भारती / शिक्षा-नौकरी
रोजगार उत्पन्न करने के लिए बजट में वित्त मंत्री सीतारमण का सर्वश्रेष्ठ विचार क्या रहा

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 2021-22 के लिए प्रस्तुत “वृद्धि बजट” में सबसे सरल और सबसे क्रांतिकारी विचार जो प्रकट किया गया, वह था छोटी कंपनियों विशेषकर एक व्यक्ति कंपनियों (ओपीसी) का जीवन सरल बनाने का वादा।

यह विचार क्रांतिकारी इसलिए नहीं है क्योंकि यह नया है- कंपनी अधिनियम 2013 में ओपीसी को समाविष्ट करने के प्रावधान पहले से हैं- बल्कि यह क्रांतिकारी इसलिए है क्योंकि ओपीसी को कानून में एक प्रावधान से कई अधिक सहयोग की आवश्यकता है।

विनियमन से मुक्त हुए बिना ओपीसी रोजगार के अवसर और आय उत्पन्न करने के अपने सामर्थ्य को पूरा नहीं कर सकते हैं। इसलिए ही निर्मला सीतारमण ने प्रस्ताव दिया है। लेकिन वह जानने से पहले समझिए कि ओपीसी क्या है और क्या नहीं है।

यह एक सीमित दायित्व वाली कंपनी होती है जिसमें एक ही सदस्य होता है, इसमें यह आवश्यक नहीं है कि इस कंपनी में एक या दो कर्मचारी ही हों या यह एक छोटी कंपनी हो। एकमात्र स्वामित्व वाली कंपनी ओपीसी हो सकती है लेकिन असीमित दायित्व के साथ नहीं।

कंपनी अधिनियम में निर्धारित अनुपालन भार को अधिक न उठाते हुए ओपीसी व्यापार का निगमीकरण करती है। बजट वक्तव्य ने सीतारमण ने कहा था-

स्टार्ट-अप और नवाचारियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाने के लिए प्रदत्त पूँजी और टर्नओवर पर बिना किसी प्रतिबंध के ओपीसी को बढ़ने देने, किसी भी समय उन्हें किसी दूसरी प्रकार की कंपनी बनने देने, भारतीय नागरिक के लिए ओपीसी स्थापित करने के लिए रहवासी सीमा को 182 दिन से घटाकर 120 दिन करके और गैर-निवासी भारतीय को भी ओपीसी निगमन की अनुमति देकर मैं ओपीसी के निगमन को प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव देती हूँ।

इटैलिक भाग पहले के कानून से महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को दर्शाते हैं। ओपीसी या नौकरियों को बढ़ावा देने में ये कानून कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त कर सके हैं।

कंपनि अधिनियम 2013 के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार केवल भारतीय नागरिक ही ओपीसी स्थापित कर सकता है, गैर-निवासी भारतीय (एनआरआई) नहीं। यदि प्रदत्त पूँजी 50 लाख रुपये या वार्षिक टर्नओवर 2 करोड़ रुपये से अधिक हो जाता है तो आवश्यक रूप से कंपनी अधिनियम के खंड 18 के अनुसार ओपीसी को प्राइवेट या पब्लिक लिमिटेड कंपनी में परिवर्तित होना पड़ेगा।

विकृति यह है कि यदि दो वर्ष से ओपीसी परिचालन को दो वर्ष से अधिक समय न बीता हो तो वह स्वेच्छा से प्राइवेट या पब्लिक लिमिटेड कंपनी नहीं बन सकती है।

वित्त मंत्री ने जो परिवर्तन प्रस्तावित किए हैं, उसके अनुसार निवासी भारतीय और एनआरआई दोनों ही ओपीसी की स्थापना कर सकते हैं, प्रदत्त पूँजी या टर्नओवर पर कोई सीमा नहीं होगी और जब भी वह चाहे अपने आप को किसी दूसरे प्रकार की कंपनी बना सकती है। निवासी भारतीय या एनआरआई के लिए भारत में रहने की न्यूनतम सीमा 120 दिन (चार महीने) कर दी गई है।

