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मोदी के लिए एक दूसरा कार्यकाल? जी हाँ।

आशुचित्र- अपने पहले कार्यकाल में मोदी सरकार का प्रदर्शन और अपनी स्वयं की विफलताओं और आधी सफलताओं से इसकी सीख के कारण इसे दूसरे कार्यकाल के साथ पुरस्कृत करना ज़रूरी है।


आम चुनावों की प्रक्रिया एक महीने से भी कम समय में शुरू होने वाली है और यही सही समय है नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) सरकार के पिछले पाँच वर्षों के काम का मूल्यांकन करने का और यह पूछा जाना चाहिए कि क्या एनडीए एक और सत्र की हकदार है।क्या नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में पर्याप्त काम किया है जो दूसरे सत्र के योग्य है?

नीतिगत हस्तक्षेपों के लाभकारी परिणाम शायद ही कभी एक चुनावी कार्यकाल में नज़र आते हैं। सामान्य नियम यह है कि अधिकांश सत्ताधारियों को एक और कार्यकाल देना चाहिए यदि वे देश के आर्थिक क्षेत्र में सुधार करने और उसके लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए कड़े प्रयास कर रहे हैं। किसी भी सरकार की पहली अवधि में इस बात पर आँकलन किया जाना चाहिए कि क्या बदलाव प्रक्रिया शुरू हुई है या नहीं और क्या यही बदलाव प्रक्रिया सही दिशा में जा रही है और क्या उन्हें एक और हमें एक और मौका देना चाहिए इन अधूरे कामों को पूरा करने के लिए। 2004 की यूपीए सरकार काफी भाग्यशाली रही जिसका अपने पहले सत्र में कोई भी सुधार न किए जाने के बावजूद उसे वैश्विक आर्थिक तेज़ी का लाभ मिला। उसकी अत्यधिक खर्चीली नीतियाँ काफी गैर ज़िम्मेदारियों के भरी हुई थीं लेकिन यह भी सत्य है कि पहले की किसी भी सरकार की तुलना में यह सर्वाधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सक्षम हुई। परंतु उसे संदेह का एक लाभ मिला और उसे एक दूसरी अवधि मिली जिसमें इसने सब कुछ गड़बड़ करके रख दिया।

नरेंद्र मोदी और एनडीए को एक गरीब विरासत मिली जिसमें उसे सुहृद पूंजीवाद, एक धीमी अर्थव्यवस्था, जुड़वाँ राजकोषीय और चालू खाता घाटे, जुड़वाँ बैलेंस-शीट समस्या और उच्च मुद्रास्फीति और फिर भी मोदी ने बड़े सुधारों का परिचय दिया जो कि लंबे समय में काफी कारगर रहेंगे। इतने निचले स्तर से देश को उठाना साफ दिखाता है कि उनकी दूसरी अवधि में आने की पूरी संभावना है।

हालाँकि हमें अभी भी यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि अगर वे सही चीज़ों के लिए एक दूसरी अवधि के हकदार हैं या फिर जो कुछ उन्होंने गलत किया है इसके लिए हमें अर्थशास्त्र से लेकर आंतरिक और बाहरी सुरक्षा तक और कूटनीति के अन्य क्षेत्रों में देखना होगा।

हमें पहले सरकार की विफलताओं से शुरुआत करनी चाहिए। लगभग पाँच साल खत्म होने को आए लेकिन हम अभी भी कई बुनियादी समस्याओं को हल करने के आधे रास्ते तक भी नहीं पहुँचे हैं जैसे खेत संकट, नौकरियों की कमी, और देश की कानून व्यवस्था जिसके लिए एनडीए को कुछ हद तक दोषी ठहराया जाना चाहिए। बिलकुल सच लेकिन ये समस्याएँ ऐसे ही नहीं बन गईं हैं और जिसने भी पाँच साल तक सत्ता का आनंद उठाया है वह जानता है कि कुछ समस्या ऐसी हैं जो हर स्तर में शामिल हैं। जिसे आसानी से नहीं कहा जा सकता है।

