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धर्मस्थल: धर्म का निवास और वह सब जो एक मंदिर हो सकता है
हर्षा भट - 18th November 2018

प्रसंग
  • कर्नाटक का यह मंदिरों का शहर दर्शाता है कि अगर राज्य दूर रहे तो प्रेरित नेतृत्व मंदिर और उसके भक्तों के लिए क्या कर सकता हैI  

एक मंदिर में शिव मुख्य देवता हैं, वैष्णव पुजारी और प्रबंधन करने के लिए एक जैन रखवाला है और यह सिर्फ महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल ही नहीं बल्कि क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का केंद्र भी है, जिसका अनुकरण करना चाहिएI

कर्नाटक में श्री क्षेत्र धर्मस्थल ऐसा ही एक मंदिर है, जो यह दर्शाता है कि अगर मंदिर राज्य के हस्तक्षेप में नहीं फंसे तो यह एक पूजा करने की जगह से कहीं ज्यादा उभर कर आएI

भारत में मंदिर रिहाईश के केंद्र में होते थेI उनके आस-पास गाँव बस गए और कई लोग की भूमिका और कर्तव्य इसके कामकाज से सम्बद्ध रहीI कलाकारों से लेकर माली, संगीतकारों, पुजारियों और जिन लोगों को मन्दिर के कार्य सौंपे गए थे- सभी ने मंदिर की गतिविधियों के केंद्र में रहकर कार्य कियाI

वर्तमान युग में आते हैं, जो मंदिरों के कल्पना कर सकते थे, जहाँ कुछ मंदिरों के पास धन और संसाधनों को सौ गुना करने के बावजूद,  उनके आसपास के समाज के पास उनके अस्तित्व में रहने के लिए उन्हें धन्यवाद देने का कोई कारण नहीं है।

ऐसे समय में, मंदिर की संपत्ति का दुरुपयोग, विरासत की उपेक्षा, सांस्कृतिक गतिविधियों में गिरावट और इस वजह से उनके साथ जुड़े विभिन्न कला रूपों का विलुप्त होना एक आदर्श बन गया है। हालांकि, कर्नाटक में यह मंदिर उन सभी मंदिरों का उदाहरण है जिसे अगर अनुमति मिले तो एक मंदिर के रूप में वह सब कर सकता है और करेगाI

धर्मस्थल मंजुनाथ मंदिर जैन परिवार, हेगड़े के द्वारा चलाया जाता है, जिन्हें आठ सदियों से भी पहले यह कार्य सौंपा गया थाI तब से, इन्होंने इस गाँव को न केवल समृद्ध शहर के रूप में तैयार किया बल्कि इसे क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, प्रशासनिक और न्यायिक सुधार के स्रोत भी बनाए।

नाटक को पुनर्परिभाषित करना

परिवार का मुखिया या जो मंदिर के प्रबंधन को चलाता है उसे धर्माधिकारी (वंशानुगत प्रशासक) कहते हैं, और यह पद अनोखा कहा जाता है क्योंकि उन्हें देवता के रूप में देखा जाता हैI ‘हेगड़े’ को देवता मंजुनाथ के लिए बोलने के रूप में देखा जाता है जो लोग उनके पास आते हैं उनसे उन्हें न्याय और सलाह देने की उम्मीद की जाती है।

डॉ वीरेंद्र हेगड़े, वर्तमान में धर्माधिकारी, जो पाँच दशकों से धर्म के सेवा कर रहे हैं, ने 24 अक्तूबर 1968 को 20 साल की उम्र में अपने पिता से यह कार्य लिया थाI तभी से कई लोगों के लिए उनके शब्द कानून है, उनके कार्यों ने बेंचमार्क स्थापित किया है, और उनकी विचारशीलता ने पूरे राज्य में सैकड़ों दूसरे कई मंदिरों को पुनर्जीवित किया है।

जैसे ही कोई मंदिर के पार्किंग स्थल की ओर जाता है, वहाँ विशाल रथ के आधार देखे जा सकते हैं। मंदिरों में अब उपयोग नहीं किए जाने वाले नक्काशी वाले पुराने रथ यहाँ लाए जाते हैं और आने वाले के लिए प्रदर्शित किए जाते हैं।

मंदिर की सीधी तरफ, एक घर है जो सभी रूपों में धर्म के साधकों की मेजबानी करता है। कमरे में आशा और शांति की हवा है जहाँ वह हर दिन तय समय पर उन लोगों से मिलने के लिए बैठते हैं, जो पहली फसल चढ़ाने, झगड़ों के समाधान, चिकित्सा जरूरतों और खर्चों या सलाह लेने के लिए आते हैंI सफ़ेद रंग में लिपटे हुए, वह शान्ति से बैठकर सबको सुनते हैं और किसी को भी निराश नहीं करतेI

