पत्रिका
आरटीई से छात्रवृत्ति तक, अल्पसंख्यकवाद से लँगड़ाती भारतीय शिक्षा व्यवस्था
Minority Children

भारत के शिक्षा के क्षेत्र में क्या ग़लत है ? इस सवाल के जवाब में बड़ी ही मासूम सी बातें सामने आती हैं। जैसे- शिक्षा के सबके लिए उपलब्ध नहीं है, पाठ्यक्रम में रचनात्मकता या नये ढंग से खोज करने को बढ़ावा देने के बजाय, रटंत विद्या या किताबी ज्ञान को ज़्यादा अहमियत दी जाती है, सरकारी स्कूलों के दयनीय हालात, शिक्षा का व्यापार बन जाना, टुइशन और कोचिंग कल्चर में वृद्धि, अच्छे शिक्षकों की कमी, आरक्षण और माक्र्स को लेकर जुनून और ऐसा ही बहुत कुछ।

लेकिन कम से कम, मेरे लिए तो ये तीसरी दुनिया के देशों की समस्या जैसा नहीं लगता, क्योंकि अगर आप अमेरिका में भी किसी सामान्य व्यक्ति से पूछते हैं, तो वह भी यही समस्यायें गिनायेगा। ये ऐसे है कि घर की नींव कमज़ोर हो और आप दूसरी मंज़िल की ख़राब रौशनी का रोना रोयें।

हालाँकि हमें ऊपर लिखी समस्यायें दूर करने की ज़रूरत है, पर इससे भी बड़ी आधारभूत समस्या है जिसका समाधान ढूँढ़ने की ज़रूरत है। और ये समस्या है, साम्प्रदायिक आधार पर सिस्टम के विभाजन की, जोकि संविधान के भीतर साम्प्रदायिकता को ताक़तवर बनाती है।

सार्वजनिक सामान में साम्प्रदायिकता

हालाँकि भारतीय राष्ट्र-राज्य जाति और धर्म आधारित भेद-भाव जैसी सामाजिक बुराइयों को पूरी तरह ख़त्म करने की बात करता है, तो वहीं इसकी नीतियाँ इसे केवल मज़बूत करती हैं।शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें इन बुरी समझी जाने वाली नीतियों के ख़तरनाक प्रभाव महसूस किये जा रहे हैं।जबकि अच्छे स्कूल सभी भारतीय नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण हैं, चाहे वे किसी भी सामाजिक या आर्थिक हिस्से से क्यों न हों, राज्य बड़े ही अजीब तरह से अपनी ओर से तोहफ़े बाँटने का काम करता है और कहा जा सकता है कि कई बार ये काम बड़े ही अविवेकपूर्ण ढंग से किया जाता है।

शिक्षा के क्षेत्र में साम्प्रदायिक झुकाव वाली सारी योजनाओं के बारे में बात कर पाना तो असम्भव होगा। तो सुविधा के लिए, आइए सिर्फ़ उन्हीं योजनाओं की बात करते हैं जिन पर हाल में संसद की मेहरबानी रही है, अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री, मुख़्तार अब्बास नक़वी ने, 7 फ़रवरी 2017 को राज्य सभा को बताया कि उनकी सरकार ”देश भर में 6 अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों-मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी को शिक्षा के क्षेत्र में सशक्त करने के लिए 9 योजनायें (ग्रामीण इलाक़ो में भी) चला रही है।“ ये हैं:

—कक्षा एक से कक्षा 9 तक के लिए प्री मैट्रिक छात्रवृत्ति- ये वही योजना है जिसका नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान विरोध किया था। उनकी सरकार ने ये कहते हुए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था कि ये योजना धार्मिक भेदभाव वाली है, जबकि उनकी सरकार ठीक ऐसी ही एक योजना चला रही है, जो कि विद्यार्थी के धर्म को लेकर कोई भेदभाव नहीं करती है। हालाँकि एक पाँच जजों की बेंच ने योजना के पक्ष में 3-2 से फ़ैसला सुनाया था। गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी अपील की थी जहाँ हाईकोर्ट का निर्णय यथावत रखा गया था। जब मोदी लोक कल्याण मार्ग पहुँचे तो उनसे उम्मीद थी कि वह इस योजना को वापिस ले लेंगे। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भी ऐसा कुछ नहीं किया। दरअसल, इस बीच इसी योजना के लिए बजट में भी 200 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष के हिसाब से वृद्धि की गई है।2014-15 में लगभग 75,00,000 अल्पसंख्यक छात्रों को 1,100 करोड़ रुपये की धनराशि दी गई।

—कक्षा दस से पीएचडी डिग्री तक के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति- 2014-15 में मोदी सरकार ने 9,05,620 अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 501 करोड़ रुपये बाँटे।

—पेशेवर और तकनीक़ी कोर्स के लिए मेरिट की अपेक्षा साधनों पर आधारित छात्रवृत्ति योजनायें- 2014-15 में 1,38,770 विद्यार्थियों को 381 करोड़ रुपये बाँटे गये।

—व्यावसायिक पाठ्यक्रमों और सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग और सम्बद्ध योजना: मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से इस योजना के तहत, लाभार्थियों की संख्या दोगुनी हो गई है। 2014-15 में जहाँ 479 लाभार्थी थे, वहीं 2015-16 में 975 लाभार्थी हो गये।

—एम.फ़िल. और पीएच.डी. के विद्यार्थियों के लिए मौलाना आज़ादा फ़ेलोशिप: 2015-16 में इस योजना के तहत क़रीब 55 करोड़ रुपये जारी किये गये।

—संघ लोक सेवा आयोग; यूपीएससी, कर्मचारी चयन आयोग एसएससी और राज्य लोक सेवा आयोग एसपीएससी द्वारा आयोजित प्रारम्भिक परीक्षाओं में सफलता के लिए अल्पसंख्यक छात्रों का समर्थन: अल्पसंख्यक छात्रों को कोचिंग सब्सिडी देने के अलावा भी राजपत्रित अधिकारी पदों के लिए 50,000 रुपये और ग़ैर राजपत्रित अधिकारियों के पदों के लिए 25,000 रुपये तक की आर्थिक सहायता भी सरकार द्वारा दी जाती है।