एनडीए इस बात पर उंगली उठा सकती है कि लगातार दो साल देश को सूखे का प्रकोप झेलना पड़ा और जिसमें गिरती वाली ग्रामीण मज़दूरी और बढ़ती ग्रामीण बेरोजगारी जैसी परिस्थितियाँ भी शामिल थीं। 2016 में जहाँ एक अच्छे मानसून ने दसतक दी जिसने ग्रामीण क्षेत्रों को काफी हद तक उभारा लेकिन वहीं उस समय नोटबंदी ने कहीं न कहीं तकलीफ दी। नोटबंदी ने नकदी-आधारित ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्र को सबसे अधिक प्रभावित किया और कृषि क्षत्रों को राहत मिलने में देरी हुई। कुछ राहत जैसे कि नीम-कोटेड यूरिया, मनरेगा आवंटन में बढ़ोतरी और बेहतर फसल बीमा योजना की पेशकश की गई जो अधिक नहीं थी और चुनावों से पूर्व की आपूर्ति करने लिए राज्य और केंद्र सरकारों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि और बकाया राशि माफ करने जैसे कदम उठाए हैं जो सिर्फ अल्पावधि में कारगर हैं। 2019 की शुरुआत हो चुकी है पर अभी भी हमारे पास ग्रामीण संकट को कम करने के लिए कोई दीर्घकालिक योजना नहीं है। इसे मोदी की बड़ी विफलता के रूप में गिनना चाहिए।

नौकरियों पर एनडीए काफी सुस्त नज़र आई और इसपर कुछ खास काम नहीं किया, वहीं 2014 में जबसे एनडीए सत्ता में आई जीडीपी विकास दर में लगभग तुरंत तेज़ी देखी गई। सरकार ने लगभग तीन साल लगा दिए यह महसूस करने में कि अतिरिक्त नौकरियाँ उत्पन्न केिए बिना ही भारत में विकास आ गया है। यह एहसास तब हुआ जब निजी कंपनियों द्वारा नोटबंदी के बाद दिखाए गए नौकरियों पर उनके आँकड़ें आए और कई जाति समूहों द्वारा आंदोलनों की शुरुआत की गई। ये यह भी दर्शाता है कि खेत संकट वैसा ही है जैसे कि नौकरियों की कमी और भूमि के छोटे भूखंडों में अलाभकारी खेती से होने वाली खराब आय है। 2017 में और 2018 में सरकार ने उन नियोक्ताओं को अच्छी खासी सब्सिडी देने की बात की जो और अधिक श्रमिकों की नियुक्ति कर सकते थे और 2018 में सरकार ने सभी उद्योगों के लिए निश्चित अवधि के श्रम अनुबंधों को बढ़ाया जिसमें कपड़ा उद्योग भी शामिल रहा। लेकिन अभी तक शुद्ध (नेट) रोज़गार सृजन दिखाई देने की संभावना नहीं है।

लाभ देखें तो मोदी सरकार ने नौकरियों को औपचारिक रूप देने पर जोर दिया है और कंपनियों को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के अंतर्गत आने को लिए प्रोत्साहित किया और प्रशिक्षुता पर श्रम कानूनों में ढील दी लेकिन औपचारिकता का अल्पकालिक प्रभाव- समय के साथ बेहतर गुणवत्ता वाली नौकरियों के लिए यह आवश्यक शर्त नौकरियों की वृद्धि के लिए नकारात्मक रही और औपचारिकता से मजदूरी की लागत में बढ़ोतरी आ गई जिसने नौकरियों के विस्तार को धीमा कर दिया।

एनडीए की बड़ी विफलता यह नहीं है कि उसने नई नौकरियाँ नहीं बनाई हैं जो कि एक अनुचित धारणा होगी लेकिन बेरोजगारी पर सटीक आँकड़े न प्राप्त करके नौकरी की चुनौती की प्रकृति का अनुमान लगाने की भी कोशिश नहीं करना है। सरकार को बेरोजगारी पर कम से कम आविश्वसनीय निजी अनुमानों पर निर्भर नहीं होना चाहिए था और इससे पहले ही एक बेहतर नौकरियों का सर्वेक्षण करा लेना चाहिए था। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) का हालिया बेरोजगारी पर आँकड़ा एनडीए के लिए मानार्थ नहीं हो सकता है लेकिन यह केवल एकमात्र उपाय है इससे बेहतर आँकड़ें। नरेंद्र मोदी को सही जानकारी के लिए कौन रोक रहा था और कौन इस जानकारी को प्राप्त करने के लिए सही संसाधनों करने से मना कर रहा था जिससे सही आँकड़े प्राप्त होते और उन्हीं आँकड़ों से रोज़गार उत्पत्ति के लिए नई नीति बनाने में आसानी होती?