बड़े पैमाने पर यह सब हो सकता है क्योंकि यहाँ पर प्रशासन के नाम पर ऐसे नियम लागू करने वाला कोई बाहरी प्राधिकरण नहीं है, जो नहीं हो सकते। “हर मंदिर की अपनी संस्कृति, अपनी प्रथा, अपनी खुद की परंपरा होती है। किसी भी जगह की प्रथा और परंपरा को लेकर सरकारी हस्तक्षेप का कोई सवाल ही पैदा नहीं होताI जहाँ भी आप सरकारी हस्तक्षेप देखेंगे, आपको बहुत गड़बड़ी दिखेगी, क्योंकि यह ज्यादा लोकतान्त्रिक हो सकता है लेकिन यह उद्देश्य पूरा नहीं करताI वहां लोकतान्त्रिक प्रबंधन तो हो सकता है, लेकिन लोकतान्त्रिक घर नहीं हो सकताI घर में माता-पिता और बड़े होते हैं, और इसी तरह मंदिर में संस्कार होते हैंI डॉ हेगड़े कहते हैं, मुझे लगता है कि धार्मिक और अध्यात्मिक गतिविधियों में राज्य का हस्तक्षेप सही नहीं हैI

राज्य के हस्तक्षेप नहीं करने की स्वतंत्रता के फलस्वरूप मंदिर की कार्यप्रणाली ने कई बदलाव सुनिचित किए हैंI धर्माधिकारी की भूमिका को ऐसे देखा जाता है जो चार दान या सेवा- अन्नदान, अभयदान, औशाधादान और विद्यादान को सुगम बनाता हैI

यहाँ पर जिस साफ़-सुथरी रसोई में रोज लाखों लोगों के लिए अन्नदान का आयोजन होता है, उसकी दुनियाभर में तारीफ की गयी हैI लोगों के मुद्दों को सुनने के अलावा मंदिर में धर्माधिकारी वंवंचित लोगों को छात्रवित्ति, चिकित्सा या पेंशन के रूप में वित्तीय सहायता करते हैं जो कई दिन लाखों तक पहुँच जाती हैI

सांस्कृतिक मोर्चे पर, श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर यक्षगाना कला केंद्र पारंपरिक स्थानीय नृत्य, यक्षगाना को भजन ककम्मता की कार्यशालाओं के द्वारा समर्थन दे रहा है, यह गांवों और गुरुकुलों में भजन समूहों को प्रशिक्षित करने के लिए आयोजित किए जाते हैं जो युवाओं को पारंपरिक गुरु-शिशु परम्परा में शिक्षा प्रदान करते हैं।

समाज में, मंदिर बड़े पैमाने पर विवाह का आयोजन करता है, जहाँ धर्माधिकारी दावत के अलावा  दुल्हन के लिए शादी का दहेज़ और दुल्हन के लिए मंगलसुत्र के खर्च का ख्याल रखने से लेकर  हर जोड़े को आशीर्वाद देता है। दूसरी तरफ, जन-जगराथी, जो एक व्यसन छोड़ने का कार्यक्रम है, ने देश के इस हिस्से में कई ग्रामीण परिवारों को बर्बाद किया है, भी काफी प्रचलित है।

धर्मस्थल को ज्यादातर सबसे साफ़ मंदिर के शहर के रूप में माना जाता है, और इस मंदिर की देखभाल करने वाली विंग, श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर धर्मोथाना (एसडीएमडी) ट्रस्ट ने 200 से ज्यादा मंदिरों को बहाल करने में मदद की है। दूसरी तरफ, एसडीएम के मेडिकल ट्रस्ट के तहत पूरे भारत में बहु-विशिष्ट अस्पताल हैं, जो जरूरतमंदों को मुफ्त चिकित्सा सहायता प्रदान करते हैं।

इसकी झलक कर्नाटक के उज्जिर में धर्मस्थला के महाडवाड़ा में प्रवेश करने के दौरान देखी जा सकती हैI द्वार से मंदिर तक कुछ किलोमीटर की दूरी पर कई शिक्षण संस्थानों, प्राकृतिक चिकित्सा और कल्याण केंद्रों के आस-पास बनाये गए बगीचों के साथ प्राचीन मंदिरों की तरह दिखने वाले मंदिर हैं। वे इसकी एक छोटी सी झलक है कि मंदिर के इस विशाल संस्थान ने समाज के लिए क्या किया है।

यह सब संभव हो गया है, क्योंकि इन प्रयासों को चलाने वाले व्यक्ति के पास धर्म को निखारने  के लिए जुनून और दृष्टि है, जिसे वह अपनी तरह से प्रेरित करता हैI

यह लेख भारतीय विरासत पर ‘स्वराज’ की श्रृंखला का एक हिस्सा है। अगर यह लेख आपको पसंद आया हो और आप चाहते हैं कि हम ऐसे लेख ओर करें,  तो प्रायोजक होने पर सोचें- आप 2,999 रुपये जितना कम योगदान दे सकते हैं। यहांँऔर पढ़ें।