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हिंदू धर्म में वापसी के लिए कई परेशानियों से होना पड़ता है दो चार

प्रसंग
  • हिंदू धर्म में धर्मान्तरण या वापसी भारत में एक जोखिम भरा कार्य है। फिर भी बहुत सारे लोग अपना नाम गुप्त रखते हुए यह यात्रा करने के लिए दृढ़ निश्चयी हैं।

27 वर्षीय शाह (बदला हुआ नाम) आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले से हैं। जन्म से मुस्लिम, शाह नमाज़ पढ़ते हैं और साथ ही साथ हिंदू श्लोकों का पाठ भी करते हैं। उन्होंने स्थानीय मस्जिदों का दौरा किया और हिंदू मंदिरों में भी पूजा की। उन्होंने स्वराज्य को बताया, “हमारा परिवार उदारवादी है। असल में हमारे गाँव के अधिकांश मुस्लिम परिवार हमारी ही तरह उदारवादी हैं। हमारी आस्था अल्लाह के लिए भी उतनी ही है जितनी कि चौडेश्वरी माता के लिए। मैं बड़ा होते-होते चौडेश्वरी मंदिर से व्यक्तिगत रूप से जुड़ गया।”

जब शाह किशोरावस्था में थे तो उन्हें एक संकट का सामना करना पड़ा जिसने “उनकी आस्था की नींव को हिलाकर रख दिया”। परिवार हैदराबाद में स्थानान्तरित हो गया, जहाँ उन्हें ‘शिर्क’ (इस्लाम में बहुदेववाद का पालन करने का दंड) की शिक्षा मिली। स्थानीय मस्जिदों में, उन्हें बताया गया कि एक सच्चा मुसलमान मूर्ति पूजा में शामिल नहीं होता है या अन्य धर्मों को स्वीकार नहीं करता है। वह कहते हैं कि मौलवियों ने उन्हें समझाया कि प्रार्थना के सभी रूपों को केवल इस्लाम के विस्तार और महिमा की तरफ ही निर्देशित किया जाना चाहिए। उस समय शाह ने उन पर विश्वास कर लिया, इस्लामी टोपी पहनी और पाँच समय नमाज़ पढ़ने वाले व्यक्ति बन गए। हालांकि, वह लंबे समय तक ऐसा नहीं कर सके।

वह कहते हैं कि वह आंतरिक रूप से उस समावेशी संस्कृति के इच्छुक थे जिसमें वह बड़े हुए थे। उन्हें मौलवी पसंद नहीं थे जो ईद पर बकरियों की बलि देने पर जोर दे रहे थे। वह कहते हैं, “मेरे गाँव में किसी भी मुस्लिम परिवार ने कभी भी ईद पर बकरियों या अन्य जानवरों की बलि नहीं दी है और न ही मैंने कभी गोमांस का सेवन किया है।” जवाब पाने के लिए उन्होंने इंटरनेट का सहारा लिया और उन्हें अग्निवीर नामक एक हिंदू अधिकार संगठन के बारे में पता चला। उन्होंने स्वराज्य को बताया, “मैं अपनी आस्था से संबंधित सभी चिंताओं के साथ उन तक पहुँचा। उन्होंने मेरी बात सुनी, मेरे साथ कई सत्र आयोजित किए और मुझे वे चीजें बताईं जिससे मेरे विचार स्पष्ट हो गए।”

वह कहते हैं, “आज मैं निश्चित रूप से और गर्व से स्वयं की पहचान वंश और संस्कृति के माध्यम से एक हिंदू के रूप में करता हूँ।”

शाह का कहना है कि संगठन ने कभी भी न उन्हें विधिपूर्वक हिंदू धर्म स्वीकार करने के लिए कहा और न ही नमाज पढ़ने से रोका। हालांकि, वह कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को हिंदू बनाने का फैसला किया है। वह कहते हैं, “मेरा उपनाम तेलुगु है जो कुरनूल में हिंदुओं का होता है। इसलिए यह एक समस्या नहीं होगी।” शाह ने कहा कि बांदी, माकन, पांडलापुरम, पिंजारी और राजमगारी कुछ ऐसे ही उपनाम हैं।