खेतों और नौकरियों के अलावा एनडीए सरकार बैंकिंग संकट की गहराई को काफी देर से समझी। यह अर्थशास्त्रियों को अच्छे से पता था कि बैंक अशोध्य ऋण से लदे पड़े हैं और जब मोदी सरकार ने सत्ता में आई तो वे इस बुरे समाचार की झलक दिखा रहे थे। लेकिन सरकार ने इस मुद्दे को गलत तरीके से संबोधित किया। पुनर्पूंजीकरण और कर्ज़ माफी अग्रिम रूप से आने चाहिए थे और बैंक समेकन और निजीकरण बाद में आना चाहिए। लेकिन ये करने के बजाय मोदी सरकार ने एक बैंक बोर्ड ब्यूरो का गठन करने का विकल्प चुना जो कुछ भी नहीं हासिल कर पाया। दो साल बर्बाद हो गए और अशोध्य ऋण की समस्या को आखिरी बार 2017 में शोधक्षमता और दिवालियापन कोड (आईबीसी) के तहत संबोधित किया गया और कमजोर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए विशाल पुनर्पूंजीकरण किया गया। मोदी सरकार इसे देरी से लाई जो शायद ही अपने पहले अवधि में परिणाम दिखाने में सक्षम हो। लाभ देखें तो हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि इस मुद्दे को सही ढंग से संबोधित किया जाना ज़रूरी था और वित्तीय वर्ष 19-20 के बाद से इसका परिणाम दिखना शुरू हो जाएगा।

इन विफलताओं को सही किया जा रहा है और सरकार द्वारा कहीं और प्राप्त सफलता की तुलना में ये विफलताएँ सरकार से उनकी कई उपलब्धियाँ नहीं छीन सकती हैं, विशेष रूप से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), आईबीसी, आधार के माध्यम से हर स्तर पर वितरण प्रणाली की सफाई और सब्सिडी की रकम सीधे खाते में पहुँचाना, 100 प्रतिशत घरों को वित्तीय समन्वय से आत्मनिर्भर बनाना, आदि। कोई यह कह सकता है कि ये वित्तीय सुधार अभी तक कुछ बड़ा नहीं दे पाए हैं और जीएसटी अपनी अंतिम स्थिर स्थिति से दूर है लेकिन हम वहाँ तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन कम से कम हम यह कह सकते हैं कि जीएसटी ने कुछ मुट्ठी भर करों को हटा दिया है और हमारे राजमार्गों को ट्रकों के धुएँ से आज़ादी दिलाई है जो चेक नाका और चुंगी पोस्ट पर सुस्ती से खड़े हुआ करते थे।

आईबीसी बड़े व्यवसायों के मित्रवादी पूंजीवाद को हटाकर उनकी गलतियों या धोखेबाज़ी के लिए भुगतान कराने के लिए लगातार निहित है। पहले निजी क्षेत्र के नुकसानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता था और उनके मुनाफों का निजीकरण लेकिन आईबीसी युग में व्यवसायी अपने सर्वोत्तम व्यवसायों को खो रहे हैं और उन्हें अपनी चूकों और दलालियों के लिए भुगतान करना पड़ रहा है। बैंकों को सही तरीके से साफ किया जा रहा है, समेकित किया जा रहा और पुनर्पूंजीकृतकिया जा रहा है और अब बैंक वित्तीय केंद्र के तहत अपने नुकसान को छिपाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किए जा रहे हैं।

