पत्रिका / राजनीति
राजमाता विजया राजे सिंधिया- एक आम इंसान से एक आदर्श बनने तक का सफर

आशुचित्र-

  • विजया राजे सिंधिया, जिन्हें सम्मान से राजमाता बुलाया जाता है, ने ग्वालियर और मध्य प्रदेश की प्रगति और विकास के लिए अपना जीवन समर्पित किया
  • उनके द्वारा किए गए कार्यों के कारण वे न सिर्फ कई बार चुनाव जीतीं बल्कि 10 साल से राज्य में चल रही भाजपा की सरकार में भी उनका योगदान है

यदि साहस और नेतृत्व का परिचय देने वाली स्त्रियों की सूची को लिपिबद्ध किया जाएगा तो उसमें मध्य प्रदेश का नाम मुख्य पन्नों में होगा। साहसी वीरांगनाओं की उपस्थिति से राज्य की विरासत और भी गौरवशाली बनती है। आज भी गोंडवाना की रानी दुर्गावती हमारे हृदय पटल पर अंकित हैं जिन्होंने अकबर की सशक्त मुग़ल सेना को खदेड़ा और वो भी तब जब मुग़ल साम्राज्य अपने शीर्ष पर था। रामगढ़ की रानी अवन्तिबाई ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सेना तैयार की और उसका नेतृत्व किया। अंग्रेज़ी सेना को पराजित कर उन्होंने अपने पराक्रम का परिचय दिया। हालाँकि अंग्रेज़ी सेना ने अपनी निर्दयी रणनीति से गुरिल्ला युद्धनीति को अवरुद्ध कर दिया था। दुर्गावती और अवन्तिबाई, दोनों ने ही शत्रु के सामने झुकने की बजाय अपने प्राणों के बलिदान को चुना।

मध्य प्रदेश के इतिहास के लिए पिछली सदी कुछ ज़्यादा अलग नहीं थी क्योंकि इसने एक आम व्यक्ति को सिंहासन पर चढ़ते देखा जो आगे चलकर एक सफल राजनेता भी बनीं। यह ऐतिहासिक व्यक्तित्व ग्वालियर की महारानी विजया राजे सिंधिया हैं।

आम व्यक्ति से गवालियर के सिंहासन तक

लेखा देवी की तरह पैदा हुई राजमाता का पालन-पोषण उनकी दादी ने किया था। लेखा देवी ने अपना बचपन एक आम इंसान की तरह व्यतीत किया। किशोरावस्था में बनारस के वसंत महाविद्यालय और लखनऊ के थोबर्न कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी निभाई। उन दिनों में भी लेखा देवी ने अपने आत्मविश्वास और उदार व्यक्तित्व से अपने आसपास के लोगों पर छाप छोड़ी थी। उनकी इन विशेषताओं ने ग्वालियर के महाराज, जीवीजी राव सिंघिया का ध्यान आकर्षित किया। ऐसा कहा जाता है कि पहली मुलाकात में ही जीवाजी राव ने लेखा देवी से विवाह करने का प्रण कर लिया था। राजा और एक आम व्यक्ति के बीच वैवाहिक संबंध पर कई प्रश्न उठाए गए लेकिन लेखा देवी, अब विजया राजे, ने सभी आशंकाओं को अपनी लगन और बुद्धिमता से खंडित कर दिया।

एक महारानी की तरह उनकी विशिष्ट उपलब्धियों में से एक 1956 में सिंधिय कन्या महाविद्यालय की स्थापना है। इस विद्यालय ने कन्याओं की उत्तम शिक्षा का पथ प्रशस्त किया जिसमें भारतीय मूल्यों, धर्म और संस्कृति पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता था। राजमाता ने एक बार कहा था-

“विज्ञान के विकास के साथ औद्योगीकरण का उदय हुआ जिसने पारिवरिक जीवन को बहुत प्रभावित किया है। आर्थिक स्थिति के कारण भारतीय महिलाओं को भी बाहर निकलना पड़े जिससे वह परिवार की आय में सहयोग कर सके। मैं पुरानी कहावत को मानती हूँ, “जो हाथ झूला झुलाते हैं, वे ही दुना पर राज करते हैं।” मैं उन हाथों तो सक्षम बनाने के लिए एक विद्यालय चाहती थी। मेरा सपना ऐसा विद्यालय शुरु करना था जो दोनों ही पहलुओं को पोषित करे।”

