शिक्षा-नौकरी
भारत को शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनाने हेतु हो रहे सम्मेलन पर विनय सहस्रबुद्धे के विचार

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) ‘डेस्टिनेशन इंडिया- भारत को शिक्षा का प्रधान केंद्र बनाने की ओर’ नामक राष्ट्रीय सम्मेलन पुणे के सिम्बायसिस विश्वविद्यालय में 28 और 29 जनवरी को करवा रहा है।

इस सम्मेलन में अग्रणी शिक्षाविद्, शिक्षा उद्योग के विभिन्न हितधारक और अन्य नीति विशेषज्ञ होंगे जो विदेशी छात्रों के लिए भारत को शिक्षा का केंद्र बनाने पर चर्चा करेंगे। इस विषय में और जानकारी के लिए स्वराज्य  ने आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉ विनय सहस्रबुद्धे से वार्ता की।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश-

सिम्बायसिस, पुणे में आईसीसीआर द्वारा आयोजित किया जाने वाला यह सम्मेलन इस प्रकार का पहला सम्मेलन होगा जिसमें भारत को वैश्विक स्तर पर शिक्षा का केंद्र बनाने पर चर्चा की जाएगी। इस विषय में और बताएँ।

ऐतिहासिक रूप से भारत वैश्विक स्तर पर शिक्षा का केंद्र रहा है। हमारे पास विश्व के कुछ उत्कृष्ट विश्वविद्यालय थे जैसे नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जहाँ दुनिया भर के छात्र आया करते थे।

हाँ, हमारी सभ्यता के वो दिन पीछ रह गए लेकिन मुझे विश्वास है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था फिर से उस चरण में है जहाँ इसका पुनः उद्धार हो रहा है और भारत को शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनाने की यह उचित शुरुआत है।

भारत को वैश्विक स्तर पर शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में से एक बनाना क्या महत्त्व रखता है?

यह बताने से पहले मैं कुछ आँकड़े सामने रखना चाहूँगा। भारत 47,000 विदेशी छात्रों को शिक्षा देता है। ‘स्टडी इन इंडिया’ कार्यक्रम का उद्देश्य इस संख्या को 2022 तक 2 लाख बनाने का है।

2009 से 2016 के बीच यह संख्या 12 प्रतिशत की दर से प्रति वर्ष बढ़ी, चीन की तरह। भारत के 63 प्रतिशत विधेशी छात्र 10 देशों से आते हैं जिसमें नेपाल के 21 प्रतिशत और अफगानिस्तान के 10 प्रतिशत छात्र हैं।

अफ्रीक, सूडान और नाइजीरिया से 5-5 प्रतिशत छात्र आते हैं। भारत में 900 से अधिक विश्वविद्यालय और 40,000 से अधिक महाविद्यालय हैं।

शिक्षा के गंतव्य स्थान के रूप में भारत 26वें पायदान पर है, वहीं भारतीय छात्रों के विदेश जाने की सूची में यह दूसरे स्थान पर है। 7.5 लाख भारतीय छात्र विदेशों में शिक्षा प्राप्त करते हैं।

ये आँकड़े अच्छे लग सकते हैं लेकिन इनमें सुधार की काफी क्षमता है। इस सम्मेलन में समस्याओं को समझने के लिए उद्योग के विभिन्न हितधारक होंगे जो व्यवस्था की कमियों को रेखांकित करेंगे और ऐसे सुझाव प्रस्तुत करेंगे जिससे भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र बनाया जा सके।

इस संदर्भ में भारत के विश्वविद्यालयों के पास क्या आवसर हैं?

भारत के उच्च शिक्षा संस्थान विभिन्न राष्ट्रों के छात्रों की उपस्थिति का महत्त्व समझ रहे हैं। कई विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को रिझाने के लिए शुल्क में छूट और छात्रवृत्तियाँ दे रहे हैं ताकि उनकी छवि और वरीयता में सुधार हो।

अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग में विदेशी सहकारिता एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई है। जैसे क्यूएस वरीयता में 10 प्रतिशत अंक विदेशी शिक्षकों व छात्रों के अनुपात के लिए होते हैं।

भारत के केवल तीन संस्थान क्यूएस वरीयता सूची के शीर्ष 200 में हैं- आईआईटी बॉम्बे 162वें स्थान पर, आईआईएससी बेंगलुरु 170 वें स्थान पर और आईआईटी दिल्ली 172वें स्थान पर। ये शीर्ष संस्थान भी अपनी रैंकिंग में सुधारों के लिए विदेशी छात्रों को बढ़ावा दे रहे हैं।

इसके अलावा कई निजी विश्वविद्यालय भी विदेशी छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं, विशेषकर दक्षिण-पूर्वी देशों से। अधिकांश छात्र अभियांत्रिकी व प्रबंधन क्षेत्रों की शिक्षा के लिए आ रहे हैं।

हालाँकि इन आँकड़ों को बेहतर बनाने के लिए एक बेहतर अध्ययन की आवश्यकता है।

इस सम्मेलन से आपका क्या उद्देश्य है और आपको क्यों लगता है कि भारत शिक्षा का वैश्विक केंद्र बन सकता है?

वृहद परिप्रेक्ष्य से देखने पर हम पाएँगे कि भारतीय संगीत, व्यंजन, फिल्में, अध्यात्म, कला और पर्यटन पहले से ही विश्व को आकर्षित कर रहा है। शिक्षा हमारी नर्म शक्ति का एक महत्त्वूर्ण स्रोत हो सकता हैष

योग की तरह हमारे द्वारा दी जा रही शिक्षा इसके मूल्य और प्रामाणिकता के कारण औरों से बेहतर होगी। भारत को उदारता, विविधता और शिक्षा के प्रति उत्सुकता से आगे बढ़ना होगा।

भारत को शिक्षा के गंतव्य स्थान बनाने के विचार को आगे ले जाने के लिए आवश्यक है कि सरकार, शिक्षा व्यवस्था, राजनयिक दूतवर्ग, शिक्षा संस्थान, छात्र, पूर्व छात्र और एक बड़ा पारिस्थितिकी तंत्र आगे आए और यही काम यह सम्मेलन करेगा।