श्रद्धांजलि
खुदीराम बोस को मृत्युदंड के बाद यतींद्र ने कैसे जारी रखीं क्रांतिकारी गतिविधियाँ (भाग 3)

यह यतींद्रनाथ दास की कहानी का तीसरा भाग है। पहला भाग और दूसरा भाग क्रमशः यहाँ और यहाँ पढ़ें।

दिन-ब-दिन बीतते जा रहे थे और यतींद्र की सैन्य संगठन वाली मुहिम को बहुत अधिक सफलता नहीं मिल पा रही थी। इतने में यतींद्र और उसके साथियों को खबर मिली कि खुदीराम बोस को अलीपुर केस के चलते फाँसी की सज़ा सुनाई गई है।

बारींद्र घोष और अरबिंदो घोष पर भी मुकदमे चले। बारींद्र घोष को भी फाँसी की सज़ा सुनाई गई। लेकिन बाद में बारींद्र घोष को राहत देकर काले पानी की सज़ा दी गई। अरबिंदो घोष इस कांड से बच निकले। कुल-मिलाकर यतींद्र की बढ़ती शक्ति को धक्का लगा।

अब इसके बाद यतींद्र को कुछ समय के लिए भूमिगत रहकर ही अपने आगे के कामों को अंजाम देना पड़ा। इसी के चलते एक ‘सीक्रेट सोसायटी’ की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश हुकूमत के साथ गुरिल्ला युद्ध और यहाँ तक कि भारतीय गद्दारों का भी सफ़ाया करना था।

‘बाघा यतींद्र’ ने सोसायटी के सदस्यों को एकजुट किया और सोसाइटी का अगली योजना सुनाते हुए कहा– “अब समय आ गया है कि हम सबसे पहले अपने ही देश के कुछ गद्दारों को सबक सिखाएँ। आख़िर कब तक हम अंग्रेज़ों से इकतरफ़ा लड़ते रहेंगे। जब अपने ही लोग धोखा दे जाते हैं तब बहुत दुःख होता है। लेकिन जो अगली योजना है उसके लिए मुझे तुम सबका साथ चाहिए।”

चित्तप्रिय– “तुम सही कहते हो यतींद्र दा। अब नहीं सहा जाता। जब से हमारे अन्य साथी पकड़े गए हैं तब से हम चुपचाप बैठे हुए हैं। ऐसे कायरों की तरह आख़िर कब तक बैठे रहेंगे।”

मनोरंजन सेन– “यतींद्र दा। अब आप जो कहोगे हम करने को तैयार हैं।”
यतीश– “हाँ यतींद्र दा।”
बिरेंद्र दत्त गुप्त– “कहो यतींद्र क्या योजना है तुम्हारी?”

यतींद्र– “ डेप्यूटी सुपरिटेंडेंट ऑफिसर ‘शम्सुल आलम’ की हत्या करनी होगी। वह हाथ धोके हमारे पीछे पड़ा हुआ है। खुदीराम बोस को जिस इंस्पेक्टर ने पकड़ा था उसकी हत्या की जाँच इसी के ज़िम्मे है। और अब तक हमने जितनी भी डकैतियाँ और हत्याएँ की हैं, वह एक-एक कर हमको कॉर्ट में घसीटेगा। और अगर ये आलम ऐसे ही हमारे पीछे लगा रहा तो यकीनन हम सब पकड़े जाएँगे।”

मनोरंजन सेन– “कब और कहाँ?”
यतींद्र– “मनोरंजन तुम इस काम के लिए नहीं जाओगे। बिरेंद्र और मैं इस काम को अंजाम देंगे। बिरेन्द्र क्या तुम्हें मंज़ूर है?”

सतीश सरकार– “नहीं यतींद्र तुम सीधे तौर पर इस काम को अंजाम नहीं दोगे। मैं इसको ठीक नहीं समझता। अगर तुम ही पकड़े गए तो हमारी पार्टी का नेतृत्ल कौन करेगा?”

