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भाजपा के लिए हिन्दू एजेंडा: 10 बिन्दुओं में
भाजपा के लिए 10 बिन्दुओं का हिन्दू एजेंडा

प्रसंग
  • भाजपा एक हिन्दू पार्टी है और इसे एक स्पष्ट और परिभाषित हिन्दू एजेंडे के साथ आगे आना चाहिए।
  • सभी के लिए सभी चीजों के ढोंग से काम नहीं चलेगा।

सर्वोच्च न्यायालय का एक निर्णय, जिसमें माना गया कि अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम को लचीला बनाया गया था, के विरोध में 2 अप्रैल को दलित हिंसा के विस्फोट ने भारतीय जनता पार्टी की अन्तर्निहित राजनीतिक कमजोरी को दर्शाया है। कारण चाहे दलितों का पक्ष लेना हो या विपक्षी ताकतें हों या दोनों का संयोजन हो, लेकिन सारहीन है। एक हिन्दू पार्टी के रूप में भाजपा तब तक झटके महसूस करती रहेगी जब तक कि भारत में जातिवाद समाप्त नहीं हो जाता।

भाजपा के साथ समस्या यह है कि यह 2014 के अपने नारे “सबका साथ सबका विकास” के नज़रिए को लेकर चली है वह भी स्वयं यह जाने कि इसका मतलब क्या है।विकास राजनीतिक सफलता के अनिवार्य शर्त है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।विकास के साथ निर्वाचन क्षेत्रों के अन्य मुद्दों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है। नरेन्द्र मोदी सरकार और अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी ने अपने आप से एक साधारण सवाल नहीं पूछा है कि: मेरा मुख्य मतदाता वर्ग क्या है और कैसे मैं न सिर्फ इसकी सेवा कर सकता हूँ बल्कि इसे अपनी नीतियों और कार्यों के माध्यम से विस्तारित भी कर सकता हूँ?

उत्तर यह है कि हिन्दुओं के लिए वास्तव में बहुत कुछ न करते हुए भी भाजपा एक हिन्दू पार्टी है। इसे एक हिन्दू पार्टी होने के लिए अल्पसंख्यक विरोधी होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि इसे अपने मुख्य मतदाता वर्ग को बनाए रखने के लिए प्रमाणपूर्वक हिन्दू होने की आवश्यकता है। अपने मुख्य मतदाताओं के बिना यह उन पार्टियों के साथ आने की ताकत नहीं जुटा पायेगी जिनकी जरूरत इसे 2019 में सरकार बनाने के लिए पड़ सकती है।

जिस प्रकार मलेशिया में यूनाइटेड मलायस नेशनल आर्गेनाइजेशन मलय मुस्लिमों के बिना एक गठबंधन का नेतृत्व नहीं कर सकता, या जैसे केरल में कांग्रेस नायर और ईसाईयों के समर्थन के बिना यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) का नेतृत्व नहीं कर सकती, ठीक उसी प्रकार भाजपा एक सकारात्मक एजेंडे के साथ हिन्दू वोट को साथ लिए बिना सत्ता में एक स्थायी पार्टी बनने की उम्मीद नहीं कर सकती।

भाजपा कई राज्यों में उच्च जाति को पीछे छोडते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) तक पहुँच बना चुकी है लेकिन इसे दलितों के साथ अंतिम भावनात्मक बाधा अभी भी पार करनी है। इसमें सालों लगेंगे,खासकर तब जब बहुत सारी दलित पार्टियाँ हैं जो दलितों के प्रति अधिक वफ़ादारी का दावा करती हैं। यह तथ्य कि कई राज्यों में ऊपरी जातियों के महत्वपूर्ण वर्ग अभी भी दलितों को बराबरी में स्वीकारना नहीं चाह रहे हैं जिसका मतलब है कि भाजपा को इस मोर्चे पर काफी ज्यादा काम करने की जरूरत है।संक्षेप में, इससे बहुत सारे दलित वोटों के आकर्षित होने की कोई उम्मीद नहीं है। 2014 का चुनाव एक अपवाद था।

तर्कसंगत रुप से, भाजपा को पहले अगड़े और पिछड़े वर्गों के लिए एक हिन्दू पार्टी बने रहते हुए सफलता की तलाश करनी चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा मतदाता वर्ग है जो एक धार्मिक पहचान के तहत भावनात्मक एकीकरण से सबसे ज्यादा निकट है। दलित,जिन्हें जबरन हिन्दू धर्म से बाहर रखा गया है, संभवतः फ़िलहाल अपनी राजनीतिक आकाँक्षाओं के लिए हिन्दू धर्म की छतरी के नीचे नहीं आएंगे। इसके लिए पहले उनके और शेष हिन्दुओं के बीच सामाजिक दूरी को कम करना होगा, जो कि एक कठिन काम है।

यदि भाजपा 2019 के रास्ते पर (उपचुनावों और सहयोगियों को खोते हुए) बुरी तरह फिसल रही है तो यह इसलिए है क्योंकि इसने अपने मूल मतदाता वर्ग का ख्याल नहीं रखा है। पार्टी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में लोकसभा उपचुनाव इसलिए हारी क्योंकि इसने मूर्खतापूर्वक यह उम्मीद लगाये रखी कि 2014 का जाति समीकरण हमेशा बना रहेगा। लेकिन भारतीय जातियां हमेशा बेहतर सौदे के पीछे भागती  हैं। उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर में दो उपचुनावों में भाजपा यादवों, मुसलमानों और दलितों के गठजोड़ के सामने हार गयी।

