शिक्षा-नौकरी
अंग्रेज़ी भाषा के प्रभाव को कम कर भारतीय भाषाओं को बल देता शिक्षा नीति का प्रारूप

हाल ही में आई भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पिछली शिक्षा नीतियों की अपेक्षा अंग्रेज़ी भाषा को कम महत्ता दी गई है। इसके दो प्रमुख कारण इसी प्रारूप में उल्लेखित हैं। सर्वप्रथम, यह माना गया कि मातृभाषा अथवा गृहभाषा में विद्यार्थी अधिक कुशलता से शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं और दूसरा यह कि 1960 के दशक में जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था कि अंग्रेज़ी वैश्विक भाषा बनेगी, वैसा नहीं हो पाया और तकनीकी रूप से विकसित देशों ने अपनी मातृभाषा से ही विकास किया जिससे अंग्रेज़ी ने स्वतः ही अपनी महत्ता खो दी।

हालाँकि अंग्रेज़ी शिक्षा को पूरी तरह नकारा नहीं गया है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह अभी भी विज्ञान की भाषा बनी हुई है (अधिकांश वैज्ञानिक जर्नल अंग्रेज़ी भाषा में उपलब्ध हैं), साथ ही भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय व कई उच्च न्यायालयों में आज भी अंग्रेज़ी भाषा ही प्रचलित है जिसके लिए अंग्रेज़ी आवश्यक है। इस हेतु सरकारी विद्यालयों में भी बेहतर गुणवत्ता वाले अंग्रेज़ी शिक्षक उपलब्ध कराने की बात कही गई है। लेकिन यह अवश्य ही उल्लेखित किया गया है कि बच्चों को कक्षा 8 तक, संभव नहीं हो तो कम से कम कक्षा 5 तक उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए यानी कि अध्यापन का माध्यम मातृभाषा हो।

विज्ञान को समझने में भारतीयों के लिए अंग्रेज़ी भाषा सबसे बड़ी बाधक मानी गई इसलिए खंड 4.5.8 में विज्ञान को दो भाषाओं में सीखने का विशेष प्रावधान बनाया गया है। यह कहता है कि कक्षा 8 तक विद्यार्थियों को दो भाषाओं- उनकी मातृभाषा व अंग्रेज़ी में विज्ञान सिखाया जाए जिससे विद्यार्थी वैज्ञानिक सिद्धांतों और संकल्पनाओं का चिंतन अधिक माध्यमों से कर सकें। “अधिकांश नोबल पुरस्कार विजेता एक से अधिक भाषा में विज्ञान को सोचते-समझते हैं।” और मातृभाषा में विज्ञान के उपलब्ध होने से यह समाज में शीघ्र प्रसारित हो पाता है।

शिक्षा नीति इस बात को भी मानती है कि भारतीय भाषाओं में जो पुस्तकें उपलब्ध हैं, उनकी गुणवत्ता अंग्रेज़ी में उपलब्ध पुस्तकों से कम है। इसके लिए भारतीय अनुवाद व व्याख्या मिशन के अंतर्गत एक संस्थान स्थापित किया जाएगा जो उच्च गुणवत्ता का अनुवाद करेगा। इसमें बहुभाषा-विद होंगे जो सभी भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित करेंगे। एनसीईआरटी और राष्ट्रीय स्तर की पठन सामग्री को सभी प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध कराया जाएगा। कक्षाओं में दो भाषाओं में अध्यापन किया जाएगा। भाषा सामंजस्य बढ़ाने के लिए कुशल शिक्षकों की नियुक्ति का भी प्रावधान है।

अब आते हैं त्रि-भाषा शिक्षा नीति पर जिसपर आरोप है कि यह हिंदी भाषा का आरोपण करती है। यह नीति 1967 से ही शिक्षा नीति में है, 1987 की शिक्षा नीति भी इसका समर्थन करती है। जो परिवर्तन किया गया है, वह मात्र यह है कि शोध में पाया गया कि दो से आठ वर्ष की आयु में बच्चे भाषा को बेहतर ग्रहण करते हैं, जिस कारण से कक्षा 1 से ही तीन भाषाओं से विद्यार्थियों को परिचित कराया जाएगा।

