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क्या भारत तकनीकी औपनिवेशीकरण को हरा सकता है?

आशुचित्र- जब भारत की तकनीक उन्नत होगी, तब ही भारत विश्व पटल पर स्थापित हो पाएगा।

10 मई 2018 को भारत के डिजिटल क्षेत्र में प्रमुख मोड़ की तरह देखा जाना चाहिए। यह वही दिन था जब वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट को 16 बिलियन डॉलर में खरीदा था तथा इसके साथ ही अमेज़ॉन के वर्चस्व वाले ई-कॉमर्स क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी चुनौती समाप्त हो गई। निश्चित ही कुछ छोटी कंपनियाँ मौजूद हैं जैसे स्नैपडील अथवा चीनी तथा जापानी सहयोग वाली पेटीएम मॉल। लेकिन यहाँ मत्स्य न्याय की परंपरा देखने को मिलती है, बड़ी कंपनियों का छोटी कंपनियों पर कब्ज़ा कर लिया जाना। फ्लिपकार्ट के कुछ महीनों पहले अलीबाबा ने ऑनलाइन अनाज विक्रेता बिग बास्केट को खरीद लिया था। वहीं अमेज़ॉन ने बिरला समूह की ऑफ़लाइन खुदरा विक्रेता “मोर” में निवेश किया था तथा अब किशोर बियानी के “फ्यूचर” समूह में निवेश करने जा रही है (किशोर बियानी बिग बाज़ार के मालिक हैं)।

तकनीकी उपनिवेशवाद अब अनेक वैश्विक स्तर की कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। इनके पास अत्यधिक धन है जिनमें मुख्यत: अमेरिका और चीन की कंपनियाँ शामिल हैं। इन आठ बड़ी कंपनियों में पाँच अमेरिका की तथा तीन कंपनियाँ चीन की हैं तथा इनके पास 19 दिसंबर तक के आँकड़ों के मुताबिक़ कुल 4.158 ट्रिलियन डॉलर से अधिक संपत्ति है। केवल 3 देशों- अमेरिका, चीन तथा जापान की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) इस राशि से अधिक है। अमेरिका की पाँच बड़ी कंपनियों में- अमेज़ॉन, एपल, फ़ेसबुक, गूगल तथा माइक्रोसॉफ्ट हैं। वहीं चीन की तीन बड़ी कंपनियों में अलीबाबा, बाईडू, तथा टेनसेंट शामिल हैं।

अब दो अन्य प्रमुख दिनों की बात करते हैं, 11 अप्रैल 2016 तथा 5 अप्रैल 2018। पहली दिनांक को भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रघुराम राजन ने यूनिक आईडी का प्रयोग कर मोबाईल से भुगतान करने के लिए यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (यूपीआई) की सुविधा लागू की थी। यूपीआई में वीसा, मास्टरकार्ड के बगैर केवल मोबाईल से ही सीधे बैंक खाते में पैसे जमा करने के प्रावधान थे।

वहीं दूसरी दिनांक को आरबीआई ने सभी भुगतान कंपनियों को भारतीय ग्राहकों का डाटा भारत में ही रखने के अर्थात डाटा प्रबंधन क्षेत्रीय स्तर पर ही करने के आदेश जारी किए थे। इस पर विदेशी कंपनियों ने लाचारी के कारण रोष भी दिखाया। वहीं डिजिटल क्षेत्र में सरकार के अन्य दो नए कदम जन-धन योजना तथा रुपे कार्ड के रूप में दिखे। नवंबर 2018 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लिखा था, “आज भारत में ही विकसित की गई यूपीआई तकनीक के कारण वीज़ा तथा मास्टरकार्ड बाज़ार में अपना वर्चस्व खो रहे हैं। युपीआई ने क्रेडिट तथा डेबिट कार्ड द्वारा किए जाने वाले भुगतान में 65 प्रतिशत हिस्सेदारी बना ली है।”

तकनीकी उपनिवेशवाद के दौर में ये छोटी सफलताएँ हैं लेकिन यह हमें आशा देती हैं कि भारत इस क्षेत्र में मुकाम हासिल कर सकता है। क्या भारत इन्हें अपनी आदत बना सकता है?

