शिक्षा-नौकरी
रोजगार अयोग्यता का कारण बुरी नीतियाँ, छात्रों-अभिभावकों का रवैया- प्रो शिशिर कुमार

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शैक्षिक संस्थानों से निकलने वाले 53 प्रतिशत स्नातक अभ्यर्थी रोजगार योग्य नहीं होते हैं। राष्ट्रीय कौशल विकास नीति का अनुमान है कि भारत का मात्र 5 प्रतिशत कार्यबल ही औपचारिक कौशल प्रशिक्षण से होकर गुज़रता है।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के परामर्शदाता के साथ काम करने वाले प्रवीण मेनन ने विशेषज्ञ और शिक्षा एवं कौशल विकास के चिंतक प्रोफेसर कर्नल शिशिर कुमार से भारतीय युवा की रोजगार अयोग्यता पर बात की।

प्रो कुमार इमैजिन एक्सपी के महानिदेशक हैं जो यूएक्स डिज़ाइन, कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), ब्लॉकचेन, डाटा विज्ञान, रोबोटिक्स और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी उभरती हुई तकनीकों में कौशल विकास का काम करती है।

कारगिल युद्ध के समय उत्तरी कमांड की सबसे बड़ी इकाई का नेतृत्व करने वाले सेवानिवृत्त कर्नल देहरादून के डीआईटी विश्वविद्यालय के निदेशक भी रहे हैं और शिक्षा के क्षेत्र में अपने दशकों के अनुभव को वे साझा करते हैं। उन्होंने सॉरी, यू आर नॉट एम्प्लॉएबल पुस्तक लिखी है और विज़डम मैट्रिक्स अभी प्रकाशन प्रक्रिया में है।

साक्षात्कार के कुछ अंश प्रस्तुत हैं-

विश्वविद्यालय का निदेशक रहते हुए आपने हमारी शिक्षा प्रणाली को निकट से देखा है, ऐसे में आपको क्या लगता है कि भारत में रोजगार योग्यता की बुरी अवस्था का क्या कारण है?

इसके तीन प्रमुख कारण हैं- 1) समय के साथ चलने वाली सक्रिय नीतियों को अभाव, 2) शिक्षा के प्रति छात्रों व अभिभावकों का रवैया और 3) हमारी शिक्षा प्रणाली में व्यावहारिक ज्ञान से अधिक सैद्धांतिक ज्ञान पर ज़ोर। जब तक नीति निर्माता समय के साथ चलते हुए पाठ्यक्रम को समय-समय पर बेहतर नहीं करेंगे और छात्रों व अभिभावकों का रवैया नहीं बदलेगा, तब तक समाधान संभव नहीं है।

नई शिक्षा नीति अच्छी शुरुआत है लेकिन व्यवहार में परिवर्तन के साथ-साथ कौशल विकास पर ध्यान को शिक्षा प्रणाली में स्थान मिलना चाहिए ताकि रोजगार योग्यता की समस्या का टिकाऊ समाधान निकाला जा सके।

राष्ट्रीय कौशल विकास नीति का अनुमान है कि भारत का मात्र 5 प्रतिशत कार्यबल ही औपचारिक कौशल प्रशिक्षण प्राप्त करता है, जो कि काफी कम है। यह समझना काफी सरल है कि अधिक छात्रों को औपचारिक कौशल प्रशिक्षण देने से कौशल विकास को बल मिलेगा।

नई शिक्षा नीति में नीति संबंधित विषयों के लिए समाधान है, ऐसे में शिक्षा प्रणाली का ध्यान और छात्रों एवं अभिभावकों के रवैये में परिवर्तन को आप कैसे देखते हैं?

