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योद्धा, युद्ध पुकार और देवी

आशुचित्र- देवी का आह्वान करके शूरवीर राजा और साहसी सैनिक भारतीय सभ्यता की रक्षा करते आए हैं और विजयी बनकर उभरे हैं।

सृजन की मौलिक शक्ति मानी जाने वाली देवी की पूजा की परंपरा भारतीय उपमहाद्वीप पर तब से है जब से यहाँ सभ्यता की शुरुआत हुई। सिंधु घाटी स्थलों पर मिलीं पक्की मिट्टी से बनीं देवी की मूर्तियाँ इस बात की परिचायक हैं कि 3000 ईसा पूर्व से दक्षिण पूर्वी एशिया में यह धारणा स्थापित थी कि देवी से ही समस्त सृष्टि का उद्गम हुआ है। वैदिक काल में इस धारणा का और विकास हुआ और देवताओं और देवियों की अलग-अलग भूमिकाएँ मानी जाने लगीं। समय के साथ यह धारणा स्थापित हुई कि स्त्री

और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं जिनके समन्वय से यह सृष्टि चलती है। वेदांत के प्रकृति और पुरुष के आध्यात्मिक विचार से अर्धनारीश्वर, यम-यमी, लिंगम, योनि, आदि के धार्मिक चित्रण ने इस धारणा को संहिताबद्ध कर दिया।

छठी शताब्दी के अंत तक, इन विचारों में और परिवर्तन हुआ। शक्ति के उदय के साथ स्त्री पूर्ण का एक भाग नहीं बल्कि स्वयं परिपूर्ण मानी जाने लगी। साथ ही उसकी प्रकृति में भी बदलाव हुआ, सौम्य धरती माँ जैसी देवी से उसने महिशासुरमर्दिनि जैसी भयंकर और विनाशकारी देवी का रूप लिया जिसमें बुराई पर विजय पाने के लिए वह प्रबल हथियारों से भी सशस्त्र थी।

शक्त विश्वोत्पत्ति की धारणा के अनुसार मौलिक स्त्री शक्ति के रूप में प्रकृति पुरुष से पहले अस्तित्व में आई। उसी से ब्रह्मा, विष्णु और शिव का जन्म हुआ। सर्वव्यापी शक्ति के रूप में देखी जाने वाली देवी का दैवीकरण प्रसिद्ध महिशासुर वध से हुआ।

यह भारतीय उपमहाद्वीप पर विशाल राजनीतिक परिवर्तन का भी समय था। गुप्त साम्राज्य की शांति और राजनीतिक स्थिरता को मध्य एशिया से आए हुण हानि पहुँचा रहे थे। संघर्ष और युद्ध नियम बन चुके थे। समाज के विभिन्न भागों में यह ज़रूरत महसूस की गई कि वे एकजुट होकर आक्रमणकारियों का सामना करें और यही विचार उनके द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं में प्रतिबिंबित हुआ। देवी का नया रूप जो गुप्त काल में प्रकट हुआ वह अनेक देवियों की सामूहिक शक्ति का द्योतक बना, जो एक सामान्य शत्रु, जैसे महिशासुर, का सामना करने के लिए स्थापित किया गया था। वह केवल अनेक देवियों की शक्ति का संचय नहीं है बल्कि हर प्रकार के शस्त्रों से विभूषित भी है। सातवीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप में देवी महात्म्या के स्तोत्र का प्रसार हुआ जो शक्तिवाद का प्रमुख पाठ है। सिंधु घाटी शताब्दी की सौम्य धरती माँ ने परिवर्तित होकर भयानक महिशासुरमर्दिनि का रूप धारण किया।

युद्ध के समय में युद्ध के देवताओं का आह्वान किया जाता है।

योद्धा और देवी- भारतीय सामरिक इतिहास में देवी   

देवी का आह्वान करते हुए योद्धाओं का उदाहरण सबसे पहले महाभारत के युद्ध के पहले देखा गया है। कौरवों और पांडवों के मध्य युद्ध आरंभ होने से पहले भीष्म पर्व पर श्रीकृष्ण अर्जुन को दुर्गा माँ की पूजा करने के लिए निर्देशित करते हैं जिसमें अर्जुन माँ दुर्गा के मंत्रों का पाठ करते हैं जिसे दुर्गा स्तोत्र के नाम से जाना गया है। अर्जुन के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर देवी उसे कौरवों पर विजय का वरदान देती है।