यदि हम अंग्रेज़ों द्वारा किए गए उपनिवेशवाद को देखें तो इसका रास्ता कुछ इस तरह से होकर जाता है। पहला कि व्यापार तथा उपभोक्ताओं में पकड़ बनाने के लिए प्रस्ताव रखो, फिर जैसे ही कदम जम जाएँ तथा मुनाफा होने लगे तो आर्थिक संपत्ति का प्रयोग सैन्य ताकत बढ़ाने में करो जिससे कमाए गए सभी फायदों पर एकाधिकार की रक्षा की जा सके। उसके बाद कमज़ोर शासकों को रक्षा का प्रस्ताव देकर अपने सैन्य एकाधिकार क्षेत्र में विस्तार करते रहो। जैसे-जैसे आर्थिक तथा सैन्य ताकत बढ़ती जाए वैसे ही एकाधिकार सीमाओं में विस्तार करते हुए पूरे देश पर अपना अधिकार जमा लो। साथ ही गुलाम क्षेत्र के लोगों को शिक्षित करते रहो जिससे वे इसे एक सौभाग्य की तरह देखने लगें- मैकॉले की परियोजना।

अब वर्तमान की बात करते हैं जहाँ राजनीतिक गुलामी तो नहीं अपितु तकनीकी उपनिवेशवाद की अधिक संभावना है जिसके पास अत्यधिक आर्थिक संपत्ति है तथा अमेरिका से राजनीतिक सहयोग प्राप्त है।

यदि कंपनी गूगल है तो मुफ़्त ई-मेल, नक्शे, भुगतान, इत्यादि सेवाएँ दे सकती है, यदि कंपनी फेसबुक है तो मुफ़्त वार्ता आदि मूल सेवाएँ दे सकती है तथा यदि कंपनी अमेज़न है तो सब्सिडी की कीमतों पर कम दाम में तब तक सामान बेच सकती है जब तक कि उससे सामान खरीदना लोगों की आदत न बन जाए। ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह गूगल, फ़ेसबुक तथा अमेज़न को डिजिटल क्षेत्र में एकाधिकार हेतु सैन्य ताकतों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो सुरक्षा उन्हें चाहिए वह मौजूदा तंत्र से उन्हें प्राप्त हो जाती है।

कमज़ोर भारतीय कंपनियाँ या तो उनके साथ समझौते कर लेती है या फिर बिक जाती हैं इससे उन कंपनियों को अपना विदेशी व्यापार विस्तृत करने में सहायता मिलती है। जब हम ही अपने देश में बनी कंपनियाँ इनके अधीन होते रहने देंगे कंपनियाँ हमारे लिए ही हानिकारक होती जाएँगी।

इसलिए जब रुपे के माध्यम से भुगतान होने लगा तथा उसका वर्चस्व कायम होने लगा तो मास्टरकार्ड, वीज़ा तथा अमेरिकन एक्सप्रेस ने अमेरिकी राजनेताओं तथा भारत-अमेरिका संयुक्त व्यापार समिति का उपयोग अपनी ओर से धाक जमाने के लिए किया। ऐसे ही जब आधार तथा युपीआई ने माइक्रोपेमेंट के क्षेत्र में कदम रखा तो फिनटेक, गूगल, अमेज़न तथा अन्य ने इसमें रुकावट डालने का प्रयास किया।

जब आरबीआई ने डाटा का स्थानीयकरण अनिवार्य किया तो अमेरिकी कंपनियों पर बड़ा दबाव आ गया। कुछ मंत्री तथा राजनयिकों ने उनकी बातें सुनना भी चाहा। वे लोग या तो तकनीकी उपनिवेशवाद से अनभिज्ञ हैं अथवा वे व्यक्तिगत तौर पर समझौते को तैयार हैं।

अंग्रेज़ उपनिवेशकों ने कमज़ोर शासकों को शीर्षक अथवा अन्य फायदे देकर अपना खेल खेला था। वहीं ये कंपनियाँ जिन्हें अमेरिकी सरकार का सहयोग प्राप्त है, उसी तरह से राजनयिकों को अन्य सुविधाएँ देकर अपना वर्चस्व कायम करना जानती हैं। उनके बच्चों को बड़े विश्वविद्यालयों में दाखिला दिलाना अथवा राजनयिकों को विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक फंड अथवा बड़े विश्वविद्यालयों में अच्छे पद दिलाना आदि तरीके अपनाती हैं।