सर्वप्रथम, हम छात्रों और अभिभावकों के व्यवहार में परिवर्तन देख रहे हैं। शिक्षा प्रणाली की कमियाँ उजागर हो रही हैं और अभिभावक व छात्र भी इसे समझ रहे हैं। हालाँकि अंकों के प्रति अत्यधिक ध्यान देने के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हैं। जब तक छात्रों और अभिभावकों की जागरूकता उन्हें कौशल विकास की ओर आकर्षित नहीं करती, इस परिवर्तन के दृष्टिगोचर लाभ नहीं मिलेंगे।

विकल्पों के अभाव में उच्च शैक्षणिक संस्थानों में अभी भी अंकों की कसौटी पर ही छात्रों को तौला जाता है और कट ऑफ अंक लगातार बढ़ रहे हैं जो अंकों की होड़ को और बढ़ा रहे हैं। ऐसे में आवश्यकता है वास्तविक कौशल की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने की।

भारत में सर्वाधिक अभियंता हैं और वैश्विक आईटी सेवाओं का बड़ा भाग भी भारत में ही है। ऐसे में तेज़ी से परिवर्तनशील तकनीकी संसार में आप कौशल विकास की आवश्यकताओं को कैसे देखते हैं?

तकनीकी क्षेत्र में बड़े परिवर्तन होंगे। कोविड 19 के कारण डिजिटलीकरण की प्रक्रिया तेज़ हो गई है और उभरती हुई तकनीकें भी लोगों को ध्यान आकर्षित कर रही हैं। चार प्रमुख तकनीकें होंगी- यूएक्स डिज़ाइन, एआई, डाटा विज्ञान और साइबर सुरक्षा। तकनीक आधारित सेवाओं के बढ़ने के साथ यूएक्स डिज़ाइन उपभोक्ता अनुभव निर्धारित करेगा और उनकी स्वीकार्यता मेंबड़ी भूमिका निभाएगा।

भारतीय एआई पर ध्यान दे रहे हैं। प्रधानमंत्री के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय के साथ आईआईटी मद्रास के साझा अध्ययन में सामने आया है कि उभरती हुई तकनीकों में 43 प्रतिशत लोग एआई पर ही ध्यान दे रहे हैं। देखने से लगता है कि एआई विजयी हो रहा है लेकिन कौशल विकास में यह कितना परिवर्तित हो पाएगा, वह देखा जाना शेष है।

एआई का प्रतीकात्मक चित्र

प्रतिदिन अथाह डाटा उत्पन्न हो रहा है, ऐसे में डाटा विज्ञान भी एक महत्त्वपूर्ण उभरती हुई तकनीक है। कुल मिलाकर, नए उपभोक्ता अनुभव का स्पर्ष बिंदु- यूएक्स डिज़ाइन, नया कर्मचारी- एआई, नया ईंधन- डाटा और नई पुलिस- साइबर सुरक्षा बनने वाले हैं।

व्यवसायिकों के लिए स्वास्थ और वित्त के क्षत्र में उभरती हुई तकनीकें अवसर हैं। जो व्यवसायी इस बात को पहले से समझ जाएँगे, वे स्वयं को इन तकनीकों में दक्ष कर लेंगे। सरकारी अधिकारी और नीति आयोग ने भी संकेत दे दिया है कि वे नीति निर्माण से इसे बल देंगे।

शिक्षा प्रणाली और नवाचार में इसकी भूमिका पर आपके क्या विचार हैं? क्या नई शिक्षा नीति नवाचार के अनुकूल वातावरण खड़ा कर पाएगी?

शिक्षा प्रणाली को रचनात्मकता की सहायता करनी चाहिए जिससे नवाचार की ओर बढ़ा जा सके। छोटी आयु में छात्रों में समस्या समाधान कौशल विकसित किया जाना चाहिए। नवाचार एक जिज्ञासु मस्तिष्क कर सकता है जो समस्या का समाधान खोजता है और वांछित परिणाम पाता है। भारत के विश्वविद्यालयों में हम डिज़ाइन विचार या समस्या समाधान जैसे कौशलों पर ध्यान नहीं देते हैं जो नवाचार की कुंजी हैं।

शोध की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए नई शिक्षा नीति इसके वित्तपोषण की बात करती है। भारत में जीडीपी का मात्र 0.69 प्रतिशत ही शोध एवं नवाचार पर खर्च किया जाता है जबकि यूएस में 2.8 प्रतिशत, इज़राइल में 4.3 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में 4.2 प्रतिशत खर्च होता है।

