राजनीति
केरल सरकार का जिहादी पीएफआई को प्रशिक्षण किस ‘बचाव एवं राहत’ कार्य के लिए?

जिन मन-मस्तिष्कों में जिहाद की ग्रंथियाँ ठूँस-ठूँसकर भरी होती हैं अथवा भरी जाती हैं, जिन हाथों को मजहबी उन्माद में मार-काट तथा जलाने-भुनाने का सुनियोजित प्रशिक्षण दिया जाता है और जिहाद के नाम पर काफिरों के विरुद्ध शत्रुत्व भाव भरा जाता है, उनसे ‘सेवा’ जैसे पवित्र कार्यों की अपेक्षा करना अकल्पनीय है।

ऐसे लोगों का हृदय-परिवर्तन भी कल्पनातीत है। ऐसा कहना अकारण नहीं है। क्योंकि सामान्य जीवन में ऐसे लोगों की कथनी और करनी में कहीं कोई समक्रमिकता (तालमेल) दृष्टिगोचर नहीं होती परंतु, केरल सरकार के फायर एंड रेस्क्यू सर्विसेस के अधिकारी न जाने क्यों इस बेमेल को अनदेखा कर कपोलकल्पित तालमेल खोजते हुए हत्यारे हाथों को प्रशिक्षण देने में जुटे-भिड़े हुए हैं?

केरल प्रायः विवादास्पद और हृदय विदारक घटनाओं के कारण चर्चा में रहता है। इधर, अलुवा (एर्नाकुलम) में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय बचाव एवं राहत कार्यक्रम के उद्घाटन में केरल फायर एंड रेस्क्यू सर्विसेस के अधिकारियों द्वारा दिए गए प्रशिक्षण के कारण केरल सरकार विवादों के घेरे में है।

हिंसाओं की कई घटनाओं में पीएफआई कैडर की संलिप्तता जगजाहिर है। अनेकानेक प्रसंगों में पीएफआई के कई सदस्यों के विरुद्ध चार्जशीट हो चुकी है। पीएफआई पर देशद्रोह के साथ-साथ कई आपराधिक मामले भी दर्ज़ हैं। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राज्य पुलिस कई मामलों की जाँच कर रही है।

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का विरोध करते हुए भारत में अनेकानेक जगह प्रदर्शन भी किए थे। विरोध प्रदर्शन के दिनों में ही केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा था कि एसडीपीआई लोगों को विभाजित करने के लिए सीएए विरोध का उपयोग कर रही है। उल्लेखनीय है कि पीएफआई की उग्र गतिविधियों में संलिप्तता को दृष्टिगत रखते हुए उसे प्रायः प्रतिबंधित करने की मांग भी होती रही है। आज भी हो रही है।

जबकि पीएफआई-एसडीपीआई की राष्ट्र एवं समाज विरोधी करतूतों-हरकतों को अनदेखा करते हुए 30 मार्च को अलुवा प्रियदर्शिनी म्यूनिसिपल ऑडिटोरियम में केरल फायर एंड रेस्क्यू सर्विसेस के अधिकारियों ने पीएफआई के सदस्यों को प्रशिक्षण देना उचित एवं प्रासंगिक समझा। स्रोत बताते हैं कि केरल पुलिस ने आग और बचाव अभियानों हेतु पीएफआई के कई कैडरों को प्रशिक्षित किया है।

यद्यपि मौजूदा नियमों के अनुसार राजनीतिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों में दमकलकर्मियों की सहभागिता प्रतिबंधित है। बताया जा रहा है कि ऐसे अनेक प्रसंगों में दमकलकर्मियों द्वारा शिकायत होती रही है कि ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेने से सेवा नियमों का उल्लंघन होता है परंतु जब सरकार ही दोहरे मापदंड पर चलती हो, तो बेचारे कर्मचारी भला क्या-कुछ कर सकेंगे?

