संस्कृति
काशी का बदलता रहा स्वरूप लेकिन सनातनी आस्था अक्षुण्ण

विश्वेशर शिव को जल चढ़ाने के उपरांत मन में पंचाक्षरी मंत्र पढ़ते हुए नंद हरिश्चंद्र घाट तक चलते-फिरते चला आया। उसका मन उदास था, काशी का रूपांतरण और उसके इर्द-गिर्द चलती हुई चर्चा उसे परेशान किए थी।

तभी घाट पर जलते दीये की परछाई से एक मानवाकार परछाई प्रकट होती है और नंद से पूछती है, “जब सारा नगर उत्सव में डूबा है तुम क्यों चिंतित हो मित्र?” नंद घबराकर परछाई से उसका परिचय पूछता है तो उत्तर मिलता है, “मैं 16वीं शताब्दी में बनारस में रहने वाला मराठी पंडित नारायण भट्ट हूँ।

मैंने ही टोडर मल से प्रार्थना करके ज्ञानवापी कूप के पास बड़ा विशेश्वर मंदिर बनवाया था जो बाद में औरंगज़ेब के आदेश पर तोड़ दिया गया था। आज जब इस कॉरिडोर से नगर की शोभा और बढ़ रही है तो यहाँ आने से स्वयं को रोक न सका।“

नंद नारायण भट्ट को प्रणाम करते हुए कहता है, “हे आचार्य आप तो काशी नगर और इसकी संस्कृति के महा पंडित हैं, तब आज जब काशी की गलियों को तोड़कर उसका मूल स्वरूप बदला जा रहा है, उसे तीर्थ से पर्यटन स्थल बनाया जा रहा है आप कैसे हर्षित हो सकते हैं?”

नारायण कुछ मुस्कुराते हैं, फिर नंद का हाथ थाम के कहते हैं, “आओ मैं तुम्हें काशी की यात्रा पर ले चलूँ।” नंद कुछ प्रतिक्रिया दे पाता, इससे पहले एक तेज़ प्रकाश होता है और नंद उस परछाई के संग उसमें प्रवेश कर जाता है।

उस पार नंद पहुँचता है महाराज दिवोदास की काशी में। नारायण कहते हैं, “देखो नंद यह काशी तब की काशी है जब शिव ने इसे अपना नगर नहीं बनाया था। शिव द्वारा निकुंभ को भेजकर नगर खाली करवाने के पहले की काशी, यह राजा दिवोदास की काशी है।”

फिर एक बार प्रकाश होता है और नंद पहुँचता है गुप्त वंश काल में जहाँ सहस्रों तीर्थ यात्री हर हर महादेव का उच्चारण करते हुए नगर की ओर बढ़े जा रहे हैं। यह काशी नंद को दिवोदास की काशी से कुछ अधिक जानी पहचानी सी लगती है।

नारायण भट्ट नंद से कहते हैं, “इन तीर्थ यात्रियों से पूछो कि ये किस औचित्य से नगर की ओर बढ़े चले जा रहे हैं”। उत्तर में ‘बाबा विश्वनाथ के दर्शन’ की अपेक्षा करते हुए जब नंद एक युवक तीर्थ यात्री से पूछता है तो उत्तर मिलता है,

“मणिकर्णिका घाट पर स्नान कर अविमुक्तेश्वर के दर्शन हेतु काशी जा रहे हैं”। जब नंद कुछ समझ नहीं पाता है तो नारायण समझाते हैं कि यह तब की काशी है जब अविमुक्तेश्वर की महत्ता विश्वेश्वर से अधिक थी।

नंद कुछ समझता इससे पहले ही फिर प्रकाश होता है और नंद परछाई का हाथ पकड़े स्वयम को आकाश मार्ग पर काशी के ऊपर तैरता हुआ पाता है। नगर पर भारी वर्षा हो रही होती है। नारायण कहते हैं, “इस नगर के वास्तु को ध्यान से देखो, इस भीषण बाढ़ में जो होगा उसे ध्यान से देखो।

देखो कैसे वरुणा नदी बनारस के उत्तर से बहती हुई तथा अस्सी नदी नगर के दक्षिण से गंगा जी में गिर रही हैं। इन दोनों नदियों के बीच में बसे होने से इस शहर को एक नाम मिला “वाराणसी”।” नगर तो काशी ही था लेकिन यह काशी नंद की जानी पहचानी काशी से एकदम अलग थी।

नगर के निचले हिस्से में छोटे-बड़े अनेक कुंड दिखे जो आपस में जुड़े हुए थे और शहर को बाढ़ की स्थिति में डूबने से बचा रहे थे। इनमें मुख्य कुंड थे- मंदाकिनी (मैदागिन), मत्स्योदरी (मच्छोद्री) जो वरुणा नदी में खुलते थे और वेणी (बेनिया) जो गोदावरी नदी (गदौलिया) में खुलता था।

गोदावरी नदी (गदौलिया) दशाश्वमेध घाट पर गंगा जी में गिरती थी जिसकी जगह आज गदौलिया चौराहा और विश्वनाथ गली स्थित है। नगर के उत्तर में ओंकार, मध्य में विश्वनाथ और दक्षिण में केदार दिख रहे थे। ओंकार मत्स्योदरी कुंड के किनारे स्थित था।

भारी वर्षा से मत्स्योदरी कुंड दक्षिण में कामेश्वर से लेकर उत्तर में ओंकार मंदिर तक फैल गया था। मत्स्योदरी से एक मत्स्योदरी नदी उत्तर की ओर बह चली थी जो कपालमोचन कुंड, ऋणमोचन कुंड, पापमोचन कुंड से होते हुए वरुणा नदी में गिर रही थी।

