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वास्तविकता में उपनिवेशवाद 2.0- डाटा संरक्षण कानून

आशुचित्र- बौद्धिक संपदा कानूनों ने यह सुनिश्चित किया कि विकसित देश अपना तकनीकी प्रभुत्व बरकरार रख सकें। डाटा संरक्षण कानूनों का भी इसी प्रकार प्रयोग हो सकता है।


तकनीक हमेशा से उपनिवेशवाद का एक प्रमुख हथियार रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप पर अंग्रेज़ों द्वारा कब्जा किए जाने के दौरान अंग्रेज़ जानते थे कि भारत के कपड़ा कारीगर श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला कपड़ा बना सकते हैं जो कि मैनचेस्टर के कारखानों द्वारा असंभव था। अत: आर्थिक लाभ के लिए अंग्रेज़ों ने सदियों पुरानी हथकरघा परंपरा को नष्ट कर दिया और विश्व के सबसे बड़े कपड़ा उत्पादक को केवल कच्चे माल की आपूर्ति करने वाला बना दिया।

लेकिन केवल इसी एक हथियार का अंग्रेज़ों ने उपयोग नहीं किया। उसी समय जब वे अपने स्वामित्व को चुनौती देने वाली तकनीकों को नष्ट कर रहे है थे, तभी वे अपने क्षेत्र में नियम तथा नियामक बनाते जा रहे थे जिससे वे उनके द्वारा स्थापित की गई तकनीक का उपयोग सुनिश्चित करते थे। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बौद्धिक संपत्ति से जुड़े कानून थे।

यह धारणा कि दिमाग के उत्पाद व्यापार योग्य वस्तु बन सकते हैं एक यूरोपियन संकल्पना है जिससे दुनिया 17वीं शताब्दी तक अनभिज्ञ थी। उसके बाद भी यह विचार केवल दो शताब्दियों में आधुनिक विश्व के प्रत्येक कोने तक पहुँच गया इसके लिए अंग्रेज़ साम्राज्य का विस्तृतीकरण धन्यवाद का पात्र है।

औपनिवेशिक प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य अपने आर्थिक उद्देश्यों की रक्षा करना था। प्रिंटिंग प्रेस जैसी अन्य तकनीक के बड़े स्तर पर प्रसार के कारण उनका स्वामित्व खतरे में आ गया था। इस चिंता के कारण अपना नियंत्रण बढ़ाने के लिए उन्होंने वैधानिक यंत्र का उपयोग किया। पुराने कॉपीराइट कानून के अनुसार यदि साहित्यिक कार्य पहले यूनाइटेड किंगडम में प्रकाशित नहीं किए गए तथा उनकी प्रतियाँ प्रकाशित होने के एक महीने के भीतर सार्वजनिक पुस्तकालयों में नहीं भेजी गई तो वे वैधानिक सुरक्षा नहीं पा सकेंगे।

अंग्रेज़ साम्राज्य के दूर-दराज के इलाकों के प्रकाशनों द्वारा इस नियम का पालन करना कठिन था और लेखकों का अपनी कृतियों पर कोई अधिकार नहीं बचा था। यही कारण था कि औपनिवेशिक समय में पुस्तक बाज़ार मुख्यत: यूरोपियन प्रकाशनों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा था। यह इस हद तक था कि आज़ादी के बाद भी इन कंपनियों ने विकासशील देशों में पुस्तक प्रकाशन के मामले में वर्चस्व कायम कर रखा था।

कॉपीराइट के लिए औपनिवेशिक तरीका धन्यवाद का पात्र है। आज विश्व बौद्धिक संपत्ति संरक्षण के मामले में पश्चिमी प्रारूप को स्वीकार्य करता है जिसमें सृजनात्मकता तथा नवाचार के प्रोत्साहन देने हेतु मौलिक कृतियों पर केवल रचनाकार का अधिकार रहता है। इसी कारणवश भारतीय सभ्यता द्वारा सदियों से अपनाया हुआ सहयोगात्मक रचना का प्रारूप घटता चला गया और परिणामस्वरूप व्यक्ति केंद्रित आवश्यकताओं के अनुरूप होने में अक्षम कलाएँ खत्म हो गईं।

