अर्थव्यवस्था / शिक्षा-नौकरी
वाहन स्क्रैपेज नीति अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए रामबाण कैसे होगी

सार्वजनिक नीतियाँ ‘रामबाण’ की तरह हों, यानी एक तीर से कई लक्ष्य भेद सकें, ऐसा बहुत कम होता है। लेकिन 2021-22 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित स्वैच्छिक ‘वाहन स्क्रैपेज (पुराने को बदलना) नीति’ ऐसा एक सरकारी कार्यक्रम बन सकता है।

केंद्रीय परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में कहा, “जो लोग अपने पुराने वाहनों को बदलना चाहेंगे उन्हें विनिर्माताओं से कुछ लाभ मिलेगा। वास्तव में स्क्रैपेज नीति एक वरदान सिद्ध होगी… यह न सिर्फ अर्थव्यवस्था को बल देगी, बल्कि ऑटोमोबाइल क्षेत्र को लाभान्वित करने के साथ-साथ वाहनों से होने वाले प्रदूषण को भी नियंत्रित करेगी।”

यह स्क्रैप नीति बहुप्रतीक्षित थी और इसकी काफी आवश्यकता थी। पिछले कुछ समय से इसपर काम भी चल रहा था और कई बार गडकरी ने ऐसे प्रयास की महत्ता पर बात की थी। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऑटोमोबाइल उद्योग के महत्त्व को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह देश के विनिर्माण क्षेत्र की रीढ़ की हड्डी है।

विनिर्माण क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान का 40 प्रतिशत ऑटोमोबाइल क्षेत्र से आता है और इसमें भी आधा योगदान कार उद्योग का होता है। पिछले चार वर्षों में वस्तु एवं सेवा कर, बीएस-4 से सीधे बीएस-6 पर अनिवार्य स्थानांतरण, विमुद्रीकरण और कोविड-19 महामारी जैसे कई झटके इस उद्योग ने झेले हैं। ऐसे में यह प्रोत्साहन लाभकारी होगा।

जो नीति ऑटोमोटिव बिक्री को प्रोत्साहन दे सके, उसकी सराहना करने के लिए बस यह बात ही पर्याप्त है। एक अच्छी स्क्रैपेज नीति पर्यावरण पर जो प्रभाव डालेगी वह मात्र सोने पर सुहागा वाली बात नहीं है, बल्कि वाहनों के कम प्रदूषण से दीर्घ अवधि में लोगों के स्वास्थ्य पर जो सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, वह इसे और महत्त्वपूर्ण बनाती है।

वाहन प्रदूषण से बचने के लिए मुँह पर कपड़ा लगाए व्यक्ति (चित्र- अर्बन अपडेट)

सरकार को इस योजना के सफल होने की अपेक्षा है। अपेक्षा है कि 1 करोड़ पुराने वाहन (15 वर्ष से अधिक पुराने) रद्दी में चले जाएँगे और ऑटोमोबाइल उद्योग का टर्नओवर जो 4.5 लाख करोड़ रुपये है, वह अगले कुछ वर्षों में 10 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा और लगभग 10,000 करोड़ रुपये का नया निवेश आएगा जो 50,000 नौकरियों के अवसर खोलेगा।

लेकिन क्या प्रस्तावित स्क्रैपेज नीति इतनी अच्छी है? पूरी नीति कुछ ही समय में सार्वजनिक हो जाएगी लेकिन सरकार ने अब तक जो जानकारियाँ सार्वजनिक की हैं, उनके आधार पर नीति के लाभ और नुकसान का विश्लेषण किया जा सकता है। नीति की रूपरेखा का सार इस प्रकार है-

  • इसके दायरे में 20 और 15 वर्ष से पुराने क्रमशः निजी तथा व्यावसायिक वाहन आएँगे।
  • इन पुराने वाहनों को एक योग्यता जाँच से गुज़रना होगा जिसकी लागत 40,000 रुपये होगी (योग्यता प्रमाण-पत्र पाँच वर्षों तक के लिए वैध होगा)।
  • उन्हें ग्रीन टैक्स भी देना होगा जो सड़क कर का 10-25 प्रतिशत होगा (अधिक प्रदूषण वाले शहरों में 50 प्रतिशत तक भी हो सकता है)।
  • सरकार उन्हें मौद्रिक प्रोत्साहन देगी जो अपने वाहन को कबाड़ में भेजेंगे।

