रक्षा
इस्लामिक स्टेट-खुरासान प्रांत का पाकिस्तान व तालिबान से संबंध, भारत को क्या है खतरा

26 अगस्त को काबुल हवाई अड्डे पर हमले के बाद से यूएस ने कुछ हवाई हमले करके अपने 13 सैनिकों की मृत्यु का बदला लिया है। काबुल हमले की ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट-खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) ने ली थी। रोचक रहा कि स्वयं एक आतंकवादी संगठन तालिबान ने भी इस हमले की निंदा की थी।

तालिबान और आईएसकेपी के संबंध समझने से पहले देखते हैं कि आईएसकेपी है क्या। खुरासान जिसे प्रायः ग्रेटर खुरासान के नाम से जाना जाता है, वह एक ऐतिहासिक क्षेत्र है और ग्रेटर ईरान का पूर्वोत्तर प्रांत है जिसमें ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कुछ क्षेत्र आते हैं।

काबुल हमला चौंकाने वाला नहीं था क्योंकि खुफिया एजेंसियों ने इस समूह से संभव खतरे की चेतावनी दी थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम जाने जाने वाले इस समूह पर ब्रिटिश और पश्चिमी यूरोपीय अधिकारियों ने भी चेतावनी दी थी।

आईएसकेपी की स्थापना मात्र छह वर्ष पूर्व हुई है जब इस्लामिक स्टेट के दो प्रतिनिधि पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत- बलोचिस्तान गए थे एक बैठक के लिए। बैठक में कुछ असंतुष्ट तालिबान कमांडर और अन्य कट्टरपंथी थे जो क्षेत्र में लड़ रहे थे लेकिन अफगान-जिहादी आंदोलन में अपनी भूमिका से असंतुष्ट थे।

पहले अफगानिस्तान और फिर पाकिस्तान में रहा तालिबान का पूर्व सदस्य हाफिज़ सईद खान आईएसकेपी का पहला अमीर बना। इस क्षेत्र के अन्य आतंकवादी समूहों के पूर्व सदस्य भी इस संगठन से जुड़े। आज इस संगठन में पाकिस्तान आधारित लश्कर-ए-तैय्यबा के अधिकांश आतंकवादी हैं।

2015 में मूल संगठन- आईएसआईएस अपने शिखर पर था और सीरिया व इराक के कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था। वह वैश्विक विस्तार का सपना देख रहा था जिसमें इस्लामिक विश्व में हर कहीं उससे संबंधित संगठन हों।

जब लेवंट क्षेत्र में आईएसआईएस की शक्ति कम हुई तो समूह ने खुरासान क्षेत्र पर अपना अधिकार मज़बूत करने पर ध्यान लगाया। वैचारिक रूप से आईएसकेपी न सिर्फ पश्चिम-विरोधी है, बल्कि तालिबान का भी विरोध करता है क्योंकि उसके अनुसार तालिबान पर्याप्त इस्लामवादी नहीं है।

उसका मानना है कि यूएस के साथ समझौते की इच्छ दर्शाकर तालिबान ने इस्लामिक मत का त्याग कर दिया है और वह सख्ती से इस्लामिक नियम लागू नहीं कर पा रहा है। उसने कहा है कि तालिबान बिक चुका है क्योंकि समझौते पर हस्ताक्षर करके वह अमेरिका की निकासी में सहयोग कर रहा है।

यूएस-तालिबान समझौता

इसके अलावा, तालिबान की प्रेरणा इस्लाम का हनफी पंथ है, जबकि आईएसकेपी सलाफी परंपरा को मानता है जो देश के पूर्वी प्रांतों में मज़बूत है। दोनों में से आईएसकेपी अधिक विषैला है क्योंकि वह काफिरों- हिंदुओं और सिखों व इस्लाम में शिया जैसे अल्पसंख्यकों के प्रति अधिक असहिष्णु है।

वैचारिक कारणों के अलावा आईएसकेपी ने स्वयं को तालिबान का शत्रु भी घोषित कर दिया है क्योंकि आर्थिक व मानव संसाधनों के लिए दोनों जिहादी समूहों में एक प्रतिस्पर्धा है। 2015 में इसने तालिबान के विरुद्ध युद्ध भी छेड़ दिया था जिसमें एक भूभाग पर इसने अधिकार कर लिया था।

हालाँकि, 2015 से 2018 के बीच इसने अमेरिका और पाकिस्तानी सरकार को ओर से आतंक-रोधी दबाव के कारण अपने 12,000 लड़ाकों को खो दिया था। मार्च 2020 में यूएनएससी रिपोर्ट में कहा गया था कि 1,400 लड़ाकों ने समर्पण किया है व पश्चिमी कुनार प्रांत में इसकी उपस्थिति बनी हुई है।

2020 के दौरान नेतृत्व, मानव और वित्तीय संसाधनों में नुकसान के बावजूद इस संगठन ने वापसी की है। यूनाइटेड स्टेट्स और तालिबान के समझौते का विरोध करने वाले दुराग्रही तालिबानियों और कुछ अन्य आतंकवादियों को आकर्षित करके आईएसकेपी ने अपने पुनर्निर्माण को बल दिया।