—मास्टर्स, एम.फ़िल. और पीएच.डी. स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के लिए पढ़ो परदेश: अल्पसंख्यक छात्रांे को न केवल देश में अध्ययन के लिए विशेष छात्रवृत्तियाँ प्राप्त होती हंै, बल्कि उनके विदेशी अध्ययन का भी मोदी सरकार द्वारा वित्त पोषण किया जाता है जो कि ब्याज सब्सिडी आधारित होता है। 2015-16 में इस योजना द्वारा केंद्र सरकार ने 1,343 विद्यार्थियों के लिए 7.5 करोड़ रुपये दिये।

—नई मंज़िल: अन्य योजनाओं के विपरीत यह योजना यूपीए सरकार की विरासत नहीं है। यह 2015 में मोदी सरकार द्वारा उन अल्पसंख्यक युवाओं की मदद करने के उद्देश्य से शुरू की गयी थी, जिनके पास औपचारिक रूप से स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र ;पढ़ें- मदरसों में पढ़ाई करने वाले छात्रद्ध नहीं है। 2016-17 में केंद्र ने 25,000 ऐसे युवाओं के प्रशिक्षण के लिए 155 करोड़ रुपये आवंटित किये।

—कक्षा 11 और 12 में पढ़ने वाली योग्यतम अल्पसंख्यक छात्राओं के लिए बेगम हज़रत महल राष्ट्रीय छात्रवृति: जैसे कि ऊपर वर्णित  जेंडर-न्यूट्रल योजनायें पर्याप्त नहीं थीं, सरकार ने अल्पसंख्यक लड़कियों के विशेष छात्रवृत्ति देने के लिए अलग से सार्वजनिक बटुआ खोल दिया है। इसे योजना के अंतर्गत 48,000 लड़कियों को 57 करोड़ रुपये की लागत से लाभ हुआ।

जैसाकि पहले कहा जा चुका है, यह कोई व्यापक सूची नहीं है। अन्य सरकारी योजनायें जो रोज़गार में सुधार लाने पर केंद्रित हैं, अल्पसंख्यक समुदायों के लिए विशेष रूप से उपलब्ध हैं, लेकिन वे शिक्षा पर हमारी वर्तमान चर्चा के दायरे से बाहर हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ‘अनुच्छेद 46’ का सहारा लेते हुए साम्प्रदायिक चरित्र वाली ऐसी योजनाओं को सही ठहराया है:

“राज्य विशेष रूप से कमज़ोर वर्गों के शिक्षा और आर्थिक हितों को, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की, सामाजिक अन्याय और सामाजिक शोषण के सभी रूपों से रक्षा करेगा।”

यह औचित्य कई स्तरों पर दोषपूर्ण है।

सबसे पहले, यह लेख संविधान के राज्य नीति खंड के निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है, जिसका अर्थ है कि यूनिफ़ाॅर्म सिविल कोड के सामान्य विवरण की तरह ही यह न्यायालयों में लागू नहीं है और इसलिए सरकार पर क़ानूनी रूप से बाध्य नहीं है।

दूसरा, लेख ‘कमज़ोर वर्ग’ कहता है- कोई संकेत नहीं है कि इस वाक्यांश को किसी सामाजिक व्याख्या की आवश्यकता है, कि आर्थिक दिशानिर्देश भी। जबकि सच्चाई ये है कि ग़रीब तो हिंदू भी हैं।

तीसरा, निर्देश, ‘विशेषकर, एससी और एसटी’ की बात करता है। अल्पसंख्यक, जैसाकि हमने आज इसे राजनीतिक व्याख्या दे दी है, अनुच्छेद 46 के मुख्य लाभार्थी नहीं हैं। कोई ये भी मान सकता है कि सरकार अन्य समूहों के बजाय एससी/एसटी के लिए लाभ में एक बड़ा हिस्सा देती है, हालाँकि यह ग़लत होगा।

शैक्षिक धन के वितरण के विश्लेषण में, हरिप्रसाद एन, जोकि सिक्योर कोर के नाम से एक ब्लॉग चलाते हैं, अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थियों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति की तुलना करते हुए कहते हैं, ‘‘अल्पसंख्यकों को अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों की अपेक्षा समान मापदंडों ;लगभग सटीकद्ध कहीं ज़्यादा छात्रवृत्ति मिलती है।’’

लेखक ने अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति के छात्रांे को मिलने वाली प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति की तुलना की तो पाया कि अल्पसंख्यकों के लिए जहाँ छात्रवृत्ति कक्षा-एक से दस तक मिलती है तो वहीं अनुसूचित जाति वाले छात्रों के लिए छात्रवृत्ति केवल कक्षा 9 और दस में ही मिलती है। दैनिक अल्पसंख्यक विद्यार्थी को जहाँ 5,900 रुपये प्रति वर्ष की छात्रवृत्ति मिलती है, वहीं अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को 2,250 रुपये प्रतिवर्ष ही दिये जाते हैं। एक आवासी अल्पसंख्यक छात्र को प्रतिवर्ष 11,900 रुपये मिलते हैं तो वहीं उनके अनुसूचित जनजाति के समकक्ष को केवल 4,500 रुपये प्रतिवर्ष मिलते हैं।

हरिप्रसाद ने ओबीसी छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति के भी आँकड़े खोज निकाले और उनकी खोज काफ़ी परेशान करने वाली है। ओबीसी विद्यार्थियों की मैट्रिक के बाद प्रति वर्ष छात्रवृत्ति है 1,261 रुपये प्रतिवर्ष जबकि उनके समकक्ष अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को 6,040 रुपये प्रतिवर्ष छात्रवृत्ति में मिलते हैं। प्री-मैट्रिक विद्यार्थियों के मामले में हालत और भी बदतर है- ओबीसी श्रेणी के विद्यार्थियों को जहाँ 47 रुपये प्रतिवर्ष की छात्रवृत्ति दी गई तो वहीं अल्पसंख्यक श्रेणी के उनके सहपाठी को प्रतिवर्ष उनकी तुलना में लगभग 30 गुना ज्यादा 1,529 रुपये छात्रवृत्ति में दिये गये।

सतही तौर पर देखा जाये तो ऐसा लगता है कि सरकार सामाजिक रूप से निराश सभी श्रेणियों के लिए समान रूप से शैक्षिक कल्याणकारी योजनायें चला रही है, लेकिन सरसरी तौर पर भी गहराई से देखें तो सरकार की शैक्षणिक छात्रवृत्ति का आपराधिक ढाँचा उजागर हो जाता है। ऐसा लगता है मानो अनुपात, समानता या न्याय की कोई समझ नहीं इस्तेमाल की गई है।

