शिक्षा-नौकरी
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था की असफलताएँ और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति से आशाएँ

वस्तुतः व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया में शिक्षा का निर्विवाद महत्त्व है। वैसे तो ज्ञान प्रत्येक जीव में जन्मतः विद्यमान होता है परंतु शिक्षा ही एकमात्र वह प्रभावी बाह्य माध्यम है जिसके द्वारा उसमें निहित ज्ञान को पुष्पित एवं पल्लवित किया जाता है।

इसलिए शिक्षा ही किसी समाज और राष्ट्र की जागृति का मूल आधार है जिसके अंर्तगत व्यक्ति एवं समाज के द्वैत को निरंतर उच्चतर धरातल पर ले जाते हुए उनके बीच के मतभेद को दूर कर उन्हें एकरूप करने का प्रयास किया जाता है।

चूंकि यह एक सतत तथा व्यापक ज्ञानार्जन की प्रकिया है अतः शिक्षा के उद्देश्य में मूल रूप से साक्षरता के लक्ष्य की पूर्ति के साथ ही साथ शैक्षिक ज्ञान तथा जीवनोपयोगी व्यवसाय का भी समावेश होना चाहिए जो व्यक्ति को जीवन के उच्चतर लक्ष्यों की ओर निरंतर अभिप्रेरित करे तथा सा विद्या या विमुक्तये के सर्वाेच्च उद्देश्य को पूरा करे।

परंतु यह कार्य कहने में जितना आसान है उतना वास्तविक धरातल पर क्रियान्वित करना सुगम नहीं है। अतः इस महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरे समाज तथा देश में सहमतिपूर्ण तरीके से लागू करने के लिए एक प्रगतिशील नीति निर्माण का किया जाना आवश्यक है जो एक लोकतांत्रिक राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था की पूर्वशर्त है।

इस संदर्भ में शिक्षा-नीति निर्माण किए जाने का उद्देश्य प्रचलित शिक्षा व्यवस्था में उन महत्त्वपूर्ण सुधारों से होता है जिसका संबंध देश की भावी पीढ़ी का आकांक्षाओं और अपेक्षाओं से अधिक होता है। शिक्षा-नीति के द्वारा एक राष्ट्र अपने समय के समाज और देश की आवश्यकताओं को पूर्ण रूप से सार्थक सिद्ध करने के लिए कुछ अपेक्षित मानसिक और बौद्धिक जागृति तैयार करता है।

नई शिक्षा-नीति का एक अन्य विशेष अर्थ भी है, जो समाज या जनता-जनार्दन की सोच-समझ में प्रत्यक्ष नयापन लाने के अभिप्राय को प्रकट करता है तथा शिक्षा व्यवस्था के बिगड़ते स्वरूप के प्रति चिंता व्यक्त करता है। भारत के संदर्भ में संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था, विशेष रूप से उच्च शिक्षा का स्वरूप चिंतनीय है जो अनेक गंभीर कमजोरियों से ग्रस्त है।

संभवतः इसीलिए उच्च शिक्षा अपने अपेक्षित लक्ष्यों को पूरा करने में निरंतर असमर्थ साबित हो रही है। सर्वत्र मध्यम-स्तर की भीड़, शिक्षकों द्वारा छात्रों से धनउगाही, परिवारवाद को बढ़ावा, मौलिक लेखन एवं गंभीर शोध का अभाव और दूसरों के शोध या साहित्य की चोरी, छात्र-छात्राओं का शोषण तथा शिक्षण कार्य के प्रति गंभीर उदासीनता जैसी अनेक अनैतिकताएँ और विशाल चुनौतियाँ हैं।

इनके कारण भारत में उच्च शिक्षा देश तथा समाज और पीड़ित मानवता की दुख-दर्द एवं विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्णतया असमर्थ हो चुकी है। वस्तुतः उच्च शिक्षा की ज़िम्मेदारियाँ अत्यंत व्यापक हैं जिसके अंतर्गत नवीन ज्ञान का सृजन या वर्तमान ज्ञान की नई व्याख्या तथा समाज की चुनौतियों का सार्थक हल प्रस्तुत करना आदि विशद लक्ष्य हैं जिसे उच्च शिक्षा को यथासंभव पूरा करना चाहिए। 

इस संदर्भ में हमारा देश आदि काल से ही अत्यंत समद्धशाली एवं सशक्त रहा है क्योंकि प्राचीन भारत में अनेक उदभट तथा चरित्रवान एवं विद्वान आचार्यों एवं शिक्षकों यथा आर्यभट्ट, मम्मट, पतंजलि, वराहमिहिर, पाणिनि आदि द्वारा ज्ञान-मीमांसा एवं ज्ञान पद्धति-शास्त्र के ऐसे विलक्षण आदर्श स्थापित किए जा चुके हैं जिनकी बराबरी कर पाना आज के स्वार्थपरक एवं संकीर्ण विचारपोषी युग में लगभग असंभव है।