जितना उपनिवेशवाद सैन्य नियंत्रण से साम्राज्य के हरण के रूप में दिखता है उतना ही कानूनी प्रारूप ने इसे दुनिया पर थोपा जिसका प्रभाव बहुत समय तक रहा।

वर्तमान में उपनिवेशवाद वैश्विक राजनीति से कोसों दूर हो चुका है और राष्ट्र के राज्य एक दूसरे से अधिक फासला करते जा रहे हैं। हमारे राजनेताओं पर राष्ट्रवाद का भूत चढ़ा हुआ है जिस कारण महाद्वीपों के बीच सामंजस्य होने की बजाय फासला बढ़ रहा है। इन सभी के बावजूद हम और उपनिवेशवाद के अधिक धोखेबाज़ प्रारूप को देख रहे हैं जिसे पहले कभी नहीं देखा।

एक बार पुन: तकनीक केंद्रीय भूमिका निभा रही है।

इंटरनेट राष्ट्रीय सीमा तक सीमित नहीं है। परिणामस्वरूप तकनीकी कंपनियाँ अपने ग्राहकों को वस्तु तथा सेवाएँ विश्व के किसी भी कोने से उपलब्ध करा सकती हैं, अत: इसके लिए उन्हें प्रत्येक देश में संस्थान स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान में तकनीकी कंपनियों के ग्राहक उनके गृह राष्ट्र की सीमा से बाहर अधिक हैं।

उनकी सेवाएँ इस तरह से सर्वव्यापक हैं कि वे हमारी ज़िंदगी के प्रत्येक भाग तक पहुँच चुकी हैं तथा उनके बगैर कार्य करना असंभव हो गया है। तकनीकी कंपनियाँ वैश्विक आबादी के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखती हैं जो किसी भी राष्ट्रीय सरकार की हद के बाहर है। उनके निर्णय तथा योजनाएँ दुनियाभर के लोगों पर प्रभाव डालती हैं जितना राष्ट्रों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिए गए निर्णय प्रभाव नहीं डालते। यह आधुनिक उपनिवेशवाद का प्रारूप है।

हम तकनीकी विस्तार का प्रभाव देख ही चुके हैं। राष्ट्र तथा राज्यों ने स्वीकारा है कि उनके नागरिकों की वार्ता वाले प्लेटफॉर्म पर उनका नियंत्रण कम है। कानून लागू करने वाली संस्थाएँ मैसेजिंग ऐप पर भेजे गए संदेश पकड़ने में अक्षम रहती हैं तथा स्थानीय सरकार सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे दुर्विचार को रोकने में नाकाम रहती हैं।

जिस पर आधुनिक दुनिया काम कर रही है वह प्रारूप कुछ संस्थानों के नियंत्रण में हैं तथा केवल वे ही उत्तरदायी हैं तथा अधिक से अधिक वे सरकारें जिन देशों से ये संचालित हो रहे हैं।

लेकिन इतिहास से विपरीत जहाँ गुलाम देशों के पास उपनिवेशवादियों का निर्णय मानने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता था, आज देश इसका विरोध करने लगे हैं। भारत सहित कई देशों ने ऐसे कानून बनाए हैं जो इन संस्थानों को देश में स्थानीय डाटा केंद्र स्थापित करने के लिए कहते हैं जहाँ उस देश के स्थानीय लोगों के डाटा को सहेजा जाता है। तकनीकी कंपनियाँ इन मांगों पर सहयोग देने के लिए तैयार है।

जैसा कि कहा गया है कि उपनिवेशवाद का असर बनाए गए कानून में दिखता है। डाटा तकनीक में वृद्धि से डाटा नियमन में बढ़ोतरी हुई है। पिछले दो दशकों में विश्वभर में देशों ने डाटा संरक्षण कानून बनाए हैं जिसमें डाटा केवल लोगों की सहमति से ही एकत्रित किया जाने का प्रवधान है।

कई संस्थानों ने इसे बड़े पैमाने पर देखा और प्रारंभिक दौर में सहमति लेते वक़्त बहुत सी गतिविधियों के लिए भी सहमति ले ली तथा बाद में अपने उद्देश्य के हिसाब से डाटा का प्रयोग किया। यह तरीका धन्यवाद का पात्र है जिससे वर्तमान में हमारे समक्ष व्याप्त तकनीक इस स्तर तक पहुँचने में कामयाब हो सकी।