भेदभाव के अधिकार का अधिनियम

छात्रवृत्तियाँ सरकार के अपने नागरिकों के साथ व्यवहार में अंतर का सिर्फ़ एक पहलू भर हैं। 2009 मेें संप्रग सरकार द्वारा पारित बच्चों के निःशुल्क ओर अनिवार्य शिक्षा का अधिकार ;त्ज्म्द्ध अल्पसंख्यक स्कूल वालों और ग़ैर अल्पसंख्यक स्कूल वालों के बीच शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव का प्रतीक है। ये क़ानून जो कथित रूप से गुणवत्तापरक शिक्षा का लाभ समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों तक लाता है, रहस्यमय तरीक़े से अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं होता है। क्या सरकार ऐसा मानती है कि अल्पसंख्या शैक्षिक संस्थान समाज के कल्याण में कोई योगदान नहीं दे सकते या फिर अल्पसंख्यकों के केवल अधिकार हैं कर्तव्य कोई नहीं। किसी भी तरह, आर्थिक रूप से वंचित सभी वर्गों के उत्थान का बोझ ग़ैर अल्पसंख्यक हिंदू-शिक्षण संस्थानों-पर आ गिरता है।

आइये देखें कि आरटीई अधिनियम काम कैसे करता है ? यह निर्देश देता है कि निजी विद्यालय ग़रीब और वंचित समूहों के बच्चों के लिए अपने विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान ख़ाली रखें। विद्यालयों में शिक्षकों की गुणवत्ता, शिक्षक-छात्र अनुपात, आधारभूत ढाँचे आदि को लेकर भी कई माँगें रखता है। बदले में सरकार निजी स्कूलों को उतना पैसा प्रतिपूर्ति स्वरूप देती है, जो सरकार सरकारी स्कूलों में प्रत्येक छात्र पर ख़र्च करती है।

कम से कम काग़ज़ पर। लगभग चार साल बीतने के बाद भी ज़्यादातर राज्य सरकारों ने वायदे के मुताबिक़ प्रतिपूर्ति जारी नहीं की है। यदि वे करते भी हैं, तो ये एक सरल सीधी प्रक्रिया नहीं होगी। उदाहरण के लिए, कर्नाटक सरकार ने हाल ही में स्कूलों के खि़लाफ़ आरटीई सम्बंधित मामला कोर्ट में लड़ने और हारने के बाद आंशिक रूप से भुगतान जारी किया है, लीगल ख़र्च भी विद्यालयों पर ही थोपा गया।

इस तरह की सरकारी सनक के खिलाफ़ बचाव के लिए निजी स्कूल अपने दूसरे छात्रों के लिए शुल्क बढ़ा देते हैं। जिससे वो महँगे हो जाते हैं और अल्पसंख्यक विद्यालयों को बाजार लाभ मिलता है, जोकि आरटीई दायरे से बाहर हैं। आरटीई के प्रभाव पर अन्य अध्ययन में, हरिप्रसाद दिखाते हैं कि बेंगलुरु में, निजी ग़ैर-अनुदानिक विद्यालयों की कुल संख्या 2,753 से 2,868 हो गयी है, अर्थात् 1.39 प्रतिशत प्रति वर्ष की वृदिध दर से, जबकि 2012-13 से 2015-16 के बीच। निजी अल्पसंख्यक ग़ैर-अनुदानित विद्यालयों की 160 से 340 हो गई है, वृद्धि दर 37.5 प्रतिशत प्रति वर्ष रही है।

अंततः ग़ैर अल्पसंख्यक विद्यालय या तो बंद हो जाते हैं या फिर बचे रहने के  रचनात्मक तरीक़े जैसे कि भाषाई अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र ढूँढ़ते हैं।

भाषाई अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र प्राप्त करना, जितना आसान लगता है उतना है नहीं। आवेदन को अल्पसंख्य शैक्षिक संस्थान राष्ट्रीय आयोग से गुज़रना होता है, इस संस्था की स्थापना 2004 में यूपीए सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से की थी, इस संस्था की सदस्यता हिंदुओं पर निषिद्ध है। एनसीएमअई अनुच्छेद 2 के अनुसार,

4 .अध्यक्ष या अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए योग्यता:

(1) अध्यक्ष के रूप में कोई व्यक्ति अयोग्य होगा, जब तक वह निम्न योग्यतायें नहीं पूरी करता है,

अल्पसंख्यक समुदाय का सदस्य है; तथा

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे हैं।

अध्यक्ष के रूप में कोई व्यक्ति अयोग्य होगा, जब तक वह निम्न योग्यतायें नहीं पूरी करता है,

अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति हो,

श्रेष्ठता, क्षमता और ईमानदारी वाला व्यक्ति हो।

संक्षेप में यूपीए का मानना था कि हिंदू ग़ैर-हिंदुओं के साथ उचित व्यवहार के लिए उत्तरदायी नहीं हो सकते हैं, हालाँकि ग़ैर हिंदुओं केा ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी।

आप सोच सकते हैं कि न्यायालय क्या कर रहे थे ? वो ऐसे खुलेआम भेदभाव वाले कृत्यों को क्यों नहीं रोकते ? क्योंकि यूपीए ने पहले ही कोर्ट को भाँपते हुए इस तरह के भेदभाव के लिए सीधा रास्ता बनाने के लिए 2005 में, 93वाँ संविधान संशोधन कर लिया था। उन्होंने ऐसा किन परिस्थितियों में, क्यों और कैसे किया, इस बारे में हम बाद में चर्चा करेंगे।

कुछ लोग अब ये प्रस्ताव दे सकते हैं कि आरटीई अधिनियम और 93वें संशोधन को रद्द कर दिया जाये। निश्चित रूप से, क्या इससे अल्पसंख्यकों और ग़ैर अल्पसंख्यकों के बीच समानता आएगी ? मुझे डर है कि ये इतना आसान नहीं होगा।

नेहरू से वाजपेयी तक: क़ानूनी विकास

आर टी ई अधिनियम और 93वें संवैधानिक संशोधन के इतिहास को समझने के लिए हमें हमारे संविधान में दिये गये शिक्षा से सम्बन्धित अल्पसंख्यक अधिकारों की जड़ों पर वापिस जाना होगा।

