शिक्षा-नौकरी
ऑनलाइन डिग्री को महत्त्व देने का समय क्यों आ गया है

पिछले एक वर्ष में दो चीज़ें काफी बढ़ गई हैं- एक कोरनावायरस और दूसरी ऑनलाइन शिक्षा। शिक्षा तकनीक (एडुटेक) न सिर्फ अपने आप को सर्वव्यापी बना चुकी है बल्कि विश्व के पिछड़े और दूरस्थ क्षेत्रों में भी पहुँच गई है।

भारत भी इस शांत और अनियोजित परिवर्तन का साक्षी बना है। महामारी के फैलाव और उससे होने वाली परेशानियों के बावजूद वर्चुअल कक्षाएँ और परीक्षाएँ सफलतापूर्वक आयोजित की गईं। इन सबमें, एक घटना है जिसकी ओर नीति-निर्माताओं का ध्यान जाना चाहिए।

भारतीय विद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ पहले से ही कई खिलाड़ी उपस्थित हैं, वहाँ अमेज़ॉन का हाल ही में प्रवेश। ई-कॉमर्स की इस बड़ी कंपनी के भारतीय शिक्षा में प्रवेश से विद्यालय शिक्षा क्षेत्र से बाहर और उच्चतर शिक्षा क्षेत्र में नीतियों के लिए कुछ सीखें हैं।

पहली, अब से शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक की भूमिका बढ़ती ही जाएगी और पारंपरिक ईंट-सीमेंट के विद्यालयों की पद अवनति होगी। दूसरी, इस क्षेत्र में निवेश के साथ-साथ संस्थानों के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने पर भी निवेश होगा।

तीसरी, इस नई पद्धति में हर बच्चे को उसके अनुसार पढ़ाने पर ध्यान होगा, बजाय पारंपरिक पद्धति के, जो लचीली नहीं है व सभी बच्चों को एक ही तरीके से पढ़ाती है। चौथा, यदि रोजगार बाज़ार नए समय के संस्थानों की ऑनलाइन शिक्षा को पहचान देता है तो अब तक विनियमित पारंपरिक संस्थानों से मिलने वाले डिग्री और डिप्लोमा की प्रासंगिकता और महत्ता घटेगी।

पाँचवीं, आज जो हम देख रहे हैं कि पारंपरिक या प्रत्यक्ष शिक्षा की तुलना में शिक्षण और सीखने के परिणाम ऑनलाइन शिक्षा में कम देखने को मिल रहे हैं, तो यह स्थिर या अजेय नहीं है, बल्कि प्रयोगशाला आधारित शिक्षा के अलावा अनुभव के साथ-साथ ऑनलाइन शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी।

छठी, विश्वविद्यालय, कॉर्पोरेट जैसे विदेशी खिलाड़ियों को न सिर्फ पिछले द्वार से प्रवेश मिल जाएगा बल्कि वे शैक्षिक मानक भी निर्धारित करेंगे और आंशिक रूप से एक वास्तविक विनियामक की भूमिका निभाएँगे। 2017 में नीति निर्माताओं से ऑनलाइन शिक्षा को अनुमति मिली थी जिसमें 20 प्रतिशत पाठ्यक्रम को ऑनलाइन पढ़ाया जा सकता है।

एक वर्ष के अंदर ही 2018 में यूजीसी के नियामक ने ऑनलाइन डिग्री देने की अनुमति दे दी। ध्यान इस बात पर था कि ऑनलाइन पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता बनी रहे इसलिए सिर्फ शीर्ष खिलाड़ियों को ही इसमें प्रतिभाग की अनुमति मिली।

उन्हीं संस्थानों को अनुमति मिली जो कम से कम पाँच वर्षों से अस्तित्व में हों, 4 में से एनएएसी मान्यता अंक कम से कम 3.26 हों और राष्ट्रीय संस्थानिक रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) में पिछले तीन वर्षों में कम से कम दो बार शीर्ष 100 में रहे हों।

इसके अलावा ये योग्य संस्थान भी अपने ऑफलाइन पाठ्यक्रमों में से चुनकर ही किसी पाठ्यक्रम को ऑनलाइन पढ़ा सकते थे। सराहनीय है कि सितंबर 2020 में इन नियमों में थोड़ी ढील दी गई जब देश एक महामारी से जूझ रहा था।

