

गाँधी के विचार आधुनिकता पर निर्णायक विचार हो भी सकते हैं और नहीं, लेकिन उनकी नैतिक ताक़त का प्रभाव अमीर लोगों पर भी पड़ रहा है। गाँधी के मूल विचार-स्वदेशी, ग्राम्य गणतंत्र, कुटीर उद्योग, स्व-रोज़गार, श्रम की गरिमा, और धन की ट्रस्टीशिप-आज की डिजिटल दुनिया के काल के नहीं हैं, लेकिन कहीं न कहीं उनके नैतिक सिद्धांत वैसे ही बदलाव लाये हैं, जैसी कि उन्होंने इच्छा की थी। वो कुछ मायनों में सही थे, लेकिन प्रायः ग़लत कारणों से।

इस आलेख में कई उद्धरण एस.आर.टिकेकर की किताब एपिग्रैम्स फ्रॉम गाँधी जी से लिए गिये हैं।