द्वितीय सहस्राब्दी के आरंभ में राजपूत जातियाँ निरंतर युद्धों से मध्य और पश्चिमी भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार करने लगे। इस संघर्ष काल ने समृद्ध लोक-साहित्य की उत्पत्ति का अवसर दिया। राजकवियों ने युद्ध से कमाए वैभव का वर्णन किया और चारण के माध्यम से इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया गया। हर कथा की एक सामामन्य कथात्मक संरचना रहती थी जिसमें संघर्षरत राजपूत राजकुमार, जो निराशा की कगार पर होता है, का देवी उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसका उद्धार करती है और उसके शत्रुओं पर विजय पाने की दिशा प्रदान कर उसके प्रभुत्व की स्थापना करती है।

समय के साथ, हर राजपूत वंश स्वयं को कुलदेवी से संधिबद्ध करने लगा और कुलदेवी की भूमिका रहती थी कि वह उसके वंश का संरक्षण करे। इस प्रकार मारवाड़ के राठौड़ की कुलदेवी नागणेची माता, मेवाड़ के सिसोदिया की बान माता और आमेर के कच्छवाहों की कुलदेवी जमवाई माता हुईं। कुलदेवी की सबसे महत्तवपूर्ण भूमिका रणभूमि में रहती थी जहाँ वह नेक योद्धा की रक्षा करती थी और यदि वह अन्यायी होता था तो उसे पराजय के रूप में सज़ा देती थी।

संरक्षण के इस संबंध को राजाओं ने सार्वजनिक पूजाओं के माध्यम से औपचारिक रूप दिया। नवरात्रि के समय पशु बलिदान देवी द्वारा महिशासुर वध की सांकेतिक अनुकृति है। इस प्रकार राजपूत राजा की देवी केवल रक्षा नहीं करती थी बल्कि सार्वजनिक रूप से देवी की पूजा करके वह अपनी वैधता भी अर्जित करता था।

17वीं शताब्दी में मराठाओं का उदय तुलजा भवानी से संबंधित है। तुलजा भवानी मराठाओं के भोंसले वंश की कुलदेवी थीं जिसके वंशज शिवाजी रहे हैं। शिवाजी ओसमानाबाद जिले के तुलजापुर में स्थित मंदिर के दर्शन करने प्रायः जाया करते थे और देवी का आशीर्वाद लेते थे। एक किंवदंती के अनुसार शिवाजी की तलवार को देवी का हर युद्ध में विजय का आशीर्वाद मिला हुआ

 

था। ऐसा माना जाता है कि देवी के उत्कट भक्त शिवाजी के पास 3 तलवारें थी जिसका नामकरण उन्होंने युद्ध की देवियों के नाम पर किया था- भवानी, जगदंबा और तुलजा। हाल ही की रिपोर्ट से पता चला है कि इनमें से एक तलवार तोलेडो, स्पेन के एक शिल्पकार ने बनाई थी जो 17वीं शताब्दी का विश्वप्रसिद्ध शिल्पी था।

इस दौरान, उत्तर भारत के पंजाब में सिख स्वयं की सेना तैयार करके औरंगज़ेब के मुग़ल शासन को चुनौती दे रहे थे। 1699 में उनके दसवें गुरु, गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की नींव रखी जिसमें वे सिख गुरुओं के न्याय के पथ पर चलने के लिए योद्धाओं को प्रेरित किया जाता था। युद्ध कौशल की स्तुति के लिए उन्होंने मौलिक स्त्री शक्ति के विनाशकारी और युद्ध प्रेरित रूप चण्डी का आह्वान किया। चण्डी द्वारा असुरों के विनाश की महिमा की सराहना करके उन्होंने सिक्खों को शस्त्र धारण कर युद्ध के लिए तैयार होने के लिए संबोधित किया। अपनी प्रसिद्ध रचना चण्डी दी वर  में गुरु गोबिंद सिंह जी काव्यात्मक लहजे में रक्त रंजित रणभूमि का चित्रण करते हैं और गुरु के पथ का सख्ती से पालन करने के लिए खालसा को इस प्रकार की स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहते हैं।