हालाँकि, ये ढीलें काफी कम हैं- योग्यता के लिए संस्थान का पाँच की बजाय तीन वर्षों का अस्तित्व अनिवार्य किया गया। शेष दो अर्हताओं को वैकल्पिक बनाया गया- मान्यता अंक न्यूनतम 3.26 हो या संस्थान पिछले तीन वर्षों में कम से कम दो बार शीर्ष 100 में रहा हो।

उभरते ट्रेंड के अनुसार नियमों को परिवर्तित करने और सिर्फ शीर्ष विश्वविद्यालयों को ऑनलाइन शिक्षा की अनुमति देने के लिए विनियामक प्रशंसनीय है लेकिन ज़मीनी वास्तविकताएँ काफी और तेज़ी से बदली हैं। योग्यता के मानक न सिर्फ उच्च स्तर के हैं, बल्कि प्रतिबंधक भी हैं।

967 विश्वविद्यालयों में से सिर्फ 100 ही योग्य होंगे यदि हम मानकर चलें कि 3.26 या उससे अधिक दिसंबर 2020 में मान्यता अंक पाने वाले 73 विश्वविद्यालय शीर्ष 100 में अपना स्थान बना लेंगे। इससे 90 प्रतिशत विश्वविद्यालय ऑनलाइन शिक्षा से अछूते रह जाएँगे।

रोचक है कि इस योग्यता मानक पर खरा न उतरने वाले 109 विश्वविद्यालयों का मान्यता अंक 3 से 3.25 के बीच है। यदि कोई विश्वविद्यालय एनएएसी या एनआईआरएफ की निर्धारित अर्हताओं को पूरा नहीं भी करता लेकिन ऑफलाइन शिक्षा में अच्छा प्रदर्शन करता है तो ऑनलाइन शिक्षा में भी अच्छे प्रदर्शन की अपेक्षा उससे की जा सकती है।

ऐसे ही यदि कोई नवस्थापित विश्वविद्यालय पहले दिन से ही अच्छा प्रदर्शन कर रहा हो तो उसे भी ऑनलाइन माध्यम की अनुमति मिलनी चाहिए। साथ ही किसी कमतर संस्थान का एक अच्छा विभाग इन मानकों में पीछे रह जाएगा जबकि एक अच्छे संस्थान का कमतर विभाग भी ऑनलाइन शिक्षा दे सकेगा।

जब बात तकनीक संबंधित सुधारों की आती है तो अधिकांश नीति-निर्माता अपरिहार्य और अपेक्षित रूप से ट्रेंड से पीछे रह जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि तकनीकी विश्व परिवर्तनशील है, आज जिसका प्रचलन है, वह कल अप्रासंगिक बन सकता है।

नीति विनियमों में हर प्रगति के साथ निरंतर परिवर्तन करने का परामर्श नहीं है लेकिन परिवर्तनों को देखते हुए विनियमों को लचीला बनाया जा सकता है। आज की स्थिति में नीति निर्णय लेना आवश्यक है जो वर्तमान विश्वविद्यालयों को एक स्थिरता दे।

बेहतर होगा कि ऑनलाइन शिक्षा के लिए गुणात्मक मानक तय किए जाएँ बजाय यह तय करने के कि कितने विश्वविद्यालय ऑनलाइन शिक्षा प्रदान कर सकते हैं। यदि गुणवत्ता की चिंता है तो बेहतर होगा नियमों का पालन करने वाले हर संस्थान को अवसर दिया जाए।

यदि उन्हें रोका जाएगा तो एक रिक्त स्थान हो जाएगा जिसे भरने के लिए ऐसे खिलाड़ी आएँगो जो विनियामकों की पहुँच से बाहर होंगे। 2020 के विनियमन की 2020-21 सत्र के अंत पर समीक्षा होनी है। ऑनलाइन डिग्री पाठ्यक्रमों को मान्यता देने से हम विश्वविद्यालयों को विदेशी निकायों से बचा सकेंगे।