पीएफआई की मानसिकता को जानने-समझने के लिए 2010 की एक घटना प्रसंगावधान से उल्लेखनीय है। न्यूमैन कॉलेज, थोडुपुळा (इडुक्की) में मलयालम के प्रोफेसर जोसेफ ने आंतरिक परीक्षा हेतु एक प्रश्न पत्र बनाया था, जिसमें पैगंबर मोहम्मद का कथित रूप से अपमान किया गया था। परिणामतः पीएफआई कार्यकर्ताओं ने उनके परिवार के समक्ष उनका दाहिना हाथ काट डाला था।

उल्लेखनीय है कि प्रोफेसर जोसेफ सपरिवार चर्च से लौट रहे थे। ध्यातव्य है कि एनआईए न्यायालय (कोच्चि) ने प्रोफेसर का हाथ काटने से संबंधित सनसनीखेज मामले में 13 आरोपियों को दोषी पाया था। सभी आरोपी पीएफआई कैडर थे। जबकि मुख्य साजिशकर्ता समेत पाँच अन्य आरोपी फरार हो चुके थे। यह पीएफआई का चाल-चलन एवं चरित्र है।

इस उत्तर-आधुनिक समय में भी भारत में शिक्षक (गुरु) को माता-पिता के बाद सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। ऐसे में, मजहबी उन्माद से भरे पीएफआई के सदस्यों का एक शिक्षक के प्रति बर्ताव चिंतनीय है। सेवा कार्यों (बचाव एवं राहत) हेतु दिये जाने वाला प्रशिक्षण प्रोफेसर जोसेफ का बर्बरता से हाथ काटने वाली हृदय विदारक घटना के साथ पूर्णतः बेमेल एवं बेतुका है।

अतः पुनःस्मरणीय है। जिनके मन-मस्तिष्क में मजहबी उन्माद हो, उनसे लोकरक्षा एवं लोक कल्याण की अपेक्षा कदापि नहीं की जी सकती। ऐसे लोगों से तो कदापि नहीं, जो मजहबी उन्माद में अपने गुरु का हाथ काट कर उसे सबक सिखाने पर उतारू हो। ऐसे निहायत ही जाहिल किस्म के लोगों से लोकहित एवं लोक सेवा जैसी पवित्र भावना की अपेक्षा एवं कल्पना करना नितांत बेमानी है।

काफिरों के विरुद्ध हर हद में जिहाद में उनके लिए आपदा भी अवसर के समान ही होगी। ज्ञातव्य है कि पीएफआई की गतिविधियाँ संदेहास्पद नहीं, अपितु अत्यंत स्पष्ट रूप से जिहादी आतंकी हैं। स्पष्ट है कि उनका लक्ष्य भारत को यथासंभव तथा यथाशीघ्र इस्लामिक राष्ट्र बनाना है। ऐसे में, स्थानीय लोगों में भय का वातावरण है कि यदि ऐसे ही लोग महामारी के दौरान बचाव कार्यों में हिस्सा लेंगे, तो पता भी नहीं चलेगा कि कितने लोग महामारी के कारण मरे और कितने इन मजहबी उन्मादियों के हाथों मौत के घाट उतार दिए गए?

विडंबना देखिए कि पीएफआई के इस राज्यस्तरीय कार्यक्रम के इश्तिहारी बैनर पर अंकित है – आपदा में बचाव और राहत! जबकि रहस्यमयी ढंग से यह ‘आपदा में अवसर’ की ओर इंगित कर रहा है। स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार स्थानीय लोगों में भय का एक और कारण है कि केरल पुलिस में भर्ती हो चुके मजहबी तत्वों का ‘पच्चा वेलिचम’ नामक एक समूह है, अर्थात् हरा प्रकाश।

यह समूह पहले केवल केरल में सक्रिय था। अब बताया जा रहा है कि इन दिनों इसकी पहुँच संपूर्ण देश भर में हो चुकी है। ये लोग आपदा के दौरान उपरोक्त जैसे शिविरों में प्रशिक्षण प्राप्त पीएफआई के राहतकर्मियों को सचेत कर देते हैं, ताकि आपद स्थलों पर पुलिस तथा राहतकर्मियों के पहुँचने से पहले वे अपने काम को अंजाम दे सकें। स्थानीय सूत्रों का एक वाजिब प्रश्न है कि क्या गृह मंत्रालय को ऐसे समूहों की जानकारी है?