शीघ्र ही संगठन ने अल्पसंख्यकों, नागरिक समाज के नेताओं, सरकारी कर्मचारियों और अफगान राष्ट्रीय रक्षा एवं सुरक्षा बलों के कर्मियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। पिछले वर्ष 26 मार्च को काबुल स्थित गुरुद्वारे में हुए आतंकी हमले की ज़िम्मेदारी आईएसकेपी ने ली थी।

इस हमले में अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदू-सिख समुदाय के 25 लोग मारे गए थे। 8 जून को बघलान प्रांत में मानव सेवा कार्य करने वाले समूह हैलो ट्रस्ट पर हमले की ज़िम्मेदारी भी आईएसकेपी ने ली थी जिसमें 10 लोग मारे गए थे और 16 घायल हुए थे।

हैलो ट्र्स्ट पर हमले में मारे गए लोगों के ताबूत

पाकिस्तान का हाथ

हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबान और आईएसकेपी जितने धुर-विरोधी लगते हैं, उतने हैं नहीं। वे न सिर्फ इस्लामवाद की विचारधारा के कारण एक हैं, बल्कि हक्कानी नेटवर्क से भी दोनों समूह जुड़े हुए हैं।

हक्कानी नेटवर्क एक नामित आतंकी संगठन जिसे माना जाता है कि वह पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज़ इन्टेलीजेन्स एजेन्सी का सच्चा हाथ है। लंदन आधारिक एशिया पैसिफिक फाउंडेशन के डॉ सज्जन गोहेल के अनुसार हक्कानी नेटवर्क ने पहले भी आईएसकेपी के साथ काम किया है।

अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी नेटवर्कों पर नज़र रखने वाले गोहेल बताते हैं कि 2019 और 2021 के बीच कई बड़े हमलों में दोनों ने साथ में काम किया था। आतंक-रोधी विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामिक आतंकवाद को ढकने के लिए आईएसकेपी मात्र एक छलावा है।

इस समूह में न सिर्फ लश्कर-ए-तैय्यबा के कई सदस्य है, बल्कि संगठन का पूर्व प्रमुख असलम फारूकी उर्फ अब्दुल्ला ओरोकज़ाई एक पाकिस्तानी नागरिक है। गुरुद्वारा हमले के संबंध में अफगान बलों ने उसे अप्रैल 2020 में पकड़ा था।

पूछताछ के दौरान उसने स्वीकारा था कि लश्कर-ए-तैय्यबा से उसका संबंध है। संभव है कि भले ही आईएसकेपी की स्थापना इस्लामिक स्टेट की एक इकाई के रूप में हुई परंतु पश्चिमी एशिया में उसके पतन के बाद तालिबान को चुनौती देता हुआ यह समूह पाकिस्तानी तत्वों के अधिक निकट पहुँच गया।

भारत पर दृष्टि

विशेषज्ञों का मानना है कि आईएसकेपी मात्र एक समूह है जिसे पाकिस्तान पोषित कर रहा है ताकि अफगानिस्तान और भारत में आतंकी हमले करवाए जा सकें और साथ ही यह भी कहा जा सके कि इसमें पाकिस्तान का कोई हाथ नहीं है।

इसी कारण से यह समूह भारतीयों को भी भर्ती करना चाह रहा है और उनकी संलिप्तता रेखांकित करके भारत के विरुद्ध जिहाद छेड़ने के लिए और लोगों को प्रोत्साहित करना चाह रहा है, जो वास्तव में, हमेशा से पाकिस्तान का स्वप्न रहा है।

इस समूह के माध्यम से तालिबान पर भी पाकिस्तान बढ़त बना सकेगा। ध्यान दें कि मार्च 2020 में काबुल गुरुद्वारे पर हमले के मॉड्यूल का नेतृत्व एक भारतीय ने किया था जिसकी पहचान मोहम्माद मुहासिन के नाम से हुई है और केरल मूल का है। अफगान बलों ने उसे मार गिराया था।

इसी तरह काबुल हवाई अड्डे पर हुए विस्फोट में भी केरलवासियों की भूमिका संभव बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि तालिबान ने बगराम जेल से केरल के 14 लोगों को रिहा कर दिया था। बाद में ये आईएसकेपी से जुड़ गए थे।

सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीयों को भर्ती करने का प्रयास किया जाता है। 2015 में जब समूह बना था तो 25 से अधिक भारतीय इससे जुड़े थे। हाल ही में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने क्रोनिकल फाउंडेशन के नाम से इंस्टाग्राम चैनल चलाने वाले भारतीय मॉ्यूल का भंडाफोड़ किया था।

इसे चलाने वाले आईएसकेपी के संपर्क में थे और कुछ सीरिया, इराक व अफ्रीका से भी जुड़े थे। केरल के मलप्पुरम का मोहम्मद अमीन इस मॉड्यूल का नेतृत्व कर रहा था। इस चैनल के 5,000 से अधिक सदस्य थे जिनमें से कई ने अप्रैल 2019 में ईरान के माध्यम से अफगानिस्तान जाकर आईएसकेपी से जुड़ने का प्रयास किया था।

मार्च से एनआईए ने जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक और केरल में छापेमारी करके मॉ्यूल के 10 सदस्यों को पकड़ा है। हूप और टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से वे जिहादी विचारधारा फैला रहे थे, सदस्यों की भर्ती कर रहे थे और वित्त इकट्ठा कर रहे थे।