फिर नंद देखता है कि ऐसी भारी वर्षा और ऐसी भीषण बाढ़ आती है की गंगा जी उल्टी बहने लगती हैं। मत्स्योदरी का जल, वरुणा और वरुणा का गंगा जी में नहीं, गंगा जी की बाढ़ का पानी वरुणा में और वरुणा की बाढ़ का पानी मत्स्योदरी में बहता चला जाता है और परिणामस्वरूप मत्स्योदरी दक्षिण को बहने लगती है।

मत्स्योदरी कुंड का पानी बांध को तोड़ मंदाकिनी में बहता और वहाँ से वेणी (बेनिया तालाब) होते हुए गोदावरी (गदौलिया) में जो दशाश्वमेध घाट पर पुनः गंगा जी मे गिरता है। ऐसे बाढ़ में नगर एक टापू में तब्दील हो जाता।

नारायण बताते हैं कि कुंड और नदी का नाम मत्स्योदरी इसलिए है क्योंकि इनके उदार में काशी मत्स्य रूप में होती है।

वर्षों में कभी होने वाले इस मत्स्योदरी योग को अत्यंत शुभ माना जाता था क्योंकि बस इस कालावधि के लिए मत्स्योदरी और गंगा जी का संगम होता था (मत्स्योदरी संगम) जिसमें शिवजी का भी काशी में प्रथम आगमन हुआ। अब तो काशी में न ये कुंड रहे रहे, न कभी मत्स्योदरी योग होता है।

तभी तुरंत बादलों में गर्जना होती है, भारी प्रकाश होता है और नंद पहुँचता है रज़िया काल में जहाँ शिव के त्रिशूल माने जाने वाली तीन पहाड़ियों में से मध्य वाली पर जो विश्वेश्वर मंदिर स्थित था वहाँ मंदिर की जगह मस्जिद बन रही होती है।

वहाँ से नंद पहुँचता है फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ काल मे जहाँ फिर एक बार हिंदुओं द्वारा पुनर्निमित विश्वेश्वर मंदिर को तुग़लक़ की सेना तोड़ रही होती है। इसके बाद नंद पहुँचता है 16वीं शताब्दी में जहाँ नारायण भट्ट स्वयं टोडर मल से प्रार्थना करके भव्य विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाते हैं जो सौ वर्ष के भीतर ही औरंगज़ेब फिर तोड़ देता है।

वहाँ से नंद पहुँचता है अहिल्याबाई होलकर के राज्य में जहाँ एक बार फिर ज्ञानवापी मस्जिद के बगल में मंदिर का निर्माण हो रहा होता है।

ऐसे अनेक बार बाबा विश्वनाथ के मंदिर को टूटते देखना नंद को भैरवी यातना-सी प्रतीत होती है और ऐसी सही ना जा सकने वाली पीड़ा से जब उसकी आँखें बंद होकर खुलती है तो वह स्वयं को वहीं हरीशचंद्र घाट पर बैठा हुआ पाता है।

नारायण उससे पूछते हैं, “बताओ नंद, काशी का मूल स्वरूप क्या है। क्या दिवोदास की काशी मूल काशी है या शिव की? क्या अविमुक्तेश्वर की काशी मूल है या विश्वनाथ की? अनेको बार बन के टूटे मंदिरों में से कौनसा मंदिर मूल विश्वनाथ मंदिर है? क्या अनेक कुंडों के बीच बसी काशी मूल है या आज तंग गलियों में घनी आबादी वाली काशी मूल है।”

अवाक् हो गए नंद के सर पर हाथ फेरते हुए नारायण कहते हैं, “सनातन सभ्यता की ही तरह उसकी सबसे पवित्र नगरी भी युग युगांतर से अपने आप को बदलती और समयानुसार ढालती आई है। काशी का महातम्य उसके मंदिरों से, उसके कुंडों से, उसकी नदियों से अधिक सनातन के अनुयायियों की काशी के प्रति आस्था में है।

जब तक आखिरी सनातनी काशी आकर गंगा जी मे स्नान करके महादेव के दर्शन की सच्ची आस्था लिये है, तब तक काशी की पवित्रता, उसका वैभव, उसका गौरव बना हुआ रहेगा।”

“ काश्यां हि काशते काशी सर्वप्रकाशिका।
सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता ही काशिका।“

नारायण भट्ट अपनी लिखित त्रिस्थलेस्तु के कुछ पन्ने पलटाकर पढ़ते हुए नंद को सुनाते हैं, “यदि मानवों द्वारा विकट परिस्थितियों में काशी से विश्वनाथ शिवलिंग हटाकर कोई दूसरा शिवलिंग स्थापित कर दिया जाए, उस जगह जिसकी भी स्थापना हो उसका पूजन होना चाहिए,

अगर विदेशी आक्रांताओं के कारण वहाँ कोई शिवलिंग न भी बचे तब भी इस जगह के धर्म का पालन होना चहिए। वैसे ही अभिषेक, परिक्रमा, पूजा-अर्चना चलती रहनी चाहिए और इसी तरह तीर्थ बना रहना चाहिए।”

बस इतना कहते ही वह परछाई फिर उस दीये की परछाई में समा जाती है और नंद प्रण लेता है कि वह धर्म की रक्षा की चिंता छोड़ धर्म का पालन करेगा और धर्म की रक्षा, उसकी निरंतरता को स्वयं धर्म जर छोड़ देगा। वह नगर के वास्तु में नहीं अपनी आस्था में काशी को संजोए रखेगा।

हर हर महादेव।।