बिरेंद्र– “सतीश की बात सही है यतींद्र। इस काम को सतीश और मैं अच्छे तरीक़े से अंजाम दे सकते हैं।”
मनोरंजन सेन– “हाँ यतींद्र दा। तुम नहीं जाओगे।”

और सबकी मंजूरी के साथ यतींद्र को अपना फैसला वापिस लेना पड़ा। सतीश सरकार और बिरेंद्र ने इस काम को अंजाम देने की ठानी। सतीश और बिरेन्द्र दोनों इस काम में जुट गए। 24 फरवरी, 1910 को शम्सुल की हत्या की योजना बनाई गई।

24 फरवरी की सुबह सतीश और बिरेंद्र दोनों कलकत्ता उच्च न्यायलय के आसपास घूमने लगे। जब शम्सुल हसन के आने का वक़्त हुआ तो एक तरफ़ सतीश खड़ा था तो दूसरी तरफ़ बिरेंद्र। शम्सुल हसन जब न्यायालय से बाहर आ रहा था तब बिरेंद्र ने सतीश के इशारे से पहले ही शम्सुल हसन को गोली दाग दी।

मिलिट्री के अंग्रेज़ बिरेंद्र के पीछे भागे। सतीश ने उनमें से एक अंग्रेज़ पर गोली चला दी और वहाँ से भागने की कोशिश की। बिरेंद्र अंग्रेज़ों से अपना बचाव करने के चलते पकड़ा गया। और सतीश भागने में सफल हुआ। लेकिन इस हत्याकांड के चलते आए दिन पुलिस के छापे क्रांतिकारी समितियों पर पड़ने लगे।

बाघा यतींद्र और उसके कई अन्य साथियों को एक दिन पकड़ लिया गया। यतींद्र को एक साल जेल में रखा गया और एक साल बाद यतींद्र निर्दोष साबित होकर जेल से बाहर निकलने में सफल रहा। अब यतींद्र ने नए सिरे से शुरुआत की।

दो तीन वर्षों के भीतर यतींद्र ‘गुप्त तरीक़े’ से काम करता रहा। इन कुछ वर्षों में यतींद्र के सैन्य संगठन की शक्ति और उसकी डकैतियाँ अपने चरम पर थीं क्योंकि इस बीच जर्मनी के राजा से यतींद्र की भेंट हुई और यतींद्र ने जर्मनी से हत्यारों की आपूर्ति का वादा लिया जिसके लिए धन की आवश्यकता थी।

प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। समिति के सदस्यों की सभा बिठाई गई।
मनोरंजन सेन ने कहा– “मुझे लगता है यह सही वक़्त है अपनी सेना को अंग्रेजों के ख़िलाफ़ उतारने का।”

यतींद्र– “नहीं! अभी थोड़ी और प्रतीक्षा की आवश्यकता है। वीरेंद्र चट्टोपाध्याय के नेतृत्व में ज्यूरिख में बर्लिन कमेटी बनाई गई है, तो लाला हरदयाल, सोहन सिंह भाखना के सहयोग से अमेरिका और कनाडा के सिख क्रांतिकारियों को लेकर गदर पार्टी का अभियान शुरू किया गया है। अब ज़रूरत है तो इन नेताओं और इनके समूहों का भारत में प्रवेश, वह भी हथियारों के साथ। और जब तक हमें जर्मनी से हथियार बरामद नहीं हो जाते तब तक हम अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की मुहिम की शुरुआत नहीं करेंगे।”

यतीश– “आने वाले समय में यह 1857 के विद्रोह से भी भयंकर साबित होगा और निःसंदेह अंग्रेज़ों को दुम दबाकर यहाँ से भागना होगा।”
चित्तप्रिय– “सही कहते हो दादा। अब बस इसी का इंतज़ार है।”

सभा समाप्त हुई और यतींद्र ने इस बड़े अभियान से पहले अपनी पत्नी इंदुबाला और बच्चों से मिलने का विचार किया। यतींद्र कुछ दिनों बाद अपने घर पहुँचा। इंदुबाला चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही थी। यतींद्र को देख उसके चेहरे पर मुस्कान चमक पड़ी। बच्चे यतींद्र की ओर भागते हुए उससे चिपट गए। यतींद्र ने एक एक कर बच्चों के लिए लाए हुए खिलौने व कपड़े उन्हें सौंपे। खुशी के मारे इंदुबाला की आँखों से आँसू झरने लगे। बच्चों से फ़ारिख हो यतींद्र कमरे में दाखिल हुआ।