आधुनिक भारतीय गणराज्य के संस्थापक पूर्वजों, जिनमें जवाहरलाल नेहरू सम्मिलित थे, उनका मानना था कि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की अवधारणा भारत के लिए अजनबी थी, और अंगे्रज़ों ने इसे भारतीय जनमानस में अपनी बाँटो और राज्य करो की नीति के तहत फैलाया था। फिर भी, जब संविधान बनाया जा रहा था तो यह सोचा गया कि इस विभाजनकारी वर्गीकरण को ख़त्म करना अभी बुद्धिमानी नहीं होगा। ख़ूनी विभाजन के बाद, संविधान निर्माता अल्पसंख्यकों की चिंतायें शांत करने के लिए चिंतित थे। संविधान सभा में अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्य उत्साहपूर्व अपने लोगों के अधिकारों को सुरक्षित करने की कोशिश करते थे। कुछेक अपमानजनक साम्प्रदायिक धाराओं जैसे कि विधायिका में आरक्षण को तो बढ़ावा मिल गया लेकिन ज़्यादातर ऐसी माँगें बहुमत नहीं पा सकीं। जो भी अधिकार स्वीकृत हुए थे, वह भी किसी भी तरह लोगों का प्यार से बिगड़ा हुआ या विशेषाधिकार प्राप्त समूह बनाने की इच्छा से नहीं स्वीकृत हुए थे। उनका इरादा भविष्य में सर उठाने वाले किसी भी प्रकार के बहुसंख्यकवाद से उन्हें बचाने का था। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद से, सुप्रीम कोर्ट ने मूल रूप से संविधान में शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यकों को दी गई शिक्षाओं के सार को समझने के बजाय, संविधान की व्याख्या करते हुए मूलतः सोचे गये अधिकारों से भी कहीं अधिक अधिकार दे दिये हैं। उदाहरणस्वरूप, उनके मूल अधिकार अनुच्छेद 30 ;1द्ध की ग़ैर अल्पसंख्यकों के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना के अधिकार अनुच्छेद 19 ;1द्ध ;गद्ध की अपेक्षा अधिक मूलभूत मानकर व्याख्या की गई।

अनुच्छेद 30 (1)  के अनुसार:

चाहे धर्म या भाषा के आधार पर, सभी अल्पसंख्यक को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना और उनके प्रशासन को चलाने का अधिकार होगा।

‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा को, हालाँकि, पाठ से अनुपस्थित रखा गया है। संविधान निर्माताओं ने ये निर्णय अदालतों पर छोड़ दिया। अल्पसंख्यक समूह के सदस्य कौन हैं ? कोई भी समुदाय अल्पसंख्य समुदाय बनने योग्य है, ये तय करने के लिए किस प्रकार के टेस्ट किये जा सकते हैं ? इस स्तर के निर्धारण के लिए इस्तेमाल में लाया जाने वाला भौगोलिक क्षेत्र ज़िला होगा, प्रदेश होगा या फिर देश? क्या अल्पसंख्यक विश्वास, भाषा या जातीयता पर आधारित हैं ?

कई दशकों में आये कई फ़ैसलों से इस सवाल के समाधान निकालने का प्रयास किया गया है। केरल शिक्षा विधेयक, 1957 के मामले से दो टेस्ट सामने आये – अल्पसंख्यक संख्यात्मक रूप से छोटा होना चाहिए ;50 प्रतिशत से कमद्ध और क़ानून के संदर्भ में इसे परिभाषित किया जायेगा। इसलिए अगर सवाल प्रादेशिक क़ानून का है तो प्रदेश की जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यकों का फ़ैसला किया जायेगा, यदि प्रश्न देश का है तो राष्ट्रीय जनसंख्या की कसौटी पर निर्णय लिया जायेगा। इन विचारों को बाद के कई मामलों में दोहराया गया- श्रीकृष्ण बनाम गुजरात विश्वविद्यालय, डीएवी काॅलेज, जालंधर बनाम पंजाब, श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी विद्यालय बनाम पश्चिम बंगाल, और अन्य। लेकिन कई वर्षों तक इस नज़रिये को मानने के बाद, सुप्रीम कोर्ट की 11 जजों की बेंच ने टीएम पई फ़ाउंडेशन बनाम कर्नाटक के मामले में निर्णय किया, चूँकि भाषायी अल्पसंख्यक केवल राज्य जनसंख्या के आधार पर तय किया जा सकता है, वही परीक्षा धार्मिक अल्पसंख्यकों पर भी लागू होना चाहिए। यह एक बड़ा बदलाव था, वर्तमान में यी अदालत का प्रचलित दृष्टिकोण है।

पई फ़ाउंडेशन केस से पहले अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के विशिष्ट विषय पर आना, अदालत ने उदारता से अनुच्छेद 30 की व्याख्या की गई, विशेषतया, इन शब्दों ‘‘अपनी पसंद का’’।

न्यायालयों के विभिन्न निर्णयों में धारा 29 और 30 के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों को दी गई विस्तारित स्वायत्तता की एक संक्षिप्त सूची है।

—संविधान लागू होने से पहले स्थापित अल्पसंख्यक संस्थान अनुच्छेद 30(1) के संरक्षण की सुविधा उठायेंगे।

—किसी भी अल्पसंख्यक संस्थान की भारतीय नागरिक द्वारा स्थापना ही आवश्यक नहीं है। भारत में निवासी, कोई विदेशी व्यक्ति भी, स्थानीय अल्पसंख्यकों की मदद से संस्थान की स्थापना कर सकते हैं।

—गुजरात में सिधिराजभाई बनाम गुजरात में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यकों को दिया गया अधिकार वास्तविक है, और किसी भी तरीक़े से इसे कम नहीं किया जा सकता है। अदालत ने निर्णय सुनाया कि यह अल्पसंख्यकों को पूर्ण शक्ति तो प्रदान नहीं करता, लेकिन ये सुझाव देकर उन्हें बड़ी स्वायत्तता प्रदान की गई कि अगर कोई राज्य किसी अल्पसंख्यक संस्थान को विनियमित करे, तो नियमों को दो परीक्षणों से गुज़रना होगा। अद्ध नियमों को तर्कसंगत होना चाहिए। बद्ध ये संस्था के शैक्षणिक चरित्र का नियमन होना चाहिए, तथा संस्थान को अल्पसंख्यक समुदाय या अन्य लोगों के लिए शिक्षा का प्रभावी वाहन बनाने के लिए अनुकूल बनाने वाला होना चाहिए।