वर्तमान में लागू त्रि-शिक्षा नीति प्रभावशाली नहीं थी, इसका प्रमुख कारण रहा तीसरी भाषा को प्रतिशत गणना में न गिनना जिससे यह तृतीय दर्जे का विषय ही बनकर रह गई। साथ ही यह मात्र कक्षा 6 से 8 तक पढ़ाई जाती है। जहाँ उत्तर भारत में अंग्रेज़ी और हिंदी के अलावा अधिकांश स्कूल संस्कृत को तृतीय भाषा के रूप में लेते हैं, वहीं दक्षिण भारत में अंग्रज़ी और क्षेत्रीय भाषा के अलावा हिंदी को। कक्षा 9 व 10 में अंग्रेज़ी के अलावा कोई एक भारतीय भाषा पढ़ाई जाती है।

नई भाषा नीति का कहना है कि कक्षा 3 तक लिपि और भाषा के आधारभूत ज्ञान को प्राप्त करने के बाद अपनी मातृभाषा में लेखन के साथ-साथ बच्चे कक्षा 3 से अन्य भाषाओं में भी लेखन शुरू करें। यदि लोगों को शंका है कि कक्षा 1 में तीसरी भाषा चुनने में विद्यार्थी समर्थ नहीं होंगे तो उनके लिए एक प्रावधान है जिसके तहत कक्षा 6 या 7 में यदि विद्यार्थी चाहें तो अपनी तीसरी भाषा को बदल भी सकते हैं। बोर्ड परीक्षाओं की वर्तमान व्यवस्था विद्यार्थियों की विश्लेषणात्मक क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए इसे लचीला बनाने की बात कही गई है। प्रारूप में कहा गया है कि इस मॉड्युलर बोर्ड परीक्षा में तीनों भाषाओं की आधारभूत परीक्षा देनी होगी व किसी एक भाषा की परीक्षा साहित्य स्तर की होगी।

1987 की शिक्षा नीति में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि हिंदी-भाषी राज्यों में अंग्रेज़ी व हिंदी के अलावा तीसरी भाषा कोई भारतीय भाषा हो, वहीं हिंदीतर-भाषी राज्यों में अंग्रेज़ी व मातृभाषा के अलावा तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य किया गया था। लेकिन वर्तमान प्रारूप में हिंदी की अनिवार्यता का उल्लेख नहीं किया गया है, हालाँकि 1987 की भाषा नीति को आगे बढ़ाने की बात कही गई है। इससे अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि हिंदी अनिवार्य है अथवा नहीं। हालाँकि विरोध के बाद शासन के कई लोगों ने आगे आकर कहा है कि कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी तो किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व शिक्षा नीति के स्वीकृत होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

भारत जैसे भाषा-विविध देश में सौहार्द और संवाद स्थापित करने के लिए त्रि-भाषा नीति आवश्यक है। व्यवस्था की मजबूरी में अंग्रेज़ी पढ़ने के अलावा, हम अपनी भाषा पढ़ते हैं तो एक और अन्य भाषा तो पढ़नी ही चाहिए, वह भी तब जब हमारे पास इतने विकल्प उपलब्ध हैं। जब हम सिर्फ व्यावहारिकता के लिए एक विदेशी भाषा अंग्रेज़ी पढ़ रहे हैं तो दक्षिण भारतीयों के लिए इस दृष्टिकोण से हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में रखना सबसे उपयुक्त होगा क्योंकि यह भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसमें हिंदी आरोपण का प्रश्न कहीं नहीं है, आरोपण तब होता है जब आपको अपनी भाषा से वंचित कर दूसरी भाषा थोपी जाए, यहाँ तो एक अवसर है और आप पर निर्भर करता है कि इसका लाभ कैसे उठाना है।

वहीं उत्तर भारतीयों की बात करें तो भले ही वे अधिकांश रूप से तृतीय भाषा के रूप में संस्कृत को चुनते हैं, लेकिन न उसके साहित्य से जुड़ पाते हैं, न उसे व्यवहार में ला पाते हैं। ऐसे में यदि हम संस्कृत की समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाने और आत्मसात करने में अक्षम हैं तो हमें इसकी बजाय किसी अन्य भारतीय भाषा को चुनना चाहिए जो कम से कम शिक्षा-रोजगार के लिए प्रवास के इस दौर में सहायक सिद्ध हो सकेगी। विशेषकर यदि किसी दक्षिण भारतीय भाषा को अपनाया जाए तो इससे दक्षिण भारतीय हिंदी अपनाने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।