 

युद्ध की देवी और भारतीय सेना की युद्ध पुकार

17वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने गुजरात के तट पर कदम रखा और भारतीय उपमहाद्वीप पर स्वयं का अधिकार स्थापित करने के लिए सेना जुटाई। जो सैनिक कंपनी के लिए लड़ रहे थे, उनके लिए अपनी कुलदेवी का आह्वान करना नैसर्गिक था। कंपनी के सैनिकों की रक्त बहाते समय की पुकार, आगे चलकर ब्रिटिश इंडियन आर्मी की युद्ध पुकार बनी जो आने वाले सालों में बेल्जियम के मैदानों, फ्रांस के तटों, अफ्रीका के रेगिस्तानों और बर्मा के जंगलों में गूंजी।

 

आधुनिक भारत ने इसी सेना की परंपरा को अपनाया जैसे कि रेजिमेंट संरचना , हालांकि मशीनीकरण और आधुनिकीकरण से कई बदलाव भी हुए हैं। वर्ग आधारित रेजीमेंट का स्थान सर्व वर्ग सम्मिलित रेजीमेंट ने लिया और पैदल सैन्य टुकड़ी को भी पथियार और तोप दिये गए।

लेकिन आज भी सुद्ध के लिए जाते हुए सैनिक देवी का आह्वान करते हैं और देवी को अपना संरक्षक मानते हैं। भारतीय सेना के कुछ रेजीमेंट जिनकी युद्ध पुकार देवी का आह्वान करती है, उनका वर्णन किया गया है-

कुमाऊँ रेजीमेंट

युद्ध पुकार- कालिका माता की जय, दादा कृष्ण की जय

भारतीय सेना का कुमाऊँ रेजीमेंट हैदराबाद के निज़ाम की सेवा के लिए 1813 में सर हेनरी रसेल द्वारा स्थापित किया गया था। परमवीर चक्र सम्मान के प्रथम प्राप्तकर्ता कुमाऊँ रेजीमेंट के मेजरसोमनाथ शर्मा थे। 24 वर्ष की आयु में मेजर शर्मा 3 नवंबर 1947 को पाकिस्तान के आक्रमण से श्रीनगर हवाई क्षेत्र की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 1962 में रेजीमेंट को दूसरा परमवीर चक्र मिला जब मेजर शैतान सिंह ने चीन के विरुद्ध रेज़ांगला में अपनी दृढ़ता दिखाई थी। भार-तिब्बत सीमा पर 5000 फीट की ऊँचाई पर ताकतवर चीनी सेना के विरुद्ध मेजर शैतान सिंह 120 कुमाऊँ सैनिकों का नेतृत्व कर रहे थे। भारतीय आखिर तक टीके रहे और मेजर शैतान सिंह इस बात का ध्यान रख रहे थे कि एक कुमाऊँ सैनिक की मौत का बदला पाँच शत्रु सैनिकों को मारकर लिया जाए। 18 नवंबर 1962 को रेज़ांगलाकी रक्षा रते हुए वे शहीद हो गए।

इस रेजीमेंट ने तीन सेना प्रमुख भी दिये हैं- जनरल एस.एम. श्रीगणेश, जनरल के.एम.थीमय्या और जनरल टी.एन. रैना।

रेजीमेंट का भर्ती अड्डा उत्तराखंड के निर्जन और पहाड़ी क्षेत्र कुमाऊँ में है जहाँ सैन्य शिक्षा स्थानीय लोगों की जीवन शैली का एक अंग है। कुमाऊँ में देवी के कई मंदिर हैं जिसमें से प्रमुख गंगोलीघाट में हाट कालिका मंदिर है। काली माता को समर्पित यह मंदिर शक्ति पीठ माना जाता है और कुमाऊँ रेजीमेंट की प्रसिद्ध युद्ध पुकार भी यहीं से प्रेरित है- कालिका माता की जय।

