शिक्षा-नौकरी
शिक्षा के लिए सीमाओं से आगे सोचें, जनसांख्यिकी लाभांश का लाभ उठाएँ

आशुचित्र- वर्तमान सरकार को जैसा जनमत मिला है, वैसा ही दृढ़ संकल्प इसे दिखाना चाहिए प्राथमिक शिक्षा सुधार के लिए।

देश में प्राथमिक शिक्षा को सदा कम महत्त्व दिया गया है। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उच्च शिक्षा को अधिक महत्त्व दिया। नरेंद्र मोदी ने भी अपने पहले कार्यकाल में ऐसा ही किया जहाँ उन्होंने प्राथमिक शिक्षा पर कम ध्यान देकर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कई सुधार किए। यदि हाल ही में आए बजट से कोई संकेत मिलता है तो वह यह है कि प्रथमिकताओं में शायद ही कोई परिवर्तन किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के प्रारूप से प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था के उपचार हेतु जो अपेक्षाएँ थीं, वे भी पूरी नहीं हुईं क्योंकि इसमें कोई बड़े सुधार नहीं सुझाए गए हैं।

शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया है। इसलिए यह केंद्र और राज्य सरकार दोनों का दायित्व है। फिर भी केंद्र सरकार प्राथमिक शिक्षा की गिरती गुणवत्ता को सुधारने के लिए प्रयास करने से बचती हुई दिखी है। शिक्षा के लिए आखिरी बड़ा प्रयास 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम से किया गया था। यदि इस रूपरेखा सही होती और इसे सही तरह से लागू किया जा पाता तो यह देश में प्रारंभिक शिक्षा की सूरत बदल सकती थी लेकिन इससे लाभ से अधिक हानि हुई।

इसके आगे क्या? आर्थिक सर्वेक्षण में प्रकाशित जनसांख्यिकी डाटा और इसका विश्लेषण प्राथमिक शिक्षा में सुधार के लिए सहायक सिद्ध हो सकता है।

अपेक्षा है कि 2021 की जनगणना में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 1.8 निकलकर आएगी जो कि 2.1 के प्रतिस्थापन दर से कम है (जिसमें जनसंख्या उतनी ही बनी रहती है)। भारत के विषम लिंग अनुपात को देखें तो प्रभावी टीएफआर और कम होगा। 13 प्रमुख राज्यों में स्थिति और चिंताजनक है (जो जनसंख्या नियंत्रण अधिनियम की बात कर रहे हैं, वे पुनः विचार करें)। सर्वेक्षण कहता है कि 2021-2041 तक स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में 18.2 प्रतिशत की गिरावट होगी (23.4 करोड़ से 19.1 करोड़) और प्रति लाख बच्चों के लिए स्कूलों की संख्या 600 (2016) से बढ़कर 760 (2041) हो जाएगी। मतलब यह कि प्रति व्यक्ति स्कूलों की संख्या बढ़ेगी, यह मानकर कि नए स्कूलों का निर्माण नहीं होगा।

जैसा टीएफआर के साथ है, वैसा ही स्कूलों के साथ भी होगा। कई राज्यों में परिवर्तन अधिक बड़े होंगे।

इसमें कई नीतिगत उलझाव हो सकते हैं लेकिन सर्वे मात्र एक की चर्चा करता है। सरकारी प्रारंभिक विद्यालयों का विलय और एकत्रिकरण होना चाहिए जिससे वे व्यवाहर्य रहें और संख्या से गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह विचार मात्र कथा नहीं है, नई शिक्षा नीति समिति ने इसे काफी स्थान दिया है और यह कैसे होगा इसपर चर्चा की है।

कहा गया है कि हमारे पास कम विद्यार्थी संख्या वाले बहुत विद्यालय हैं इसलिए इनका विलय करके एक स्कूल कॉम्प्लैक्स बनाया जा सकता है (कम से कम प्रशासनिक रूप से यदि भौतिक रूप से संभव न हो)। इससे वे एक-दूसरे के संसाधन साझा कर सकते हैं और शासन में भी सुधार होगा। लेकिन न एनईपी प्रारूप और न ही आर्थिक सर्वेक्षण शिक्षकों की जवाबदेही और सरकारी विद्यालयों के शासन में सुधार के केंद्रित हल देते हैं।