वशी शर्मा, जो अग्निवीर के अध्यक्ष हैं और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-बॉम्बे से डॉक्टरेट की उपाधिधारक हैं, कहते हैं कि शाह की तरह भारत में कई ऐसे मुसलमान हैं जो स्वीकार करते हैं कि उनके वंशज हिंदू थे और वे हिंदू धर्म को स्वीकार करना चाहते हैं। उन्होंने स्वराज्य को बताया, “वे हमारे वीडियो ऑनलाइन देखते हैं और हमारे पास आते हैं। हम उन्हें सलाह देते हैं। अगर वे इच्छुक होते हैं तो हम उन्हें हिंदू धर्म में स्वीकार करने के लिए एक छोटा सा अनुष्ठान करते हैं।” आमतौर पर वह अनुष्ठान हवन होता है। वह आगे कहते हैं, “जो लोग औपचारिक रूप से धर्मान्तरण करना चाहते हैं उन्हें जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय में एक शपथपत्र प्रस्तुत करना होता है। हम कागजी कार्यवाही की सुविधा देते हैं।”

शर्मा ने कहा कि संगठन ने बीते समय में एक ही समय में हजारों लोगों को एकसाथ धर्मपरिवर्तन की सुविधा प्रदान की है। इसके लिए, यह अग्निवीर ही था जिसने मुसलमानों से संपर्क स्थापित किया। शर्मा ने कहा, “हमने अलीगढ़ के कुछ गाँवों के साथ संपर्क किया जहाँ राजपूत मुस्लिम रहते हैं। उन्होंने हिंदू धर्म का त्याग नहीं किया है। वे राणा, चौधरी और चौहान जैसे उपनामों का उपयोग करते हैं, और अपने हिंदू मित्रों के माध्यम से मंदिरों में पूजा भी करते हैं। हमने पंचायतों का दौरा किया और उन्हें उनके पैतृक धर्म में वापसी कराने की पेशकश की, यदि वे इच्छुक हों। वे आसानी से सहमत हो गए।”

शर्मा ने कहा कि यह दृष्टिकोण हमेशा काम नहीं आता है। उन्होंने कहा, “एक बार हम बहुत मुसीबत में फंस गए जब कुछ मुस्लिम ग्रामीणों ने ऐसा प्रस्ताव रखने के लिए हम पर पिस्तौल और बंदूकें तान लीं।”

स्वराज्य स्पष्ट रूप से यह सत्यापित नहीं कर सकता कि उन गांवों में बड़े पैमाने पर धर्मान्तरण करने वाले लोग पाँच साल बाद अपने नए धर्म में बने रहे या नहीं।

संगठन ने इस आयोजन को ‘घर वापसी’ का नाम दिया। घर वापसी शब्द राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके सहयोगियों द्वारा हिंदू परंपरा के गैर हिंदुओं को हिंदू धर्म में धर्मपरिवर्तित करने के लिए एक कोड के रूप में इस्तेमाल किया गया।

मुख्यधारा (अंग्रेजी) भारतीय मीडिया – जिसने अपनी चर्चाओं में अन्य धर्मों के धर्मपरिवर्तन गतिविधियों को कभी नहीं जोड़ा है – में घर वापसी को पर्याप्त स्थान मिला है। लेकिन इस पर असंगत फोकस के बावजूद, मीडिया द्वारा इसकी प्रस्तुति निष्प्रभावी रही। सभी घर वापसी प्रयासों को – और वास्तव में धर्मपरिवर्तन पर सभी हिंदू प्रयासों को – जबरन कहके ख़ारिज किया गया। इनकी रिपोर्टों में स्थिरता से एक खतरनाक स्वर सुनाई देता है।

अग्निवीर के संस्थापक संजीव नेवार, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-गुवाहाटी और भारतीय प्रबंधन संस्थान-कलकत्ता के पूर्व छात्र हैं, कहते हैं कि उन्होंने एक तर्कसंगत शब्द की कमी के कारण घर वापसी शब्द का इस्तेमाल किया लेकिन वे हिंदू धर्म में प्रवेश के लिए इच्छुक लोगों के लिए ‘हिंदू बनो’ कार्यक्रम चलाते हैं। उन्होंने स्वराज्य को बताया, “हम इस मामले में स्पष्ट हैं। सभी को संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार है।” उन्होंने दावा किया कि संगठन ने पिछले कुछ वर्षों में लगभग 5,000 लोगों को हिंदू धर्म में परिवर्तित किया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि उन्होंने कानूनी धर्मपरिवर्तन के बजाय ‘मानसिक धर्मपरिवर्तन’ पर अधिक जोर दिया है, क्योंकि अगर ऐसा केवल संख्या बढ़ाने के लिए किया जाता है तो कानूनी धर्मपरिवर्तन हिंदू धर्म के लिए लंबे समय तक सार्थक नहीं रह सकता है।

