पत्रिका
दलित पूंजीवाद के लिए एजेंडा

आशुचित्र- भारतीय राज्य को नियम आधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए क्योंकि दलित उद्यमियों की सफलता के बिना जातिवाद को नहीं मिटाया जा सकता।

आधुनिक भारतीय गणराज्य की शुरुआत से ही दलित एजेंडा और राज्य की नीतियों ने समुदाय की तात्कालिक समस्याओं जैसे अस्पृश्यता, बहिष्कार और जाति-आधारित भेदभाव के समाधान का प्रयास किया। नतीजतन दलित राजनीतिक चर्चा पर दो मुद्दों ने काफी ज़ोर पकड़ा। पहला मुद्दा उनकी पहचान का था जिसने विभिन्न दलित जातियों की पहचान को इससे जुड़े कलंक को धोने और सामाजिक-राजनीतिक समुदाय के रूप में संगठित करने का प्रयास किया। दूसरा मुद्दा ‘आरक्षण’ था जो सकारात्मक कार्रवाई का एक रूप है और इसका उद्देश्य शैक्षिक संस्थानों, विधायिकाओं और नौकरशाही में प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।

इस तथ्य में कोई संदेह नहीं है कि आरक्षण प्रतिनिधित्व प्रदान करने और सामाजिक गतिशीलता को प्रेरित करने के अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल रहा है। लेकिन आरक्षण केवल समस्या के लक्षणों के लिए कुछ निवारण प्रदान करता है जबकि वास्तविक समस्या अनसुलझी है। समस्या सीधे शब्दों में कहें तो यह है कि, “जातिवाद के बिना समाज कैसे बनाया जाए जहाँ जाति व्यक्तियों के बीच सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सहभागिता का निर्णायक कारक न हो?” मूल प्रश्न के अपकार करते हुए दलित एजेंडा ’पहचान और आरक्षण ’के मुद्दों तक सीमित हो गया है। जाति एक धार्मिक प्रणाली नहीं है लेकिन उनके संबंधित व्यवसायों के अनुसार ’मजदूरों (श्रम नहीं) के विभाजन की एक सामाजिक प्रणाली है, जो एक श्रेणीबद्ध पदानुक्रम में व्यवस्थित होती है और जातिगत विवाह इसकी विशेषता होती है। जाति व्यवस्था का मुख्य मुद्दा है कि यह आर्थिक स्वतंत्रता नहीं देता है- यह लोगों को अपना पेशा चुनने की आज़ादी नहीं देता है। और आर्थिक स्वतंत्रता पर हमारी अन्य स्वतंत्रताएँ निर्भर करती हैं।

इसलिए यह आर्थिक स्वतंत्रता ही है जो किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी पेशे को चुनने, पैसा कमाने और अपनी इच्छानुसार उस पैसे को खर्च करने की स्वतंत्रता देती है और यह सीधे जाति व्यवस्था को कमज़ोर करती है। जाति व्यवस्था के तहत लोगों के बीच आर्थिक संबंध उनकी जाति से निर्धारित होते हैं जो उस संबंध को और भी मज़बूत करता है; जबकि, बाज़ार पर आधारित एक प्रणाली लोगों के बीच आर्थिक लेनदेन का प्रतिरूपण करती है। वास्तव में जहाँ कहीं भी बाज़ार की ताकतें मज़बूत हुई हैं, उन्होंने जन्म आधारित प्रणालियों को कम कर दिया है।

भारत में पहले से ही यही प्रक्रिया चल रही है। लाइसेंस कोटा राज, जिसने एक दलित के लिए व्यवसाय शुरू करना या दुकान स्थापित करना असंभव बना दिया था, के भंग होने के बाद हम दलित उद्यमिता की वृद्धि देखते हैं। दलित युवा बिना किसी आरक्षण के निजी फर्मों और बहु-राष्ट्रीय कंपनियों में काम कर रहे हैं।