मेरा मानना है कि कई तरीकों से राष्ट्रीय शोध संस्थान (एनआरएफ) की सफलता तय करेगी कि नीति निर्माताओं ने जो लाभ सोचा है, उस अनुसार शोध अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो पाता है या नहीं। सिर्फ वित्तपोषण की बात नहीं है बल्कि देश भर के विश्वविद्यालयों में पारिस्थितिकी तंत्र को पोषित करना होगा।

एनआरएफ पर चर्चा करते शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी जैसे प्राचीन भारत के विश्व-स्तरीय संस्थान बहु-शाखाओं में शोध और शिक्षा के उच्च मानदंड स्थापित करते हैं और आधुनिक भारत में इस सफलता को दोहराने का सरकार का प्रयास सराहनीय है।

उद्योग और शैक्षिक संस्थानों की साझेदारी से भारत में कौशल विकास का वातावरण कैसे बनाया जा सकता है और वर्तमान में यह कैसे हो रहा है?

उद्योग और शैक्षिक संस्थानों में साझेदारी आवश्यक है क्योंकि कुशल प्रतिभा के उपभोक्ता उद्योग ही हैं और शिक्षा प्रणाली इन प्रतिभाओं की प्रदाता। दुरभाग्यवश, प्रायः उद्योगों को लगता है कि शिक्षा प्रणाली कौशल की आवश्यकता अनुसार प्रतिभा की आपूर्ति नहीं कर पाती। ऐसे में कंपनियों की प्रशिक्षण लागत बढ़ जाती है और कई कंपनियाँ अपने संस्थान भी चलाती हैं।

वहीं, रोजगार के लिए अयोग्य युवाओं को निकालकर शैक्षिक संस्थान पारिस्थितिकी तंत्र का मूल्यवर्धन करने में असफल हो जाते हैं। कॉरपोरेट को शैक्षिक संस्थानों के साथ साझेदारी पर विचार करना चाहिए ताकि वे उद्योग संबंधित जानकारी छात्रों तक पहुँचा सकें और बिना मानव संसाधन विभाग व प्रशिक्षण पर खर्चा किए कम लागत में अच्छी गुणवत्ता की प्रतिभा पा सकें।

दूसरी ओर शैक्षिक संस्थानों को प्लेसमेंट के अलावा भी कॉरपोरेट के प्रति स्वीकार्यता बढ़ानी चाहिए। कौशल विकास और उच्चतर स्तर पर शोध के लिए साझेदारी हो रही है लेकिन द्वितीय स्तर के विश्वविद्यालयों में यह नहीं हो रहा है।

एक शिक्षाविद् होने के नाते छात्रों और अभिभावकों को आपका क्या संदेश है?

मैं छात्रों और अभिभावकों से कहना चाहूँगा कि ध्यान रखें सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि कौशल रोजगार योग्यता निर्धारित करता है। सिर्फ अंक केंद्रित शिक्षा प्राप्त करना दूरदर्शिता नहीं है, शिक्षा का केंग्र सीखने और कौशल का उपयोग होना चाहिए जो आपको रोजगार योग्य बनाएगा।

अभिभावकों को अपने बच्चों की खूबियों और कमियों को समझकर ही कुछ करना चाहिए। सरकार यह नहीं कर सकती क्योंकि वह सामूहिक स्तर पर काम करतीहै, एक-एक बच्चे पर ध्यान दे पाना असंभव है। अपने बच्चों को समझकर जो अभिभावक बच्चे की रुचि और कौशल के अनुरूप राह चुनेंगे, वे सफल होंगे।

बच्चों को बताया जाना चाहिए कि याद करके आप अंक ले आएँगे लेकिन यह सफलता सीमित है और भविश्य में दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। नौकरी कर रहे व्यवसायियों को सोचना चाहिए कि क्या उनका कौशल अगले कुछ वर्षों तक प्रासंगिक रहेगा और परिवर्तनशील संसार में कौशल विकास करते रहें।