ब्लॉग
काशी विश्वनाथ प्रांगण में बिताए समय का संस्मरण

काशी!!
काशी विश्वनाथ!!
महादेव!!
माँ गंगा!!
हर हर महादेव!!

क्या हैं ऊपर के शब्द? ये हैं काशी में बिताए अपने जीवन को संक्षेप में व्यक्त करने के सफल प्रयास जिसकी प्रेरणा पिछले तीन दिनों में काशी विश्वनाथ धाम में जाकर समय बिताकर मिली!

काशी में बिताए अपने जीवन के सर्वोत्तम सबसे अधिक स्मरणीय करीब 11 वर्ष जिन्होंने न केवल बहुत कुछ सिखाया समझाया बल्कि अलौकिक संतुष्टि का भाव भी दिया जिसके विषय में मैं कहीं भी चर्चा करता तो लोगों की प्रतिक्रिया ऐसी रहती मानो मैं मोक्ष जी रहा हूँ!!

यह भाव काशी के कण-कण में था। संकरी सड़कों में, गलियों में भटकते नंदी जी में, चारों ओर उड़ती हुई धूल में भी एक अलग-सा खिंचाव था। और कभी-कभी तो मन में यह आता था कि अगर जन्म मृत्यु के चक्र में काशी की धूल बनने को भी मिले तो उससे अच्छा क्या होगा।

काशी में यह भी सीखा कि काशी में जो भी है सब अच्छा है। संकरे रास्ते, रोड पर लटकते तार, नाक में घुसकर दिमाग को हिला देने वाली दुर्गंध, जगह-जगह आपको मुस्कुराते हुए निमंत्रण देते कूड़े के ढेर, अचानक से ही किसी के मुँह से निकलकर आपके पैरों के ठीक पास फैल जाने वाली पान की पीक! ये सब कभी भी कष्ट नहीं देते थे, लगता था इनमें भी सौंदर्य है! यह भी अच्छा है! काशी है ना!!

काशी विश्वनाथ के मंदिर जाते समय गलियों की लाइनों की भूल-भुलैया से जाता था, कतार में लगता था, कई जगह स्क्रीनिंग होने के बाद मंदिर प्रांगण में पहुँचकर कुछ क्षणों में निकल जाना होता था! बड़ी इच्छा होती थी कि काश, थोड़ा-सा समय और बिता पाता!! काशी थोड़ा-सा स्पष्ट देख पाता! काश थोड़ी देर और रुक पाता! 46 वर्ष तक बाबा विश्वनाथ की कृपा तो अपार रही किंतु अभी तक शायद उन्होंने कुछ और ही योजना बना रखी थी!

कल के दिन, न जाने क्या मन में आया, अचानक से बढ़ चला काशी विश्वनाथ धाम की ओर। थोड़ी देर में ही काशी विश्वनाथ जी के प्रांगण में था। जो दिव्य स्वरूप था धाम का, उसका शब्दों में वर्णन करने की क्षमता तो नहीं है। देर मतलब 5-6 मिनट हुए होंगे!

वहाँ लाइन में लगा तो मिनटों में ही दर्शन भी हो गए। फिर से लाइन में लग गया। फिर से तुरंत दर्शन हो गए। ऐसा कई बार किया। मन न भरा तो सामने बैठ आते-जाते लोगों को देखने लगा, उन चेहरों पर वह हर्ष, वह उत्साह और चारों ओर देखने पर उनकी आँखों में वह कुतूहल मानो सब कुछ समा लेना चाहते हों, दो आँखें कम पड़ें, ऐसी दिव्यता और वैभव!!

ऐसा वैभव जो बिना किसी विभेद के सभी के लिए था। क्या राजा, क्या रंक, सभी मग्न थे महादेव के स्मरण में, सभी झूम रहे थे भक्ति में। उसके बाद शृंगार आरती देखी जो मैंने पूरे जीवन में कभी नहीं देखी थी, पहले इतना समय रुकने का शायद धैर्य न था। उस आरती की दिव्यता से स्वाभाविक था कि मन में आता कि थोड़ी देर और रुकूँ!! शृंगार आरती के बाद दिव्य खीर के प्रसाद का स्वाद अभी भी जीभ पर है।

शायद महादेव पुरानी सभी स्मृतियों पर इन स्मृतियों को मढ़ देना चाहते थे! शयन आरती में इतने कंठों से निकलता एक ही स्वर, झूमते भक्त, गाते भक्त, अद्भुत अलौकिक ऊर्जा का स्त्रोत बनते भक्त!! मैं धन्य हुआ जा रहा था, अनेक विचार मन में थे, कि कैसे इस प्रांगण का एक अभिन्न अंग हो इसी में मिल जाऊँ!

मैंने पूरे जीवन में यहाँ इतना समय नहीं बिताया था जितना एक दिन में बिता लिया! मंदिर के द्वार बंद होने वाले थे, बाहर निकलना ही था, महादेव को नमन करके मैं चल दिया, जानता था कि फिर बुलाएँगे ही!!

हर हर महादेव !!