सर्वेक्षण का सुझाव अच्छा है लेकिन आश्चर्य होता है कि उन्होंने सिर्फ एक ही सुझाव दिया है। भारतीय नीति-निर्माताओं और उनके सलाहकारों को सीमाओं से आगे जाकर सोचना होगा। आँकड़ों पर ध्यान दें। शिक्षा का जिला सूचना सिस्टम बताता है कि 2010 से 2017 के बीच सरकारी प्रारंभिक विद्यालयों में बच्चों के प्रवेश में 2.4 करोड़ की गिरावट आई है और मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों में प्रवेश में 2.1 करोड़ की वृद्धि हुई है।

अब हम सरकारी विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए आधे मन से प्रयास करके अगले 10-20 वर्ष व्यर्थ कर सकते हैं या यथार्थवादी होकर एक पीढ़ी के समय में लाखों गरीब बच्चों को निजी क्षेत्र द्वारा अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा दे सकते हैं। चुनावी दृष्टिकोण से समझा जा सकता है कि राजनेता शिक्षक संघों को आड़े हाथ लेने में हिचकिचाते हैं लेकिन कोई उन्हें सीधा लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से गरीब बच्चों की शिक्षा को पोषित करने से नहीं रोक रहा है, इस शर्त पर कि वे अपनी इच्छानुसार किसी भी स्कूल में जा सकें।

दशक भर में ये संघ असंबंधता के कारण कमज़ोर पड़ जाएँगे और अंततः विलुप्त हो जाएँगे।

जहाँ तक बजट की बात है तो यह डीबीटी परियोजना सरकारी स्कूलों से राशि को मोड़कर निर्धन बच्चों की शिक्षा के लिए पहुँचा सकती है। 41 प्रतिशत उन स्कूलों (लगभग चार लाख विद्यालय) में जहाँ 50 से कम बच्चे पढ़ते हैं, सरकार ने प्रति बच्चे पर 50,000 रुपये तो मात्र शिक्षक के वेतन पर ही खर्च किया है। अन्य व्यय (इंफ्रास्ट्रक्चर आदि) अतिरिक्त हैं। यदि हम डीबीटी द्वारा से पैसे दें, मान लें महीने के 2,000 रुपये तो साल के 24,000 रुपये हुए। यानी कि एक शिक्षक के वेतन से दोगुना बच्चों को पढ़ाया जा सकता है। 1.2 करोड़ बच्चों को बुरी शिक्षा (इन छोटे स्कूलों में औसत तौर पर 30 बच्चे पढ़ते हैं) देने के स्थान पर 2.4 करोड़ बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सकती है।

सर्वे कहता है कि अगले दो दशकों में स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में 18 प्रतिशत की गिरावट होगी। इसका मतलब यह कि प्रति बच्चे को शिक्षा के लिए मिलने वाली राशि में बढ़ोतरी होती जाएगी और सरकार को अतिरिक्त धन व्यय नहीं करना होगा। फिर भी यदि हम महंगाई को गिनें तब भी बजट में मामूली बढ़ोतरी करनी होगी।

इस तरह डीबीटी किसी प्रकार से सरकार पर बोझ नहीं बनेगा। जो बजट निजी विद्यालय करोड़ों विद्यार्थियों के इस बाज़ार से लाभ कमाएँगे, उन्हें शुल्क विनियमन अधिनियम के अंतर्गत लाया जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में आयुष्मान भारत जैसी योजना क परिकल्पना करें।

हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए पैसे की चिंता नहीं है। हमारी इच्छा शक्ति और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग में कमी है। ऐसा नहीं है कि हम पैसे खर्च कर रहे हैं लेकिन हम बुद्धिमता के साथ पैसे नहीं खर्च कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि इस पद्धति को बदला जाए।