इस योजना का लक्ष्य 20 वर्ष से अधिक पुराने 51 लाख हल्के मोटर वाहन (एलएमवी), 15 वर्ष से अधिक पुराने 34 लाख एलएमवी और 15 वर्ष से अधिक पुराने 17 लाख माध्यम और भारी मोटर वाहन हैं। कुल मिलाकर 1 करोड़ से थोड़ा अधिक। यदि हम कम आकलन करके चलें और हर वाहन का कबाड़ मूल्य 20,000 रुपये मानें तो यह प्रयास 20,000 करोड़ रुपये का है।

कबाड़ में वाहन (चित्र- गौ मेकैनिक)

इसके अतिरिक्त पुराने व्यावसायिक वाहनों को सड़क से हटाना अधिक आवश्यक है क्योंकि भले ही वे कुल वाहनों का 5 प्रतिशत भाग ही हों लेकिन वाहन प्रदूषण में उनका 65-70 प्रतिशत योगदान रहता है। 20 वर्ष से अधिक पुराने वाहन मात्र 1 प्रतिशत ही हैं लेकिन वाहन प्रदूषण में 15 प्रतिशत योगदान करते हैं, भारत सरकार की विज्ञप्ति में कहा गया।

ऐसे में हमारे पास 17 लाख वाहनों को वित्तीय प्रोत्साहन देने के लिए 20,000 करोड़ रुपये का बजट है। यह स्वागत योग्य प्रयास है लेकिन केंद्र को इसे लगातार जारी रखने की बजाय एक बार की पहल बनाना चाहिए (जैसे यूनाइटेड स्टेट्स का अति सफल ‘कैश फॉर क्लंकर्स’ प्रयास)।

20 वर्ष से अधिक पुराने निजी और 15 वर्ष से अधिक पुराने व्यावसायिक वाहनों पर और सख्ती बरतनी चाहिए। लंबे समय तक उन्हें सड़कों पर चलने देने को कोई मतलब नहीं है और उनपर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। पुराने वाहन के बदले आर्थिक छूट उन वाहनों को देनी चाहिए जो तुलनात्मक रूप से नए हैं जैसे 10 वर्ष से अधिक पुराने (या डीज़ल के मामले में आठ वर्ष से अधिक पुराने) वाहन।

व्यावसायिक वाहनों के लिए भी यही समय-सीमा तय कर देनी चाहिए। ऐसे में प्रति वर्ष कम से कम 30,000 करोड़ रुपये की योजना चलाई जा सकती है। उन्नत पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में भी ऐसा ही प्रचलन है जहाँ 10 वर्ष पूरा होने पर वाहनों को कबाड़ में भेजने योग्य माना जाता है।

यह बहुत अधिक भार लग सकता है लेकिन ऑटोमोबाइल बिक्री से सरकार को जो जीएसटी राजस्व मिलता है, उसका यह मात्र पाँचवाँ हिस्सा है। साथ ही अधिक कारों की बिक्री (पुराने के बदले नए वाहन पर छूट के अंतर्गत) से सरकार को जीएसटी राजस्व और बढ़ेगा।

विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार के अवसरों के साथ पर्यावरण लाभ भी है। इसके अतिरिक्त ऑटोमोबाइल क्षेत्र अर्थव्यवस्था के विनिर्माण भाग के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है, यह समझकर तो हम अर्थव्यवस्था और प्रगति पर इसका सकारात्मक प्रभाव भी समझ सकते हैं।

यह योजना उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) की तरह है। इसमें अर्थव्यवस्था, नौकरियों, पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य, सभी की विजय है। सरकार के पास अवसर है कि कई समस्याओं का कुशल समाधान वह दे सके। यह अवसर व्यर्थ नहीं होना चाहिए।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @haryannvi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।