शिक्षा-नौकरी
बोर्ड परीक्षाओं के बाद विषय चुनने में असमंजस? जानें पेरेंट्स काउंसलिंग और अन्य

10वीं की परीक्षाएँ की समाप्ति के बाद विद्यार्थियों को आराम करने के साथ-साथ यह भी सोचने की ज़रूरत है कि अब इसके बाद वे क्या करेंगे। अगर सिर्फ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की बात करें तो इस साल भारत के 18 लाख 91 हज़ार से भी अधिक विद्यार्थियों ने बोर्ड की परीक्षाएँ दी हैं। इन परीक्षाओं के बाद विद्यार्थियों को अपने लिए विषयों का चयन करना होता है, जिसपर यह निर्भर करता है कि विद्यार्थी अपने भावी जीवन में किस तरह के व्यवसाय से जुड़ सकते हैं। और अक्सर विद्यार्थी अपने विषयों का चयन अपनी रुचि के हिसाब से नहीं बल्कि औरों को देख कर करते हैं, और जिनके परिणामों के बारे में भी उन्हें खबर नहीं होती है।

और बच्चों को इस समय अगर कोई सही दिशा दिखा सकता है तो वह उनके माता-पिता ही होते हैं पर इसके लिए भी यह ज़रूरी है कि पहले अभिभावकों को इस बारे में पूरा ज्ञान हो कि उन्हें अपने बच्चे को किस तरह की सलाह देनी चाहिए और उनके साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए। 

इन सभी बातों के लिए परामर्श देने के लिए बहुत सारे विद्यालय, निजी कंपनियाँ और मनोवैज्ञानिक संस्थान भी निजी और एक सामूहिक तौर पर पेरेंट्स कॉउंसलिंग के सत्रों का आयोजन करवाते हैं। हाल की भाजपा सरकार ने भी विद्यार्थी जीवन में पेरेंट्स कॉउंसलिंग के महत्त्व को समझते हुए सरकारी और राष्ट्रीय रूप में इस दिशा की ओर कदम बढ़ाए हैं।

पेरेंट्स काउंसलिंग कहते किसे हैं ?

पेरेंट्स काउंसलिंग में डॉक्टर, मनोविज्ञान विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा अभिभावकों का पहले साक्षात्कार लिया जाता है। उनकी पूरी तरह बात सुनने के बाद समस्या की जड़ तक पहुँचा जाता है, जिसके बाद अभिभावकों को उनकी मौजूदा परवरिश शैली के बारे में बताया जाता है कि वह किस तरह अपने बच्चे से अभी तक व्यवहार करते आ रहे थे और उसके बाद विशेषज्ञ उन्हें कुछ तौर-तरीके और उपचारों की सलाह देते हैं।

इन सत्रों में माता-पिता को बिना किसी पक्षपात और पूर्व धरना के आधार पर विशेषज्ञों द्वारा दिशा-निर्देश दिए जाते हैं।

इस संबंध में पेरेंट्स काउंसलिंग बहुत ही कारगर साबित होती है, क्योंकि अगर पहले माता-पिताओं को पता होगा कि उनके बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत तो हो सकता है कि तो वह अपने बच्चे की विषयों का चुनाव करने में सहायता कर सकते हैं।

पेरेंट्स काउंसलिंग और बच्चों के द्वारा विषयों के चयन पर, लुधियाना के खालसा कॉलेज फॉर वीमेन के मनोविज्ञान विभाग की सहायक प्राध्यापिका मनप्रीत कौर का कहना है, “अभिभावकों को नियमित रूप से पेरेंट्स काउंसलिंग के सत्रों में भाग लेना चाहिए और यह समझना ज़रूरी है कि अपने सपनों को अपने बच्चों में पूरा करने की चाहत ना रखें और दूसरा की माता-पिताओं को अपने बच्चों का साइकोमेट्रिक टेस्ट करवाना चाहिए ताकि उनके बच्चे की रुचि उन्हें और उनके बच्चे को पता चल पाए, जिससे की उन्हें 10वीं के बाद विषय चुनने में आसानी रहे”।

विषयों के चयन करने पर प्राध्यापिका मनप्रीत ने बताया कि विद्यालयों को यह योजना बनानी चाहिए कि जिसमें अगर बच्चे की रुचि गणित के साथ-साथ मनोविज्ञान या फिर किसी अन्य विषय को पढ़ने में है तो विद्यालय उन्हें यह स्वतंत्रता प्रदान कर सके, जिससे कि बच्चों में अपने फैसले खुद लेने का हौंसला कायम होगा। 