आशंका के अनेकानेक कारणों में एक यह भी है कि ‘आपदा में राहत एवं बचाव’ हेतु आयोजित इस राज्य स्तरीय प्रशिक्षण समारोह में बोलते हुए पीएफआई के राज्य सचिव ने कहा कि बचाव और राहतकर्मियों को ‘अन्य चुनौतियों से देश को बचाने’ के लिए तैयार किया जाना चाहिए। इस कथन के कारण अत्यधिक प्रखर आलोचना हो रही है। बताया जा रहा है कि ‘अन्य चुनौतियों’ में अर्थ वास्तव में ‘अन्यार्थ बोधक’ तथा सांप्रदायिक है।

पीएफआई मुसलमानों से इतर किसी की सहायता का कदापि पक्षधर नहीं है। उसके कृत्यों से यह अत्यंत स्पष्ट है। कुछ स्थानीय लोग केरल की तुलना कश्मीर से कर रहे हैं और आपदा की आड़ में हिन्दुओं के नरसंहार की दुर्दान्त घटनाओं की आशंका जताई जा रही है। यह भी बताया जा रहा है कि कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादियों ने प्रशिक्षण दिया था। यहाँ स्वयं पुलिस ही आतंकी मानसिकता से ग्रस्त उन्मादियों को प्रशिक्षण दे रही है।

अंतर केवल इतना है कि कश्मीर में हिन्दुओं को मारने के लिए प्रशिक्षण दिया गया था। यहाँ बचाव एवं राहत की आड़ में बड़े षडयंत्र के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यद्यपि यह भय से उपजा कथन प्रतीत होता है, तथापि मजहबी उन्मादियों के कृत्य देखते हुए सहज ही आपदा में अवसरों को भुनाने की मानसिकता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह भी कि स्थानीय भला इतने बुरे की आशंका से ग्रस्त क्यों हैं? स्मरणीय है कि सूफी इस्लामी बोर्ड ने भी पीएफआई की आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता को रेखांकित किया था। ऐसे में, केन्द्रीय एजेंसियों को निश्चय ही सतर्क होने की आवश्यकता है।

कुछ वर्ष पूर्व इस बात की ओर संकेत किया गया था कि केरल पुलिस में मजहबी जिहादी मानसिकता से ग्रस्त लोगों की भर्तियाँ हो रही हैं, जो कि आपद समय घातक सिद्ध हो सकते हैं। इधर, कुछ माह पूर्व पीएफआई को संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं की सूची देने में पुलिस की सक्रिय भागीदारी स्पष्ट हुई ही है। ऐसी घटनाओं के कारण लोगों की दृष्टि में केरल पुलिस संदेह के दायरे में है।

केरल भाजपा अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने गृह मंत्री अमित शाह को ट्वीट कर लिखा है कि पीएफआई और एसडीपीआई कई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं। और पिनाराई विजयन सरकार इन जिहादियों का विशेष आदरातिथ्य कर रही है। जब दामन ही दागदार हो, तो ऐसी कटु आलोचना स्वाभाविक प्रतीत होती है।

एक बार के लिए भाजपा अध्यक्ष की बातों को राजनीतिक दृष्टि से अनुचित करार दिया जा सकता है परंतु, पहला तथ्य यह है कि पीएफआई की करतूतें-हरकतें जिहादी आंतकी रूप-स्वरूप से आत्यंतिक मेल खाती हैं। दीगर तथ्य यह है कि पिनाराई विजयन की वामपंथी सरकार पीएफआई के समर्थन से अपना वर्चस्व बनाने में जुटी हुई है।

अवसर की राजनीति की दृष्टि से पीएफआई के साथ माकपा के गठजोड़ का सुदीर्घ इतिहास है। वर्तमान में, केरल सरकार पीएफआई कैडर को प्रशिक्षण देने वाले पुलिसकर्मियों के निलंबन का खेल खेल रही है। जनता की दुहाई देने वाली वामपंथी सरकारें जानती हैं कि ऐसे मुद्दों की आयु बहुत कम होती है। कुछ ही दिनों बाद जनता सुप्तावस्था में चली जायेगी। जनता की पक्षधर वामपंथी सरकारें आखिर जनता की नब्ज़ भलीभाँति जानती है।

यह लेख पहले पांचजन्य में ‘सरकारी अफसर दे रहे पीएफआई को प्रशिक्षण’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। लेखक की अनुमति से यहाँ पुनः प्रकाशित किया गया है।

डॉ आनंद पाटील वरिष्ठ युवा आलोचक और तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट और कू करते हैं।