नेवार ने बताया, “हम चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग हिन्दू दर्शन और जीवन पद्धति को अपनाएँ। हमारा मानना है कि यह व्यक्ति के साथ-साथ संसार के लिए भी अच्छा है। कुछ ऐसे संगठन हो सकते हैं जो अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए सामूहिक घर वापसी कार्यक्रम आयोजित करते हैं लेकिन हम इस पर विश्वास नहीं करते हैं।”

घर वापसी कार्यक्रम – जिसे मीडिया और उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग द्वारा धोखाधड़ी के मामले के रूप में प्रदर्शित गया – एक ऐसा कार्यक्रम था जिसे शायद पहली बार 2014 के एक मामले में सार्वजनिक बहस में जगह मिली। 2014 के मामले में एक हिंदू संगठन ने कथित रूप से लगभग 50 मुस्लिम परिवारों को हिंदू धर्म में परिवर्तित किया था। परिवारों ने आयोग को बताया कि उन्हें एक हिंदू जागरण समिति द्वारा एक-एक घर देने का वादा किया गया था और उन्हें एक हवन कुंड के चारों ओर बैठने और अहुति देने के लिए कहा गया था। हालांकि, परिवारों ने बताया कि वे फिर भी इस्लाम का पालन कर रहे थे। मुख्य आरोपी नंद किशोर वाल्मीकि पर बाद में गुंडा एक्ट लगाया गया था।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में इस मामले से हिंदू धर्मपरिवर्तन कार्यक्रमों को आघात पहुँचा। नेवार के अनुसार, प्रशासन सामूहिक हिंदू धर्मपरिवर्तन कार्यक्रमों की अनुमति नहीं देता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने सच्चे हैं, “जबकि अन्य धर्म खुलेआम ऐसा कर रहे हैं”।

भारत में कई हिंदू संगठन अपनी धर्मपरिवर्तन गतिविधियों के बारे में स्पष्ट नहीं हैं। स्वराज्य ने आरएसएस और उसके वैचारिक मोर्चों से संबंधित कई कार्यकर्ताओं से बात की, लेकिन लगभग सभी ने नाम न बताने की शर्त पर बात की और कई सवालों पर चुप्पी साधे रखी। देवदत्त माजी, जो पश्चिम बंगाल स्थित सिंह वाहिनी नामक एक ‘अराजनैतिक’ संगठन के अध्यक्ष हैं, इनमें से एक थे जिन्होंने स्वीकार किया कि संगठन मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को हिंदू धर्म में धर्मपरिवर्तन कराने का सक्रिय रूप से काम करता है। उन्होंने कहा कि वे समुदाय के सदस्यों (मुस्लिम) को बताते हैं कि उन्हें हिंदुओं के रूप में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी। माझी ने बताया, “उन्होंने ही हमसे संपर्क किया था। पुरुषों से, हम कहते हैं कि उन्हें मौलवियों के अत्याचार या फतवों से डरकर नहीं जीना पड़ेगा। महिलाओं से, हम कहते हैं कि उनका महिला-विरोधी गतिविधियों जैसे निकाह हलाला और तीन तलाक से बचाव होगा।” उन्होंने आगे बताया, “हम जो कहते हैं वह सच है।”

माजी ने कहा कि संगठन के प्रमुख कार्यों में से एक हिंदू पुरुषों के साथ मुस्लिम महिलाओं के विवाह को सुविधाजनक बनाना था। “यह पूरी तरह से सहमति से होता है और कड़ाई से यह बालिगों के बीच ही होता है।”