—अल्पसंख्यक संस्थानों को शिक्षा के माध्यम का चयन करने का अधिकार है, क्योंकि ये संस्कृति के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। हालाँकि राज्य एक माध्यम लिख सकता है, अल्पसंख्यक समुदायों के निर्देश की भाषा की भी अनुमति होनी चाहिए।

—अल्पसंख्यक संस्था की मान्यता/सम्बद्धता के क्षेत्र में भी, सामान्य संस्था की अपेक्षा स्वायत्तता बहुत अधिक है। राज्य इन संस्थानों की सम्बद्धता के लिए ऐसी शर्तें नहीं रख सकता, जो अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत संस्था के अधिकारों को ख़तरे में डालें।

—राज्य किसी भी अल्पसंख्यक संस्थान का अधिग्रहण नहीं कर सकता है, सिवाय इसके कि संस्थान स्वयं बिना शर्त के आत्मसमर्पण करने की पेशकश करता है। अदालतों ने यह माना है कि अल्पसंख्यक संस्थानों के हितों सर्वोच्च लाभ तभी है जबकि उनके प्रशासन का नियंत्रण उनके स्वयं के हाथों में होता है।

—जहाँ तक स्टाफ़ की नियुक्ति, प्रशासन द्वारा सेवा शर्तों और अनुशासनात्मक नियंत्रण का सम्बंध है, अदालतों ने से नियामक उपाय माना है, और इन नियमों से शिक्षकों के कार्यकाल को सुनिश्चित करने, सेवाओं की स्थिति में सुधार, से शैक्षिक उत्क्ष्टता को बढ़ाने में भी मदद मिलती है। तो राज्य इन धर्मनिरपेक्ष क्षेत्रों को विनियमित कर सकते हैं।

—इस तरह की संस्था उस स्थिति में भी अल्पसंख्यक संस्था होगी यदि उसने आम जनता से धन लिया है केवल अल्पसंख्यकों से नहीं।

इनके अलावा, शिक्षा पर टिप्पणी के लिए प्रतिष्ठित एक ट्विटर हैंडल, @RealityCheckInd, अल्पसंख्यकों को प्राप्त होने वाले कई अन्य विशेष लाभों की सूची देता है। सरकार द्वारा पोषित वित्त पोषित अल्पसंख्यक संस्थानों को 95 प्रतिशत तक सहायता मिलती है, उन्हें शिक्षकों की भर्ती के लिए अनूसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण के दिशा निर्देशों का पालन नहीं करना पड़ता है, ग़ैर अल्पसंख्यक शिक्षकों की नियुक्ति करने के लिए उन पर कोई प्रतिबंध नहीं है, और वे छात्रों को प्रवेश के लिए अपने मापदंड निर्धारित कर सकते हैं।

लेकिन अदालतों द्वारा निरंतर पुनः पुष्टि करने के बाद दशकों में पत्थर में डाली गई दो महत्वपूर्ण मामलों पर न्यायिक विकास सबसे महत्वपूर्ण हैं।

पहला-अल्पसंख्यक संस्थान किस तरह के विद्यार्थियों को प्रवेश दे सकते हैं, और दूसरा, वे किस तरह की शिक्षा प्रदान कर सकते हैं। इन सवालों के जवाब देने में न्यायपालिका की घोषणा हमें इसका अभिप्राय समझने में मदद करती है कि अल्पसंख्यकों को दिये गये अधिकार कितने विस्तृत हो गये हैं।

केरल शिक्षा विधेयक के मामले में, अदालत ने फ़ैसला सुनाया कि अल्पसंख्यक संस्थान मंे छोटी मात्रा में बाहरी लोगों के होने से संस्था के अल्पसंख्यक चरित्र की समाप्ति का कारण नहीं होगा। अदालत ने ‘‘छोटी मात्रा में बाहरी लोगों के होने’’ का कोई सटीक प्रतिशत निर्दिष्ट नहीं किया है। सेंट स्टीफेंस कॉलेज बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय मामले के ऐतिहासिक निर्णय में ये निश्चित किया गया। बहुमत से निर्णय लेते हुए, जस्टिस के. जगन्नाथ शेट्टी ने कहा,

संस्थान का उद्देश्य जिस क्षेत्र में सेवा प्रदान करने का है, उस क्षेत्र में समुदाय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए राज्य इस श्रेणी में प्रवेश का नियमन कर सकता है। लेकिन किसी भी अवस्था में ये प्रवेश सालाना प्रवेश के पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।

उन्होंने यह फ़ैसला भी दिया, ‘दूसरे समुदाय के उम्मीदवारों को चयन शुद्धतम योग्यता के मापदंड पर होगा।’ हालाँकि, पचास प्रतिशत स्थान अल्पसंख्यकों को आरक्षित रखने पर आपत्ति की गई कि ये अनुच्छेद 29 (2) द्वारा दिये गये अधिकारों का उल्लंघन करता है, जो कहता है- ‘‘कोई भी नागरिक धर्म, जाति, नस्ल, भाषा या उनमें से किसी भी आधार पर राज्य द्वारा बनाये गये या राज्य द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त संस्थानों में प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा।’’

जस्टिस शेट्टी ने आगे अनुच्छेद 30 (1) द्वारा दिये गये अधिकारांे को अनुच्छेद 29 (2) में दिये गये अधिकारों से ऊपर माना और कहा, ‘‘तथ्य ये है कि अनुच्छेद 29 (2) अल्पसंख्यकों और ग़ैर-अल्पसंख्यकों दोनों पर लागू होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अनुच्छेद 30 (1) के तहत अल्पसंख्यकों को प्राप्त विशेष अधिकार समाप्त हो जाते हैं।’’

दूसरे प्रश्न का सम्बन्ध अल्पसंख्यक संस्थानों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के प्रकार से है। एक तर्क यह था कि अनुच्छेद 30 ;1द्ध को अनुच्छेद 29 (2) से जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि नागरिकों के किसी भी वर्ग को उनकी संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार है, इसलिए एक अल्पसंख्यक समूह जो शैक्षणिक संस्थान की स्थापना कर रहा है, वह केवल उस शिक्षा को प्रदान करने का काम केवल अपनी संस्कृति या भाषा की रक्षा के लिए करेंगे। आखि़रकार, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करने वाले अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 30 (1) के संरक्षण की आवश्यकता क्यों होगी ?