स्पष्ट रूप से, जब भी आप नौकरशाहों से उदारीकरण की बात कहेंगे तो वे इतने सारे नियम और शर्तें बना देंगे कि पूरी प्रक्रिया उपहासपूर्ण लगने लगे। ऐसा ही कंपनी अधिनियम 2013 के खंड 2(62) में ओपीसी के प्रावधानों के साथ था।

जब सीतारमण इन परिवर्तनों को क्रियान्वित करेंगी तब ओपीसी किसी भी आकार तक बढ़ सकेगा, जितनी आवश्यकता हो उतने कर्मचारी भर्ती कर सकेगा और विस्तार करने व सफल होने के लिए जितनी पूँजी की आवश्यकता हो, वह इकट्ठा कर सकेगा।

यह बहुत बड़ी बात है, भले ही हर ओपीसी सफल हो यह आवश्यक नहीं है लेकिन कम से कम कानून छोटे उद्यमियों को व्यापार खड़ा करने और रोजगार के अवसर उत्पन्न करने से नहीं रोक सकेगा। यह एकमात्र स्वामित्व वाली कंपनियों को निगमित होने के लिए प्रोत्साहित करेगा जिससे वे विस्तार के लिए पूँजी इकट्ठा कर पाएँगे।

भारत की हमेशा से समस्या रही है कि हमारे पास ऐसे उद्योग हैं जो थोटे ही रहते हैं और बड़े नहीं होना चाहते, आंशिक रूप से यह उसका समाधातन है। ओपीसी उदारीकरण को यदि कारगर होना हैतो इसे राज्य के स्तर पर वकालत करने वाले चाहिए क्योंकि वहाँ नियमन का भार काफी होता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि सत्ता संबंध, औद्योगिक संपदा, प्रदूषण नियंत्रण और श्रम कानून राज्य लागू करता है। जब तक इंस्पेक्टर राज चलता रहेगा, तब तक केंद्रीय स्तर पर ओपीसी का उदारीकरण पर्याप्त नहीं होगा। इसका अर्थ हुआ कि निर्मला सीतारमण को आवश्यकता है कि वे राज्यों को समझाएँ कि वे ओपीसी को एक रोजगार उत्पन्न करने के माध्यम के रूप में देखें और उन्हें नियामकों के अति-उत्साह में न दबाएँ।

ओपीसी समेत छोटे-छोटे स्टार्ट-अपों की प्रगति के बिना भारत में रोजगार उत्पन्न करने को तीव्र गति नहीं मिल सकेगी। इन्फोसिस के गैर-कार्यकारी अध्यक्ष और यूनिक पहचान परियोजना के निर्माता नंदन निलेकनी ने लेखक की पुस्तक द जॉब्स क्राइसिस इन इंडिया पर साक्षात्कार के दौरान कहा था-

एक बैंक की अनेक शाखाएँ खुल जाने से रोजगार उत्पन्न नहीं होगा लेकिन यदि वह 10 करोड़ लोगों को वित्तीय सेवा दे सके और वे औपचारिक अर्थव्यवस्था तक पहुँच बना सकें, तो वे ये कर सकते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लाखों-करोड़ों छोटी-छोटी इकाइयों से रोजगार उत्पन्न होगा। मनेसर में मारुति 20,000 नौकरियाँ नहीं दे सकेगा, 20,000 नौकरियाँतब बनेंगी जब 20,000 छोटी इकाइयाँ एक अतिरिक्त व्यक्ति को लेंगी। चीज़ें इसी प्रकार से आगे बढ़ेंगी।

रोजगार के अवसर उत्पन्न करने का मार्ग ओपीसी प्रशस्त कर सकते हैं। मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ा काम लाखों ओपीसी की खुलने में सहायतका करना है और राज्य के साथ मिलकर काम करना है जिससे उन्हें परेशानियाँ न उठानी पड़े।