उदाहरण के तौर पर इमेज रिकग्निशन। किसी भी तस्वीर को पहचानने वाली एल्गोरिदम को कई सारी तस्वीरों को पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाता है जिसके प्रारूपों से सीखकर फिर वह किसी भी तस्वीर को खुद से पहचानने में सक्षम होती है।

सटीक डाटा मुश्किल से मिलते हैं यदि हमने सोशल मीडिया पर टैग कर तस्वीरें नहीं डालीं होती तो इन एल्गोरिदम्स हेतु आवश्यक इतने विशाल तथा सटीक डाटा को हम कभी एकत्रित नहीं कर पाते। यह कई अन्य तकनीकों जैसे नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग, वॉइस रिकग्निशन, सिमेंटिक सर्च के लिए भी समान है।

इस पर कोई संशय नहीं कि हमने अहस्तक्षेप करने के स्वभाव के कारण हानिकारक परिणाम झेले हैं। जैसे कैम्ब्रिज के अनुमानक विभाग द्वारा अन्य कारणों के लिए एकत्रित किया गया लोगों का निजी डाटा  राजनीतिक उद्देश्य के लिए प्रयोग किया गया।

इसके साथ ही यूरोप ने डाटा संरक्षण के कड़े नियम बनाए तथा यह सामान्य डाटा संरक्षण नियमन (जीडीपीआर) इसी वर्ष लागू हुए। यह डाटा एकत्रित तथा उपयोग करने वाले संस्थानों को नोटिस तथा सहमति वाले प्रारूप को निभाने का आदेश देते हुए केवल सीमित उद्देश्यों के लिए ही डाटा के उपयोग का अधिकार देता है। यदि संस्थान ऐसा करने में असफल रहते हैं तो उन्हें बड़े जुर्माने का भुगतान करना होता है।

नियमन के रूप में जीडीपीआर तेजी से प्रसारित हुआ है तथा यूरोपियन संगठन के साथ व्यापार करने वाली कंपनियों को इन नए नियमों के अनुरूप अपनी प्रक्रिया को बदलना पड़ा है। यदि उनके देश में गोपनीयता कानून पर्याप्त हैं तो यह उनके लिए बदलाव में सहायक है। दुनियाभर के देश अब जीडीपीआर की तर्ज पर कानून लागू करने को विवश हैं।

जो संस्थान निजी डाटा से संबंधित ढीले नियमों के कारण पिछले दो दशकों से फायदा ले रहे थे उनके लिए कड़े नियम शायद ही मायने रखेंगे। उनके पास विशाल संख्या में ग्राहक पहले से हैं जिनसे वे मशीन लर्निंग एल्गोरिदम के लिए निरंतर डाटा एकत्रित कर सकते हैं।

वहीं नवीन डाटा व्यापारों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एल्गोरिदम के लिए डाटा एकत्रित करने में संघर्ष करना पड़ेगा। यह आधुनिक उपनिवेशवाद का वास्तविक स्वरूप है।

यह वैश्विक स्तर पर बड़ी कंपनियों द्वारा ग्राहकों के डाटाबेस का तकनीकी विस्तार नहीं है जिसके लिए हमें चिंता की आवश्यकता है। यह तो आसानी से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कड़े नियमन से हासिल किया जा सकता है। लेकिन जीडीपीआर की तर्ज पर विकासशील देशों में कड़े डाटा संरक्षण नियम लागू कर अपनी डाटा कंपनियों के प्रारंभिक दौर में विपरीत हालात पैदा करना अधिक भयावह है। वहीं विकसित देशों में उनकी कंपनियों के प्रारंभिक दौर में ऐसे नियमन नहीं थे।

जिस प्रकार बौद्धिक संपत्ति कानून ने सुनिश्चित किया कि विकसित देशों को तकनीक के मामले में अन्य देशों के मुकाबले अच्छी शुरुआत मिले, मुझे डर है कि डाटा संरक्षण कानून भी ऐसा ही प्रभाव डालेंगे।

अभी भी प्रभावशाली कदम उठाने में अधिक विलंब नहीं हुआ है।

राहुल मट्टहन ट्रइलीगल में एक साझेदार हैं। वे @matthan के माध्यम से ट्वीट करते हैं।