पेरेंट्स काउंसलिंग की महत्ता पर आबूरोड के सेंट जॉन स्कूल की एक अध्यापिका के अनुसार यह सत्र अभिभावकों के लिए इस लिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वह ही हैं जो अपने बच्चे का वास्तविक सामर्थ्य व रुचि जान कर उन्हें सही दिशा दे सकते हैं।

साइकोमेट्रिक टेस्ट (मानस-मिति संबंधी जाँच)

किसी भी विषय का चुनाव करने से पहले यह जान लेना बहुत ही आवश्यक है कि किसी एक विषय के लिए एक विद्यार्थी के अंकों  से अहम उसकी वास्तविक क्षमता होती है।

साइकोमेट्रिक टेस्ट एक वैज्ञानिक विधि है, जो कि विद्यार्थी में मौजूद कौशल, रुचि और उसके व्यक्तित्व का आंकलन करने में इस्तेमाल किया जाता है। इससे विद्यार्थियों को अपने भविष्य के लिए विषयों का चयन करने में सहायता मिलती है।

यह टेस्ट विद्यार्थियों का ही नहीं बल्कि बड़ी कंपनियाँ भी अपने यहाँ लोगों को काम पर रखने से पहले करवाती हैं ताकि कंपनी में काम करने से पहले उनकी रुचि, व्यक्तित्व और कौशल का आंकलन कंपनी कर सके।

इस टेस्ट में विद्यार्थियों से अनेक तरीके की समाजिक स्थितियों के हिसाब से सवाल पूछे जाते है कि किस तरह वह इन स्थितियों में अपनी प्रतिक्रिया देंगे। साथ ही साथ कुछ सवाल गणित, अंग्रेजी भाषा, इतिहास, किस व्यवसाय में वह अपना भविष्य देखते और साथ ही साथ कुछ एक मुद्दों पर बच्चों की राय भी मांगते हैं।  

यह टेस्ट 20 मिनट से लेकर 40 मिनट तक का होता है, और यह ज़्यादातर ऑनलाइन माध्यम से करवाया जाता है। 

सरकारी मदद

पेरेंट्स काउंसलिंग और विद्यार्थियों की कॉउंसलिंग की महत्ता को समझते हुए मौजूदा केंद्र सरकार ने भी इस दिशा में प्रारंभिक कदम उठाए हैं।

जो विद्यार्थी और माता-पिता निजी कंपनियों द्वारा आयोजित करवाए गए सत्रों के लिए मांगी गई भारी फीस का भुगतान नहीं कर सकते, वह सरकार के द्वारा आयोजित इन साधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

भारत की कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2015 में स्किल साथी योजना की शुरुआत की जिसमें मंत्रालय का मुख्य केंद्र विद्यार्थियों की काउंसलिंग पर है, ताकि वेअपनी रूचि के हिसाब से विषयों और व्यवसाय का चयन कर सकें।

20 जुलाई 2015 में ही प्रधानमंत्री के नेतृत्व में श्रम एंव रोज़गार मंत्रालय ने भी नेशनल करियर सर्विसेज़ की शुरुआत की थी जिसका भी मुख्य कार्य विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की कॉउंसलिंग करना है।

नेशनल करियर सर्विसेस एक सरकारी वेबसाइट है जिसपर आप बिना कोई लॉग-इन करे काउन्सलर्स की जानकारी वहाँ से ले सकते हैं और निजी रूप से काउन्सलर्स से बात करके कॉउंसलिंग सत्र का आयोजन करवा सकते हैं।

इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान अगर हम एक विद्यार्थी के जीवन में रखना शुरू कर दे, फिर इससे फर्क नहीं पड़ता कि हर विद्यार्थी के माता-पिता का शिक्षित होना ही ज़रूरी है या नहीं हम किसी भी रिश्ते के रूप में उनकी सहायता कर सकते हैं। तो हो सकता कि वह भविष्य में विद्वान बन पाएँ या नहीं पर हाँ, इससे उनका आज का सफर थोड़ा आसान ज़रूर हो सकता है।

सोमेश स्वराज्य में प्रशिक्षु व अमिटी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता अंतिम वर्ष के छात्र हैं। वे @someshkhatrii के नाम से ट्वीट करते हैं।