एक हिंदू कार्यकर्ता तपन घोष के साथ करीब 10 साल तक काम करने वाले माजी कहते हैं कि इस अवधि में उन्होंने इसी तरह की करीब 450 शादियाँ करवाने में मदद की है। माजी इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस तरह के विवाह जोड़ों की जिंदगी को खतरे में डाल देते हैं और इसलिए संगठन, जिसको अन्य राज्यों से भी समर्थन प्राप्त है, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेता है। उन्होंने कहा कि “हम उनको अपना गृह शहर छोड़ने और निवास तथा काम दिलाने में मदद करते हैं। तीन-चार साल बाद परिवार वाले शांत हो जाते हैं और जोड़ा अपने गृह शहर में वापस लौट आता है। कम से कम ज्यादातर मामलों में तो ऐसा ही होता है।”

हिंदू संगठन लंबे समय से ‘लव जिहाद’ पर चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। लव जिहाद धर्मान्तरण के अंतिम लक्ष्य के साथ, मुस्लिम पुरुषों द्वारा हिंदू महिलाओं को बहला-फुसला कर, लुभाकर, छल से उनके साथ रोमांटिक रिश्ते बनाने के बारे में एक षडयंत्र सिद्धांत है। हालाँकि अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित हो सके कि इस षड्यंत्र को एक संगठित आपराधिक रैकेट के तहत चलाया जाता है, लेकिन ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं जिसमें मुस्लिम पुरुषों ने नाबालिग हिंदू लड़कियों का अपहरण करके धर्मान्तरण करवाया है और अपनी मुस्लिम पहचान को या यहाँ तक कि इस तथ्य, कि वे पहले से ही विवाहित थे, को छुपाने के बाद हिंदू महिलाओं के साथ विवाह किया है।

माजी के अनुसार, संगठन इस तरह की गतिविधियों को रोकने का प्रयास करता है। हालाँकि वह कहते हैं कि उन मामलों को रोकने के लिए वे बहुत कम हैं। उन्होंने कहा, “हमारे 450 के लिए, उनके पास 45,000 हैं।” “आप देखते हैं कि दुनिया भर में इस्लाम को विस्तारित करने के लिए काफी समर्पण है। ऐसी गतिविधियों को अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिलता है। दूसरी ओर हिंदुओं का बहुत ही छोटा भाग है जो ऐसा करते हैं और हम लोगों के पास हमेशा संसाधन और समर्थन कम होता है।”

यह पूछे जाने पर कि क्या इस ‘नंबर गेम’ के लिए महिलाओं का उपयोग करना नैतिक है, माजी कहते हैं कि “हम मानते हैं कि यह मुस्लिम महिलाओं के लिए ही अच्छा है। सभी जोड़े बहुत खुश हैं।”

लगभग उन सभी हिंदू संगठनों, जिनसे स्वराज्य ने बात की, ने कहा कि अपने धर्मान्तरण प्रोग्राम के एक हिस्से के रूप में वे ऐसे जोड़ों को प्रोत्साहित करते हैं और सुविधा प्रदान करते हैं। झारखंड में रहने वाली रुखसार (बदला हुआ नाम) ने सन् 2014 में अपने पास में ही रहने वाले चौहान जाति के एक हिंदू आदमी से शादी कर ली थी। यह जोड़ा पिछले चार सालों से मध्य प्रदेश में रह रहा है, विश्व हिंदू परिषद से संबद्ध बजरंग दल के एक सदस्य ने उसको रहने की सुविधा प्रदान की थी। 23 वर्षीय रुखसार ने फोन पर स्वराज्य को बताया कि उनको अपने घर का माहौल पसंद नहीं था और वह सोचती थीं कि हिंदू परिवार अपने घर की महिलाओं को ज्यादा आजादी देते हैं। उन्होंने कहा, “मैं बचपन से ही उन्हें (अपने पड़ोसी) पसंद करती थी। इसलिए जब उसने मुझे प्रपोज किया तो मैं राज़ी हो गई।” रुखसार, जिन्होंने शादी के बाद अपना बदल लिया है, कहती हैं कि वह जानती थीं कि उनके घर वाले कभी भी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे लेकिन उस आदमी ने उनसे वादा किया था कि वह उनका पूरा ख्याल रखेगा। उन्होंने कहा, “बजरंग दल के एक सदस्य ने भागने में हमारी मदद की। हमने मध्य प्रदेश के एक आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली और वहीं पर मैंने अपना धर्म बदल लिया। तब से हम यहीं पर रह रहे हैं।”