लाभप्रद होने के अलावा ये तरीके कंपनी के उपनिवेशवाद तथा वैश्विक स्तर तक पहुँचने के प्रयास हैं जबकि उन्हें इस बात का ख्याल नहीं कि अमरीकी जनता भी इससे निराश है। वैश्वीकरण तथा स्वचालन से अमरीकी मध्यमवर्गीय जनता को सबसे ज्यादा समस्याएँ झेलनी पड़ी हैं तथा ट्रम्प का जीतना सबसे बड़ा प्रमाण है।

भारत के तकनीकी क्षेत्र में नव उद्यमियों को अपने अधीन करने का सबसे अच्छा तरीका है उनके सामने पैसा फेंकना। अधिक धन से वे अरबपति नहीं तो करोड़पति तो बन ही जाते हैं जैसा कि सचिन और बिन्नी बंसल ने करोड़ों रुपए को उद्यम के बदले अपनाना ठीक समझा।

मुफ़्त की मिलने वाली भिन्न प्रकार की सुविधाओं जैसे मेल, नक्शे, संदेश, कम कीमत पर वस्तुएँ इत्यादि पर भारतीय नागरिक मोहित हो जाते हैं औऱ इसी तरह धीरे-धीरे तकनीकी उपनिवेशवाद की जकड़ में आ जाते हैं। इस तरह हम अपना पूरा डाटा हम इन उपनिवेशवादियों को सौंप देते हैं तथा थोड़ी सुविधाओं के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उनकी जकड़ में जाते जा रहे हैं। जब डाटा ही आधुनिक ईंधन है, तो ऐसी स्थिति में हमने व्यक्तिगत सहूलियतों के लिए नए तकनीकी उपनिवेशकों को सऊदी अरब के तेल के कुओं के मालिक के समतुल्य स्थान दे दिया है।

इस क्रम में यह बड़ी कंपनियाँ हमें गुलाम बनाते जा रही हैं। गूगल को पता होता है कि हम कहाँ जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, क्या खरीद रहे हैं कितना इंटरनेट कंटेंट हम उपयोग कर रहे हैं। वहीं अमेज़ॉन को पता होता है कि हम कहाँ रहते हैं, क्या खरीदते हैं, हमारा मासिक खर्च कितना होता है इत्यादि। उबर को पता होता है कि हम कहाँ यात्रा करते हैं, कहाँ रहते और कहाँ कार्य करते हैं, हम खाने के लिए ऑनलाइन क्या मंगवाते हैं इत्यादि। हमें नहीं पता कि इस जानकारी का यह कंपनियाँ क्या करती हैं।

हाल ही में ख़बरें थीं कि फ़ेसबुक ने अपने ग्राहकों का संवेदनशील डाटा केम्ब्रिज ऐनालिटिका को उपलब्ध कराया था जिसका चुनावी दुरुपयोग किया गया। वहीं यदि रूसी हैकर्स अमेरिका के चुनाव के परिणामों पर असर डाल सकते हैं तो हम कल्पना कर सकते हैं कि भारतीय साइबर सुरक्षा को कितनी आसानी से हैक किया जा सकता होगा और यदि यह दुरुपयोग चुनावों के परिणाम बदल देगा तो सोचिए कि क्या हाल होगा।

तकनीकी उपनिवेशवाद आसानी से भारतीय ग्राहकों का डाटा उपयोग करने दे सकता है जो कि राजनीतिक हालातों पर असर डाल सकता है। खबरें थीं कि कांग्रेस ने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के आकलन विभाग की ओर रुख किया था। भले ही यह खबर गलत हो लेकिन यदि ऐसा होता तो सोचिए हालात क्या हो सकते हैं।

तकनीकी उपनिवेशवाद के विरुद्ध हर स्तर पर लड़ाई लड़नी होगी- आर्थिक मदद तथा हिस्सेदारी की ताकत, नियमन, डाटा सुरक्षा और स्थानीयकरण तथा देश के तकनीकी क्षेत्र के उद्यमों के लिए सहयोग।