व्यापक आर्थिक मोर्चे पर हाल ही में चुनाव से संबंधित मुफ्त घोषणाओं की पेशकश के कारण राजकोष में कुछ गिरावट के बावजूद राजकोष यथोचित रूप से अच्छी स्थिति में है और मुद्रास्फीति पूरी तरह से समाप्त हो गई है। यह कुछ ऐसा है जो यूपीए वैश्विक आर्थिक तेज़ी के बावजूद भी हासिल नहीं कर पाई थी। दोहरी-बैलेंस-शीट समस्या से मंद निवेश करने की निजी क्षमता को मोदी सरकार ने तेल करों से उच्च राजस्व और राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए अन्य चीजों के अलावा इसको अच्छी तरह से इस्तेमाल किया।आईबीसी की प्रक्रिया शुरू होने से निजी निवेश दुबारा से प्रोत्साहित होगा और पुरानी कंपनियों को नए मालिकों को सौंपकर बैंक अपनी बकाया राशि वसूल कर सकेंगे। वहीं चिंता स्पष्ट रूप से निर्यात है। स्पष्ट रूप से यह पुनरोद्धार अधिक निर्यात करने के लिए कृषि को मुक्त करने और भारतीय विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा में सुधार करने से होगा। कृषि सुधारों को लेकर मोदी सरकार पर दूसरी अवधि में महत्त्वपूर्ण कार्य रहेगा।

मोदी सरकार के आर्थिक रिकॉर्ड पर एक और सवाल खड़ा करने का कारण राज्य के संसाधनों को संरक्षित करने के लिए निजीकरण को एक विकल्प में रूप में देखना उनकी विफलता है। एयर इंडिया, बीएसएनएल और कई बड़े बैंक जैसे कुछ संस्थान जो संसाधनों को निगल रहे हैं लेकिन जिन्हें आदर्श रूप से सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मोदी अभी तक सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं के निजीकरण के विचार के प्रति समर्थित नहीं दिखे हैं लेकिन शायद अब उन्हें आभास हो गया है कि एयर इंडिया जैसी घाटे में चल रही कंपनियों को करदाताओं के पैसों पर चलाना हानिकारक है। 2018 में एयर इंडिया के निजीकरण का प्रयास खराब योजना के कारण विफल होकर रह गया और इस प्रक्रिया को पुनरारंभ करने में कोई भी तेज़ी नहीं दिखाई पड़ रही और जब तक कि एक नई सरकार नहीं आती है तब तक ऐसा ही देखना को मिलेगा।

सामाजिक पक्ष को देखें तो सार्वभौमिक वित्तीय समावेश अब जन धन योजना के तहत वास्तविकता के काफी करीब है। बुढ़ापे के लिए अंशकालिक पेंशन योजनाएँ सभी के लिए उपलब्ध हैं, आयुष्मान भारत से चिकित्सा बीमा लाभ भारत में गरीबों तक पहुँच रहा है, और बिजली भारत के आखिरी गाँव तक पहुँच गई है और जल्द ही आखिरी घर पर भी प्रकाश डाल देगी। खाना पकाने की गैस 80-90 प्रतिशत घरों तक पहुँच गई है, इस प्रकार नागरिकों को लकड़ी जलाने से या केरोसीन पर सब्सिडी की मांग करने से दूर हो रहे हैं। इससे भी बेहतर यह कि भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा की एक प्रधानमंत्री ने घरों के लिए शौचालय-निर्माण करना अपने लिए एक निजी प्राथमिकता बनाई और विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच पूरी तरह बंद हो जाएगा और जब एक बार स्वच्छ भारत पूरी तरह से लागू कर लिया जाएगा तो डायरिया और प्रोटीन से संबंधित कुपोषण के कारण होने वाली तीन लाख बच्चों की अकस्मात मौत को बचाया जा सकेगा।

