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क्रांतिदूत का दूसरा भाग ‘काशी’ देशभर में चल रहे क्रांति संघर्ष से परिचय कराता है
मनु - 28th May 2022

भेषजं भवरोगिणांखिलपदामपहारिणं
दक्षयज्ञर्विनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनं
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं सकलाघसङ्गनिबर्हणम्
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्ष माम्।।

“कभी वैद्य के रूप में समस्त संसार के संताप का हरण करने वाले, तो कभी क्रुद्ध वीरभद्र के के रूप में अभिमानी दक्ष के यज्ञ के ध्वंसकर्ता, तीन गुणों को धारण करने वाले त्रिलोचन, जिनकी दृष्टि भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालों पर रहती है, जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं एवं संपूर्ण पापराशि का संहार करते हैं,वे भगवान चन्द्रशेखर हमारी रक्षा करें।”

ऐसी वंदना के द्वारा भगवान् शिव के परमसुंदर चंद्रशेखर रूप की स्तुति करते हुए मार्कण्डेय मुनि उनके भिन्न स्वरूपों की स्तुति करते हैं। उन्हीं चंद्रशेखर आशुतोष श्मसानवासीगृहस्थ शिव की प्रिय नगरी काशी में शेखर के चंद्रशेखर बनने की यात्रा प्रारंभ होती है।

निडर, निशंक, विद्रोही किशोर चंद्रशेखर का सचीन्द्रनाथ सान्याल जैसा गुरु, आचार्य नरेंद्रदेव जैसा पारखी और बिस्मिल जैसा मित्र और मार्गदर्शक है तो उनके जीवन को एक नई ऊर्जावान दिशा एवं लक्ष्य दोनों मिल जाते हैं।

“काशी सर्व प्रकाशिका” नाम के अनुरूप काशी क्रांतिदूतों के पथ को प्रकाशित करते हुए उन्हें साहस, संबल एवं नवीन ऊर्जा से भर देती है। क्रांतिदूत-1 से क्रांतिदूत-2 तक हम चंद्रशेखर भगवान् शिव की तरह चंद्रशेखर आज़ाद के भी विभिन्न स्वरूपों से परिचित हो चुके हैं।

धर्म के प्रेमियों के लिए धर्म ग्रंथ रस हैं और आज़ादी के प्रेमियों के लिए आज़ादी के दीवानों की कहानियाँ! चंद्रशेखर आज़ाद के साथ-साथ हम सभी भी उन मतवालों क्रांतिकारियों की कथा में मंत्रमुग्ध से बंधे रह जाते हैं जिनके नाम, पहचान, अस्तित्व सब कुछ इस देश की हवा में विलीन हो चुका है।

रह गई है तो हवा में उनकी सुकीर्ति की सुगंध जो समय के साथ-साथ हल्की पड़ने लगी है। उस सुगंध को, उन चिह्नों को कसकर संजोकर रखने की चेष्टा है क्रांतिदूत शृंखला…!

काशी जमघट है उन अलबेले मस्ताने लोगों का जो साधारण होकर भी असाधारण थे, जो साधनविहीन होकर भी असंभव स्वप्न देखते थे। जो निर्धन थे किंतु साहस और विचारों का वैभव रखते थे। जो उत्साही थे किंतु दिशाहीन नहीं। उन क्रांतिकारियों की क्रांति की मशाल में उत्साह की लौ के साथ-साथ अक्षय देशप्रेम और अध्ययन, ज्ञान तथा वैचारिक संपदा का ईंधन भी था।

हमारे क्रांतिकारी भटके हुए दिशाहीन नौजवान नहीं थे, जैसा कि उस समय के कुछ बड़े नेताओं ने बयान दिया था। अपितु उनमें ज्ञान की, आगे बढ़ने की, देश-विदेश की घटनाओं से सीखने की प्यास थी। सीमित संसाधनों से अपराजेय ब्रिटिश साम्राज्य के सूर्य को अस्त कराने की ललक थी। संसार के सुख और परलोक में मोक्ष को छोड़कर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए बार-बार बलिदान होकर पुनः उसी धरती पर जन्म लेने की चाह थी।

काशी (क्रांतिदूत भाग-2) में सुदूर बंगाल में चल रहे अनवरत क्रांति संघर्ष से परिचय होता है। साहित्यकारों, क्रांतिकारियों, विचारकों, पत्रकारों ने बंगाल में क्रांति की ज्वाला कैसे प्रखर बनाए रखी? कैसे किशोरों युवकों, प्रौढ़ों, बालिकाओं तक ने असाधारण कृत्य कर ब्रिटिश साम्राज्य की नींदें उड़ा रखीं? कैसे क्रांति की मशाल महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर भारत और विदेशों तक में घूम-घूम कर जलती रही, उसकी झाँकी आपको “काशी” में मिल जाती है।

पाठक क्रांतिदूत शृंखला में नए क्रांतिदूतों से मिलने के लिए, अनाम नामों को जानने के लिए और अनकही कहानियाँ सुनने के लिए तथा अनजाने पथ पर बढ़ने के लिए उत्सुक एवं अधीर होते जाते हैं।

काशी मार्गदर्शन करती है औरआगामी पथ की भावी घटनाओं की झलक दिखलाती है। काशी साक्षी बनती है क्रांतिधर्मियों के मिलन की।

भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से क्रांतिदूतों का संकल्प अवश्य फलित होगा, किंतु कुछ ही यह सौभाग्य अपनी आँखों से देख पाएँगे। बाकी स्वर्गरथ पर आरूढ़ हो, देश के नवसौभाग्य को आशीष देंगे, सुमनांजलि देंगे।

तेरा वैभव अमर रहे माँ,
हम दिन चार रहें ना रहें।।

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