भले ही यह आसान तरीके नहीं हैं, लेकिन हमें खुद से प्रश्न पूछकर अपने उत्तर में निम्न बिंदुओं को शामिल करना चाहिए-

पहला, इन बड़ी कंपनियों के पास सबसे बड़ा हथियार उनकी आर्थिक सम्पन्नता है जिससे निश्चित ही वे भारतीय उद्यमों में बड़ा निवेश कर सकती हैं अथवा खरीद सकती हैं। इसका अर्थ है कि हमें देश के उद्यमों को अधिक आर्थिक ज़रूरत तथा अभाव के कारण बाज़ार से बाहर होने से रोकना होगा। क्या हम विदेशी निवेशकों को “नोन वोटिंग शेयर्स” का प्रावधान दे सकते हैं अथवा क्या निवेशकों की कई श्रेणियाँ बनाई जा सकती हैं? क्या उनके लिए हम कम “कैपिटल गेन्स टैक्स” का प्रावधान रख सकते हैं?

दूसरा, क्या सरकार के माध्यम से अथवा सार्वजनिक-निजी भागीदारी माध्यम से विकसित नव उद्यमों को किसी भी बाहरी प्रतियोगी के सामने जाने से पहले प्राथमिक दौर में केवल भारतीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित अथवा विकसित करने का प्रावधान कर सकते हैं? इसमें हमें किसी भी विजेता की तलाश करना आवश्यक नहीं है। जिस उद्यम का व्यवसाय प्रारूप अच्छा होगा वह सफल होगा और जिसका नहीं वह इस दौड़ से बाहर होगा। हमें देश के उद्यमों को बढ़ाने के लिए 10 नए असफल उद्यम नहीं खोलने हैं।

तीसरा, क्या भारतीय अर्थव्यवस्था के सुधार तथा रोज़गार के अवसर बढ़ाने हेतु ओपन सोर्स तकनीक के विकास के लिए निजी-सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा दे सकते हैं? उदाहरण के तौर पर बड़े आर्थिक निवेश के साथ उबर को बाज़ार में वर्चस्व बनाने से रोकने के लिए हम कोई ऐसा गैर-लाभ-एप बना सकते हैं जिससे हर टैक्सी सेवा कंपनी कुछ मासिक किराया देकर अपने ग्राहकों को सेवा दे सकेंगी और अधिक मुनाफा अपने पास ही रख सकेंगी।

इससे उबर की प्रतियोगी केवल ओला ही नहीं होगी। यह ऐप किसी मुनाफे के उद्देश्य से नहीं होना चाहिए लेकिन हर व्यक्ति के उपयोग लायक सुलभताएँ होनी चाहिए। इससे “शेयर्ड मोबिलिटी मार्केट” में भी कई गुना अवसर बढ़ेंगे। साथ ही यह निजी कार मालिक यदि निजी तथा व्यवसायिक दोनों ही तरीक़ों से कार उपयोग में लाना आरंभ कर दें तो वे भी इसका लाभ ले सकते हैं। अत: यह सार्वजानिक लाभ के उद्देश्य को परिपूर्ण करेगा।

चौथा, किसी भी नियमन के प्रारूप को बनाने या भारतीय उद्यमियों को मदद करने हेतु एक भारतीय तकनीकी विशेषज्ञ की सलाह अनिवार्य होनी चाहिए। सरकारी तथा नियामक के सदस्यों में तकनीक के ज्ञान की कमी की वजह से कुछ निर्णय ऐसे हो सकते हैं जो कि भारतीय उद्यमों पर नकारात्मक असर डालें। इस संदर्भ में “आई-स्पिरिट” जैसी संस्थाएँ सहायक सिद्ध हो सकती हैं। वहीं भारतीय सॉफ्टवेयर क्षेत्र में राउंड टेबल भी एक बड़ा विकल्प हो सकता है। यह बुद्धिजीवियों तथा वैचारिक लोगों का समूह होता है जो भारतीय सॉफ्टवेयर क्षेत्र का सेवाओं से उत्पाद की ओर रुख करने में सहायक होता है। 