एक अन्य तर्क यह था कि अनुच्छेद 30 (1) को अलग से पढ़ा जाना चाहिए, और ‘अपनी पसंद का’ शब्द का मतलब है कि संविधान निर्माता उन्हें विशाल शक्तियाँ देना चाहते थे, इसलिए ये उन पर निर्भर है कि वे अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए धार्मिक शिक्षा देना चाहते हैं या धर्मनिरपेक्ष प्रशिक्षण देना चाहते हैं। यह दूसरा दृष्टिकोण अदालतों में प्रबल हुआ: जस्टिस दास ने केरल शिक्षा विधेयक मामले में, जस्टिस हिदायतउल्लाह ने डब्ल्यू.प्रूस्ट बनाम बिहार मामले में, जस्टिस रेड्डी, जस्टिस खन्ना, जस्टिस मैथ्यू, जस्टिस बेग और जस्टिस द्विवेदी ने पिछले कई सालों में कई बार इस नज़रिये को दोहराया और अब यह मुद्दा पूरी तरह से न्यायिक क्षेत्र में स्थापित हो चुका है। सभी ने यह माना कि अल्पसंख्यकों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करने के अधिकार के बग़ैर, अनुच्छेद 30 (1) के अंतर्गत आने वाले अधिकार अर्थपूर्ण नहीं रह जायेंगे।

फिर भी, ये ज़रूरी नहीं कि जो कुछ भी तकनीक़ी रूप से न्यायसंगत हो वो निष्पक्ष भी हो। निर्णयों के निहितार्थ: मान लीजिए एक ज़िले में दो स्कूल हैं, एक अल्पसंख्यक ईसाइयों द्वारा और दूसरा हिंदुओं द्वारा चलाया जा रहा है। दोनों धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करते हैं, और समान विषय पढ़ाते हैं। अब हम मान लीजिस दोनों में क्रमशः 10 से 12 प्रतिशत ईसाई छात्र हैं। अदालतों के मुताबिक़, ईसाई स्कूल को जहाँकि ईसाई विद्यार्थियों का प्रतिशत कम है,  हिंदुओं द्वारा चलाये जा रहे स्कूलों की तुलना में कहीं ज़्यादा स्वायत्तता प्राप्त है। इंसाफ़ को पूरी तरह मज़ाक़ बना दिया गया। 93वें संवैधानिक संशोधन के पारित होने से पहले यह स्थिति थी। इसके अतिरिक्त, के. ए. हामिद बनाम मो. हाजी साबू सिद्दीक पाॅलिटेक्निक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि सरकार के आदेश जिसमें पाॅलिटेक्निक संस्थानों को एक निश्चित प्रतिशत में अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों के लिए स्थान आरक्षित करने को कहा गया है, अल्पसंख्यक संस्थानों पर नहीं लागू किया जा सकता क्योंकि ये अनुच्छेद 30 (1) का उल्लंघन करता है। जैसा कि इस फ़ैसले से साफ़ संकेत मिलता है, निष्पक्षता के लिहाज़ से भी, अल्पसंख्यक संस्थानों तक आरटीई का दायरा बढ़ा पाना सम्भव नहीं है, क्योंकि ये विधेयक क़ानूनी तौर पर इस स्थिति में नहीं है।

सवाल उठता है कि अगर अल्पसंख्यक संस्थानों को इतनी स्वायत्तता प्राप्त थी ही तो फिर आर टी ई अधिनियम और 93वाँ संवैधानिक संशोधन पारित करने की क्या आवश्यकता थी ?

पूर्व सोनिया युग

उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर एक के बाद एक आये तीन फ़ैसलों में है जो कि सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच से आये। जिनसे हिंदुओं द्वारा चलाये जा रहे स्कूलों को बड़ी स्वायत्तता प्रदान की गयी, हालाँकि अभी भी अल्पसंख्यक संस्थानों के बराबर नहीं है।

टीएमए पई फ़ाउंडेशन बनाम कर्नाटक का निर्णय 2002 में आया था। न्यायमूर्ति किरपाल ने बहुमत से निर्णय लिखते हुए कहा,

‘‘एक दृढ़ शुल्क ढाँचे का निर्धारण, सरकारी निकाय के गठन और संरचना को निर्देशित करना, शिक्षकों या स्टाफ़ के लिये नामांकन की अनिवार्यता, या प्रवेश के लिए विद्यार्थियांे का नामांकन अस्वीकार्य प्रतिबंध होंगे।

‘‘ग़ैर अनुदानित निजी स्कूलों के मामले में, प्रशासन के क्षेत्र में प्रबंधन को अधिकतम स्वायत्तता दी जानी चाहिए, जिसमें नियुक्ति के अधिकार, आनुशासनिक शक्तियाँ, विद्यार्थियों का प्रवेश और शुल्क निर्धारण शामिल हैं।’’

उन्होंने आगे लिखा, ‘‘किसी भी अन्य ग़ैर-अनुदानित संस्थान की तरह, भाषाई या धार्मिक शैक्षिक संस्थानों को निम्न के सम्बंध में अधिकतम स्वायत्तता सुनिश्चित की जाती है, जैसे कि शिक्षकों की भर्ती की विधि, शुल्क निर्धारण, और छात्रों का प्रवेश।’’

जैसा कि भाषा से स्पष्ट है कि इससे ग़ैरअल्पसंख्यक ग़ैर सहायता प्राप्त संस्थान अल्पसंख्यक संस्थानों की बराबरी पर आ गये। इसके अतिरिक्त, अदालत ने इस सवाल का भी जवाब दिया, ‘‘क्या अनुच्छेद 29 के साथ-साथ अनुच्छेद 14 और 15 (1) के अंतर्गत ग़ैर अल्पसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय के ही समान शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और प्रशासनिक तौर पर चलाने का अधिकार है?’’ जवाब है-

“शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन को चलाने का अधिकार भारतीय संविधान के अंतर्गत सभी नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(g) और 26 के तहत और अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 30 के तहत दिया गया है।