दुर्भाग्यवश, एक हिन्दू पार्टी का लेबल लगे होने के बावजूद भी भाजपा को यह समझ में नहीं आता कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के इसके दावों से परे इसके हिन्दू एजेंडे में क्या-क्या शामिल होना चाहिए। भाजपा को स्वयं से ज्यादा विपक्षी दलों ने हिन्दू पार्टी का लेबल दिया है।

पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में यह हिन्दू वोट हासिल करने के लिए किस प्रकार कोशिश कर रही है, जहाँ माँ काली, माँ दुर्गा, महाबली, अयप्पा और गुरूवयूर कृष्ण की पूजा की जानी चाहिए। जबकि रामनवमी और हनुमान जयंती हर स्थान पर लोकप्रिय हैं, वहींइनसे स्थानीय जनता काफी प्रोत्साहित होती है और आपके लिए हिन्दू वोट का निर्माण करती है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के यादवों में आप जय श्रीराम की तुलना में जय श्री कृष्ण का नारा लगाने पर विचार करें।

कर्नाटक में जब कांग्रेस ने लिंगायतों को अलग धर्म की पहचान देकर हिन्दुओं को विभाजित करने की कोशिश की तब भाजपा ने स्वयं को परेशान महसूस किया। इस प्रयास के लिए भाजपा को तार्किक रूप से यह साधारण बयान देना चाहिए था कि वह सभी समुदायों को अल्पसंख्यकों के समान ही अधिकार देने के लिए संविधान में एक संशोधन करेगी चाहे वह लोग वास्तव में अल्पसंख्यक हों या न हों।

गड़बड़ी तो तब सामने आती है जब एक हिन्दू पार्टी होते हुए भी आप यह समझने में सक्षम नहीं होते हैं कि एक हिन्दू एजेंडे में क्या-क्या होना चाहिए जो अल्पसंख्यक विरोधी या कट्टरपंथी न हो।

प्रमुख जातियों और धार्मिक संप्रदायों को संगठित करने वाले गैर-कट्टरपंथी हिन्दू एजेंडे में निम्नलिखित चीजें शामिल होनी चाहिएः

#पहला,मंदिरों सहित सभी शैक्षिक और धार्मिक संस्थानों को स्वायत्त रूप से चलाने का समान अधिकार दिया जाए,और यहअधिकार सभी समुदायों के लिए हों।

#दूसरा,मानवाधिकार आयोगों के सुदृढ़ीकरण के साथ-साथ अल्पसंख्यक वर्ग के आयोगों का समापन।

#तीसरा, आर्थिक तथा राजनैतिक दोनों रूपों से, सभी राज्यों को शक्तियों के अधिक वितरण के साथ धारा 370 का उन्मूलन करना औरभारत को वास्तविक “राज्यों का संघ” बनाना।

#चौथा, प्रत्येक समुदाय को अपनी सांस्कृतिक प्रथाओं का अधिकार देकर एक समान नागरिक संहिता को लागू करना, जहाँ हर किसी के पास समान भारतीय नागरिक और आपराधिक कानूनों तक पहुँच हो।

#पांचवां,धार्मिक निकायों में विदेशी दान को प्रतिबंधित करना, जो मंदिरों की अपेक्षा गिरिजाघरों तथा मस्जिदों के वित्त पोषण को आसान बनाता है।

#छठा,भारत के वर्तमान धार्मिक मिश्रण को रोककरअवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को रोकने के लिए एक मुखर प्रतिबद्धता। पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिन्दू शरणार्थियों (हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध) को अन्य धर्मों के शरणार्थियों की अपेक्षा शरण और नागरिकता प्रदान करने में वरीयता दी जानी चाहिए। इसकी वजह यह है कि सारी दुनिया में हिन्दू बहुलता वाला केवल यही एक स्थान है और और यह बहुलता हर जगह हिन्दुओं की सुरक्षा और आश्रय के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

#सातवां,कश्मीर घाटी से भाग कर आने वाले पंडितों को कश्मीरी मुस्लिमों की सहमति से या सहमति के बिना उचित समय के भीतर फिर से बसाया जाना चाहिए। जम्मू और लद्दाख को कश्मीर से अलग कर इसे स्वशासन दे दिया जाना चाहिए या तो इसेवर्तमान जम्मू कश्मीर संविधान के भीतर  जगह दी जानी चाहिए या संघ शासित प्रदेशों के रूप में इसे दर्जा दिया जाना चाहिए। भारतीयों को जम्मू-कश्मीर मेंकहीं भी स्वतंत्र रूप से बसने और संपत्ति खरीदने की अनुमति दी जानी चाहिए।

#आठवां, अवैध बांग्लादेशीअप्रवासियों की नागरिकता खारिज कर दी जानी चाहिए, लेकिन उन्हें वर्क परमिट दिया जा सकता है ताकि उनकी आजीविका बाधित न हो।

#नौवां, केवल बहुसंख्यक संस्थानों को लक्षित करने वाले शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) को वैकल्पिक बना दिया जाना चाहिए औरआर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों का दाखिला लेने के लिए सभी संस्थानों को सब्सिडी की पेशकश की जानी चाहिए।आरटीई एक मजबूरी नहीं बल्कि प्रोत्साहन आधारित होना चाहिए।

#दसवां,परिणामी हिंदू पार्टी को दलितों और मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करने वालों के साथ सत्ता साझा करने की पेशकश करनी चाहिए।यह भाजपा के लिए सत्ता में स्थायी रूप से रहने का मार्ग है।सभी के लिए सभी चीजों के ढोंग से काम नहीं चलेगा।