पाँचवा, डाटा सुरक्षा, गुप्तता तथा नियमन। डाटा स्थानीयकरण के लिए आरबीआई भी ज़ोर दे रहा तथा यह एक आवश्यक कदम है। लेकिन कहीं भारत को एक ऐसा प्रारूप तैयार करना होगा जो बड़ी कंपनियों फायदा देने की बजाय डाटा को सार्वजनिक लाभ हेतु उपयोग में दे सके। स्टर्न स्कूल ऑफ बिज़नेस के प्राध्यापक वसंत धर ने पिछले सितंबर में द वॉशिंगटन पोस्ट में लिखा था कि डाटा नियंत्रण के चार प्रारूप हैं।

एक है अमरीकी प्रारूप जो बड़ी कंपनियों को कानूनी तरीके से एकत्रित किया डाटा व्यवसायिक उद्देश्य के लिए उपयोग करने की छूट देता है। दूसरा है चीनी प्रारूप जहाँ सरकार द्वारा डाटा नियंत्रण होता है तथा उन कंपनियों को लाभ देता है जो कम्युनिस्ट पार्टी की अंगुलियों पर नाचते हैं।

तीसरा है यूरोपियन संगठन प्रारूप जिसमें डाटा सुरक्षा नियमन के अनुसार यदि कोई कंपनी डाटा एकत्रित कर रही है तो उसे साबित करना होता है कि उसके द्वारा एकत्रित की गई जानकारी आवश्यक थी। यदि कंपनी किसी अन्य उद्देश्य से डाटा का उपयोग करती है तो उसे जुर्माना देना होता है। जैसे कि यदि किसी टैक्सी सेवा कंपनी ने जगह की जानकारी एकत्रित की तथा यदि उसने टैक्सी सेवा के अतरिक्त वह जानकारी किसी अन्य उद्देशय के लिए उपयोग की तो उसे जुर्माना देना होता है। 

वहीं बीएन श्रीकृष्ण की रिपोर्ट में बताया गया भारतीय प्रारूप अभी भी लागू होना शेष है लेकिन वह चौथा प्रारूप है तथा वहाँ डिजिटल डाटा प्लेटफॉर्म को सार्वजनिक वस्तु के रूप में देखा जाता है। धर ने लिखा, “भले ही भारत में डाटा सुरक्षा बिल अभी कानून बनना अभी शेष है लेकिन जो ज़िम्मेदार लोग इसे बनाएँगे वह सुनिश्चित करेंगे कि डाटा का लेन-देन सह-संवेदी हो व्यक्ति की सहमति के अनुसार उसे उपयोग किए जा सकने की समय सीमा का प्रावधान होगा।

अभी तक केवल व्यवसायिक लेन-देन को जाँचना ही जिम्मेदारों से अपेक्षित था लेकिन अब स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार अथवा अन्य क्षेत्र जहाँ संवेदनशील डाटा की आवश्यकता होती है पर भी नियंत्रण रखना होगा। डाटा पर नियंत्रण के लिए भारतीय प्रारूप हर व्यक्ति की डाटा की सुरक्षा का तरीका बताता है।”

स्पष्ट है कि हमने ठोकर खाई है लेकिन आवश्यकता है कि हम ऐसा मार्ग चुनें जो तकनीकी उपनिवेशावद को रोक सके तथा हमारे नागरिकों का डाटा नागरिकों की भलाई के लिए उपयोग करने में सहायक हो।

लेकिन इरादों और अंतिम प्रारूप के बीच कई जगह बाधाएँ आ सकती हैं। वैश्विक दबाव में भारत कई बार झुक जाता है इस कारण हमें अनियंत्रित तथा खुद को हराने वाले व्यवहार से बचना होगा।

भारत इस तकनीकी उपनिवेशवाद को तभी चूर कर सकता है जब यहाँ निजी-सार्वजनिक भागीदारी के साथ अच्छी योजनाएँ तथा तकनीकी प्लेटफॉर्म विकसित किए जाएँ। यदि भारतीय तकनीकी कंपनियाँ भारत में वर्चस्व रखेंगी तो भारत दुनिया में वर्चस्व रख पाएगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।