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें घर की याद आती है और क्या उन्हें उनके फैसले पर पछतावा होता है, तो रुखसार ने बताया कि वह छुपकर फोन से अपनी माँ से बात कर लेती हैं। उन्होंने कहा कि “दरअसल मेरे पिताजी जानते हैं कि मैं माँ से बात करती हूँ लेकिन तब से उन्होंने मुझसे बात नहीं की है।” “एक बार उन्होंने मेरी माँ से कहा था कि मैं या मेरे पति कभी भी दोबारा उस गाँव में कदम न रखें।”

रुखसार कहती हैं कि उन्हें अपने परिवार की याद तो आती है लेकिन वह अपनी शादी से खुश हैं। सभी हिंदू त्यौहारों और व्रतों में उन्हें करवाचौथ सबसे ज्यादा पसंद है; ईद पर, वह “घर पर कुछ खास बनाती हैं।” वह बताती हैं कि उन्हें बहुत अच्छी तरह से पता है कि उनके लिए उनके घर और यहाँ तक कि गाँव के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं।

धर्मान्तरण पर हिंदू प्रयासों को नियमित रूप से अनैतिक और सांप्रदायिक कहकर निंदित किया जाता है। यहाँ तक कहा जाता है कि हिंदुत्व का यह भयावह षडयंत्र भारतीय आबादी से अल्पसंख्यकों और अन्य धार्मिक संप्रदायों को मिटाने का इरादा रखता है। लेकिन हिंदू कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे केवल इस्लाम और ईसाइयत जैसे विस्तारवादी धर्मों के धर्मान्तरण अभियानों का विरोध कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के एक आरएसएस कार्यकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर स्वराज्य को बताया कि “धर्म आबादी से संबंधित है और आबादी राजनीतिक सत्ता का निर्धारण करती है। हिन्दुओं ने धर्मान्तरण के लिए कभी भी किसी भी देश पर आक्रमण नहीं किया। हम सदियों से सदस्य खो रहे हैं। तो हम केवल अपनी आबादी को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हम प्रबल और अच्छी तरह से वित्त पोषित शक्तियों के खिलाफ हैं।”

यह मांग करते कि सरकार घर वापसी जैसे कार्यक्रम को मुख्यधारा में लाए, आरएसएस कार्यकर्ता ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि घर वापसी जैसे कार्यक्रम प्रकाश में नहीं आ पाए हैं।

कार्यकर्ता कहते हैं कि इस तरह के हिंदू प्रयासों के खिलाफ “गलत खबरों” का नतीजा यह हुआ कि घर वापसी गलतफहमियों में आ गया।

देवदत्त माजी कहते हैं कि “सबसे ज्यादा आम आपत्ति जाति के संबंध में है। वे यह कहकर घर वापसी का मजाक उड़ाते रहे कि मुस्लिम या ईसाई हिंदू धर्म अपनाकर किस जाति में जाएंगे।” उन्होंने कहा कि यह एक गलत धारणा है कि हिंदू होने के लिए जाति जरूरी है। “बंगाल बड़े पैमाने पर एक जाति मुक्त समाज है। हमारे द्वारा धर्मान्तरित किए गए लोगों की कोई जाति नहीं होती है।”

माजी कहते हैं कि अगर परिवार अपना गोत्र जानते हैं तो वे इसको भी अपना सकते हैं। और अगर गोत्र जानने के बाद भी वह इसे नजरअंदाज करना चाहते हैं तो वह ऐसा करने के लिए आजाद हैं। माजी कहते हैं कि उनके द्वारा कराए गए धर्मान्तरणों में लोगों ने आमतौर पर अपना उपनाम ‘दत्त’ रखा है। बिहार के बेगूसराय के एक कार्यकर्ता ने स्वराज्य को बताया कि उनके क्षेत्र के परिवारों, “जो जाति मुक्त हैं” ने पुरुषों के लिए ‘कुमार‘ और महिलाओं के लिए ‘देवी’ या ‘कुमारी’ उपनाम पसंद किया है।

आरएसएस कार्यकर्ता ने पूछा कि “भारत में रहने वाले कितने हिंदू अपना गोत्र जानते हैं? आखिरकार वे हिंदू ही हैं न? “धर्मान्तरित लोगों के लिए भी ऐसा ही है जो अपना असल गोत्र नहीं जानते हैं। अपना गोत्र न जानना कभी भी उनके घर वापसी के रास्ते में नहीं आता है।”

