शिक्षा-नौकरी
शिक्षा में शास्त्रों के समावेश से क्या हम अपने सामूहिक चारित्रिक पतन को रोक सकते हैं

शिक्षा मानवीय जीवन को परिष्कृत कर विकारमुक्त बनाती है, भ्रम के कुहासे का पटापेक्ष कर जीवन की सच्चाई बताती है। कर्तव्यबोध का अहसास कराती है और सद्चरित्र का पाठ पढ़ाती है। भारतीय ज्ञान पद्धति में शिक्षा मात्र जीवकोपार्जन या बौद्धिक विलासिता का साधन नहीं वरन् मूल्याधारित जीवन जीने की कला है, परमार्थ की भावना है।

शिक्षा का असल उद्देश्य अंतस में समाहित अपरिमित ऊर्जा का जागरण है, समाज-हित में उसका क्रियान्वयन है। इसका लक्ष्य व्यक्तित्व को नवीन उत्कर्षों तक पहुँचाना है। शिक्षा अनंत संभावनाओं के आकाश में विचरण करने की स्वतंत्रता है। एक ऐसी स्वतंत्रता जो दुरूह परिस्थितियों में भी जीवन को गतिशील बनाए रखे, उसकी लयबद्धता को कायम रखे।

शिक्षा विचारों का भटकाव नहीं, न ही जीवन का ठहराव है। यह तो व्यक्तित्व का स्थायित्व है। मन और बुद्धि का सामंजस्य है। विकारों और दुर्गुणों पर विजय है। मानवीयता के उच्च आदर्शों की प्राप्ति का साधन है। परंतु आज हमारी शिक्षा पद्धति इतनी विकृत और संकीर्ण हो गई है कि हम व्यक्तिगत उत्कर्ष से आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं। विचार संक्रमित हो गए हैं। सामुहिकता लुप्त हो गई है और ज्ञानेंद्रियाँ शून्य।

परमार्थ के स्थान पर स्वार्थ और सर्वजन हिताय के जगह स्वहिताय का भाव आ गया है। आज सूचना और जानकारी के विस्फोट तथा जीवन की बढ़ती हुई गति ने यथार्थ की पहचान को इतना मुश्किल बना दिया है कि अचानक हमें लगने लगा है जैसे जीवन को जानने-पहचानने की जो हमारी शक्तियाँ थी, हमारी संवेदना थी, हमारी इंद्रियाँ थीं, वे अपर्याप्त-सी हो गई हैं।

सूचना का, जानकारी का एक कुहासा-सा हमारे चारों ओर घिर आया है, एक वृत्त है जिसके भीतर हम घिरे हुए हैं, वह घूम रहा है हमारे साथ-साथ, हमारे चारों ओर और उसने, जैसे हमारी देख पाने की, सोचने समझने की, शक्ति को कुंद-सा कर दिया है। आज हम देखते हैं कि किस तरह मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है, मनुष्य संवेदना शून्य होता जा रहा है। उनके व्यवहार में सामाजिकता का लोप हो रहा है।

महामारी के समय जब मानवता अपने अस्तित्व से जूझ रही थी तब जिस तरह से कालाबाज़ारी करने वाले लोगों ने अपनी सामाजिक निष्कृष्टता और लोभ का परिचय दिया है, उससे हमारे सामाजिक चारित्रिक पतन का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। यह सब हमारे शिक्षा तंत्र की विफलता का परिणाम है। वह अपने उद्देश्य से भटक गया है।

फलतः भारत में उत्तम मनुष्य, राष्ट्रभक्त, नीतिमान एवं प्रामाणिक व्यक्ति दुर्लभ हो गए हैं। हमारे सामाजिक एवं राजकीय मूल्य नष्ट हो गए हैं और अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति के ढाँचे में ढले हुए निकृष्ट, व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी, रोगी और अप्रमाणिक व्यक्ति जो परोक्ष रूप से अंग्रेज़ियत के समर्थक हैं, ऐसे लोग आज समाज का, प्रशासन का नेतृत्व करने लगे हैं जिसकी परिणीति आए दिन हम अधिकारियों की गुंडागर्दी के रूप में देखते हैं।

आज पढ़-लिखने के बाद भी विद्यार्थी ये तय नहीं कर पाता कि उसे क्या करना है यानी उसके एक पक्ष का विकास ही नहीं हुआ। जबकि शास्त्र हमारे सर्वागींण विकास हेतु प्रतिबद्ध हैं। वे हमें बताते हैं कि हमे क्या करना है, क्या नहीं करना है, हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है। शास्त्र हमारी चेतना को अनंत विस्तार देते हैं साथ ही हमारे सामाजिक व्यवहारिकता का पाठ पढ़ाते हैं।

शास्त्र ज्ञान, सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत के वाहक हैं। इनसे हमारी प्रज्ञा और कल्पनाशीलता की जो तृप्ति होती है, वह अन्य माध्यमों से संभव नही हैं। यह मानवीय विकारों को कम कर, मनुष्य को मनुष्य बनने का मार्ग दिखाते हैं और हमारी संवेदनाओं, विचारों को जाग्रत कर एक सकारात्मक, ऊर्जावान परिवेश का निर्माण करते हैं।

इसी परिवेश में स्वस्थ, स्वतंत्र और अनुशासित समाज के भाव पल्लवित होते हैं और आदर्श मानवीयता के विचार दृष्टिगोचर होते हैं। वास्तव में शास्त्रों से हमारी स्थिरप्रज्ञा को नैतिकता और सहृदयता का सम्मिश्रण प्राप्त होता है। शास्त्र ही हमें बेहतर व्यक्ति बनाते हैं, अराजकता के दौर में राहत का एहसास कराते हैं और अपने भीतर कोमलता और संवेदना को बचाए रखने का माध्यम बनते हैं।

अंततः अपनी संस्कृति के साथ यही एक जुड़ाव हमें एक रोबोट नहीं बनने देता और हमारे भीतर मानवता को बरक़रार रखता है जिससे जीने के रास्ते सरल हो जाते हैं। शास्त्र हमारे जीवन में उस सघन छाया की तरह हैं जहाँ ठहरकर थोड़ा विश्राम किया जा सकता है। आज की परिस्थिति में जब हर तरफ अनाचार और अनैतिकता का प्रभाव है, आदर्शवादिता और कर्तव्यनिष्ठता का आभाव है, सामाजिक सरोकार लुप्त है तब हमें शास्त्रों की ओर लौटने का विचार करना चाहिए।