डोगरा रेजीमेंट

युद्ध पुकार- ज्वाला माता की जय

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध में सिख साम्राज्य के पतन के बाद 1846 में डोगरा रेजीमेंट की स्थापना हुई। साहसी पहाड़ी लोग- डोगरा उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के पहाड़ी और दुर्गम भूभाग में स्वयं को जल्द ही दूसरों से भिन्न सिद्ध कर देते हैं। इस रेजीमेंट के नाम 3 विक्टोरिया क्रॉस और 13 महावीर चक्र हैं। 2003 से 2005 तक सेना प्रमुख रहे जनरल एन.सी. विज इसी रेजीमेंट से थे।

भारत में विद्रोह नियंत्रण के कई ऑपरेशन में डोगरा रेजीमेंट सम्मुख रहा है। 2015 में मणिपुर में हुए चण्डेल आक्रमण और 2016 में कश्मीर के उरी आक्रमण में डोगरा रेजीमेंट को निशाने पर रखा गया था। हर घटना के बाद भारतीय सेना ने प्रतिहिंसा के लिए म्यान्मार और पाकिस्तानी क्षेत्र में क्रमशः सर्जिकल स्ट्राइक की।

डोगरा रेजीमेंट की युद्ध पुकार हिमाचल प्रदेश के कांगरा में ज्वालामुखी में विराजने वाली ज्वाला माता का आह्वान करती है। ज्वालामुखी मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है और यह मान्यता है कि जब विष्णु ने सती के अंगों को काटा था तब उनकी जीह्वा वहाँ गिरी थी। ज्वालामुखी मंदिर की महत्ता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिण एशिया के इतिहास में कई सम्राट ज्वाला माता को मानते थे। अकबर ने यहाँ एक स्वर्ण छत्र दान किया था, नेपाल के राजा ने एक पीतल का घंटा चढ़ाया था और लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह द्वारा इसके गुंबद पर सोने का पानी चढ़वाया गया था। कांगरा क्षेत्र डोगरा रेजीमेंट का प्रमुख भर्ती केंद्र है क्योंकि सैन्य शिक्षा यहाँ के लोगों की जीमन शैली का प्रचीन अंग रही है।

गोरखा राइफल्स

युद्ध पुकार- जय महाकाली, आयो गोरखाली

गोरखा राइफल्स कई रेजीमेंटों की श्रंखला है जिसे सामूहिक रूप से गोरखा ब्रिगेड के नाम से जाना जाता है। भारत और नेपाल की संजाति गुरखा समुदाय उनकी निडरता के लिए जानी जाती है। गोरखा ब्रिगेड में सबसे विशाल 11 गोरखा राइफल्स है, इसमें 7 बटलियन है। गोरखा रेजीमेंट ने भारतीय सेना के हर युद्ध में भाग लिया है और अपने नाम तीन परमवीर चक्र किये हैं। गोरखाओं को पहला परमवीर चक्र सम्मान 1961 में 3/1 गोरखा राइफल्स के कैप्टन गुरबचन सिंह सलरिया के माध्यम से मिला था जिन्होंने कॉंगो में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना बल में काम करते हुए काटंगा विद्रोहियों से युद्ध में अपने प्राण गँवाएँ थे। वे संयुक्त राष्ट्र के एकलौते शांतिदूत हैं जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है।

अक्टूबर 1962 भारत-चीन युद्ध के दौरान 1/8 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा को लद्दाख में पेनगॉग झील की रक्षा करते हुए चीनी सेना बंधक बनाकर ले गई थी लेकिन उससे पहले उन्होंने चीनी सेना के तीन बार आक्रमण के प्रयास को ध्वस्त किया था। अभूतपूर्व साहस का परिचय देने पर उनके लिए गोरखा राइफल्स को दूसरा परमवीर चक्र सम्मान मिला।

गोरखाओं का तृतीय परमवीर चक्र पुरस्कार 1/11 गोरखा के कैप्टन मनोज कुमार पांडेय को मिला जिन्होंने 3 जुलाई, 1999 को बटालिक क्षेत्र में जुबार शिखर पर चढ़ाई का नेतृत्व करते हुए 25 वर्ष की आयु में अपने प्राणों की आहुति दे दी। वे आज बटालिक के नायक के नाम से जाने जाते हैं।