नालंदा, तक्षशिला, मगध जैसे उच्चकोटि के विश्वविद्यालय ऐसे श्रेष्ठ ज्ञानार्जन तथा शोध के अद्वितीय केंद्र रहे हैं जिनके प्रतिमान खड़े कर पाना आज लगभग असंभव है। यह इसलिए कि आज सर्वत्र धन या पैसे की प्रधानता है जहाँ योग्यता को सम्मान नहीं मिल पा रहा है।

साथ ही अनेक प्रकार के भ्रष्टाचार के चलते योग्य शिक्षकों का चुनाव नहीं हो रहा है। यद्यपि अन्य सेवाओं के चयन आयोगों के समान उच्च शिक्षा सेवा हेतु आयोगों या भर्ती बोर्डों की कमी नहीं है, परंतु वे निष्पक्ष रूप से काम ही नहीं कर पाते और उनमें काम करने वाले उच्च पदस्थ अधिकारी एवं कर्मी स्वयं युगानुरूप सत्ता के ईशारे पर भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। 

इसी के साथ शिक्षक बनने वे लोग आ रहे हैं जो अन्य सिविल, प्रशासनिक, अभियंत्रण तथा चिकित्सा या स्वास्थ्य सेवाओं आदि में चयनित नहीं हो पाते हैं, अतः थक-हारकर शिक्षा विभाग- विशेषतया उच्च शिक्षा विभाग जहाँ शिक्षकों को संभवतः सबसे ज्यादा वेतन मिलता है- की शरण में आते हैं क्योंकि यहाँ आसानी से संबधों या परिवारवाद के नाम पर या अंततोगत्वा पैसे के बल पर नौकरी मिल ही जाती है।

यहाँ पर ध्यान देना आवश्यक है कि इसके लिए सरकार स्वयं जिम्मेदार है जिसके माननीय मंत्री, सांसद, विधायक, अन्य नेतागण, प्रभावशाली तत्व तथा शैक्षिक माफियागण और इसमें संलिप्त असंख्य दलाल संगठित होकर शिक्षा को सरकार की सर्वसुलभ नीति बनाने के नाम पर इसे मुख्य रूप से मुनाफा व्यापार तथा प्रभाव विस्तार का एक प्रभावशाली साधन बना चुके हैं।

इसी प्रकार सरकार के द्वारा नियुक्त किए जाने वाले बहुसंख्य उच्च पदस्थ विद्वान, कुलपति एवं आयोगों के अध्यक्ष आदि बिना किसी प्रमाणित या स्थापित योग्यता के बावजूद करोड़ों रुपये की रिश्वत देकर जाति, धर्म, किसी संगठन की सदस्यता या राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा एवं समर्पण जैसे कारणों के आधार पर प्रभावशाली पदों पर अपना वर्चस्व स्थापित किए हैं।

ऐसे भ्रष्ट लोगों से क्या अपेक्षा की जा सकती है कि वे सिवाय अनैतिकता, भाई-भतीजावाद एवं सभी किस्म के भ्रष्टाचार बढ़ाने के और उसी में अपना लाभ कमाने के अलावा और क्या करेंगे। नतीजा देश में हर क्षेत्र में पतन स्पष्ट रूप में दिखाई दे रहा है।             

गत वर्ष भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 संसद में प्रस्तुत की गई जिसे सभी वर्गाें के परामर्श से तैयार किया गया है। इसे लाने के साथ ही देश में शिक्षा के समेकित विकास पर व्यापक चर्चा आरंभ हो गई है।

इतने लंबे अंतराल, 35 वर्ष बाद, देश के नीति निर्माताओं ने देश की शिक्षा प्रणाली में बहुत बड़े और महत्त्वपूर्ण बदलाव किए हैं जिसका लक्ष्य निस्संदेह एक समरसतायुक्त, समतामूलक, विकासशील तथा आधुनिक राजनीतिक एवं आर्थिक समाज तथा वैश्विक ज्ञान शक्ति का निर्माण करना है। इस नई शिक्षा नीति से संपूर्ण राष्ट्र को बहुत आशाएँ हैं जिसकी सफलता से उच्च शिक्षा में भी अपेक्षित सुधार होना अवश्यंभावी है।

सुधांशु त्रिपाठी उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज में आचार्य हैं।