जबकि सरकारी नौकरियों में आरक्षण ने सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा दिया और पारंपरिक व्यवसायों से बचने के लिए एक जगह भी दी और अब निजी क्षेत्र दलित सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक-आर्थिक समानता की तलाश में अगला अखाड़ा होगा। वैसे भी सरकारी क्षेत्र में सीमित संख्या में ही नौकरियाँ हैं जो शिक्षित दलित युवाओं की बढ़ती संख्या के लिए अपर्याप्त हैं। निजी उद्यमिता और निजी क्षेत्र की नौकरियाँ ऐसे क्षेत्र हैं जहांँउन्हें जल्दी से जल्दी जाना होगा। इसलिए, राज्य नीति को कौशल विकास, बाज़ार पहुँच, प्रवेश बाधा, छोटे और मध्यम उद्यमियों की समस्याओं आदि पर ध्यान देना शुरू करना चाहिए।

दलित उद्यमियों के सामने एक बड़ी समस्या है कि उनके पास सामाजिक पूंजी की कमी है और वित्तीय क्षेत्र तक पहुँच नहीं है। सामाजिक पूंजी अंतर-संबंधित व्यक्तियों और समूहों के बीच अधिमान्य उपचार और सहयोग से प्राप्त सामूहिक या आर्थिक लाभ है और ऐतिहासिक बहिष्कार एवं सामाजिक-आर्थिक विकास के निम्न स्तर के कारण दलित सबसे पीछे हैं। इसलिए उद्यमियों को अपने क्षेत्रों में स्वयं को सक्षम बनाने के लिए पर्याप्त सहायता प्रदान करना एक महत्वपूर्ण कार्य हो जाता है।

दूसरा, उचित दर पर पूंजी प्राप्त करने के लिए वित्तीय क्षेत्र तक पहुंच की समस्या है। नए प्रवेशकों के लिए पूंजी की लागत सामान्य रूप से अधिक होती है, विशेष रूप से उन सामाजिक समूहों से आने वाले लोगों के लिए जिनका उद्योग में कोई इतिहास नहीं है। इस संबंध में, एससी/एसटी वेंचर कैपिटल फंड, ग्रीन बिज़नेस स्कीम, मुद्रा आदि जैसी योजनाएँ दलित उद्यमियों के वित्तीय समावेशन के कार्य को मुख्यधारा की वित्तीय प्रणाली में शामिल करने के लिए किया जाए न कि इसलिए कि उन्हें सुगम ब्याज दरों के साथ अनौपचारिक पूंजी बाज़ार पर भरोसा करने दिया जाए।

दलितों द्वारा चलाए जा रहे उद्यमों से खरीद के लिए प्रावधान करना और दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री जैसे संगठनों को प्रोत्साहित करना, कॉरपोरेटों को सलाह देने के लिए दलित उद्यमियों को शामिल करना और उनकी भर्ती और खरीद नीति में विविधता लाने का पूरे सामाजिकआर्थिक गतिशीलता पर दूरगामी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

स्वतंत्रतावादी व्यवस्था के विपरीत पूंजीवाद राज्य के बिना कार्य नहीं कर सकता है। राज्य ने सभी सफल पूंजीवादी देशों में एक महत्त्पूर्ण ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। भारत को भी इस भूमिका को निभाना चाहिए, विशेष रूप से वंचित समुदायों पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत के भविष्य के विकास को चलाने के लिए नए उद्यमशील वर्ग के व्यापक आधार को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाना चाहिए।

हमें एक अच्छी विनियमित, नियमआधारित बाज़ार प्रणाली बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए, जहाँ व्यापार करने में आसानी हो और कानून का शासन कायम हो। इससे आर्थिक विकास में तेज़ी आएगी, जो समाज को मौलिक रूप से उन देशों के ऐतिहासिक अनुभव के रूप में बदल देगी जिनको इस तरह की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा है।

अभिनव प्रकाश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।