हालाँकि, उन्होंने कहा कि जब से उत्तर प्रदेश के लगभग सभी मुस्लिमों को अपना गोत्र पता चला है, वे इसमें ‘लौटना’ चाहते हैं। उन्होंने कहा, “यहाँ तक कि अनुसूचित जाति के लोग भी।”

क्या धर्मांतरित लोग एससी अधिनियम के तहत अपने जातीय लाभ प्राप्त करते हैं?

वे प्राप्त कर सकते हैं? उच्चतम न्यायालय ने 2015 में अपने फैसले में कहा था कि जो लोग ईसाई धर्म से हिंदू धर्म में वापस आ जाते हैं वे आरक्षण के लाभ के हकदार हैं, इस आधार पर कि अध्ययनों से पता चला है कि हिंदू धर्म के लोग, जिन्होंने किसी लालच या आकांक्षा में ईसाई धर्म अपना लिया था, सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े ही बने रहे।

हालाँकि, स्वराज्य से बात करने वाले लगभग सभी कार्यकर्ताओं ने बताया कि वे इस तरह के किसी भी सफल मामले के बारे में नहीं जानते हैं। कार्यकर्ता वाशी शर्मा ने कहा कि “कई पीढ़ियों पहले धर्मांतरित होने वाले परिवारों के लिए यह बेहद मुश्किल है क्योंकि उनके पास जाति प्रमाण पत्र नहीं हैं। लेकिन हालिया धर्मांतरणों के लिए जिनके पास अभी भी अपने माता-पिता या दादा-दादी के जाति प्रमाण पत्र हैं, यह आसान होना चाहिए।”

चूँकि कार्यकर्ता हिंदू धर्मान्तरण पर होने वाली जातीय चिंताओं को दूर करने के लिए तत्पर हैं और जोर देते हैं कि धर्मान्तरण निर्विघ्न हो, वे कहते हैं कि गलत धारणा केवल उन लोगों के बीच ही नहीं है जो धर्मांतरित होना चाहते हैं बल्कि हिंदू धर्म की देखभाल करने वालों के बीच भी व्याप्त है। बेगूसराय में बजरंग दल के एक कार्यकर्ता ने कहा कि “अगर आप इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाना चाहते हैं तो आपको केवल पड़ोस की मस्जिद या चर्च में जाना होता है। लेकिन जब आप अपने पड़ोस के मंदिर में जाकर हिंदू धर्म अपनाने का प्रयास करते हैं, तो पुजारियों को कुछ अता-पता नहीं होता।” उन्होंने कहा कि “बहुत से लोगों को यह भी नहीं पता होगा कि आर्य समाज धर्मान्तरण की चाहत रखने वाले लोगों के लिए दशकों से ऐसे समारोहों का आयोजन करता रहा है।”

धर्मान्तरण पर हिंदू प्रयास प्रतिक्रियावादी और विस्तारवादी धर्मों द्वारा निरंतर धर्मान्तरण मिशनों के प्रभाव को कम करने के लिए बेताब अभ्यास प्रतीत होते हैं। लेकिन लोकप्रिय तौर पर इसमें यह अविश्वास जुड़ा हुआ है कि गतिविधियाँ काफी हद तक गोपनीय बनी हुई हैं। यह दोष संघ को दिया जाता है जो स्पष्ट रूप से यह ढोंग करते हुए कि घरवापसी एक धर्मान्तरण कार्यक्रम नहीं है, इस बात को स्वीकार करने में नाकाम रहा है। यह शब्द खुद आलोचनाओं के घेरे में आ गया क्योंकि यह मानता है कि एक बार हिंदू होने वाला हमेशा हिंदू ही रहता है। बाद में संघ ने इस कार्यक्रम का नाम बदलकर ‘धर्म जागरण’ रख दिया। हालाँकि, इसे अपने संवैधानिक अधिकार के रूप में प्रसारित करने की अनिच्छा जारी है।

स्वाति गोयल शर्मा स्वराज्य की वरिष्ठ संपादक हैं। उनका ट्विटर हैंडल @swati_gs है।