इंदुबाला ने कहा– “आप थोड़ा आराम कर लीजिए। थक गए होंगे।”
यतींद्र ने इंदुबाला का हाथ पकड़ते हुए कहा– “मेरे पास आराम करने का समय नहीं है। तुमसे मिलने आया था। तुम मेरे पास बैठो। कुछ पल। मुझे आज रात ही निकलना होगा।”
“क्यों अभी तो आए हो। ऐसी भी क्या जल्दी”
“सुनो। पहले बैठो।”

इंदुबाला यतींद्र के पास बैठ गई। और उसके पैर दबाने लगी।
यतींद्र ने रोकते हुए कहा– “नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं है। आज मेरे बाल सहला दो।”
इंदुबाला ने कहा –“आप ठीक तो हैं न?”
“बिलकुल ठीक हूँ। इंदु, तुमसे एक बात पूछूँ?”
“पूछिए।”

“मैं एक ऐसे कार्य में संलिप्त हूँ कि अब वहाँ से पीछे लौटना मेरे लिए मुमकिन नहीं। और मैं लौटना भी नहीं चाहता। मेरा बस एक ही सपना था और आज मैं उसके बहुत नज़दीक हूँ। अगर मैं वापिस न लौटा………!”

“बस अब एक शब्द नहीं। मेरे सामने वापिस न लौटने की बात कभी न करना।”
“शायद तुम मेरे कामों से अनभिज्ञ नहीं हो। आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाना चाहता हूँ। सुनोगी?”
इंदुबाला ने यतींद्र के बालों को सहलाते हुए कहा– “सुनाइए।”

“एक 6-7 साल का बच्चा था। गली में किलकारियाँ मारते हुए खेल रहा था। अचानक एक कुत्ता उसके पीछे पड़ गया। वह उसके डर के मारे भागने लगा और तेज़-तेज़ रोने लगा। वह बच्चा तब तक भागता रहा जब तक अपने घर न पहुँच गया। और घर पहुँचते ही वह भयभीत बच्चा अपनी माँ के पल्लू में जाकर सिमट गया। लेकिन उसका रोना बंद नहीं हुआ। पता है उसकी माँ ने क्या किया?”

इंदुबाला ने उत्सुक होकर पूछा– “क्या किया उसकी माँ ने?”

“उसकी माँ ने उस बच्चे के हाथ में जलती हुई मशाल थमा दी। और उस बच्चे से कहा– ‘भाग उस कुत्ते के पीछे और तब तक भाग जब तक ये तेरे ख़ौफ़ से तेरे सामने आत्म समर्पण न कर दे। जा भाग मैं कहती हूँ।’ और वो बच्चा तब तक उस कुत्ते के पीछे मशाल लेके भागता रहा जब तक उस कुत्ते का डर उसके ज़हन से न निकल गया।”

यतींद्र ने आगे कहा– “यह बच्चा कोई और नहीं मैं था और वह स्त्री मेरी माँ। और जब तक इन अंग्रेज़ों के मन में मैं अपना ख़ौफ़ न भर दूँ और इनको आत्म-समर्पण के लिए मजबूर न कर दूँ तब तक मैं मशाल लेकर इनके पीछे भागता रहूँगा। मेरा पहला और अंतिम स्वप्न यही है कि हम लोग आज़ादी से अपने मुल्क में सैर करते हुए इन मस्त आज़ाद हवाओं का लुफ़्त उठा सकें। जब तक ये स्वप्न पूरा नहीं होगा तब तक मैं आराम से नहीं बैठ सकता।”

इंदुबाला ने गर्व से कहा– “मैं आपके साथ हूँ। आपका स्वप्न ज़रूर पूरा होगा।”
शाम को यतींद्र विदा लेता हुआ कलकत्ते के लिए रवाना हुआ। इंदुबाला ने आँसू पोंछते हुए कहा–“मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी। वापिस तो आओगे न?”
यतींद्र इसका जवाब न दे सका। और उसके सिर पर हाथ रखते हुए इंदुबाला से विदा लेकर कलकत्ता रवाना हुआ।

जारी…