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कुमार साहिब के गिटार का जादू (सरगम के सितारे भाग- 3)

गिटार के शानदार कलाकार डेविड कुमार की कहानी आगे बढ़ाने से पहले पाकीज़ा का एक गीत सुनिए जिसकी शुरुआत में आपको उनका गिटार सुनाई दे जाएगा। विशेष बात यह है कि गुलाम मोहम्मद साहब द्वारा संगीतबद्ध यह गीत फिल्म में नहीं था।

डेविड कुमार का असली नाम डेविड वर्नोन “वर्नी” लिडल था जो बाद के दिनों में “कुमार साहिब” के नाम से भी जाने जाते थे। गुलाम मोहम्मद, एन दत्ता, एसडी बर्मन के साथ काम करते हुए कुमार साहिब लोकप्रिय हो चुके थे।

दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो में कार्यरत होने के साथ-साथ वे रिकॉर्डिंग के लिए अक्सर बॉम्बे पहुँच जाते थे। इस समय तक ना केवल दिल्ली में बल्कि पूरे उत्तर भारत में संगीत कार्यक्रमों और निजी समारोहों में उनकी बहुत मांग हो चुकी थी।

1957 में कुमार साहिब ने शादी कर ली और अगले ही साल वे परिवार सहित बॉम्बे आ गए। उनके पुराने दोस्त दत्ताराम और सुप्रसिद्ध अरेंजर सेबस्टियन ने उन्हें शंकर-जयकिशन से मिलवाया और उन्होंने दिल अपना प्रीत पराई में एक ऐसा शानदार गीत “अजीब दास्तान है ये” पेश किया कि शंकर-जयकिशन उनके गिटार की झंकार से चमत्कृत रह गए।

अपने अगले युगल गीत “तुम तो दिल के तार छेड़कर” में कुमार साहिब ने फिर अपना कमाल दिखाया। अब बारी थी रवि साहब की जो अपने “वक़्त” का इंतजार कर रहे थे। उनका साथ दिया था फिर से कुमार साहिब ने।

कुछ समय बाद मधुबाला के पिता अत्ताउल्लाह खान ने उन्हें अपने दोस्त बृज के सहयोग से अपनी आगामी फिल्म पठान के लिए संगीत तैयार करने के लिए संपर्क किया लेकिन वह फिल्म कठिनाइयों में पड़ती चली गई।

फिल्म अंततः 1962 में रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई। हालाँकि इस फिल्म की लोरी “सो जा सलोने सो जा” ने लोगों के दल में जगह बना ली थी। जब 1961 में अनिल विश्वास दिल्ली वापिस आ गए तो कुछ दिन बाद कुमार साहिब ने वापिस आकर विश्वास साहब के साथ आल इंडिया रेडियो में काम शुरू कर दिया था।

यह वह समय था जब पाकीज़ा की रिलीज़ से पहले गुलाम मोहम्मद की मृत्यु (1968 में) हो गई थी और नौशाद साहब ने बाकी बचे काम की बागडोर संभाली थी। यह हिंदी फिल्म संगीत का बेहद दुखद दौर था। संगीत निर्देशक अनिल विश्वास ने एक दुखद हवाई दुर्घटना में अपने बेटे को खो दिया था।

रोशन (1967), हुस्नलाल (1968) और गुलाम मोहम्मद (1968) की मृत्यु हो चुकी थी। मदन मोहन, एसडी बर्मन और रवि का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्ण युग का अंत अब समीप आता जा रहा था।

कुमार साहिब ने 1975 में रिलीज़ हुई खेल-खेल में के लिए आरडी बर्मन के लिए तीन गाने रिकॉर्ड किए। राजेश रोशन के नेतृत्व में उन्होंने अपना आखिरी फिल्म गीत, 1979 में रिलीज़ हुई बात-बातों में में रिकॉर्ड किया था।

33 साल के अपने फिल्मी यात्रा में उस समय के सभी प्रसिद्ध संगीत निर्देशकों के साथ काम करते हुए उन्होंने नैयर साहब के साथ सिर्फ एक बार आरपार में काम किया था। इसका कारण यह हो सकता है कि नैयर साहब रिदम के जादूगर थे और इसके लिए उन्हें सोलो पीस से ज्यादा एक पूरे ऑर्केस्ट्रा की आवश्यकता होती थी।

आरपार के बाद हवाई गिटार का इस्तेमाल बहुत ही कम किया जाता था लेकिन अगर आप इस गीत को सुनेंगे तो आपको गिटार का यही पीस नैयर साहब की कश्मीर की कली में भी सुनाई देगा।

दिलचस्प बात यह है कि उस लोकप्रिय गीत में जिन साहब ने गिटार बजाया था, यह वही थे जिन्होंने कुमार साहिब को 1947 में लाहौर से शरणार्थी के रूप में नंगे पैर आने पर चप्पलों से मदद की थी।

फिलहाल सुनते हैं “तारीफ करूँ क्या उसकी” और अगली बार बात करेंगे उन चप्पल वाले साहब की जिन्होंने इस गीत में गिटार बजाया था।