गुरखाओं की खून बहाने के पहले की पुकार जय महाकाली, आयो गोरखाली  दुश्मनों के दिल में एक डर बैठा देती है। वर्तमान सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत 11वें गोरखा राइफल्स से हैं और गोरखा ब्रिगेड से सेना प्रमुख बनने वाले चौथे व्यक्ति।

जम्मू और कश्मीर राइफल्स

युद्ध पुकार- दुर्गा माता की जय

जम्मू और कश्मीर राइफल्स की स्थापना 1821 में हुई जब निडर डोगरा जनरल ज़ोरावर सिंह को लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह द्वारा तिब्बत पर कब्ज़ा करने का कार्य सौंपा गया था। सिख साम्राज्य के पतन के बाद जम्मू और कश्मीर राइफल्स ने जम्मू और कश्मीर राज्य की सेना का स्थान ले लिया। स्वतंत्रता के बाद इस रेजीमेंट को भारतीय सेना में सम्मिलित कर लिया गया।

इस रेजीमेंट का प्राचीन और गौरवशाली इतिहास है। 1999 में कारगिल युद्ध के बाद यह गौरव गाथा दो परमवीर चक्र सम्मानों से और सुशोभित हो गई।

4 जुलाई 1999 को जम्मू और कश्मीर राइफल्स की 13वीं बटालियन के राइफलमैन संजय कुमार ने दुश्मन के बंकर पर हमला किया जिसमें उन्हें सीने और बाजू में दो गोलियाँ लगी। घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने बाहुबल से एक बंकर पर कब्ज़ा कर लिया और उससे दूसरे पर निशाना साध दिया।

4 दिन के बाद जम्मू और कश्मीर राइफल्स की 13वीं बटालियन के कैप्टन विक्रम बत्रा ने दुश्मन की निरंतर गोलाबारी के बीच पॉइंट 4875 पर निडरता से कब्ज़ा कर लिया। जम्मू और कश्मीर राइफल्स का युद्ध नारा पुकारते दुर्गा माता की जय  पुकारते हुए, कैप्टन बत्रा ने कई शत्रु सैनिकों को प्राण के घाट उतार दिया। मात्र 24 वर्ष की आयु में एक ग्रेनेड के लग जाने से वे शहीद हो गए।

पंजाब रेजीमेंट

युद्ध पुकार- बोल ज्वाला माँ की जय, जो बोले सो निहाल, सतश्री अकाल

पंजाब रेजीमेंट का प्राचीन और गौरवशाली अतीत है। भारतीय सेना के इतिहास में इस रेजीमेंट को अमर बनाने में मेजर कुलदीप सिंह चंदपुरी का योगदान है जिन्होंने 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में लोंगेवाला क्षेत्र में 120 सैनिकों के अपने दल के साथ पूरी पाकिस्तानी ब्रिगेड और 45 टैंकों का सामना किया। फिल्मकार जे.पी.दत्ता ने 1997 की फिल्म बॉर्डर के माध्यम से इस अल्पभिज्ञ कहानी को सबके सामने प्रस्तुत किया। मेजर चंदपुरी, जो ब्रिगेडियर के पद से सेवा निवृत्त हुए, को लोंगेवाला में उनके साहसपूर्ण नेतृत्व के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

पंजाब रेजीमेंट अनूठा इसलिए है क्योंकि पूरे विश्व में केवल यही एक पैदल सेना का रेजीमेंट है जिसका नौसैनिक जलयान भी है। इसका कारण है कि पंजाब रेजीमेंट की स्थापना अंग्रेज़ों द्वारा की गई थी और वे समुद्र यात्रा को सरल बनाना चाहते थे। 1824 तक रेजीमेंट ने 8 समुद्र पार के अभियानों को अंजाम दिया था। यह रेजीमेंट के सिद्धांत को भी प्रतिबिंबित करता है- स्थल वा जल (थल या जल)। समुद्र के साथ इस रेजीमेंट के संबंध को और सुदृढ़ आई.एन.एस. रणजीत से औपचारिक संबंधन से किया गया है जो महाराजा रणजीत सिंह के नाम पर रखा गया भारतीय नौसेना का एक निर्देशित मिसाइल विध्वंसक है।

देवी ने समय की उथल-पुथल के साथ कई परिवर्तन देखे हैं। वह मौलिक स्त्री शक्ति है, स्वयं ब्रहमांड है।