सामाजिक सुधार की अग्रदूत राजमाता ने जीवन भर ग्वालियर के लोगों के लिए वही समर्पण भाव रखा।

महारानी बनीं लोकसभा सदस्य

राजमाता के जीवन का दूसरा पहलू राजनीति में उनका प्रवेश था जो बहुत ही नाटकीय रूप से हुआ था। 1950 के दशक में ग्वालियर हिंदू महसभा का गढ़ था क्योंकि इस पार्टी को महाराज जीवाजी राव सिंधिया का संरक्षण प्राप्त था। इस परिदृश्य से कांग्रेस पार्टी अप्रसन्न थी और अफवाह फैली कि यह पार्टी महाराजा के लिए परेशानियाँ खड़ी करेगी। जीवाजी राव अपने व्यक्तिगत कार्य से मुंबई में व्यस्त थे इसलिए राजमाता ने स्वयं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से मिलकर उन्हें यह समझाने का निर्णय लिया कि महाराज कांग्रेस विरोधी नहीं थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके संदेह का तभी निवारण होगा जब जीवाजी राव कांग्रेस के टिकट पर लोक सभा का चुनाव लड़ेंगे। जब राजमाता ने नेहरु जी को समझाया कि जीवाजी राव की राजनीति में उतरने की मंशा नहीं है, तो प्रधानमंत्री ने महाराज की जगह राजमाता को खड़े होने के लिए कहा। प्रधानमंत्री अटल थे तो राजमाता चुनाव लड़ने को तैयार हो गईं और ग्वालियर से जीतीं। लेकिन यह राजनीतिक संधि जो जीवाजी राव की सलामती के लिए हुई थी, वह ज़्यादा दिन तक नहीं टिकी।

1967 के चुनावों के पहले मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री डी.पी. मिश्रा से मतभेद होने के बाद राजमाता सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और विधान सभा के लिए जन संघ की ओर से व लोक सभा के लिए स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ीं (उस समय लोक सभा और विधान सभा अलग नहीं थे)। वे दोनों चुनाव जीतीं और जन संघ से औपचारिक रूप से जुड़ने के बाद विधान सभा की सदस्या बनने का फैसला किया।

महारानी ने किया तख़्तापलट

मध्य प्रदेश की विधान सभा में महारानी के प्रवेश से राजनीति में एक नया मोड़ आया। मिश्रा की प्रतिरोधी कार्यशैली से राज्य कांग्रेस इकाई उनसे काफ़ी निराश थी। इस हतोत्साह ने एक बड़ा रूप तब ले लिया जब 36 सदस्यों ने अपना समर्थन वापस लेकर मिश्रा की सरकार गिरा दी। पार्टी के आला अधिकारियों ने मिश्रा पर पद त्यागने के लिए दबाव बनाया और इस प्रकार मध्य प्रदेश पहली बार ‘कांग्रेस मुक्त’ हुआ। यह स्थापित तथ्य है कि मिश्रा के पदच्युति के पीछे राजमाता का हाथ था।

संयुक्त विधायक दल नाम की संधि सरकार बनी जिसका नेतृत्व स्वयं राजमाता कर रही थीं और मिश्रा के पूर्व साथी गोविंद नारायण सिंह मुख्य मंत्री बने। अफसोस की बात है कि बदले की भावना पर आधारित यह संधि सरकार ज़्यादा लंबी नहीं टिकी। 20 महीनों बाद सिंह संधि तोड़कर फिर से कांग्रेस में जा मिले। हालाँकि जन संघ राज्य में एक प्रभावशाली पार्टी बन गई और राजमाता उसकी सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में से एक थीं। उनके नेतृत्व में जन संघ ने 1971 के लोक सभा चुनावों में इंदिरा गांधी की लहर का सामना किया और ग्वालियर क्षेत्र में तीन सीटों पर जीत दर्ज की- राजमाता भिंड से, उनके बेटे माधवराव सिंधिया गुना से, हालाँकि बाद में उन्होंने पार्टी छोड़ दी और अटल बिहारी वाजपयी ग्वालियर से।