सभी नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(g) और 26 के तहत शैक्षिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार अनुच्छेद 19(6) और 26(a) के प्राविधानों के अधीन है। हालाँकि, अल्पसंख्यक संस्थानों को इस फ़ैसले में की गई चर्चा के अनुसार अल्पसंख्यक छात्रों को स्वीकार करने का अधिकार होगा।’’

यहाँ भी अल्पसंख्यक संस्थानों को ज़्यादा स्वायत्तता दी गई है, लेकिन हिंदुओं द्वारा चलाये जा रहे संस्थान अब अल्पसंख्यक संस्थानों के लगभग समकक्ष थे।

तथ्य ये है कि 11 न्यायाधीशों की बेंच के इस निर्णय ने इसके मूल्य को और अधिक बढ़ा दिया था। हालाँकि, कर्नाटक में इस्लामिक अकेदमी बनाम कर्नाटक मामले में, एक नई पाँच न्यायाधीशों की पीठ का गठन किया गया, जहाँ न्यायालय ने तर्क दिया कि टीएम पई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक मामले का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए, ‘कि ग़ैर अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को भी वही समान अधिकार दिये जायेंगे जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 द्वारा अल्पसंख्यकों को सौंपे गये हैं। ग़ैर अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 30 की सुरक्षा नहीं मिली है। इसलिए, कुछ निश्चित मामलों में वो अल्पसंख्यक संस्थानों के स्तर पर नहीं हैं और हो भी नहीं सकते हैं।’

बहुमत में दिया गया तर्क था कि अल्पसंख्यक संस्थान ‘‘ग़ैर अल्पसंख्यक संस्थानों की अपेक्षा बेहतर स्थिति में हैं।’’ इसमें कहा गया है कि अनुच्छेद 30(1) के तहत सुरक्षा केवल अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को ‘‘विशेषाधिकार’’ के रूप में उपलब्ध है। हालाँकि, जस्टिस एस.बी. सिन्हा ने अलग से लिखते हुए, कहा कि यह ‘‘विशेषाधिकार’’ नहीं बल्कि केवल एक ‘‘अतिरिक्त सुरक्षा’’ था।

समानता अभी भी हिंदुओं द्वारा चलाये जा रहे स्कूलों के लिए दूर की कौड़ी रही लेकिन टीएमए पई फ़ाउंडेशन बनाम कर्नाटक मामले में जीती गई स्वायत्तता बरक़रार रही। 2005 में, पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र मामले में इन दो मामलों में उठे मुद्दों को और स्पष्ट करने के लिए सात जजों की बंेच का गठन किया गया। यहाँ फ़ैसला हुआ, ‘‘न तो आरक्षण नीति राज्य द्वारा लागू की जा सकती है, और न ही किसी भी कोटा या प्रवेश का प्रतिशत राज्य द्वारा अल्पसंख्यक या ग़ैर-अल्पसंख्यक अनुदानित शैक्षणिक संस्थान में विनियोजित किया जा सकता है।’’

सोनिया गाँधी युग

पई फ़ाउंडेशन और पी.ए. इनामदार मामलों के फ़ैसलों, और न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा के बयान को साथ देखें तो इस क्षेत्र को काफ़ी स्पष्टता से परिभाषित किया गया है और आरटीई की प्रारम्भिक अवस्था में ही इसे रोकने लायक़ माना जा सकता है। इसके अल्पसंख्यक संस्थानों को लाभान्वित करने वाले प्रावधानों के पक्ष में हिंदू स्कूलों की क़ीमत पर एक संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता पड़ी। 93वें संशोधन ने अनुच्छेद 15 में एक ऐसा खंड जोड़ा जिसने साम्प्रदायिक शैक्षणिक संस्थानों को पर पुराने मामलों पर आधारित क़ानून को पूरी तरह प्रभावी ढंग से निरस्त कर दिया। इसमें लिखा था:

15 (5) इस अनुच्छेद में या इसके उपखंड g में या अनुच्छेद 19 के उपखंड 1 में कुछ भी ऐसा नहीं है जो राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए सहायता प्राप्त या ग़ैर सहायता प्राप्त निजी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए विशेष प्रावधान लाने या क़ानून बनाने से रोक सके, सिवाय अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा चलाये जा रहे शैक्षणिक संस्थानों के अलावा जिन्हें अनुच्छेद 30(1) का संरक्षण प्राप्त है।

93वें संशोधन विशेष रूप से अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत टीएमए पई फ़ाउंडेशन मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बहुसंख्यक समुदाय को दी गई सुरक्षा पर  निशाना बनाया गया। उसने न केवल सरकार द्वारा सहायता प्राप्त हिंदुओं द्वारा संचालित स्कूलों को भी निशाना बनाया गया, बस सुविधानुसार अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को बाहर छोड़ दिया गया क्योंकि सरकार जानती थी कि अदालत ने इसे  अमान्य क़रार दिया होता।

अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारतीय संघ मामले में 93वें संशोधन को चुनौती दी गई। कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि संवैधानिकता का परीक्षण तब किया जा सकता है जब सरकार ने क़ानून पारित किया हो और ये आरटीई अधिनियम सरकार ने  2009 में पारित किया गया था। यहाँ ये कहना भी आवश्यक नहीं था कि यह नियम केवल हिंदुओं द्वारा संचालित स्कूलों पर ही लागू होता है क्योंकि 93वंें संशोधन ने पहले ही इस बिंदु को समाप्त कर दिया था। अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के ग़ैर-अनुदानित निजी स्कूलों में भारतीय संघ के खि़लाफ़ फ़ैसला सुनाया कि अनुदानित अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान आरटीई अधिनियम के दायरे से बाहर हैं , लेकिन:

‘‘… हम मानते हैं कि 2009 का अधिनियम संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक स्कूलों की मदद करने के लिए है।’’

सबसे राजनीतिक रूप से पारदर्शी क़दम में, यूपीए सरकार सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों को बचाने के लिए, कोर्ट के फ़ैसले के 12 दिन के भीतर ही अधिनियम को संशोधित कर दिया।

कपिल सिब्बल ने संसद में तर्क दिया:

“सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की है कि अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत आने वाले नियम और स्पष्टतः कहा कि ग़ैर सहायता प्राप्त निजी संस्थान इस अधिनियम के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित नहीं हैं। यह स्पष्टता सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई है। उस क़ानून को बदला नहीं जा सकता है। यही सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय है। लेकिन, सहायता प्राप्त संस्थानों को शामिल किया गया है। अब, इस संशोधन के अंतर्गत, सहायताप्राप्त संस्थानों में, विद्यालय की प्रबंधन समितियाँ अल्पसंख्यक संस्थानों को शासित नहीं करेंगी। उनका केवल सलाहकार का कार्य करेंगी। इसलिए हमने इसे छोड़ दिया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अंतर्गत, इस संशोधन के तहत सहायताप्राप्त संस्थानों का प्रशासन स्कूल की प्रबंधन समिति द्वारा किया जायेगा, हम पहले ही कह चुके हैं, सहायताप्राप्त संस्थानों को कवर नहीं किया जायेगा। उनकी क्षमता केवल सलाहकार की होगी। तो, एक तरह से, अल्पसंख्यक समुदायों के हितों की रक्षा के लिए हम दो क़दम आगे गये हैं। अतः अदीबजी, हम आपसे अनुरोध करते हैं, कृपया आप आश्वस्त रहें कि हम अल्पसंख्यक समुदाय की चिंताओं के प्राति बेहद संवेदनशील हैं। अगर आप दो क़दम चलते हैं, तो हम यह सुनिश्चित करने के लिए दस क़दम चलेंगे कि उनके हित पूरी सुरक्षित रहें।”

फिर भी, 93वें संशोधन की संवैधानिक वैधता अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने तय नहीं की है। इस मामले को सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पाँच न्यायाधीशों की एक बंेच का गठन किया। इस पीठ में आई.पी.एल. के लिए प्रसिद्ध जस्टिस आर.एम.लोढ़ा और भारत के प्रतीक्षारत मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र शामिल थे। न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक द्वारा लिखे गये फ़ैसले को 2014 के आम चुनावों के परिणाम से ठीक 10 दिन पहले ही घोषित किया गया था, और हिंदू शिक्षा संस्थानों और अल्पसंख्यक संस्थानों के बीच समानता की सभी उम्मीदों को धराशायी कर दिया।

अदालत ने लिखा कि हालाँकि टीएमए पई फ़ाउंडेशन मामले में फ़ैसला सुनाया गया कि अनुच्छेद 19(1)(g) के अर्थ के भीतर एक शैक्षिक संस्था की स्थापना और चलन ‘‘व्यवसाय’’ है, उन्होंने यह भी कहा कि अगर समाज के कमज़ोर और पिछड़े वर्गों के छात्रों को अगर निःशुल्क प्रवेश या छात्रवृत्तियाँ दी जायें तो भी उनके इस अधिकार या स्वायत्तता पर कोई ख़ास फ़रक़ नहीं पड़ेगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस बात से भी इत्तेफ़ाक़ नहीं रखा कि अनुच्छेद 15 ;5द्ध ने स्वायत्तता के साथ शैक्षिक संस्थानों को चलाने के बहुसंख्यकों के अधिकारों को नष्ट कर दिया है। कोर्ट ने यह लिखा कि अनुच्छेद 15 (5) ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत संविधान प्रदत्त इस अधिकार के स्वैच्छिक तत्व को ‘‘कुछ हद तक सीमित कर दिया है’’।

न्यायालय की ‘‘बहुत सीमित हद तक’’ की विस्तृत परिभाषा का अर्थ है एक चैथाई निःशुल्क सीटें जोकि निश्चय ही कल्पना की ऊँची उड़ान है और ये भी नहीं कह सकते कि 25 प्रतिशत की ये सीमा मनमानी तो है ही साथ ही ये भविष्य में और ऊँची भी हो सकती है, क्योंकि आरक्षण की निचली सीमा ही एक चैथाई सीटें मानी गई हैं।

मोदी का प्रवेश

नरेन्द्र मोदी से काफ़ी उम्मीदें थीं कि सत्ता में चुनकर आने के बाद वे शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी साम्प्रदायिकता को जारी नहीं रखेंगे। साम्प्रदयिक छात्रवृत्ति संख्या में न केवल वृद्धि हुई बल्कि भाजपा सरकार के समय में इनके लिए बजट आवंटन भी अधिक हुआ है, जोकि नरेंद्र मोदी के समर्थकों के लिए निराशा का विषय है। अलसे अलावा आरटीई को ख़त्म करने के बजाय, राज्यांे की बीजेपी सरकारें इस अधिनियम के प्रावधानों को उत्साहपूर्वक लागू कर रही हैं। मोदी ने अपने चुनाव अभियान में जिस कुशल प्रशासन की बात कही थी, उससे हिंदुओं द्वारा चलाये जा रहे स्कूल बहुत तेज़ी से बंद हो रहे हैं, और अल्पसंख्य विद्यालय बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि हिंदू शिक्षा व्यवसायी इस तरह के शत्रुतापूर्ण बाज़ार में प्रवेश करने की हिम्मत ही नहीं कर पा रहे हैं।

आगे की राह

यह स्पष्ट है कि आरटीई अधिनियम और 93वाँ संशोधन निरस्त करने से भी शैक्षिक संस्थानाओं को समानता नहीं मिलेगी। यहाँ तक कि हिंदू संस्थानों के लिए अनुकूल निर्णयों में भी यह बात मानी गयी है कि अनुच्छेद 29 और 30 के आधार पर, अल्पसंख्यक संस्थानों का स्तर हिंदुओं द्वारा चलाये जा रहे संस्थानों की अपेक्षा बेहतर है। पूर्ण समानता प्राप्त करने के लिए, अनुच्छेद 29 और 30 में संशोधन करना होगा, जिसकी सम्भावना बहुत कम दिखती है। लेकिन इसका अर्थ आर टी ई अधिनियम और 93वें संशोधन से पीछे हटने से नहीं है। बल्कि ये रेखांकित करना है कि ये केवल पहला क़दम हो सकता है, जो हिंदुओं द्वारा चलाये जा रहे स्कूलों को कुछ राहत प्रदान करेगा। अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत और अधिक स्वायत्तता के लिए लड़ना होगा।

शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में समय बहुत अहम है। एक पीढ़ी देश को बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि लोक कल्याण मार्ग के इन अधार्मिक नीतियों पर जागते-जागते बहुत देर नहीं हो चुकी होगी।