बाहरी मोर्चे पर भारत की वैश्विक प्रोफ़ाइल कभी भी अधिक अच्छी नहीं रही है और वहीं भारतीय कूटनीति ने देश को विशेष एफएमसीटी (फिसाइल मटेरियल कटऑफ संधि) क्लब में शामिल करवाने में सफल रही है। हालाँकि अभी भी करने के लिए बहुत काम है क्योंकि चीन अमेरिका के समर्थन के बावजूद परमाणु आपूर्तिकर्ताओं के समूह में हमारी प्रविष्टि को रोकना जारी रखे हुए है। चिंता चीन-पाकिस्तान गठजोड़ और भारतीय सुरक्षा के लिए इसका निहितार्थ है। डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी संरक्षणवादी नीतियों ने चीन को डोकलाम गतिरोध के बाद अपनी भारतीय विरोधी स्थिति को कम करने के लिए मजबूर कर दिया लेकिन भारत को चीनी विस्तारवाद को रोकने के लिए अपनी सैन्य तैयारी और कूटनीतिक प्रयासों को जारी रखने की आवश्यकता है। पाकिस्तान पर मोदी सरकार ने आतंकवाद के कृत्यों के प्रतिशोध के लिए अधिक आक्रामक रुख को बनाए रखा है लेकिन अभी तक परिणाम काफी अंतर्निहित हैं। लेकिन अकेले सिर्फ मोदी की विफलता नहीं हैं इसमें लगभग भारत की सभी सरकारें शामिल रही हैं। नीतियाँ अकेले भव्य स्वागतों या एक अच्छी साख बनाने से नहीं बनती हैं, इसमें एक पैनी धार होनी चाहिए।

जम्मू और कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ राज्य में सरकार बनाने के एक विफल प्रयास करने के बाद केंद्र अब अपने रास्ते पर वापस आ गया है। राज्य में राजनीति को सामान्य करने की कोशिश करने से पहले आतंकवाद को कम करने के लिए यह कदम सराहनीय है। अभी और भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है लेकिन पीडीपी जो अलगावादियों पर नरम है और उनका समर्थन करती है, उससे रिश्ता तोड़ना बहुत अच्छा कदम है। पूर्वोत्तर में भाजपा ने लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए अतीत में किसी भी अन्य सरकार से अधिक काम किया है। नागरिकता संशोधन बिल पर उत्तर-पूर्व में हाल ही में क्रोध देखा गया और बिल के बारे में लोगों को बहकाया जा रहा है। यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि बांग्लादेश से उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों (पाकिस्तान की बात न करें) को भारतीय नागरिकता देने में एक तेज़ी आएगी और मोदी को दूसरे कार्यकाल में इसको आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। उत्तर-पूर्व की जनता को एकमात्र आश्वासन दिया जाना चाहिए कि बोझ देश के बाकी हिस्सों द्वारा भी साझा किया जाएगा। अवैध प्रवासी केवल असम की समस्या नहीं हो सकते हैं।

यदि एक दूसरी अवधि दी जाती है तो मोदी सरकार को कई सुधारों पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है जिनपर अब तक बहुत कम ध्यान दिया गया है। जिसमें शामिल हैं एक पारदर्शी और राजनीतिक रूप से तटस्थ कानूनी मशीनरी बनाना, सीबीआई को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना, न्यायपालिका को साफ करना, न्यायपालिका में सुधार विशेषकर न्यायिक चयन और जवाबदेही की प्रक्रिया में; राज्यों को और अधिक शक्तियों प्रदान करना, दो प्रमुख कारक बाज़ारों- भूमि और श्रम को विकसित करना जिससे अधिक नौकरियाँ बनाई जा सकें।

अपने पहले कार्यकाल में मोदी सरकार का प्रदर्शन और अपनी स्वयं की विफलताओं और आधी सफलताओं से इसकी सीख के कारण इसे दूसरे कार्यकाल के साथ पुरस्कृत करना ज़रूरी है ताकि देश के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके। यदि मतदाता मोदी को खारिज कर देते हैं तो इस देश को काफी कुछ झेलना पड़ सकता है और प्रयत्न और त्रुटि (ट्रायल एंड एरर) के इन कुछ वर्षों में निराशा ही हाथ लगेगी और जिसपर मोदी ने इतनी मेहनत की है उसपर पानी फिर जाएगा।

इन कारणों की वजह से स्वराज्य  मोदी के नेतृत्व में एनडीए को दूसरा कार्यकाल मिलने का समर्थन करता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।