विजया राजे बनाम प्रियदर्शिनी

कुछ इतिहासकारों का मत है कि इंदिरा गांधी ने राजपरिवारों की शाही थैली का प्रावधान इसलिए हटाया ताकि वह विजया राजे सिंधिया जैसे राजसी व्यक्तित्वों को नीचा दिखा सके लेकिन इससे वह ग्वालियर की महारानी को नहीं रोक पाईं जिनकी लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी। उनका इंदिरा गांधी सरकार से अगला संघर्ष तब हुआ जब आपातकाल के दौरान उन्हें तिहाड़ जेल में कैद किया गया। उनके साथ जयपुर की महारानी गायत्री देवी भी कैद थीं। दोंनो महारानियों ने गांधी के निरंकुश तरीकों का विरोध किया था।

सिंधिया के लिए प्रधानमंत्री का एक गुप्त उद्देश्य था। जैसे इंदिरा के पिता ने जीवाजी को संकट से बचाने के नाम पर विजया राजे को कांग्रेस से जोड़ा था, उसी प्रकार इंदिरा ने विजया राजे के बेटे माधवराव सिंधिया को अपनी माँ की सलामती का वास्ता देकर जन संघ छोड़ने पर विवश किया था। अपनी माँ की तरह माधवराव ने गुना के संवैधानिक क्षेत्र से कांग्रेस के समर्थन में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा था व जनता पार्टी की लहर के बावजूद जीते थे। 1980 में वे औपचारिक रूप से कांग्रेस के सदस्य बन गए व गुना से तीसरी बार चुनाव जीते।

1984 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में वे अटल बिहारी वाजपयी के विरुद्ध ग्वालियर से लड़े। राजमाता ने बेमन से अपने पुत्र की सहायता की थी, हालाँकि प्रचार उन्होंने वाजपयी जी के लिए ही किया था। प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि ध्यान रखिएगा कि सिंधिया परिवार की गरिमा बनी रहे, हालाँकि उन्होंने यह वाजपयी के लिए कहा था लेकिन जनता ने समझा कि माधवराव की जीत के लिए यह कहा गया है। उस क्षेत्र में राजमाता की लोकप्रियता वैसी ही बनी रही।

जटिल पारिवारिक संबंध

जनता के प्रति उनके समर्पण और राजनीति ने उन्हें अपने बच्चों से मिलने-जुलने के लिए बहुत कम समय दिया, और 1961 में जीवाजी राव की मृत्यु के बाद तो और भी कम। अपनी आत्मकथा में वे दुःख क साथ कहती हैं कि अपनी दोनों बेटियों के संघर्षपूर्ण विवाह संबंध का सामना करने में भी वे अपनी बेटियों का साथ नहीं दे पाईं। अपने एकलौते बेटे से उनके मतभेद के विषय में ज़्यादा लोग जानते हैं। लेकिन उनके सभी बच्चे, वसुंधरा राजे (राजस्थान की मुख्यमंत्री), यशोधरा राजे सिंधिया (मध्य प्रदेश में कैबिनेट मंत्री) और स्वर्गीय माधवराव भी अपने राजनीतिक जीवन को आकार देने का श्रेय अपनी माँ को देते हैं। वे कहते हैं कि राजमाता ने उनमें आत्मविश्वास भरा जिससे वे राजनीतिक सफलता प्राप्त कर पाए। स्वर्गीय प्रधानमंत्री वाजपयी जी उन्हें आदर्श राजनीतिक कार्यकर्ता मानते हैं।

अंतिम पहलू  

भाजपा सदस्य के रूप में उन्होंने 1989 में गुना से चिनाव जीता और 1991, 1996 व 1998 में उस सीट पर बरकरार रहीं। भाजपा में रहते हुए उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने ग्वालियर क्षेत्र में आने वाले करसेवकों के सत्कार की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली थी। 1999 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया परंतु मध्य प्रदेश में पार्टी को संबल प्रदान करती रहीं जिसके कारण आज भाजपा की सरकार राज्य में एक दशक से अधिक का कार्यकाल पूर्ण कर चुकी है।